रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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हजारों अच्छे-अच्छे गाँव हैं, जिनमें वैद्य, दर्जी, धोबी निवास ही नहीं करते।
उन गाँवों के लोगों को दस, बीस कोस दूर दौड़ना पड़ता है। वे इतने दुखी होते
हैं कि जिसका अनुमान करना कठिन है। विवाह आदि के अवसरों पर यथासमय
कपड़े नहीं मिलते। काष्ठादिक औषधियाँ बड़े-बड़े कस्बों में नहीं मिलतीं। यदि
मामूली अत्तार बनकर ही कस्बे में बैठ जाएँ, और दो-चार किताबें देखकर औषधि
दिया करें तो भी तीस-चालीस रुपये मासिक की आय तो कहीं गई ही नहीं। इस
प्रकार उदर-निर्वाह तथा परिवार का प्रबंध हो जाता है। गाँवों की अधिक
जनसंख्या से परिचय हो जाता है। परिचय ही नहीं, जिसका एक समय जरूरत पर
काम निकल गया, वह आभारी हो जाता है। उसकी आँखें नीची रहती हैं।
आवश्यकता पड़ने पर वह तुरंत सहायक होता है। गाँव में कौन ऐसा पुरुष है
जिसका लुहार, बढ़ई, धोबी, दर्जी, कुम्हार या वैद्य से काम नहीं पड़ता? मेरा पूर्ण
अनुभव है कि इन लोगों की भले-भले गाँववासी खुशामद करते रहते हैं।
रोजाना काम पड़ते रहने से और संबंध होने से यदि थोड़ी-सी चेष्टा की
जाए और गाँववासियों को थोड़ा-सा उपदेश देकर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न
किया जाए तो बड़ी जल्दी काम बने। अल्प समय में ही वे सच्चे स्वदेश भक्त
खद्दरधारी बन जाएँ। यदि उनमें एक दो शिक्षित हों तो उत्साहित करके उसके
पास एक समाचार पत्र मँगाने का प्रबंध कर दिया जाए। देश की दशा का भी
उन्हें कुछ ज्ञान होता रहे। इसी तरह सरल-सरल पुस्तकों की कथाएँ सुनाकर उनमें
से कुप्रथाओं को भी छुड़ाया जा सकता है। कभी-कभी स्वयं रामायण या भागवत
की कथा भी सुनाया करें। यदि नियमित रूप से भागवत की कथा कहें तो पर्याप्त
धन भी चढ़ावे में आ सकता है, जिससे एक पुस्तकालय स्थापित कर दें। कथा
कहने के अवसर पर बीच-बीच में चाहे कितनी राजनीति का समावेश कर जाएँ,
कोई खुफिया पुलिस का रिपोर्टर बैठा हो जो रिपोर्ट करे। वैसे यदि कोई
खद्दरधारी गाँव में उपदेश करना चाहे तो तुरंत ही जमींदार पुलिस में खबर कर
दे और यदि कस्बे के वैद्य, लड़के पढ़ाने वाले अथवा कथा कहने वाले पंडित कोई