प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
( 188 )
सीता—हूं । आज भी मुझे विश्वास नही होता । (पास जाकर) आर्यपुत्र की
जय हो ।
रामः—सीते, क्या जानती हो, पहले हम इस जनस्थान मे रहा करते थे ।
क्या तुम पुत्र के समान पाले गए इन वृक्षों को पहचानती हो ?
सीता—जानती हूँ, जानती हूं । जिन वृक्षों को छोटे-छोटे पत्तो वाली
स्थिति मे देखा था, अब वे नेत्र ऊपर करके देखने योग्य हो गए हैं ।
राम—ऐसा ही है । समय सचमुच अन्तर उत्पन्न कर देता है । सीते, याद है,
इस सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे श्वेत वस्त्र पहने हुए भरत को देख कर
हरिणों का झुण्ड भयभीत हो गया था ।
सीता—आर्यपुत्र, अच्छी तरह से याद है ।
राम—और यह हमारी तपस्या का साक्षी बना हुआ विशाल सरोवर है ।
यही बैठ कर हमने पिताजी की श्राद्ध क्रिया की चिन्ता करने के
समय कांचनपार्श्व नामक हिरण को देखा था ।
सीता—हूँ, आर्यपुत्र, उसका आप नाम मत लीजिए, मत लीजिए । (भयभीत
होकर कांपती है ।)
राम—मत घबराओ, मत घबराओ वह समय तो बीत गया । (चारों ओर देख
कर) अरे, यह क्या है ?
लोध्रपुष्प के समान सफेद धूल उड रही है । वह हवा से प्रसारित
की हुई चारो दिशाओं को ढक रही है । यह शंख ध्वनि वाद्य यन्त्रो
तथा शूर वीरों के गर्जन से वृद्धि को प्राप्त करके इस शान्त तपोवन
को नगर का रूप दे रही है । (४)
(३) मूल
(प्रविश्य)
लक्ष्मणः—जयत्वार्यः ! आर्य !
अयं सैन्येन महद्वता त्वग्दर्शनसमुत्सुकः ।
मातृभिः सह सम्प्राप्तो भरतो भ्रातृवत्सलः ॥ (५)
रामः—वत्स लक्ष्मण ! किमेवं भरतः प्राप्त इति ?
लक्ष्मणः—आर्य ! अथ किम् ।
रामः—मैथिली ! श्वश्रूजनपुरोगं भरतमवलोकयितुं विशालीक्रियतां
ते चक्षुः ।
सीता--आर्यपुत्र ! एष्टव्ये काले भरतः आगतः ।
(ततः प्रविशति भरतः समातृकः)
भरतः--तैस्तैः प्रवृद्धविषयैर्विषमैर्विमुक्त
मेघैर्विमुक्तममलं शरदिव सोमम् ।
आर्यासहायमहमद्य गुरुं दिदृक्षुः
प्राप्तोऽस्मि तुष्टहृदयः स्वजनानुबद्धः ॥ (६)
रामः--अम्बा ! अभिवादये ।
सर्वाः--जात ! चिरञ्जीव । दिष्ट्या वर्धामहे अवसितप्रतिज्ञं त्वां
कुशलिनं सह वध्वा प्रेक्ष्य ।
रामः--अनुगृहीतोऽस्मि ।
क्ष्मणलः--अम्बाः । अभिवादये।
सर्वाः--जात ! चिरजीव ।
लक्ष्मणः--अनुगृहीतोऽस्मि ।
सीता--आर्याः ! वन्दे ।
सर्वाः--वत्से ! चिरमङ्गला भव ।
सीता--अनुगृहीतास्मि ।
भरतः--आर्य ! अभिवादये, भरतोऽहमस्मि ।
रामः - एह्येहि वत्स ! इक्ष्वाकुकुमार ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
वक्षः प्रसारयं कवाटपुटप्रमाण
मालिङ्ग मां सुविपुलेन भुजद्वयेन ।
उन्नामयाननमिदं शरदिन्दुकल्प
प्रह्लादय व्यसनदग्धमिदं शरीरम् ॥ (७)
भरतः--अनुगृहीतोऽस्मि । आर्ये ! अभिवादये । भरतोऽहमस्मि ।
सीता--आर्यपुत्रेण चिरसञ्चारी भव ।
भरतः--अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये ।
लक्ष्मणः--एह्येहि वत्स ! दीर्घायुर्भव । परिष्वजस्व गाढम् । (आलि-
ङ्गति)
( 190 )
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! प्रतिगृह्यता राज्यभारः ।
रामः - वत्स ! कथमिव ।
कैकयी—जात ! चिराभिलषितः खल्वेष मनोरथः ।
शब्दार्थ—भ्रातृवत्सलः = भाई से स्नेह रखने वाला । श्वश्रूजनपु-
रोगं = सासुएँ जिसके आगे चल रही हैं, ऐसे भरत को । अवलोकयितुम्=देखने
को । विशालीक्रियता=दीर्घ बनाओ । एष्टव्ये = अभीष्ट, चाहे गए । समा-
तृकः = माताओं के साथ । प्रवृद्धंविपर्यं = अनेक प्रकार के । विपमैः = संकटों
से । विमुक्तं = विरहित या छूटा हुआ । अमलं = स्वच्छ । शरदि = शरद्
ऋतु में । सोमम् = चन्द्रमा को । आर्यासहाय = सीता के सहित । गुरुं = पूज्य
को । दिदृक्षुः = देखने का इच्छुक । तुष्टहृदयः = प्रसन्न मन वाला । स्वज-
नानुबद्धः = अपने आदमियों द्वारा पीछे-पीछे आते हुए । अम्बाः = हे जननियो ।
वर्धामहे=आनन्द से परिपूर्ण हैं । अवसितप्रतिज्ञं = पूर्ण व्रत वाले । सह वध्वा=
बहू सीता के साथ । चिरमङ्गला = बहुत समय तक कल्याण प्राप्त करने
वाली । अनुगृहीत = कृपा से युक्त । आर्यपुत्रेण = राम के साथ । चिर-
सञ्चारी = बहुत समय तक साथ चलने वाले अर्थात् सुख भोगने वाले । प्रति-
गृह्यता = स्वीकार करो । चिराभिलषितः = बहुत समय से इच्छित ।
अन्वय —अयं भ्रातृवत्सलः त्वद्दर्शनसमुत्सुकः भरतः महता सैन्येन
मातृभिः सह सम्प्राप्तः । (५)
अन्वय—अद्य तुष्टहृदयः अहम् स्वजनानुबद्धः शरदि मेघैः विमुक्तम्
अमलं सोमम् इव तैः तैः प्रवृद्धविपर्यैः विषमः विमुक्तम् आर्यासहाय गुरुं
दिदृक्षुः प्राप्तः अस्मि । (६)
अन्वय—यह पद्य अंक ४, पद्य १६ में पहले आ चुका है । (७)
हिन्दी अर्थ
(प्रवेशक रुके)
लक्ष्मण—आर्य की जय हो ! हे आर्य,
भाई से स्नेह रखने वाला, आपके दर्शन के लिए लालायित बना यह
भरत विशाल सेना को लेकर माताओं के साथ यहां आ गया है ।
राम—वत्स लक्ष्मण, क्या ऐसा ? भरत आ गया है ।
लक्ष्मण—आर्य, और क्या ।
( 191 )
राम -- सीते, भरत के साथ तुम्हारी सासुएँ आ रही हैं। उनके दर्शन के
लिए तुम्हारी आँखो को विशाल बना लो।
सीता -- आर्यपुत्र, चाहे गए समय पर भरत आ गए।
(इसके बाद भरत का माताओं के सहित प्रवेश)
भरत -- आज अतिप्रसन्न हृदय वाला मै अपने आत्मीय जनो के साथ, शरद्
काल मे बादलो से रहित् स्वच्छ चन्द्रमा के समान, नाना प्रकार के
संकटो से मुक्त हुए, पूज्य सीता के सहित राम को देखने को इच्छुक
यहा आया हूँ। (६)
राम -- जननियो, मै प्रणाम करता हूं।
सभी -- पुत्र चिरजीव रहो। सौभाग्य से, अपने वचन निभाकर, सीता के साथ
तुम्हे कुशलतापूर्वक देख कर हम बहुत सुखी हैं।
राम -- कृपा से युक्त हूँ।
लक्ष्मण -- जननियो को प्रणाम।
सभी -- पुत्र, चिरजीवी बनो।
लक्ष्मण -- कृपायुक्त हूँ।
सीता -- पूज्य जनो को प्रणाम।
सभी -- वत्से, सदा सुहागिन रहो।
सीता -- कृतकृत्य हो गई।
भरत -- आर्य, मैं भरत आपको अभिवादन करता हूँ।
राम -- आओ, वत्स, इक्ष्वाकुकुमार, तुम्हारा कल्याण हो। दीर्घायु बनो।
किवाडो के समान अपने विशालवक्ष स्थल को फैलाओ और अपनी दोनों
लम्बी भुजाओ से मेरा आलिंगन करो। अपने शरद् कालीन चन्द्रमा
के समान इस सुन्दर मुख को ऊपर उठाओ तथा मेरे इस दुःख से
सन्तप्त शरीर को आनन्द प्रदान करो। (७)
भरत -- अनुगृहीत हूँ। हे देवी, मैं भरत प्रणाम करता हूँ।
सीता -- आर्यपुत्र के साथ बहुत समय तक रहो।
भरत -- अनुगृहीत हूँ। आर्य, मैं प्रणाम करता हूँ।
लक्ष्मण -- वत्स, आओ, आओ, दीर्घायु बनो। मेरा प्रगाढ आलिंगन करो
(आलिंगन करता है)
192 )
भरत—कृतकृत्य हूँ । आर्य, राज्य के भार को स्वीकार करो ।
राम—वत्स, क्यो ?
कैकेयी—पुत्र, हमारी यह इच्छा तो बहुत दिनो से है ।
(४) मूल
(ततः प्रविशति शत्रुघ्नः)
शत्रुघ्नः—विविधैर्व्यसनैः क्लिष्टमक्लिष्टगुणतेजसम् ।
द्रष्टुं मे त्वरते बुद्धी रावणान्तकरं गुरुम् ॥ (८)
(उपगम्य) आर्य ! शत्रुघ्नोऽहमभिवादये ।
राम.—एह्येहि वत्स ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्ये ! अभिवादये ।
सीता--वत्स ! चिरजीव ।
शत्रुघ्नः--अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये ।
लक्ष्मणः--स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! एतौ वसिष्ठवामदेवौ सह प्रकृति-
भिरभिषेकं पुरस्कृत्य त्वद्दर्शनमभिलषतः ।
तीर्थोदकेन मुनिभिः स्वयमाहृतेन
नानानदीनदगतेन तव प्रसादात् ।
इच्छन्ति ते मुनिगणाः प्रथमाभिषिक्तं
द्रष्टुं मुखं सलिलसिक्तमिवारविन्दम् ॥ (६)
कैकेयी—गच्छ जात ! अभिलषाभिषेकम् ।
रामः—यदाज्ञापयत्यम्बा । (निष्क्रान्तः)
(नेपथ्ये)
जयतु भवान् । जयतु स्वामी । जयतु महाराजः ।
जयतु देवः । जयतु भद्रमुखः । जयत्वार्यः ।
जयतु रावणान्तकः ।
कैकेयी—एते पुरोहिताः काञ्चुकिनः पुत्रकस्य मे विजयघोषं वर्धयन्त
आशिभिः पूजयन्ति ।
सुमित्रा—प्रकृतयः परिचायिकाः सज्जनाश्च पुत्रकस्य मे विजय
वर्धयन्ति ।
(नेपथ्ये)
भो भो जनस्थानवासिनस्तपस्विनः ! शृण्वन्तु शृण्वन्तु भवन्तः ।
हत्वा रिपुप्रभवमप्रतिमं तमौघं
सूर्योऽन्धकारमिव शौर्यमयैर्मयूखैः ।
सीतामवाप्य सकलाशुभवर्जनीया
रामो मही जयति सर्वजनाभिरामः ॥ (१०)
कैकेयी—अम्महे ! पुत्रस्य मे विजयघोषणा वर्धते ।
शब्दार्थ—व्यसनैः=सकटो से । क्लिष्टुं=पोडित । अक्लिष्टगुणतेजसम्=
बढ़े गुणों के प्रभाव वाले । द्रष्टुं=देखने के लिए । त्वरते=शीघ्रता कर रही
है । बुद्धिः=मन । रावणान्तकरं=रावण को मारने वाले । गुरुम्=श्रीराम को ।
एतौ=ये दोनों । सह प्रकृतिभिः=प्रजागण के साथ । पुरस्कृत्य=आगे करके ।
अभिलषतः=चाहते हैं । आहृतेन=लाए गए । नानानदीनदगतेन=बहुत सी नदियों
और तालाबों में प्राप्त होने वाले । प्रसादात्=कृपा से । सलिलसिक्तम्=जल
से भीगे । इव=तुल्य । अरविन्दम्=कमल । अभिलष=प्राप्त करो । भद्रमुख=
कल्याणकारी मुख वाले । रावणान्तिक=रावण को मारने वाले । आशिभिः=
शुभ वचनों से । पूजयन्ति=अभिनन्दन करते हैं-। प्रकृतयः=प्रजा । परिचारकाः=
सेवक । वर्धयन्ति=बढ़ा रहे हैं । रिपुप्रभवं=शत्रुजन्य । अप्रतिम=अनुपम ।
तमौघं=दुःखों के समूह को । शौर्यमयैः=पराक्रम रूपी । मयूखैः=किरणों से ।
अवाप्य=णप्त करके । सकलाशुभवर्जनीयां=सम्पूर्ण अमंगलों से रहित । मही=
पृथ्वी को । जयति=वश मे करते है । सर्वजनाभिरामः=सकल लोक प्रिय ।
अम्महे=अहो ।
अन्वय—विविधैः व्यसनैः क्लिष्टम्, अक्लिष्टगुणतेजसम् रावणान्त-
करम् गुरुम् द्रष्टुम् मे बुद्धिः त्वरते । (८)
अन्वय—तव प्रसादात् मुनिभिः स्वयम् आहृतेन नानानदीनदगतेन
तीर्थोदकेन प्रथमाभिषिक्तम् ते मुखम् मुनिगणाः सलिलसिक्तम् अरविन्दम् इव
द्रष्टुम् इच्छन्ति । (६)
अन्वय—अप्रतिमम् रिपुप्रभवम् तमौघम् सूर्य अन्धकारम् इव शौर्य-
मयैः मयूखैः हत्वा सकलाशुभवर्जनीयाम् सीताम् अवाप्य सर्वजनाभिरामः
रामः महीम् जयति ।
( 194 )
हिन्दी अर्थ
(इसके बाद-शत्रुघ्न का प्रवेश)
शत्रुघ्न—अनेक प्रकार के दु खो से घिर कर भी जिनका दिव्य तेज और गुण
प्रदीप्त होता रहा और जिन्होंने अपने प्रबल शत्रु रावण का सरलता
से विनाश किया, पूज्य राम को देखने के लिए मेरा मन शीघ्रता कर
रहा है । (8)
(पास जाकर) आर्य, मैं शत्रुघ्न प्रणाम करता हूँ ।
राम—वत्स, आओ, आओ । कल्याण हो, दीर्घायु बनो ।
शत्रुघ्न—अनुगृहीत हूँ । आर्ये प्रणाम ।
सीता—वत्स, बहुत समय तक जीवित रहो ।
शधुघ्न—अनुगृहीत हूँ । आर्य, प्रणाम करता हूँ ।
लक्ष्मण—कल्याण हो, दीर्घायु बनो ।
शत्रुघ्न—अनुगृहीत हूँ । आर्य, ये, दोनो वसिष्ठ और वासुदेव प्रजागण के
साथ अभिषेक को आगे लेकर आपसे-मिलना चाहते हैं।
मुनिजन स्वयं जाकर बहुत सी छोटी-बडी नदियो से तीर्थ जल लाए
है । उनकी इच्छा है-कि आप सर्वप्रथम अभिषेक जल ग्रहण करे ।
इसके बाद अभिषेक जल से सिक्त कमल की तरह विकसित आपके
मुख का वे दर्शन करना चाहते है । (६)
कैकेयी—जाओ पुत्र । राज्याभिषेक को स्वीकार करो ।
राम—जैसी जननी की आज्ञा । (निकल जाते हैं)
(नेपथ्य मे)
आपकी जय । स्वामी की जय । महाराज की जय ।
देव की जय । भद्रमुख की जय । आर्य की जय ।
रावण के विनाशक की जय ।
कैकेयी—ये पुरोहित और कचुकी मेरे पुत्र का विजय नाद करते हुए
आशीर्वचनों अभिनन्दन कर रहे है
सुमित्रा—प्रजा के लोग, सेवक और सज्जन गण मेरे पुत्र की विजय घोषणा
कर रहे है ।
(नेपथ्य मे)
हे जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप लोग सुनिए, सुनिए ।
जिस प्रकार सूर्य अपनी प्रखर किरणों से अन्धकार का विनाश करता
है, उसी प्रकार अपने अनुपम पराक्रम से शत्रुओं द्वारा उत्पन्न सकटों
के समूह को नष्ट कर, मंगलमयी सीता को पाकर नयनाभिराम राम
ने पूरी पृथ्वी पर अधिकार लिया है। (१०)
कैकेयी—अहा, मेरे पुत्र की विजय घोषणा बढ़ रही है।
(५) मूल—
(ततः प्रविशति कृताभिषेको रामः सपरिवारः)
रामः—(विलोक्यैाकाशे) भोस्तात !
स्वर्गेऽपि तुष्टमुपगच्छ विमुञ्च दैन्यं
कर्म त्वयाभिलषितं मयि यत् तदेतत् ।
राजा किलास्मि भुवि सत्कृतभारवाही
धर्मेण लोकपरिरक्षणमभ्युपेतम् ॥ (११)
भरतः—अधिगतनृपशब्दं धार्यमाणातपत्रं
विकसितकृतमौलि तीर्थतोयाभिषिक्तम् !
गुरुमधिगतलीलं वन्द्यमानं जनौधै
(र्नवशशिनमिवार्यम् पश्यतो मे न तृप्तिः ॥ (१२)
शत्रुघ्नः—एतदार्याभिषेकेण कुलं मे नष्टकल्मषम् ।
(पुनः प्रकाशता याति सोमस्येवोदये जगत् ॥ (१३)
रामः—वत्से लक्ष्मण ! अधिगतराज्योऽहमस्मि ।
लक्ष्मणः—दिष्ट्या भगवान् वर्धते ।
(प्रविश्य)
काञ्चुकीयः—जयतु महाराजः । एष खलु तत्रभवान् विभीषणो
विज्ञापयति—सुग्रीवनीलमैन्दजाम्बवद्धनमत्प्रमुखांश्चानु-
गच्छन्तो विज्ञापयन्ति “दिष्ट्या भवान् वर्धते” इति ।
रामः—“सहायानां प्रसादाद् वर्धत” इति कथ्यताम् ।
काञ्चुकीयः—यदाज्ञापयति महाराजः ।
कैकेयी—धन्या खल्वस्मि । इममभ्युदयमयोध्यायां प्रे क्षितुमिच्छामि ।
रामः—द्रक्ष्यति भवती । (विलोक्य) अये ! प्रभाभिर्वनमिदमखिलं
सूर्यवत् प्रतिभाति । (विभाव्य) आः ज्ञातम् । सम्प्राप्तं
( 196 )
पुष्पकं दिवि रावणस्य विमानम्। कृतसमयमिद स्मृतमात्र-
मुपगच्छतीति । तत् सर्वैरारुह्यताम् ।
(सर्वे आरोहन्ति)
रामः—अद्यैव यास्यामि पुरीमयोध्या
सम्बन्धिमित्रैरनुगम्यमानः ।
लक्ष्मणः - अद्यैव पश्यन्तु च नागरास्त्वा
चन्द्रं सनक्षत्रमिवोदयस्थम् ॥ (१४)
(भरतवाक्यम्)
यथा रामश्च जानक्या बन्धुभिश्च समागतः ।
तथा लक्ष्म्या समायुक्तो राजा भूमिं प्रशास्तु नः ॥ (१५)
(निष्क्रान्ताः सर्वे)
इति सप्तमोऽङ्कः ।
शब्दार्थ—कृताभिषेकः = राज्याभिषेक किए हुए । तुष्टिं सन्तोष
को । उपगच्छ = प्राप्त करो । विमुञ्च = परित्याग करो । दैन्यम् = चिन्ता को ।
अभिलषितं=इच्छित । भुवि=पृथ्वी पर । सत्कृतभारवाही = सम्मानपूर्ण कार्य
का वाहक । धर्मेण=धर्मपूर्वक । लोकपरिरक्षणं=प्रजा का संरक्षण । अभ्यु-
पेतम्=स्वीकार कर लिया । अधिगतनृपशब्द = राजा शब्द को प्राप्त कर
लिया । धार्यमाणातपत्र = राजच्छत्र को धारण कर लिया । विकसितकृत-
मौलिम् = मस्तक को उन्नमित किया । तीर्थतोयाभिषिक्तं = तीर्थों के जल से
स्नान करने वाले । गुरुम्=पूज्य राम को । अधिगतलीलम् = लक्ष्मी को प्राप्त
करने वाले । वन्द्यमानम् = प्रणाम किए जाते हुए । जनौघैः = लोक समूह के
द्वारा । नवशशिनम् इव=दूज के चाँद की भाँति । पश्यतः = देखते हुए ।
तृप्तिः=सन्तोष । नष्टकल्मषं = कलङ्कहीन । प्रकांशनाम् - दीप्तिशालिता को ।
याति = प्राप्त करता है । सोमस्य इव = चन्द्रमा के समान । उदये = उदय-
के समय । जगत् = संसार । अधिगतराज्यः = राज्य प्राप्त करने वाला ।
वर्धन्ते = वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं । मैन्द = एक वानर का नाम । जाम्ब-
वत्=एक भालू का नाम । हनूमत् = हनुमान । अनुगच्छन्तः=पीछे आते हुए ।
( 197 )
सहायानां = सहायकों की । प्रसादात् = कृपा से । अभ्युदयं = राज्याभिषेक
रूपी महोत्सव को । धन्या = पुण्यशालिनी । प्रेक्षितुं = देखने की । द्रक्ष्यति =
देखोगी । भवती = देवी । प्रभाभिः = तेज के द्वारा । अखिल = समूचा । सूर्यवत् =
सूर्य के समान । प्रतिभाति = प्रकाशित हो रहा है । विभाव्य = विचार कर के ।
सम्प्राप्तम् = आ पहुँचा है । पुष्पकं = विमान का नाम । कृतसमय = संकेत
देने पर । स्मृतमात्रं = स्मरण काल मे । उपगच्छति = समीप जाता है । आरु-
ह्यताम् = आरोहण किया जाए । यास्यामि = जाऊँगा । नागराः = नगर
निवासी । त्वाम् = राम को । सनक्षत्रम् = अन्य तारा गणों के साथ । उदय-
स्थम् = उदयाचल पर विद्यमान । जानक्या = सीता के साथ । समायुक्तः =
परिपूर्ण होकर । प्रशास्तु = पालन करें । नः = हमारे ।
अन्वय-स्वर्गे अपि तुष्टिम् उपगच्छ । दैन्यं विमुञ्च । त्वया मयि यत्
कर्म अभिलषितम् तत् एतत् (निवृत्तम्) । किल भुवि सत्कृतभारवाही राजा
अस्मि । धर्मेण लोकपरिरक्षणम् अभ्युपेतम् । (११)
अन्वय —अधिगतनृपशब्दम् , धार्यमाणातपत्रम्, विकसितकृतमौलिम्,
तीर्थतोयाभिषिक्तम्, गुरुम् अधिगतलीलम् जनौघैः वन्द्यमानम् नवशशिनम्
इव आर्यम् पश्यतः मे तृप्तिः न (जायते) । (१२)
अन्वय—आर्याभिषेकेण नष्टकल्मषम् मे एतत् कुलम् सोमस्य उदये
जगत् इव पुनः प्रकाशतां याति । (१३)
अन्वय —अद्य एव अयोध्यां पुरीम् सम्बन्धिमित्रैः अनुगम्यमानः
यास्यामि । च अद्य एव नागराः उदयस्थं सनक्षत्रं चन्द्रम् इव त्वाम्
पश्यन्तु । (१४)
अन्वय—यथा रामः जानक्या बन्धुभिः च समागतः, तथा लक्ष्म्या
समायुक्तः नः राजा भूमिम् प्रशास्तु । (१५)
हिन्दी अर्थ
(इसके बाद अभिषेक किए हुए राम का परिवार के साथ प्रवेश)
राम — (आकाश की ओर देखकर) हे पिताजी,
आप अब स्वर्ग मे आनन्द प्राप्त करें तथा सन्ताप को भूल जाएं ।
( 198 )
आपने मेरा राज्याभिषेक करना चाहा था, वह अब पूरा हुआ। अब
मैं पृथ्वी पर पुण्य भार का वहन करने वाला राजा बन
गया हूं। मैंने न्यायपूर्वक प्रजापालन का उत्तरदायित्व स्वीकार
कर लिया है। (११)
भरत— महाराज की पदवी प्राप्त करने वाले, राजच्छत्र ग्रहण करने वाले,
प्रकाशमान मुकुट पहनने वाले, तीर्थों के जल से अभिषेक स्वीकार
करने वाले, पूजनीय, राजलक्ष्मी को प्राप्त करने वाले, प्रजाओ के
समूहों से जय-जयकार की ध्वनि वाले, नये चन्द्रमा की भाँति आर्य
राम को देखते हुए मुझे तृप्ति नही हो रही है । (१२)
शत्रुघ्न— जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय से सारा ससार प्रकाशित होने लगता
है, उसी प्रकार आर्य राम के राज्याभिषेक से निष्कलक मेरा यह
रघुकुल फिर से प्रकाशमान हो रहा है। (१३)
राम— वत्स लक्ष्मण, अब मैंने राज्य पा लिया है।
लक्ष्मण— सौभाग्य की बात है कि आप वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं।
(प्रवेश करके)
काञ्चुकीय— महाराज की जय हो। ये श्रीमान् विभीषण सूचित करते हैं कि
सुग्रीव, नील, मैन्द, जाम्बवान्, हनुमान् आदि आपके अनुचर निवे-
दन कर रहे है— "अहोभाग्य, आपको बधाई।"
राम— उनमे कह दो कि "आप सहायकों की कृपा से सब विजय है।"
काञ्चुकीय-- जैसी महाराज की आज्ञा।
कैकेयी— मैं सौभाग्यशालिनी हूं। इस वैभव को मैं अयोध्या मे भी देखना
चाहती हूँ।
राम— आप देखेंगी। (देखकर) अरे, यह समूचा तपोवन सूर्य के समान
कान्ति से देदीप्यमान हो रहा है। (विचार कर के) अच्छा समझ
गया। आकाश मे रावण का पुष्पक विमान आ गया है। यह ठीक
समय पर याद करने मात्र से उपस्थित हो जाता है। तो आप सब
इस पर चढिए।
(सब चढते हैं)
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चतुर्थोऽङ्कः [ ११५
तया स्फुटभावेन प्रतीयमानानि यानि करणानि उच्चारणसाधनानि तैः नानाक्षराणि
विविधवर्णाः तेषां भावस्तत्ता तया अनुपहतसञ्चाररभसः अनुपहतः अप्रतिरुद्धः सञ्चा-
रस्य शब्दोच्चारण प्रचारस्य रभसः वेगः यस्य स, यः यथास्थानं वर्णोच्चारणशक्त्या
विविधाक्षरान् स्पष्ट रूपेण वेगेन च उच्चारयितुं समर्थः इति भावः, चतुर्णां चतुः-
संख्यापरिमितार्ना ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राणाम् अभयं निर्भयत्वम् इव दातुं व्यवसितः
उद्युक्तः । मुखे-कण्ठे वक्षसि च विशिष्टवर्णोच्चारणक्षमानि स्थानानि वर्तन्ते तालुमूर्ध-
कण्ठोष्ठादीनि तैः करणैः यः स्वरसंयोगः स्पष्टरूपेण वेगेन च नानाविधान् अक्षर्रान्
उच्चारयितुं क्षमते, यस्य च गाम्भीर्यभावेन लोकाः निर्भयत्वमनुभवन्ति तादृशः
स्वरोऽयं परिचीयते ॥७॥
व्याकरण—समदः यः वृषभस्तस्य स्वर इव स्निग्धः मधुरः च । √वृष् +
अभच् = वृषभ । √स्निह् + क्त = स्निग्ध । मधु + √रा + क = मधुर । न उपहतः
= अनुपहतः । अनुपहतः सञ्चारस्य रभसः यस्य स । न + उप + हन् + क्त = अनुप-
हत । सम् + चर् + घञ् = सञ्चार । स्फुटानि करणैः नाना अक्षराणि तस्य भावः
तत्ता तया । कृ + ल्युट् (अन) = करण । न + क्षर = अक्षर । वि + अव + √षिव्
- क्त = व्यवसित ।
छन्दः—शिखरिणी ।
अलङ्कार—परिकर और उत्प्रेक्षा । अभिप्रायगर्भित विशेषणों का प्रयोग होने
से परिकर अलङ्कार है । अभयं दातुम् इव में दानम् क्रिया की सम्भावना होने से उत्प्रेक्षा
अलङ्कार है ।
बन्धुजनबहुमानम्—बन्धुजनस्य बहुमानम् । लक्ष्मण ने पहचान लिया कि यह
स्वर मेरे भाई भरत का है । अतः भरत के प्रति उनके : हृदय में बहुत अधिक आदर
का भाव हुआ कि वे वन में मिलने आये हैं ।
❖❖❖
रामः—सर्वथा नामयबान्धवस्य स्वरसंयोगः। क्लेदयतीव मे हृदयम् ।
वत्स लक्ष्मण ! दृश्यतां तावत् ।
लक्ष्मणः —यदाज्ञापयत्यार्यः । (परिक्रामति)
भरतः—अये, कथं न कश्चित् प्रतिवचनं प्रयच्छति ? किन्तु खलु
विज्ञातोऽस्मि, कैकेय्या पुत्रो भरतः प्राप्त इति ?
लक्ष्मणः—(विलोक्य) अये, अयमार्यो रामः । न न, रूपसादृश्यम्—
मुखमनुपमं त्वार्यस्यामुं शशाङ्कमनोहरं
मम पितृसमं पीने वक्षः सुरारिशरक्षतम् ।
द्युतिपरिवृतस्तेजोराशिर्जगत्प्रियदर्शनो
नरपतिरयं देवेन्द्रो वा स्वयं मधुसूदनः ॥८॥
११६ ] प्रतिमानाटकम्
[ अन्वयः — अनुपमं शशाङ्कमनोहरं मुखं तु आर्यस्य आभं, सुरारिक्षतं पीनं वक्षः
मम पितृसमं, द्युतिपरिवृतः, तेजोराशिः, जगत्प्रियदर्शनः, अयं नरपतिः, देवेन्द्रः वा,
स्वयं मधुसूदनः ॥८॥
हिन्दी रूपान्तर—
राम—सम्पूर्ण रूप से ठीक है कि यह अबान्धव का स्वर नहीं है । यह मेरे
हृदय को मानो भिगोये दे रहा है । वत्स लक्ष्मण ! देखो तो ।
लक्ष्मण—आर्य जैसा आदेश देते हैं । (घूमता है)
भरत—अये, कोई प्रत्युत्तर क्यों नहीं दे रहा है ? क्या मुझको पहचान
लिया है कि कैकेयी का पुत्र आ पहुँचा है ?
लक्ष्मण—(देखकर) अये, ये क्या आर्य राम हैं । नहीं, नहीं रूप की
समानता है ।
अर्थ [श्लोक ८]—यह अनुपम तथा चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख आर्य राम
के मुख के समान है । असुरों के बाणों से घायल हुआ विशाल वक्ष मेरे पिता के समान
है, कान्ति से घिरा हुआ यह मानो तेज का समूह है, इसका दर्शन करना लोगों को
प्रिय है, यह क्या राजा दशरथ है, अथवा देवों का स्वामी इन्द्र है अथवा स्वयं विष्णु
है ? भरत का मुख राम के समान था, वक्ष पिता के समान था और वे अत्यधिक
तेजस्वी थे, उनको देखकर राम की अथवा पिता की भ्रान्ति होना लक्ष्मण के लिये
स्वाभाविक था ॥८॥
संस्कृत-व्याख्या—अनुपमं न विद्यते उपमा उपमानं यस्य तादृशं, शशाङ्क-
मनोहरं शशाङ्कः चन्द्रः स इव मनोहरं हृदयाकर्षकं, सुरारिशरक्षतं सुरारीणां देवशत्रू-
णाम् असुराणां शरैः बाणैः क्षतं देव-दानवयुद्धेषु सहायतार्थं युद्धावसरेषु व्रणकिणितं
पीनं विशालस्थूलं वक्षः उरःस्थलं मम मे लक्ष्मणस्य पितृसमं पितुः सदृशं वर्तते !
परिवृतः द्युतिभिः कान्तिभिः परिवृतः परिवेष्टितः अयं तेजोराशिः तेजसा ।
वर्तते, जगत्प्रियदर्शनः जगतां लोकानां प्रियं प्रीतिकरं दर्शनम् अवलोकनं यस्य तादृशः
वर्तते । अयं जनः नरपतिः राजा दशरथो वर्तते अथवा देवेन्द्रः देवानां इन्द्रः शक्रः
वर्तते अथवा स्वयं मधुसूदनः मधुनाम्नो राक्षसस्य विनाशको भगवान् विष्णुः
वर्तते ॥८॥
व्याकरण—न विद्यते उपमा यस्य तत् = अनुपमम् । उप + √ मा + क्विप् =
उपमा । सुराणाम् अरीणां शरैः क्षतम् = सुरारिशरक्षतम् ।
छन्दः—हरिणी ।
अलङ्कार—उपमा, रूपक और उल्लेख । शशाङ्क के समान मनोहर में समा-
सगा उपमा है। उपमेय भरत पर तेजोराशि उपमान का आरोप करने से रूपक
अलङ्कार है । एक ही भरत का नरपति, देवेन्द्र और मधुसूदन, अनेक प्रकार से
उल्लेख करने से उल्लेख अलङ्कार है ।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
चतुर्थोऽङ्कः [ ११७
(सुमन्त्रं दृष्ट्वा) अये तातः ?
सुमन्त्रः—अये, कुमारो लक्ष्मणः ?
भरतः—एवं गुरुरयम् । आर्य ! अभिवादये ।
लक्ष्मणः—एह्येहि । आयुष्मान् भव । (सुमन्त्रं वीक्ष्य) तात ! कोऽत्र
भवान् ?
सुमन्त्रः—कुमार ।
रघोश्चतुर्थोऽयमजात् तृतीयः
पितुः प्रकाशस्य तव द्वितीयः ।
यस्यानुजस्त्वं स्वकुलस्य केतो-
स्तस्यानुजोऽयं भरतः कुमारः ॥६॥
[अन्वयः-—अयं रघोः चतुर्थः अजात् तृतीयः, प्रकाशस्य तव पितुः द्वितीयः,
यस्य त्वम् अनुजः स्वकुलस्य केतोः तस्य अनुजः अयं कुमारः भरतः ॥६॥]
हिन्दी रूपान्तर--
(सुमन्त्र को देखकर) अये, तात हैं ?
सुमन्त्र—अये, कुमार लक्ष्मण हैं ?
भरत—ये बड़े भाई हैं। आर्य ! अभिवादन करता हूँ।
लक्ष्मण--आओ, आओ। आयुष्मान् होओ। (सुमन्त्र को देखकर) तात !
ये आप कौन हैं ?
सुमन्त्र--कुमार !
अर्थ [श्लोक ६]—वंशपरम्परा में ये रघु से चौथी पीढ़ी में हैं, अर्थात् प्रपौत्र
हैं, अज से दूसरी पीढ़ी में हैं, अर्थात् पौत्र हैं, लोक में विख्यात तुम्हारे पिता से दूसरी
पीढ़ी में हैं, अर्थात् पुत्र हैं। जिस राम के तुम छोटे भाई हो, अपने कुल के ध्वजा
रूप उस राम के छोटे भाई ये कुमार भरत हैं।
संस्कृत-व्याख्या--वंशपरम्परायामयं रघोः चतुर्थः चतुर्थत्वेन परिगणनीयः
प्रपौत्रः वर्तते इति भावः । अजात् तृतीयः तृतीयत्वेन परिगणनीयः, पौत्रः वर्तते इति
भावः । प्रकाशस्य लोके प्रसिद्धस्य तव पितुः जनकस्य द्वितीयः द्वितीयत्वेन परिगण-
नीयः, पुत्रः वर्तते इति भावः । यस्य रामस्य त्वम् अनुजः कनिष्ठभ्राता वर्तसे, स्वकुल-
स्य आत्मीयस्य वंशस्य केतोः ध्वजरूपस्य तस्य अनुजः कनिष्ठभ्राता अयं कुमारः
भरतः वर्तते । तव बान्धव एवायमिति भावः ॥६॥
व्याकरण—अनुजातः=अनु + जन् + ड=अनुज ।
छन्दः--उपजाति ।
अलङ्कार--परिकर और रूपक । भरत के लिये साभिप्राय विशेषणों का
कथन करने से परिकर अलङ्कार है । उपमेय राम पर उपमान केतु का आरोप करने
से रूपक अलङ्कार है ।
[ ११८ ] प्रतिमानाटकम्
क्लेदयति इव—भरत का स्वर पहचानकर राम का हृदय द्रवीभूत सा हो
रहा था। भरत का स्नेह मानो उनको भिगो रहा था।
कैकेय्याः पुत्रः—पुकारने पर भी कोई उत्तर न पाकर भरत को आशंका हुई
कि इन्होंने मुझको पहचान लिया है। कैकेयी का पुत्र होने से मेरी बात का उत्तर
नहीं दे रहे।
गुरुरयम्···अभिवादये···आयुष्मान् भव—इन वाक्यों से विदित होता है कि
भास ने लक्ष्मण को बड़ा भाई और भरत को छोटा भाई वर्णित किया है। परन्तु
रामायण की कथा से यह वर्णन विपरीत है। रामायण के अनुसार लक्ष्मण से भरत
बड़े थे। इनका क्रम था—राम-भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न । रामायण की कथा के आधार
पर अपने नाटक की रचना करते हुये भास के लिये उचित नहीं था, कि इस प्रकार
का परिवर्तन कर उलटा क्रम दिखावें ।
लक्ष्मणः—ऐह्येहीक्ष्वाकुकुमार ! वत्स ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
असुरसमरदक्षैर्वज्रसंघृष्टचापै-
रनुपमबलवीर्यैः स्वैः कुलैस्तुल्यवीर्यः ।
रघुरिव स नरेन्द्रो यज्ञविश्रान्तकोशो
भव जगति गुणानां भाजनं भ्राजितानाम् ॥१०॥
[अन्वयः—असुरसमरदक्षैः वज्रसंघृष्टचापैः अनुपमबलवीर्यैः स्वैः कुलैः तुल्य-
वीर्यः, यज्ञविश्रान्तकोशः स नरेन्द्रः रघुः इव जगति भ्राजितानां गुणानां भाजनं
भव ॥१०॥]
हिन्दी रूपान्तर—
लक्ष्मण—हे इक्ष्वाकुकुमार ! आओ । वत्स ! तुम्हारा कल्याण हो । आयु-
ष्मान् होओ ।
अर्थ [श्लोक १०]—असुरों के साथ युद्ध करने में समर्थ, असुरों के साथ युद्ध
करने में इन्द्र के साथ स्पर्धा करने वाले धनुष को धारण करने वाले, अनुपम बल और
पराक्रम से सम्पन्न अपने कुल के पूर्वजों के समान पराक्रमी बनो । यज्ञों में सम्पूर्ण
कोश का दान करने वाले उस प्रसिद्ध राजा रघु के समान तुम इस संसार में दैदीप्य-
मान गुणों के पात्र बनो ॥१०॥
संस्कृत-व्याख्या—असुरसमरदक्षैः असुरैः दैत्यैः सह समरे युद्धे दक्षैः समर्थैः
वज्रसंघृष्टचापैः असुरयुद्धे वज्रेण इन्द्रस्य कुलिशेन सह संघृष्टं स्पर्धमानं चापं धनुः
येषां तैः अनुपमबलवीर्यैः अनुपमम् असाधारणं बलं सामर्थ्यं वीर्यं पराक्रमः च येषां तैः
स्वैः आत्मीयैरपि कुलैः वंशीयैः पूर्वजैः नरपतिभिः तुल्यवीर्यः तुल्यं समानं वीर्यं
पराक्रमः यस्य तादृशः त्वं भव । यज्ञविश्रान्तकोशः यज्ञेषु अध्वरेषु विश्रान्तः दक्षिणासु
सम्पूर्णरूपेण प्रदत्तः कोशः निधिः येन तादृशः स प्रसिद्धः नरेन्द्रः राजा रघुः इव जगति
चतुर्थोऽङ्कः [ ११६
लोके भ्राजितानां शोभमानानां गुणानां बलवीर्यदाक्षिण्यादीनां भाजनं पात्रं भव ।
अस्मत्पूर्वजैः देवतानां साहाय्यार्थं धनुर्भिः दैत्या अपि पराजिताः । रघूणां विश्वजिति
यज्ञे दक्षिणासु ब्राह्मणेभ्यः सकल एव कोशः विश्रान्तः । त्वयापि तैः इव बलशालिना
वीर्यशालिना दाक्षिण्यशालिना च भूत्वा अयोध्यायाः शासनं करणीयम् ॥१०॥
व्याकरण—असुरैः समरे दक्षैः = असुरसगरदक्षैः । वज्रेण संघृष्टं चापं
येषां तैः = वज्रसंघृष्टचापैः । न विद्यते उपमा यस्य तत् = अनुपम । वीरस्य भावः =
वीर + = वीर्य । अनुपमं वीर्यं येषां तैः = अनुपमबलवीर्यैः । यज्ञेषु विश्रान्तः कोशः
येन सः = यज्ञविश्रान्तकोशः । यज् + नङ् = यज्ञ । वि + श्रम् + क्त = विश्रान्त ।
छन्दः—मालिनी ।
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि ।
लक्ष्मणः—कुमार ! इह तिष्ठ। त्वदागमनमार्याय निवेदयामि ।
भरतः—आर्य ! अचिरमिदानीमभिवादयितुमिच्छामि । शीघ्रं निवेद्य-
ताम् ।
लक्ष्मणः—बाढम् । (उपेत्य) जयत्वार्यः । आर्य !
अयं ते दयितो भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः ।
संक्रान्तं यत्र ते रूपमादर्श इव तिष्ठति ॥११॥
[अन्वयः—यत्र ते रूपम् आदर्शः इव सङ्क्रान्तम्, अयं ते दयितः भ्रातृवत्सलः
भ्राता भरतः तिष्ठति ॥११॥]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—मैं अनुगृहीत हो गया हूँ ।
लक्ष्मण—कुमार ! यहीं ठहरो । तुम्हारे आने की बात आर्य से निवेदन
करता हूँ ।
भरत—आर्य ! अब शीघ्र ही अभिवादन करना चाहता हूँ । शीघ्र निवेदन
कीजिये ।
लक्ष्मण—हां । (समीप जाकर) आर्य की जय हो । आर्य !
अर्थ [श्लोक ११]—जहां कि आपका रूप दर्पण के समान प्रतिबिम्बित हुआ
है, ऐसा यह आपका प्रिय तथा भाई को स्नेह करने वाला भाई भरत खड़ा है । भरत
का रूप बिलकुल आपके समान है, वह आपको प्रिय है तथा वह आपके प्रति स्नेहशील
है। वह आया है ॥११॥
संस्कृत-व्याख्या—यत्र यस्मिन् जने ते तव रूपम् आदर्शो दर्पणे इव संक्रान्तं
प्रतिबिम्बितं तादृशः अयं पुरो दृश्यमानः ते तव दयितः स्नेहपात्रं भ्रातृवत्सलः भ्रातरि
१२० प्रतिमानाटकम्
अनुरक्तः भ्राता अनुजः भरतः तिष्ठति द्वारि स्थितो वर्तते । यथा आदर्श कस्यापि
रूपम् अविकलरूपेणावलोक्यते तथैव भरत ते रूपमविकलरूपेणावलोक्यते ॥११॥
व्याकरण—भ्रातरि वत्सलः = भ्रातृवत्सलः । वत्स + लच् = वत्सल ।
सम् + क्रम् + क्त = संक्रान्त ।
छन्दः—अनुष्टुप्
अलङ्कार—उपमा ।
रामः—वत्स लक्ष्मण ! किमेवं भरतः प्राप्तः ?
लक्ष्मणः—आर्य ! अथ किम् ?
रामः—मैथिलि ! भरतावलोकनार्थं विशाली क्रियतां ते चक्षुः ।
सीता—अय्यउत्त ! किं भरदो आददो ? [आर्यपुत्र ! किं भरत आगतः ?]
रामः—मैथिलि ! अथ किम् ?
अद्य खल्ववगच्छामि पित्रा मे दुष्करं कृतम् ।
कीदृशस्तनयस्नेहो भ्रातृस्नेहोऽयमीदृशः ॥१२॥
[अन्वयः—अद्य खलु अवगच्छामि, मे पित्रा दुष्करं कृतम् । ईदृशः अयं भ्रातृ-
स्नेहः । तनयस्नेहः कीदृशः ॥१२॥]
हिन्दी रूपान्तर—
राम—वत्स लक्ष्मण ! क्या इस प्रकार भरत आया है ?
लक्ष्मण—और क्या ?
राम—सीते ! भरत को देखने के लिये अपनी आंखों को विशाल
बना लो ।
सीता—आर्यपुत्र ! क्या भरत आये हैं ?
राम—सीते ! और क्या ?
अर्थ [श्लोक १२]—आज मैं निश्चय से समझ रहा हूँ कि मेरे पिता ने
बहुत अधिक कठिन कार्य किया है। इस प्रकार का तो यह भाई का स्नेह है तो पुत्र
के प्रति स्नेह कैसा होगा। भाई के प्रति तो स्नेह इतना अधिक है कि मैं भरत
के वियोग में अत्यधिक पीडित हूँ । पुत्र के प्रति स्नेह तो उससे भी अधिक होता है ।
अतः मेरे वन चले आने पर पिता को जो कष्ट हुआ होगा, उसको अब मैं समझ
रहा हूँ ॥१२॥
संस्कृत-व्याख्या—अद्य इदानीम् अहम् अवगच्छामि भ्रातृभरतागमनावसरे
अवचिनोमि ये पित्रा जनकेन दशरथेन दुष्करम् अत्यधिककठिनं कष्टप्रदं च कार्यं कृतं
विहितम् । ईदृशः एवंविधः अयम् एष भ्रातृस्नेहः भ्रातरं भरतं प्रति स्नेहः वर्तते
राज्यमपि परित्यज्य स्नेहभावेन मां द्रष्टुं भरतः आगतः, अहं च तस्यागमनेन हृदये
चेतसि च अनुपमां प्रसन्नतामनुभवामि । तनयस्नेहस्तनयं पुत्रं प्रति तु स्नेहः कीदृशः
चतुर्थोऽङ्कः [ १३१
कथंविधः भविष्यति । तथाविधं पुत्रस्नेहं हृदये धारयन् मे पिता मदीयराज्यविभ्रंशनं
वनवासजनित वियोगं च धारणे असमर्थः सन् दिवं गतः इति मया अधुना भरता-
गमनसमये अवचीयते ॥१२॥
व्याकरण—दुस् + कृ + अच् = दुष्कर । किम् + दृश् + कन् (की आदेश) =
कीदृश । तनोति विस्तारयति कुलम् = तन् + कथन् = तनय ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
विशालीक्रियतां ते चक्षुः—अविशालं विशालं क्रियताम् = विशालीक्रियताम् ।
च्वि प्रत्यय । अत्यधिकस्नेहभाजन व्यक्ति के मिलने पर प्रसन्नता के कारण नयनों
का विशाल करना एक मुहावरा है । भरत को देखने के लिये सीता का नयनों को
विशाल करना स्वाभाविक है । इस प्रकार के प्रयोग कवियों ने अनेकशः
किये हैं ।
लक्ष्मणः—आर्ये ! किं प्रविशतु कुमारः ?
रामः- वत्स लक्ष्मण ! इदमपि तावदात्माभिप्रायमनुवर्तयितुमिच्छसि ?
गच्छ, सत्कृत्य शीघ्रं प्रवेश्यतां कुमारः ।
लक्ष्मणः—यदाज्ञापयत्यार्यः ।
रामः— अथवा तिष्ठत्वम्—
इयं स्वयं गच्छतु मानहेतोर्मातेव भावं तनये निवेश्य ।
तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा हर्षास्रमासारमिवोत्सृजन्ती ॥१३॥
[अन्वयः—माता इव तनये भावं निवेश्य तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा आसारम् इव
हर्षास्रम् उत्सृजन्ती, इयं मानहेतोः स्वयं गच्छतु ॥१३॥]
हिन्दी रूपान्तर
लक्ष्मण—आर्ये ! क्या कुमार भरत प्रवेश करें ?
राम—वत्स लक्ष्मण ! क्या इसमें भी मेरी अनुमति को लेना चाहते हो ?
जाओ और सत्कार के साथ कुमार को शीघ्र अन्दर ले आओ ।
लक्ष्मण—आर्य जैसा आदेश देते हैं ।
राम—अथवा तुम ठहरो—
अर्थ [श्लोक १३ —माता के समान पुत्र के प्रति स्नेह को अपने हृदय में रख
कर' हिम से भरे हुये कमलपत्र के समान नेत्रों वाली तथा धारासार वर्षा के समान
प्रसन्नता के आँसुओं को बहाती हुई यह सीता इस भरत का आदर करने के लिये
स्वयं जावे ॥१३॥
संस्कृत व्याख्या—माता जननी इव तनये पुत्रे भावं वात्सल्यभावं निवेश्य हृदये
संधार्य, यथा काचिन्माता चिरादायातं पुत्रं प्रति वात्सल्यपूर्णा भवति, तथैव तनयसदृशं
भरतं प्रति स्नेहपूर्णा सती इत्यर्थः, तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा तुषारेण हिमेन पूर्णम् आवृत्तम्
˙१२२ ] प्रतिमानाटकम्
उत्पलपत्रं कमलपत्रमिव नेत्रं नयनं यस्या सा, आसारं धारासम्पातमिव हर्षास्रं
प्रसन्नताश्रूणि इव उत्सृजन्ती प्रवाहयन्ती इयं सीता एव मानहेतोः तस्य भरतस्य
सत्कारार्थं स्वयं गच्छतु बहिर्यातु । इयं स्वयमे वगत्वा सत्कृत्य स्वपुत्रतुल्यं भरतं
इहानयतु ॥१३॥
व्याकरण—तुषारेण पूर्णम् उत्पलपत्रं तदिव ने त्रं यस्या सा = तुषारपूर्णोत्पल-
पत्रनेत्रा । आ + सृ + घञ् = आसार ।
छन्दः—उपजाति ।
अलङ्कार—उपमा । मातेव भावं तनये निवेश्य—पूर्णोपमा । तुषारपूर्णोत्पल-
पत्रनेत्रा = वाचकलुप्ता समासगा उपमा ।
सीता—जं अज्जउत्तो आणवेदि । (उत्थाय परिक्रम्य भरतमवलोक्य) हुं,
तदो तं वेलं दाणि णिक्कन्तो अय्यउत्तो । णहि णहि । रूवसादिसं । [यदार्यपुत्र
आज्ञापयति । हुं, ततस्तां वेलामिदानीं निष्क्रान्त आर्यपुत्रः । नहि न हि
रूपसादृश्यम् ।
सुमन्त्रः—अये वधूः ?
भरतः—अये, इयमत्रभवती जनकराजपुत्री ?
इदं तत् स्त्रीमयं तेजो जातं क्षेत्रोदराद्धलात् ।
जनकस्य नृपेन्द्रस्य तपसः सन्निदर्शनम् ॥१४॥
[अन्वयः—इदं तत् स्त्रीमयं तेजः, क्षेत्रोदरात् हलात् जातम् । नृपेन्द्रस्य जनकस्य
तपसः सन्निदर्शनम् ॥१४॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र जैसा आदेश देते हैं । (उठकर घूमकर और भरत को
देखकर) हूँ, तो अब आर्यपुत्र उसी समय बाहर निकल गये थे ? नहीं, नहीं,
रूप की समानता है ।
सुमन्त्र—अये, वधू है ?
भरत—अये, ये आदरणीया राजा जनक की पुत्री सीता हैं—
अर्थ [श्लोक १४]—यह वह स्त्रीरूप में विद्यमान तेज है, जो खेत के मध्य से हल
से उत्पन्न हुआ था । राजाधिराज जनक की तपस्या का यह उत्तम उदाहरण है रामायण
की कथा प्रसिद्ध है कि खेत में हल जोतते हुये राजा जनक को सीता पृथिवी के गर्भ
से प्राप्त हुई थी, जो एक घड़े में थी तथा हल की नोक से उखड़ कर यह घड़ा
पृथिवी के गर्भ से बाहर निकल आया ॥१४॥
संस्कृत-व्याख्या—इदम् एतत् पुरो दृश्यमानं स्त्रीमयं स्त्रीरूपेण परिणतं तेजः
प्रसिद्धा कान्तिः, यत् क्षेत्रोदरात् क्षेत्रस्य कर्षणयोग्यभूमेः उदरात् मध्यभागात् हलात्