प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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सीता—हूं । आज भी मुझे विश्वास नही होता । (पास जाकर) आर्यपुत्र की
जय हो ।
रामः—सीते, क्या जानती हो, पहले हम इस जनस्थान मे रहा करते थे ।
क्या तुम पुत्र के समान पाले गए इन वृक्षों को पहचानती हो ?
सीता—जानती हूँ, जानती हूं । जिन वृक्षों को छोटे-छोटे पत्तो वाली
स्थिति मे देखा था, अब वे नेत्र ऊपर करके देखने योग्य हो गए हैं ।
राम—ऐसा ही है । समय सचमुच अन्तर उत्पन्न कर देता है । सीते, याद है,
इस सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे श्वेत वस्त्र पहने हुए भरत को देख कर
हरिणों का झुण्ड भयभीत हो गया था ।
सीता—आर्यपुत्र, अच्छी तरह से याद है ।
राम—और यह हमारी तपस्या का साक्षी बना हुआ विशाल सरोवर है ।
यही बैठ कर हमने पिताजी की श्राद्ध क्रिया की चिन्ता करने के
समय कांचनपार्श्व नामक हिरण को देखा था ।
सीता—हूँ, आर्यपुत्र, उसका आप नाम मत लीजिए, मत लीजिए । (भयभीत
होकर कांपती है ।)
राम—मत घबराओ, मत घबराओ वह समय तो बीत गया । (चारों ओर देख
कर) अरे, यह क्या है ?
लोध्रपुष्प के समान सफेद धूल उड रही है । वह हवा से प्रसारित
की हुई चारो दिशाओं को ढक रही है । यह शंख ध्वनि वाद्य यन्त्रो
तथा शूर वीरों के गर्जन से वृद्धि को प्राप्त करके इस शान्त तपोवन
को नगर का रूप दे रही है । (४)
(३) मूल
(प्रविश्य)
लक्ष्मणः—जयत्वार्यः ! आर्य !
अयं सैन्येन महद्वता त्वग्दर्शनसमुत्सुकः ।
मातृभिः सह सम्प्राप्तो भरतो भ्रातृवत्सलः ॥ (५)
रामः—वत्स लक्ष्मण ! किमेवं भरतः प्राप्त इति ?
लक्ष्मणः—आर्य ! अथ किम् ।
रामः—मैथिली ! श्वश्रूजनपुरोगं भरतमवलोकयितुं विशालीक्रियतां
ते चक्षुः ।