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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 296 में से

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पृष्ठ 169

( 190 )
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! प्रतिगृह्यता राज्यभारः ।
रामः - वत्स ! कथमिव ।
कैकयी—जात ! चिराभिलषितः खल्वेष मनोरथः ।
शब्दार्थ—भ्रातृवत्सलः = भाई से स्नेह रखने वाला । श्वश्रूजनपु-
रोगं = सासुएँ जिसके आगे चल रही हैं, ऐसे भरत को । अवलोकयितुम्=देखने
को । विशालीक्रियता=दीर्घ बनाओ । एष्टव्ये = अभीष्ट, चाहे गए । समा-
तृकः = माताओं के साथ । प्रवृद्धंविपर्यं = अनेक प्रकार के । विपमैः = संकटों
से । विमुक्तं = विरहित या छूटा हुआ । अमलं = स्वच्छ । शरदि = शरद्
ऋतु में । सोमम् = चन्द्रमा को । आर्यासहाय = सीता के सहित । गुरुं = पूज्य
को । दिदृक्षुः = देखने का इच्छुक । तुष्टहृदयः = प्रसन्न मन वाला । स्वज-
नानुबद्धः = अपने आदमियों द्वारा पीछे-पीछे आते हुए । अम्बाः = हे जननियो ।
वर्धामहे=आनन्द से परिपूर्ण हैं । अवसितप्रतिज्ञं = पूर्ण व्रत वाले । सह वध्वा=
बहू सीता के साथ । चिरमङ्गला = बहुत समय तक कल्याण प्राप्त करने
वाली । अनुगृहीत = कृपा से युक्त । आर्यपुत्रेण = राम के साथ । चिर-
सञ्चारी = बहुत समय तक साथ चलने वाले अर्थात् सुख भोगने वाले । प्रति-
गृह्यता = स्वीकार करो । चिराभिलषितः = बहुत समय से इच्छित ।
अन्वय —अयं भ्रातृवत्सलः त्वद्दर्शनसमुत्सुकः भरतः महता सैन्येन
मातृभिः सह सम्प्राप्तः । (५)
अन्वय—अद्य तुष्टहृदयः अहम् स्वजनानुबद्धः शरदि मेघैः विमुक्तम्
अमलं सोमम् इव तैः तैः प्रवृद्धविपर्यैः विषमः विमुक्तम् आर्यासहाय गुरुं
दिदृक्षुः प्राप्तः अस्मि । (६)
अन्वय—यह पद्य अंक ४, पद्य १६ में पहले आ चुका है । (७)
हिन्दी अर्थ
(प्रवेशक रुके)
लक्ष्मण—आर्य की जय हो ! हे आर्य,
भाई से स्नेह रखने वाला, आपके दर्शन के लिए लालायित बना यह
भरत विशाल सेना को लेकर माताओं के साथ यहां आ गया है ।
राम—वत्स लक्ष्मण, क्या ऐसा ? भरत आ गया है ।
लक्ष्मण—आर्य, और क्या ।