प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः [ १३१
कथंविधः भविष्यति । तथाविधं पुत्रस्नेहं हृदये धारयन् मे पिता मदीयराज्यविभ्रंशनं
वनवासजनित वियोगं च धारणे असमर्थः सन् दिवं गतः इति मया अधुना भरता-
गमनसमये अवचीयते ॥१२॥
व्याकरण—दुस् + कृ + अच् = दुष्कर । किम् + दृश् + कन् (की आदेश) =
कीदृश । तनोति विस्तारयति कुलम् = तन् + कथन् = तनय ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
विशालीक्रियतां ते चक्षुः—अविशालं विशालं क्रियताम् = विशालीक्रियताम् ।
च्वि प्रत्यय । अत्यधिकस्नेहभाजन व्यक्ति के मिलने पर प्रसन्नता के कारण नयनों
का विशाल करना एक मुहावरा है । भरत को देखने के लिये सीता का नयनों को
विशाल करना स्वाभाविक है । इस प्रकार के प्रयोग कवियों ने अनेकशः
किये हैं ।
लक्ष्मणः—आर्ये ! किं प्रविशतु कुमारः ?
रामः- वत्स लक्ष्मण ! इदमपि तावदात्माभिप्रायमनुवर्तयितुमिच्छसि ?
गच्छ, सत्कृत्य शीघ्रं प्रवेश्यतां कुमारः ।
लक्ष्मणः—यदाज्ञापयत्यार्यः ।
रामः— अथवा तिष्ठत्वम्—
इयं स्वयं गच्छतु मानहेतोर्मातेव भावं तनये निवेश्य ।
तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा हर्षास्रमासारमिवोत्सृजन्ती ॥१३॥
[अन्वयः—माता इव तनये भावं निवेश्य तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा आसारम् इव
हर्षास्रम् उत्सृजन्ती, इयं मानहेतोः स्वयं गच्छतु ॥१३॥]
हिन्दी रूपान्तर
लक्ष्मण—आर्ये ! क्या कुमार भरत प्रवेश करें ?
राम—वत्स लक्ष्मण ! क्या इसमें भी मेरी अनुमति को लेना चाहते हो ?
जाओ और सत्कार के साथ कुमार को शीघ्र अन्दर ले आओ ।
लक्ष्मण—आर्य जैसा आदेश देते हैं ।
राम—अथवा तुम ठहरो—
अर्थ [श्लोक १३ —माता के समान पुत्र के प्रति स्नेह को अपने हृदय में रख
कर' हिम से भरे हुये कमलपत्र के समान नेत्रों वाली तथा धारासार वर्षा के समान
प्रसन्नता के आँसुओं को बहाती हुई यह सीता इस भरत का आदर करने के लिये
स्वयं जावे ॥१३॥
संस्कृत व्याख्या—माता जननी इव तनये पुत्रे भावं वात्सल्यभावं निवेश्य हृदये
संधार्य, यथा काचिन्माता चिरादायातं पुत्रं प्रति वात्सल्यपूर्णा भवति, तथैव तनयसदृशं
भरतं प्रति स्नेहपूर्णा सती इत्यर्थः, तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा तुषारेण हिमेन पूर्णम् आवृत्तम्