प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ११८ ] प्रतिमानाटकम्
क्लेदयति इव—भरत का स्वर पहचानकर राम का हृदय द्रवीभूत सा हो
रहा था। भरत का स्नेह मानो उनको भिगो रहा था।
कैकेय्याः पुत्रः—पुकारने पर भी कोई उत्तर न पाकर भरत को आशंका हुई
कि इन्होंने मुझको पहचान लिया है। कैकेयी का पुत्र होने से मेरी बात का उत्तर
नहीं दे रहे।
गुरुरयम्···अभिवादये···आयुष्मान् भव—इन वाक्यों से विदित होता है कि
भास ने लक्ष्मण को बड़ा भाई और भरत को छोटा भाई वर्णित किया है। परन्तु
रामायण की कथा से यह वर्णन विपरीत है। रामायण के अनुसार लक्ष्मण से भरत
बड़े थे। इनका क्रम था—राम-भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न । रामायण की कथा के आधार
पर अपने नाटक की रचना करते हुये भास के लिये उचित नहीं था, कि इस प्रकार
का परिवर्तन कर उलटा क्रम दिखावें ।
लक्ष्मणः—ऐह्येहीक्ष्वाकुकुमार ! वत्स ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
असुरसमरदक्षैर्वज्रसंघृष्टचापै-
रनुपमबलवीर्यैः स्वैः कुलैस्तुल्यवीर्यः ।
रघुरिव स नरेन्द्रो यज्ञविश्रान्तकोशो
भव जगति गुणानां भाजनं भ्राजितानाम् ॥१०॥
[अन्वयः—असुरसमरदक्षैः वज्रसंघृष्टचापैः अनुपमबलवीर्यैः स्वैः कुलैः तुल्य-
वीर्यः, यज्ञविश्रान्तकोशः स नरेन्द्रः रघुः इव जगति भ्राजितानां गुणानां भाजनं
भव ॥१०॥]
हिन्दी रूपान्तर—
लक्ष्मण—हे इक्ष्वाकुकुमार ! आओ । वत्स ! तुम्हारा कल्याण हो । आयु-
ष्मान् होओ ।
अर्थ [श्लोक १०]—असुरों के साथ युद्ध करने में समर्थ, असुरों के साथ युद्ध
करने में इन्द्र के साथ स्पर्धा करने वाले धनुष को धारण करने वाले, अनुपम बल और
पराक्रम से सम्पन्न अपने कुल के पूर्वजों के समान पराक्रमी बनो । यज्ञों में सम्पूर्ण
कोश का दान करने वाले उस प्रसिद्ध राजा रघु के समान तुम इस संसार में दैदीप्य-
मान गुणों के पात्र बनो ॥१०॥
संस्कृत-व्याख्या—असुरसमरदक्षैः असुरैः दैत्यैः सह समरे युद्धे दक्षैः समर्थैः
वज्रसंघृष्टचापैः असुरयुद्धे वज्रेण इन्द्रस्य कुलिशेन सह संघृष्टं स्पर्धमानं चापं धनुः
येषां तैः अनुपमबलवीर्यैः अनुपमम् असाधारणं बलं सामर्थ्यं वीर्यं पराक्रमः च येषां तैः
स्वैः आत्मीयैरपि कुलैः वंशीयैः पूर्वजैः नरपतिभिः तुल्यवीर्यः तुल्यं समानं वीर्यं
पराक्रमः यस्य तादृशः त्वं भव । यज्ञविश्रान्तकोशः यज्ञेषु अध्वरेषु विश्रान्तः दक्षिणासु
सम्पूर्णरूपेण प्रदत्तः कोशः निधिः येन तादृशः स प्रसिद्धः नरेन्द्रः राजा रघुः इव जगति