प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ ] प्रतिमानाटकम्
[ अन्वयः — अनुपमं शशाङ्कमनोहरं मुखं तु आर्यस्य आभं, सुरारिक्षतं पीनं वक्षः
मम पितृसमं, द्युतिपरिवृतः, तेजोराशिः, जगत्प्रियदर्शनः, अयं नरपतिः, देवेन्द्रः वा,
स्वयं मधुसूदनः ॥८॥
हिन्दी रूपान्तर—
राम—सम्पूर्ण रूप से ठीक है कि यह अबान्धव का स्वर नहीं है । यह मेरे
हृदय को मानो भिगोये दे रहा है । वत्स लक्ष्मण ! देखो तो ।
लक्ष्मण—आर्य जैसा आदेश देते हैं । (घूमता है)
भरत—अये, कोई प्रत्युत्तर क्यों नहीं दे रहा है ? क्या मुझको पहचान
लिया है कि कैकेयी का पुत्र आ पहुँचा है ?
लक्ष्मण—(देखकर) अये, ये क्या आर्य राम हैं । नहीं, नहीं रूप की
समानता है ।
अर्थ [श्लोक ८]—यह अनुपम तथा चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख आर्य राम
के मुख के समान है । असुरों के बाणों से घायल हुआ विशाल वक्ष मेरे पिता के समान
है, कान्ति से घिरा हुआ यह मानो तेज का समूह है, इसका दर्शन करना लोगों को
प्रिय है, यह क्या राजा दशरथ है, अथवा देवों का स्वामी इन्द्र है अथवा स्वयं विष्णु
है ? भरत का मुख राम के समान था, वक्ष पिता के समान था और वे अत्यधिक
तेजस्वी थे, उनको देखकर राम की अथवा पिता की भ्रान्ति होना लक्ष्मण के लिये
स्वाभाविक था ॥८॥
संस्कृत-व्याख्या—अनुपमं न विद्यते उपमा उपमानं यस्य तादृशं, शशाङ्क-
मनोहरं शशाङ्कः चन्द्रः स इव मनोहरं हृदयाकर्षकं, सुरारिशरक्षतं सुरारीणां देवशत्रू-
णाम् असुराणां शरैः बाणैः क्षतं देव-दानवयुद्धेषु सहायतार्थं युद्धावसरेषु व्रणकिणितं
पीनं विशालस्थूलं वक्षः उरःस्थलं मम मे लक्ष्मणस्य पितृसमं पितुः सदृशं वर्तते !
परिवृतः द्युतिभिः कान्तिभिः परिवृतः परिवेष्टितः अयं तेजोराशिः तेजसा ।
वर्तते, जगत्प्रियदर्शनः जगतां लोकानां प्रियं प्रीतिकरं दर्शनम् अवलोकनं यस्य तादृशः
वर्तते । अयं जनः नरपतिः राजा दशरथो वर्तते अथवा देवेन्द्रः देवानां इन्द्रः शक्रः
वर्तते अथवा स्वयं मधुसूदनः मधुनाम्नो राक्षसस्य विनाशको भगवान् विष्णुः
वर्तते ॥८॥
व्याकरण—न विद्यते उपमा यस्य तत् = अनुपमम् । उप + √ मा + क्विप् =
उपमा । सुराणाम् अरीणां शरैः क्षतम् = सुरारिशरक्षतम् ।
छन्दः—हरिणी ।
अलङ्कार—उपमा, रूपक और उल्लेख । शशाङ्क के समान मनोहर में समा-
सगा उपमा है। उपमेय भरत पर तेजोराशि उपमान का आरोप करने से रूपक
अलङ्कार है । एक ही भरत का नरपति, देवेन्द्र और मधुसूदन, अनेक प्रकार से
उल्लेख करने से उल्लेख अलङ्कार है ।
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