प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
समये = देवताओ की सहायतार्थ जाने के समयWait, look atअभिसारिसमयेin line 12:अ भ ि स ा र ि स म य े: अभिसारिसमये. Line 13: मे । खम् = आकाश मे । समानैः = तुल्य । विमानै. = वायुयान के द्वाराLine 14:विख्यातः = सुप्रसिद्ध । यः = जो व्यक्तिविशेष । विमर्दे = युद्ध मे । बहुशः =Line 15:अनेक बार । सासुराणाम् = असुरो के सहित । सुराणाम् = देवताओ के ।Line 16:श्रीमान् = राजा दशरथ । त्यक्तदेहः = शरीर छोड कर । दयितम् = प्रेमीLine 17:जीव । स्नेहवन्तम् = अनुराग शाली । साम्प्रत = अब । रमयति = प्रसन्न होतेLine 18:होगे । पितृभि. = पितरो के साथ । नरेन्द्र. = राजा दशरथ । प्रवासम् = वनLine 19:यात्रा को । भरतविपादम् = भरत के दुःख को । अनाथताम् = अशरणताLine 20:को । बहुविधम् = नाना रूप वाले । अनुभूय = अनुभव करके । दुष्प्रसहम्
( 131 )
। नीचपथे = राज्य स्वीकृति के रूप मे पिता की आज्ञा न मानने वाले मार्ग
र। प्रवर्तते = चल रहे हो। मात्राभिहित = माता के द्वारा कहा गया है।
र्णे = घाव पर। प्रहर्तुम् = चोट पहुंचाना। सुगुण = हे अच्छे गुणों वाले।
सूतिः = उत्पत्ति। निभृतधीमान् = अचंचल बुद्धि वाले ' सुपुरुष = हे अच्छे
नपुरुप। मातृदोषः = जननी के द्वारा कियों गया अपराध। वरद = हे चाही
ई वस्तु को देने वाले। आर्तम् = पीड़ित। यथावत् = सही रूप में।
अन्वय-य पूर्वम् सासुराणाम् सुराणाम् विमर्दे अभिसरिसमये
श्वसैन्यं समानैः विमानैः खम् गत्वा स स इति बहुशः विख्यातः। स श्रीमान्
त्यक्तदेहः नरेन्द्रः दयितम् अपि स्नेहवन्तम् भवन्तम् विना स्वर्गस्थः साम्प्रतम
पितृभिः सह नरेन्द्रैः रमयति किम् । (१७)
अन्वय नरपतिनिधनम् भवत्प्रवासम् भरतविषादम् कुलस्य अनाथ-
ताम् बहुविधम् दुष्प्रसह्यम् अनुभूय मे आयुषा गुणे बहु अपराध्दम् इव। (१८)
अन्वय-इह देहेन स्थास्यामि, तत्र कर्मणा स्थास्यामि। भवतः नाम्ना
एव राज्य कृतरक्षं भविष्यति। (१६)
अन्वय-वत्स, अहम् पितुः नियोगात् वनम् आगतः। दर्पात् न, भयात्
न, विभ्रमात् न। न कुलम् च सत्यधनम्, ते ब्रवीमि, भवान् नीचपथे कथम्
प्रवर्तते। (२०)
अन्वय-सुगुण, त्वत् प्रसूतिः मम अपि प्रसूतिः। स खलु निभृत-
धीमान् ते पिता मे पिता च। सुपुरुष, पुरुषाणाम् मातृदोषः न दोषः। वरद,
तावत् आर्तम् भरतम् यथावत् पश्य। (२१)
हिन्दी अर्थ
सुमन्त्र-(पास जाकर) आप दीर्घायु की जय हो।
राम-हा तात,
आपके साथ जो राजा दशरथ पहले देवासुर संग्रामो मे देवो की सहा-
यता के लिए स्वर्ग जाते थे। उस यात्रा मे आपके विमान देव विमानों
के समान होते थे। उस युद्ध में महाराज की विजय पर लोग आदर
सम्मान प्रकट करते थे। वे ही राजा दशरथ अब मृत्यु के बाद आप
( 132 )
प्रेमी और स्नेही के बिना स्वर्ग में अपने अन्य पूर्वज राजाओं के
क्या आनन्द पाते होंगे । (१७)
सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) महाराज की मृत्यु, आपका वनवास, भरत की पी-
परिवार का रक्षकहीन होना आदि अनेक प्रकार के कष्टों को दि-
कर मेरी लम्बी उम्र ने गुणों के साथ दोष ही अधिक दिए हैं । (१८)
सीता—तात रोते हुए पतिदेव को और भी अधिक रुला रहे हैं ।
राम—सीते, यह मैं अपने आपको सँभाल रहा हूँ । वत्स लक्ष्मण, जरा पानी
तो लाओ ।
लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा ।
भरत—आर्य, यह उचित नही है । छोटा होने के कारण वारी तो मेरी है ।
मैं ही जल लाऊँगा । (कलश लेकर, बाहर जाकर, पुनः अन्दर आकर)
यह जल है ।
राम— (आचमन करके) सीते, अब तो लक्ष्मण का काम छिन रहा है ।
सीता—पतिदेव, इसे भी तो सेवा करनी चाहिए ।
राम—ठीक है । यहां वन में लक्ष्मण सेवा करे और वहाँ अयोध्या में भरत ।
भरत—आर्य प्रसन्न होइए ।
मैं यहाँ पर शरीर से रहूँगा तथा वहाँ तो केवल मेरा प्रबन्ध रहेगा
राज्य की रक्षा तो आपके नाममात्र से ही हो जायेगी । (१९)
राम—हे वत्स भरत, ऐसा मत कहो ।
हे वत्स, मैं पिता की आज्ञा से वन में आया हूँ । न तो मैं अभिमान से
यहाँ आया हूँ, न भय से अथवा न चित्त के पागलपन से । हमारा
रघुकुल सत्य के लिए प्रसिद्ध है, यह मैं तुमसे कह रहा हूँ । इसे
जानते हुए भी तुम निम्न पथगामी क्यों बन रहे हो । (२०)
सुमन्त्र—तो फिर अब राज्याभिषेक किसका होना चाहिए ?
राम—उसी का होवे, जिसके लिए जननी ने कहा है ।
भरत—आप प्रसन्न होइए । आर्य, अब घाव पर नमक न छिड़कें ।
हे गुणज्ञ मेरा जन्म भी उसी कुल में हुआ है, जिसकी आप शोभा
हैं । मेरे पिता भी वे ही प्रशस्त बुद्धि वाले हैं, जिनके आप यशस्कर
( 133 )
है। हे श्रेष्ठ पुरुष, मनुष्यों में माता के अपराध को अपराध नहीं
माना जाना चाहिए। हे वर देने वाले, दुःखी भरत की ओर न्यायो-
चित दृष्टि से देखें। (२१)
मूल
-आर्यपुत्र ! अतिकरुणं मन्त्रयते भरतः । किमिदानीमार्यपुत्रेण
चिन्त्यते ।
.-मैथिलि !
तं चिन्तयामि नृपतिं सुरलोकयातं
येनायमात्मजविशिष्टगुणो न दृष्टः ।
ईदृग्विधं गुणनिधिम् समवाप्य लोके
धिग् भो विधेर्यदि बलं पुरुषोत्तमेषु ॥ (२२)
वत्स कैकेयीमातः !
यत्सत्यं परितोषितोऽस्मि भवता निष्कल्मषात्मा भवां
स्त्वद्वाक्यस्य वशानुगोऽस्मि भवतः ख्यातैर्गुणैर्निर्जितः ।
किन्त्वेतन्नृपतेर्वचस्तदनृतं कर्तुम् न युक्तं त्वया
किञ्चोत्पाद्य भवद्विधं भवतु ते मिथ्याभिधायी पिता ॥(२३)
भरतः-यावद् भविष्यति भवन्नियमावसानं
तावद् भवेयमिह ते नृप, पादमूले ।
रामः-मैवं नृपः स्वसुकृतैरनुयातु सिद्धिं
मे शापितो न परिरक्षसि चेत् स्वराज्यम् ॥ (२४)
भरतः-हन्त अनुत्तरमभिहितम् । भवतु समयतस्ते राज्यं परि-
पालयामि ।
रामः-वत्स ! कः समयः ?
भरतः-मम हस्ते निक्षिप्तं तव राज्यं चतुर्दश वर्षान्ते प्रतिग्रहीतु-
मिच्छामि ।
रामः एवमस्तु ।
भरतः-आर्ये ! श्रुतम् । आर्ये ! श्रुतम् । तात ! श्रुतम् ।
सर्वे-वयमपि श्रोतारः ।
( 134 )
भरतः—आर्य ! अन्यमपि वरं हर्तुं मिच्छामि ।
रामः—वत्स ! किमिच्छसि ? किमहं ददामि ? किमहमनुष्ठास्यामि
भरतः—पादोपभुक्ते तव पादुके मे
एते प्रयच्छ प्रणताय मूर्ध्ना ।
यावद् भवानेष्यति कार्यसिद्धिम्
तावद् भविष्याम्यनयोर्विधेयः ॥ (२५)
शब्दार्थ—अतिकरुणम् बहुत ही दीन होकर । मन्त्रयते = कह रहा
है । चिन्त्यते = विचार किया जा रहा है । सुरलोकयांत == स्वर्ग गए हुए ।
आत्मजविशिष्टगुणः=पुत्रों मे विशेष गुण वाला । ईदृग्विधम्=इस प्रकार का ।
गुणनिधि = गुणों के खजाने । समवाप्य = प्राप्त करके । धिग् = धिक्कार है ।
विधेः = भाग्य के । पुरुषोत्तमेषु = मनुष्यों में श्रेष्ठ पूज्य पिता मे । यत्सत्यम्
= सचमुच में । परितोषितः = सन्तुष्ट । निष्कल्मषात्मा - निष्पाप बुद्धि वाले ।
भवान् आप भरत । वशानुगः = वशीभूत हुआ । भवतः = आपके । ख्यातं =
सुप्रसिद्ध । निर्जितः = पराजित कर दिया है । अनृतं = मिथ्या । युक्तम् =
उचित । किञ्च = और । उत्पाद्य = उत्पन्न कर के । भवद्विधम् = तुम्हारे
जैसा । भवतु = होवे । ते = तुम्हारा । मिथ्याभिधायी = झूठ बोलने वाला ।
यावद्=जब तक । भवन्नियमावसानम् = आपके वनवास की समाप्ति । भवेयम्
= रहूँगा । इह = यहाँ पर । ते=आपके । पादमूले = चरणों मे । मैवम् =
ऐसा मत कहो । स्वसुकृतैः = अपनी सत्यवादिता जन्य पुण्य से । अनुयातु
= प्राप्त करे । सिद्धिम् = सफलता को । मे = मेरी । शापितः = सौगन्ध ।
परिरक्षसि = पालोगे । चेत् = यदि । हन्त = हाय । अनुत्तरम् = उत्तर देने
से रहित । अभिहितम् = कहा गया । भवतु -- ठीक है । समयतः = शर्त के
अनुसार । समय. = शर्त । निक्षिप्तम् = धरोहर रूप मे रखा गया । प्रतिग्रही-
तुम् = देना । श्रुतम् - सुन लिया । हर्तुम् - प्राप्त करना । अनुष्ठास्यामि =
करूँ । पादोपभुक्ते = चरणों मे पहनी हुई । पादुके = दो खडाऊ । प्रणताय =
झुके हुए । मे = मुझे । मूर्ध्ना = सिर से । एष्यति = आयेंगे । अनयोः = इन
दोनो चरण पादुकाओं का । विधेयः = आज्ञाकारी ।
अन्वय—सुरलोकयात तं नृपतिम् चिन्तयामि, येन अयम् आत्मज-
विशिष्टगुणः न दृष्टः । लोके ईदृग्विध गुणनिधिम् समवाप्य पुरुषोत्तमेषु यदि
विधेः बलम् । (तर्हि) भो धिक् । (२२)
( 135 )
अन्वय—भवता यत्सत्यम् परितोषितः अस्मि, भवान् निष्कल्मषात्मा,
तैः भवतः गुणैः निर्जितः । त्वद् वाक्यस्य वशानुगः अस्मि । किन्तु एतत्
तेः वचः तत् त्वया अनृतं कर्तुम् न युक्तम् । किञ्च भवद्विधम् उत्पाद्य ते
ता मिथ्याभिधायी भवतु । (२३)
अन्वय—यावत् भवन्नियमावसानं भविष्यति, नृप, तावत् इह ते पादमूले
यम् । मैवम् नृपः स्वसुकृतैः सिद्धिम् अनुयातु, चेत् स्वराज्यं न परिरक्षसि,
शपितः । (२४)
अन्वय—मूर्ध्ना प्रणताय मे एते पादोपभुक्ते तव पादुके प्रयच्छ । यावत्
भवान् कार्यसिद्धिम् एष्यति, तावत् अनयोः विधेयः भविष्यामि । (२५)
हिन्दी अर्थ
सीता—पतिदेव, भरत बहुत दीनता से बोल रहे हैं। आप अब क्या सोच
रहे है ?
राम—सीते,
मैं स्वर्ग लोक मे गए हुए अपने उन पिताजी के विषय में सोच रहा हूँ,
जिन्होने अपने अनुपम इस पुत्र रत्न को नही देखा। संसार में इस
प्रकार के गुणसागर पुत्र को प्राप्त करके भी पिताजी की मृत्यु हो
गई, तो भाग्य की इस विडम्बना को धिक्कार है। (२२)
हे वत्स भरत,
तुमने मुझे सचमुच मे प्रसन्न कर दिया। तुम्हारी अन्तरात्मा अति
पवित्र है। तुम्हारी बात को मै मानता हूँ। तुम्हारे सुविख्यात गुणो
ने मुझे जीत लिया है। ये सारी बाते ठीक है। किन्तु तुम्हारे द्वारा }
पिताजी के इस वाक्य को कि "भरत राजा बने" मिथ्या करना समु-
चित नहीं है। तुम्हारे जैसे इतने अच्छे पुत्र को उत्पन्न करके तुम्हारे
पिता झूठ बोलने वाले हों, यह अच्छा नही है। (२३)
भरत—हे महाराज राम, जब तक आपका यह वनवास समाप्त नहीं होगा,
तब तक मैं भी यही आपके चरणो की सेवा में रहूँगा।
राम—ऐसा मत कहो। राजा दशरथ को अपने पुण्य से सिद्धि भोगने दो।
यदि तुम अपना राज्य नही सँभालो, तो तुम्हे मेरी शपथ है। (२४(
( 136 )
भरत—हाय, आपने तो मुझे अनुत्तर सा कर दिया । अच्छा, मैं एक शर्त पर
आपके राज्य का पालन करूँगा ।
राम—वत्स, वह कौन सी शर्त है ।
भरत—मेरे हाथ में धरोहर रखा हुआ आपका राज्य चौदह वर्ष के अन्त में
पुनः आपको लौटाना चाहता हूँ ।
राम—ऐसा ही होवे ।
भरत—आर्य, सुना । हे पूज्ये, सुना । तात, सुना आपने ।
सभी—हम लोग साक्षी हैं ।
भरत—आर्य, मैं एक वरदान और लेना चाहता हूँ ।
राम—वत्स, क्या चाहते हो ? मैं क्या दूँ ? मैं क्या करूँ ?
भरत—आपके चरणों में मस्तक झुकाने वाले मुझे आपके पाँवों में पहनी
हुई ये खड़ाऊ दे दें । जब तक आप अपना वनवास पूरा करके लौटें
तब तक मैं इनका सेवक बन कर आपका राज्य भार संभालूँगा । (२५)
(७) मूल
रामः—(स्वगतम्) हन्त भोः ।
सुचिरेणापि कालेन यशः किञ्चिन्मयार्जितम् ।
अचिरेणैव कालेन भरतेनाद्य सञ्चितम् ॥ (२६)
सीता—आर्यपुत्र ! ननु दीयते खलु प्रथमयाचनं भरताय ।
रामः—तथास्तु । वत्स ! गृह्यताम् ।
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । (गृहीत्वा) आर्य !
अत्राभिषेकोदकमावर्जयितुमिच्छामि ।
रामः—तात ! यदिष्टं भरतस्य तत् सर्वम् क्रियताम् ।
सुमन्त्रः—यदाज्ञापयत्यायुष्मान् ।
भरतः— (आत्मगतम्) हन्त भोः!
श्रद्धेयः स्वजनस्य पौररुचितो लोकस्य दृष्टिक्षमः
स्वर्गस्थस्य नराधिपस्य दयितः गीfull/शीलान्वितोऽहं सुतः ।
भ्रातॄणां गुणशालिनां बहुमतः कीर्तेर्महद् भाजनं
संवादेषु कथाश्रयो गणवतां लब्धप्रियाणां प्रियः ॥ (२७)
( 137 )
रामः—वत्स ! कैकयीमातः ! राज्यं नाम मुहूर्तमपि नोपेक्षणीयम् ।
तस्मादद्यैव विजयाय प्रतिनिवर्ततां कुमारः ।
सीता—हम्, अद्यैव गमिष्यति कुमारो भरतः ।
रामः—अलमतिस्नेहेन । अद्यैव विजयाय प्रतिनिवर्ततां कुमारः ।
भरतः—आर्य ! अद्यैवाहं गमिष्यामि ।
*( 138 )
हम् = क्या (खेद व आश्चर्य सूचक अव्यय, जो स्त्री पात्रो द्वारा प्रयुक्त किया
जाता है) । आशावन्तः = राम के आने की आस लगाए हुए। पुरे = अयोध्या
नगर मे । पौराः = नागरिक । स्थास्यन्ति = विद्यमान होगे । त्वद्दिदृक्षया =
आपके देखने की इच्छा मे । प्रीतिम् अनुराग को । करिष्यामि = करूँ गा ।
प्रमादस्य = कृपा अर्थात् चरण पादुकाएँ । प्रयतिष्ये = प्रयत्न करूँ गा । आरो-
हतः = दोनो चढ़ते हैं । अनुयातृ = पीछे चलने वाले ।
अन्वय-मया सुचिरेण अपि कालेन किञ्चित् यश. अर्जितम् । अद्य
भरतेन अचिरेण एव कालेन सञ्चितम् । (२६)
अन्वय-अहम स्वजनस्य श्रद्देयः, पौररुचितः, लोकस्य दृष्टिक्षमः,
स्वगंस्थस्य नराधिपस्य दयितः शीलान्वित. सुतः, गुणशालिनां भ्रातृणां बहुमतः,
कीर्तेः महत् भाजनम्, गुणवता संवादेपु कथाश्रय., नब्धप्रियाणा प्रियः
जातः । (२७)
अन्वय -- पुरे पौराः आशावन्त. त्वद्दिदृक्षया स्थास्यन्ति । त्वत्प्रसा-
दस्य दर्शनात् तेषा प्रीति करिष्यामि । (२८)
हिन्दी अर्थ
राम- (स्वगत) अहा,
मैंने बहुत दिनों में जितना यश संचित किया था, भरत ने उतना यश
अल्प काल में ही अर्जित कर लिया है । (२६)
सीता-आर्यपुत्र, क्या भरत को आप प्रथम बार मांगी गई वस्तु नहीं देंगे ।
राम-अवश्य । कुमार, यह लो ।
भरत-बड़ी कृपा । (लेकर) आर्य, इन पर राज्याभिषेक के जल को छिटकना
चाहता हूं ।
राम-तात, जो भरत को प्रिय हो, वह सभी किया जाए ।
सुमन्त्र-जैसी आपकी आज्ञा ।
भरत-(मन में) अहा,
अब मैं अपने बान्धवों का विश्वास पात्र बना । नगरवासियों का प्रेम
पात्र, संसार की ओर आंख उठा कर देखने योग्य, स्वर्गवासी महाराज
दशरथ का प्रिय एवं अच्छे गुण वाला पुत्र, गुणी भाइयों का सम्मानी,
( 139 )
प्रशंसा का बहुत बडा आश्रय, गुणीजनों की पारस्परिक वार्ता का
विषय और सफल मनोरथ प्रजा का प्रिय बन गया हूँ । (२७)
राम- हे वत्स भरत, राज्य की थोड़े समय के लिए भी उपेक्षा नही करनी
चाहिए । अतः तुम आज ही विजय के लिए वापस लौट जाओ ।
सीता-अरे, क्या, आज ही कुमार भरत चले जायेगे ।
राम-अधिक स्नेह मत बताओ । आज ही भरत राज्य की रक्षा के निमित्त
वापस जाये ।
भरत--आर्य, मै आज ही चला जाऊँगा ।
प्रजा के लोग आशा लगाए हुए आपको देखने की इच्छा से अयोध्या
मे प्रतीक्षा कर रहे होगे । मैं जाकर उन्हे यह आपकी कृपा अर्थात्
चरण पादुकाएँ दिखाऊँगा और उनको प्रसन्न करूँगा । (२८)
सुमन्त्र-- हे दीर्घायु, अब मै क्या करूँ ?
राम-तात, महाराज की भाँति भरत का पालन करे ।
सुमन्त्र-यदि जीवित रहा, तो प्रयास करूँगा ?
राम-वत्स भरत, मेरे सामने ही रथ पर चढो ।
भरत-जो आज्ञा ।
(दोनो भरत और सुमन्त्र रथ पर बैठते हैं)
राम-हे सीते, जरा इधर तो आओ । वत्स लक्ष्मण, तुम भी इधर आओ ।
आश्रम के द्वार तक हम भी भरत के पीछे चलेगे ।
(इस प्रकार सभी निकल जाते है)
चौथा अंक समाप्त ।
ति रामः)with a colon:(ततः प्रविशति रामः:)? No, it's (ततः प्रविशति रामः)with a dot? No,रामः.)- look at it:(ततः प्रविशति रामः.)`).
-
Line 9:
रामः— (सशोकम्)(orरामः— (सशोकम् )with a dash). -
Line 10:
त्यक्त्वा तां गुरुणा मया च रहितां रम्यामयोध्यां पुरी
Wait, is there an anusvara onपुरी?
Look atपुरी: there is a dot to the right? No, there is a comma/speck far to the right, but onरीthere is no dot? Wait, at the top ofरी, no, but in line 10, the last word isपुरीorपुरीं?
Wait,रम्यामयोध्यां पुरींis grammatically required. In the print:पुरीwith no clear anusvara, wait, there is a tiny speck overरी? No, look atमया च रहितां रम्यामयोध्यां पुरी: wait, there's an apostrophe/speck at the far right. -
Line 11:
`मुद्वाप्यापि ममाभिषेकमखिलं मत्सन्नि
कष्टं वनं स्त्रीजनसौकुमार्यं
समं लताभिः कठिनीकरोति ॥ (३)
(उपेत्य) मैथिलि ! अपि तपो वर्धते !
सीता—हम् आर्यपुत्रः ! जयत्वार्यपुत्रः ।
रामः—मैथिलि ! यदि ते नास्ति धर्मविघ्नः, आस्यताम् ।
सीता—यदार्यपुत्र आज्ञापयति । (उपविशति)
रामः—मैथिलि ! प्रतिवचनार्थिनीमिव त्वां पश्यामि । किमिदम् ?
सीता—शोकशून्यहृदयस्येवार्यपुत्रस्य मुखरागः । किमेतत् ?
रामः—मैथिलि ! स्थाने खलु कृता चिन्ता ।
कृतान्तशल्याभिहते शरीरे
तथैव तावद् हृदयव्रणो मे ।
नानाफलाः शोकशराभिघाता
स्तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति ॥ (४)
सीता—आर्यपुत्रस्य क इव सन्तापः ?
शब्दार्थ—उपहारसुमनः=देवताओं के लिए चढ़ाए जाने वाले पुष्प ।
आकीर्णाः=परिपूर्णा । सम्मार्जितः= स्वच्छ बना । आश्रम पदविभवेन=तपोवन
में प्राप्त पुष्प आदि सम्पदा से । अनुष्ठितः=किया है । देवसमुदाचारः=देव-
पूजा । बालवृक्षान्=छोटे पेड़ों को । उदकप्रदानेन=जल से सींचने के द्वारा ।
अनुक्रोशयिष्यामि=प्रसन्न करूंगी । अविघ्नम्=सानन्द । अस्य=सिंचन कार्य
का । त्यक्त्वा=छोड़ कर । तां=उस (अयोध्या) को । गुरुणा=पिता दशरथ के
द्वारा । मया=मुझ राम के द्वारा । रहिता=सूनी बनी । रम्यां=सुन्दर । पुरीम्
=नगरी को । उद्यम्य=प्रयत्नपूर्वक सम्पादित करके । अखिलं=सम्पूर्णां ।
मत्सन्निधौ= मेरे पास । आगतः=(भरत) आया । गुणनिधिः=गुणों का समूह
भरत । तत्र=उसी सूनी अयोध्या में । सम्प्रेषितः=भेजा गया । नृपतेः=राजा
का । धुरं=भार । सुमहती=बहुत भारी । एकः=अकेला भरत । समुत्कर्षति=
ढो रहा है । विमृश्य=विचार कर के । ईदृशशोकविनोदनार्थम्=इस प्रकार के
अर्थात् भरत वियोग जन्य दुःख को दूर करने के लिए । अवस्थाकुटुम्बिनीम्=
सभी दशाओं मे साथ रहने वाली (कुटुम्ब धातु चुरादि गण, आत्मनेपदी की
अकर्मक धातु है, जिसका अर्थ होता है "धारण करना" इसके लट्, प्र०पु०,
(142)
एक वचन में "कुटुम्बयते" रूप बनता है) । प्रत्यग्राभिषिक्तानि=अभी-अभी
सीचे गए । वृक्षमूलानि=वृक्षो की जडें । अदूरगतां=पास मे ही । वृक्षावर्ते=
पेड के थाले (आलवाल) में । सफेनम्=झाग के सहित । अवस्थित= भूमि मे
गया हुआ । तृषितपतिताः=प्यासे होने के कारण जल पीने को आए हुए ।
क्लिष्ट=कलुषित अर्थात् मटमैले । खगा=पक्षी । स्थलं=सूखी जगह पर ।
अभिपतन्ति=दौड कर जा रहे हैं । कीटा.=कीडे । जलपूरिते=पानी से भरे ।
नववलयिनः=नई गोलाकार रेखा वाले । मूले=जड भाग मे । जलक्षयरेखया=
पानी के सूख जाने के चिह्न से । श्राम्यति=थक जाता है । दर्पणे=काच को
उठाने में । नैति=न+एति=नही प्राप्त करता है । खेद=थकान को । वहन्त्याः
=लेते हुए । कष्टं=दुःख । स्त्रीजनसौकुमार्यम्=ललना स्वभाव की सुलभ कोम-
लता । कठिनीकरोति=कठोर हो जाती है । धर्मविघ्नः= अनुष्ठान मे बाधा ।
आस्यताम्=बैठो । प्रतिवचनार्थिनीम्=कुछ पूछने की इच्छुक । शोकशून्यहृद-
यस्य=दुःख से सूने हृदय वाले । मुखरागः=आनन का वर्ण । स्थाने=उचित विषय
मे । कृतान्तशल्याभिहिते = यमराज के बाण तुल्य यथा वाले । हृदयव्रणः
=पिता के वियोग के दुःख वाला मानसिक खेद । नानाफलाः=अनेक प्रकार के
फल वाले । शोकशराभिघाता.=दु ख रूपी वाणो के प्रहार । क इव=
किस प्रकार का । सन्ताप.=शोक ।
अन्वय--गुरुणा मया च रहिताम् ताम् रम्याम् अयोध्याम् पुरीम्
त्यक्त्वा, अखिलम् मम अभिषेकम् उद्यम्य मत्संन्निधौ आगतः अपि गुणनिधिः
भरतः पुनः तत्र एव रक्षार्थम् सम्प्रेषितः । एकः नृपतेः सुमहतीम् धुरं
समुत्कर्षति, कष्टम् भोः । (१)
अन्वय-सलिलम् वृक्षावर्ते अवस्थितम् सफेनम् भ्रमति । तृषितपतिताः
एते खगाः क्लिष्टम् जलम् न पिवन्ति । बिले जलपूरिते आर्द्रा. कीटाः स्थलम्
पतन्ति । वृक्षाः मूले जलक्षयरेखया नववलयिनः । (२)
अन्वय-य अस्या. करः दर्पणे अपि श्राम्यति, स कलशम् वहन्त्याः
खेदम् न एति । कष्टम् (यत्) वनम् लताभिः समम् स्त्रीजनसौकुमार्यम्
कठिनीकरोति । (३)
अन्वय-कृतान्तशल्याभिहिते मे शरीरे हृदयव्रणः तावत् तथा एव ।
नानाफला. शोकशराभिघाताः तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति । (४)
हिन्दी अर्थ
(सीता और तापसी का प्रवेश)
( 143 )
सीता—आर्ये, आश्रम में बिखरे हुए पूजा के फूलों को साफ कर दिया ।
आश्रम सुलभ फल फूल आदि से देव पूजा भी कर ली । तो अब जब
तक पतिदेव नहीं आते हैं, मैं इन छोटे पौधों को जल से सींच लूँ ।
तापसी—तुम्हारा यह कार्य बिना बाधा के होवे ।
(इसके बाद राम आते हैं)
राम—(खेद पूर्वक) पिताजी और मुझ से रहित उस सुन्दर अयोध्या को
छोड़ कर, मेरे अभिषेक की सारी सामग्री साथ लेकर भरत मेरे पास
आया । मैंने पुनः उस गुणों के आगार भरत को राज्य के पालन के
लिए वहीं पर भेज दिया । बड़े कष्ट की बात है कि पिताजी के
राज्य के भारी भार को वह अकेला ही खेच रहा है । (१)
(सोच कर) यह राजकार्य ऐसा ही है । तो अब मैं ऐसी चिन्ताओं से
मुक्ति पाने के लिए मेरी सहचरी सीता को देखूँ । सीता अभी
कहाँ गई होगी ? (घूम कर और देख कर) अरे, ये तत्काल सींचे गए
पौधों के थाल बता रहे हैं कि सीता यहीं कहीं पास में है । क्योंकि—
पेड़ों के थालों में पड़ा झाग वाला जल अभी भी घूम रहा है और प्यासे
पक्षी पास आकर भी इस मैले पानी को नहीं पी रहे हैं । जल से भीगे
कीड़े अपने बिलों से भाग कर बाहर आ रहे हैं तथा पेड़ों की जड़ों
में कई गोलाकार रेखाएं पड़ गई हैं । (२)
(देख कर) अरे, सीता तो यह रही । हाय, बड़ा दुःख है ।
इसका हाथ कभी दर्पण उठाने में भी थक जाता था, वही हाथ अब
घड़ा उठाने में भी नहीं थकता । वनवास ने लताओं के साथ नारी
की सुकुमारता को भी कठोरता में बदल दिया है । (३)
(पास जाकर) सीते, क्या तुम्हारा तप बढ़ रहा है ?
सीता—अरे, पतिदेव । आर्यपुत्र की जय हो ।
राम—सीते, यदि तुम्हारे धार्मिक कार्य में कोई रुकावट न हो, तो बैठ जाओ ।
सीता—जैसी आपकी आज्ञा । (बैठती है)
राम—सीते, लगता है जैसे तुम कुछ पूछना चाहती हो ? क्या बात है ?
सीता—आपके मुख से लग रहा है मानो आपका हृदय किसी दुःख से
सना हो रहा है । यह क्या है ?
(144)
राम—सीते, तुम्हारा सोचना नितान्त उचित है ।
यमराज के बाणों के प्रहार होने वाले मेरे शरीर पर हृदय का घाव
तो अभी वैसा ही है । इसी बीच अनेक फल वाले दुःख रूपी बाणों
के आघात उसी स्थान पर बार-बार गिर रहे हैं । (४)
सीता—आखिर आर्यपुत्र को किस बात की चिन्ता है ?
(२) मूल
रामः—श्वस्तत्रभवतस्तातस्यानुसंवत्सरश्राद्धविधिः ।
कल्पविशेषेणनिवपनक्रियामिच्छन्ति पितरः । तत
कथं निर्वर्तयिष्यामीत्येतच्चिन्त्यते । अथवा—
इच्छन्ति तुष्टिं खलु येन केन
त एव जानन्ति हि ता दशा मे ।
इच्छामि पूजां च तथापि कर्तुम्
तातस्य रामस्य च सानुरूपाम् ॥ (५)
सीता—आर्यपुत्र ! निर्वर्तयिष्यति श्राद्धं भरत ऋद्ध्या, अवस्था-
नुरूपं फलोदकेनाप्यार्यपुत्रः । एतत् तातस्य बहुमततरं
भविष्यति ।
रामः—मैथिलि !
फलानि दृष्ट्वा दर्भेषु स्वहस्तरचितानि नः ।
स्मारितो वनवासं च तातस्तत्रापि रोदिति ॥ (६)
(ततः प्रविशति परिव्राजकवेषो रावणः)
रावणः—एष भोः !
नियतमनियतात्मा रूपमेतद् गृहीत्वा
खरवधकृतवैरं राघवं वञ्चयित्वा ।
स्वरपदपरिहीणां हव्यधारामिवाहं
जनकनृपसुतां तां हर्तुकामः प्रयामि ॥ (७)
(परिक्रम्याधो विलोक्य)
इदं रामस्याश्रमपदद्वारम् । यावदवतरामि । (अवतरति)
यावदहमप्यतिथिसमुदाचारमनुष्ठास्यामि । अहमतिथिः ।
कोऽत्र भोः !
( 145 )
रामः-(श्रुत्वा) स्वागतमतिथये।
रावणः-साधु विशेषितं खलु रूपं स्वरेण।
रामः-(विलोक्य) अये भगवान्। भगवन्! अभिवादये।
रावणः स्वस्ति।
रामः-भगवन्! एतदासनमास्यताम्।
रावणः--(आत्मगतम्) कथमाज्ञप्त इवास्म्यनेन।
(प्रकाशम्) बाढम्। (उपविशति)
रामः-मैथिलि! पाद्यमानय भगवते।
सीता-यदार्थपुत्र आज्ञापयति। (निष्क्रम्य प्रविश्य)
इमा आपः।
रामः-शुश्रूषय भगवन्तम्।
सीता-यदार्थपुत्र आज्ञापयति।
रावणः-(मायाप्रकाशनपर्याकुलो भूत्वा) भवतु भवतु। इयमेका
पृथिव्या हि मानुषीणामरुन्धती।
यस्या भर्तेति नारीभिः सत्कृतः कथ्यते भवान्॥ (८)
रामः-तेन हि आनय, अहमेव शुश्रूषयिष्ये।
रावणः-अयि, छाया परिहृत्य शरीरं न लङ्घयामि। वाचानुवृत्तिः
खल्वतिथिसत्कारः। पूजितोऽस्मि। आस्यताम्।
रामः-बाढम्। (उपविशति)
रावणः-(आत्मगतम्) यावदहमपि ब्राह्मणसमुदाचारमनुष्ठास्यामि
(प्रकाशम्) भोः! काश्यपगोत्रोऽस्मि। साङ्गोपाङ्गं
वेदमधीये, मानवीयं धर्मशास्त्रं, माहेश्वरं योगशास्त्रं, बार्ह-
स्पत्यमर्थशास्त्रं, मेघातिथेर्न्यायशास्त्रं, प्राचेतसं श्राद्धकल्पं च।
रामः-कथं कथं श्राद्धकल्पमिति।
शब्दार्थ - श्वः=कल। तत्रभवतः=पूज्य। तातस्य=पिता दशरथ की।
अनुसंवत्सर=प्रत्येक वर्ष मे किया जाने वाला। श्राद्धविधिः=श्राद्धकर्म। कल्प-
विशेषेण=विशिष्ट वस्तु दान के द्वारा। निवपनक्रियाम्=पिण्ड दान के कार्य
को। पितरः = मृत पूर्वज। निवर्तयिष्यामि = पूर्ण करूंगा। चिन्त्यते=विचार
किया जा रहा है। तृप्तिम् = तृप्ति को। येन केन = अपनी दशा के अनुरूप।
त इव = वे ही। मे = मेरी। रामस्य = स्वयं के। सानुरूपाम् = अपने योग्य।
( 146 )
ऋद्ध्या = ऐश्वर्य के साथ । फलोदकेन = फल-फूल और जल से । बहुमतं
= अधिक प्रिय । दर्भेषु = कुश घास पर । नः = हमारे । स्मारितः = याद दिला
जायेगा । रोदिति = रोएँगे । परिव्राजकवेषः = साधु के रूप मे । नियतम् = जितेन्द्रिय
राम को । अनियतात्मा = अजितेन्द्रिय मैं रावण । रूपम् = वेश को । खरं
कृतवैरम् = खर नामक राक्षस को मारने के कारण उत्पन्न शत्रु को । वञ्च-
यित्वा = ठग कर । स्वराङ्गपरिहीणा = स्वर और शब्द के विभाग से रहित
हव्यधाराम् = हवि और घी की धारा को । हर्तुकामः = अपहरण की इच्छा
वाला । प्रयामि = जा रहा हूँ । अधः = नीचे । अवतरामि = नीचे उतरूं । प्रतिपत्ति
समुदाचारम् = अभ्यागतोचित व्यवहार को । अनुष्ठास्यामि = करूँगा । साधु =
स्वभाव सुन्दर । विशेषितम् = और अधिक सुन्दर किया है । रूप = आकृति ।
स्वरेण = शब्द के द्वारा । आज्ञप्तः = आज्ञा दिया गया । वाढम् = ठीक ।
पाद्यम् = पाव धोने के लिए जल । भगवते = महानुभाव के लिए । शुश्रूषय = सेवा
करो । मायाप्रकाशनपर्याकुलः = सीता द्वारा रावण के पैर छूने पर उस अजिते-
न्द्रिय के रोमाञ्च आदि से सन्यासी का कपट भेद खुल जाने से व्याकुल ।
भूत्वा = होकर । अरुन्धती = वसिष्ठ पत्नी के तुल्य पतिव्रता । भर्ता = पति ।
सत्कृतः = पूजित । कथ्यते = कहे जाते हो । भवान् = आप । आनय = लाओ ।
लङ्घयामि = छूने दूंगा । वाचानुवृत्तिः = अच्छी वाणी को कहना । पूजितः =
सम्मानित । समुदाचारम् = आचरण को । साङ्गोपाङ्गम् = अंग और उपांग
के सहित । वेद के छ अग = शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष ।
उपांग चार हैं = पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र । अधीये = पढा हुआ
हूँ । मानवीयं = मनु द्वारा प्रवर्तित । माहेश्वरं = महेश्वर द्वारा कथित । धर्म-
शास्त्र = धर्मानुशासन । योगशास्त्र - पातंजल उपजीव्य योगविद्या का रहस्य ।
बार्हस्पत्यम् = बृहस्पति द्वारा कथित । अर्थशास्त्र = अर्थनीति प्रतिपादन प्रधान
राजनीतिशास्त्र । मेधातिथेः = मेधातिथि नामक महर्षि का । न्यायशास्त्र = तर्क-
शास्त्र विशेष । प्राचेतस = वरुण द्वारा कथित । श्राद्धकल्प = श्राद्धविधान ।
अन्वय — येन केन खलु तुष्टिम् इच्छन्ति, हि ते एव मे तां दशां
जानन्ति । तथापि तातस्य च रामस्य सानुरूपा पूजा कर्तुम् इच्छामि । (५)
अन्वय — दर्भेषु नः स्वहस्तरचितानि फलानि दृष्ट्वा तातः वनवासं
स्मारितः च तत्रापि रोदिति । (६)
( 147 )
अन्वय-अनियतात्मा एतत् रूप ग्रहीत्वा नियतं खरवधकृतवैर राघवं
वा अह स्वरपदपरिहीणा हव्यधाराम् इव तां जनकनृपसुता हर्तुं कामः
। (७)
अन्वय—इयं हि पृथिव्या मानुषीणाम् एका अरुन्धती । यस्याः भर्ता
खान् नारिभिः सत्कृतः कथ्यते । (८)
। अर्थ
-कल पिताजी का वार्षिक श्राद्ध दिवस है । पितर लोग सामर्थ्य के अनुसार
अपना पिण्डदान चाहते है । उमे मैं किस प्रकार पूरा करूँगा, यही
चिन्ता है ।
अथवा—
वे जिस भांति तृप्त होते है, होवे । क्योकि वे मेरी पूरी स्थिति को
तो जानते ही है । फिर भी मैं पिताजी की प्रतिष्ठा तथा अपने सामर्थ्य
के अनुरूप पितृश्राद्ध करना चाहता हूँ । (५)
सीता—आर्यपुत्र, बडे वैभव के साथ पिताजी का श्राद्ध तो भरत करेंगे ही,
आप भी अपनी अवस्था के योग्य फल-जल से श्राद्ध करे । पिताजी
इसे ही पर्याप्त मान लेगे ।
सीते, —
राम—कुशों पर हमारे हाथों से रखे फलो को देखते ही हमारे वनवास की
याद आ जाने से पिताजी वहां पर भी रो देगे । (६)
(इसके बाद संन्यासी के वेश में रावण का प्रवेश)
रावण—अरे यह,
राम ने खर दूषण का वध करके मेरे साथ वैर बढाया है । मैं आज
उसे ठगने के लिए अविरक्त होकर भी विरक्त का रूप धारण करता
हूँ । मैं सीता का हरण करने उस प्रकार जा रहा हूँ, जिस प्रकार
स्वर तथा पद से अशुद्ध मन्त्रोच्चारण हवन की आज्यधारा को हर
लेता है । (ऐसी मान्यता है कि मन्त्रदोष से दीयमान हव्यधारा को
राक्षस ग्रहण कर लेते है ।) (७)
(घूम कर तथा नीचे की ओर देख कर) यह राम के आश्रम के
स्थान का द्वार है । तो मै नीचे उतरूं । (उतरता है) अब मै अतिथि
के योग्य आचरण करता हूँ । मैं अतिथि हूँ । अरे, यहां कौन है ?
राम— (सुन कर) अतिथि का स्वागत है ।
( 148 )
रावण—इसके स्वर ने रूप को और चमका दिया है ।
राम—(देख कर) अरे भगवान् हैं ।' भगवान्, प्रणाम ।
रावण—कल्याण हो ।
राम--भगवान्, यह आसन है, बैठिए ।
रावण—(मन मे) इसके द्वारा मे मानो आदेश दिया गया हूँ । (प्रव
अच्छा । (बैठता है)
राम—सीते महात्मा के लिए पाद्य जल लाओ ।
सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (बाहर जाकर और प्रवेश करके)
‧ जल है ।
राम—महात्मा की सेवा करो ।
सीता--जैसी आपकी आज्ञा ।
रावण—(भेद खुलने के भय से हक्का-बक्का होकर) रहने दो, रहने दो ।
सचमुच मे यह अकेली सीता पृथ्वी पर स्त्रियो मे अरुन्धती के समान
पतिव्रता है, जिसके स्वामी होने के कारण स्त्रियाँ आपका यश
गाती है । (८)
राम—तो फिर लाओ । मैं स्वयं ही सेवा करूंगा ।
रावण—अरे, छाया के समान सीता से सेवा का निषेध करने वाला में शरीर
के समान आपसे कैसे ग्रहण करूंगा । सच्चा अतिथि सत्कार तो
मीठे वचनो के स्वागत से होता है । मेरा सम्मान हो गया है । बैठिए ।
राम--अच्छा । (बैठते हैं)
रावण—(स्वागत) तब तक मैं भी ब्राह्मण के अनुरूप कार्य करूँ । (प्रकट)
श्रीजी, मैं काश्यप गोत्र का हूँ । मैंने छहों अंग व चारों उपांगो के
सहित वेद, मानकीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर योगशास्त्र, वृहस्पति का
अर्थशास्त्र, मेधातिथि का न्यायशास्त्र और प्रचेता का श्राद्धकल्प इन
सबका अध्ययन किया है ।
राम—क्या कहा ? श्राद्धकल्प ।
(३) मूल
रावणः—सर्वा. श्रुतीरतिक्रम्य श्राद्धकल्पे स्पृहा दर्शिता किमेतत् ?
रामः—भगवन् ! भ्रष्टाया पितृसन्तानायामागम इदानीमेष ।
( 149 )
[रा]वणः--अलं परिहृत्य । पृच्छतु भवान् ।
[रा]मः--भगवन् ! निवपनक्रियाकाले केन पितॄंस्तर्पयामि ?
[रा]वणः--सर्वम् श्रद्धया दत्तं श्राद्धम् ।
[रा]मः--भगवन् ! अनादरतः परित्यक्तं भवति । विशेषार्थम् पृच्छामि ।
[रा]वणः--श्रूयताम् । विरूढेषु दर्भाः, ओषधीषुतिला, कलाय शाकेषु,
मत्स्येषु महाशफर., पक्षिषु वार्ध्रीणसः, पशुषु गौः खड्गो वा,
इत्येते मानुषाणां विहिताः ।
रामः--भगवन् ! वाशब्देनावगतमन्यदप्यस्तीति ।
रावणः--अस्ति प्रभावसम्पाद्यम् ।
रामः--भगवन् ! एष एव मे निश्चयः ।
उभयस्यास्ति सान्निध्यं यद्येतत् साधयिष्यति ।
धनुर्वा तपसि श्रान्ते श्रान्ते धनुषि वा तपः ॥ (६)
रावणः--सन्ति । हिमवति प्रतिवसन्ति ।
रामः--हिमवतीति । ततस्ततः ।
रावणः--हिमवत. सप्तमे शृंगे प्रत्यक्षस्थाणुशिरःपतितगङ्गाम्बु-
पायिनो वैदूर्यश्यामपृष्ठा. पवनसमजवाः काञ्चनपार्श्वा नाम
मृगाः, यैर्वैखानसबालखिल्यनैमिषीयादयो महर्षयश्चिन्तित-
मात्रोपस्थितविपन्नैः श्राद्धान्यभिवर्धयन्ति ।
तैस्तर्पिताः सुतफलं पितरो लभन्ते
हित्वा जरा खमुपयान्ति हि दीप्यमानाः ।
तुल्यं सुरैः समुपयान्ति विमानवास
मावृत्तिभिश्च विपयैन बलान् ध्रियन्ते ॥ (१०)
रामः--मैथिलि !
आपृच्छ पुत्रकृतकान् हरिणान् द्रुमांश्च
विन्ध्य वनं तव सखीर्दयिता लताश्च ।
वत्स्यामि तेषु हिमवद्गिरिकाननेषु
दीप्तैरिवौषधिवनैरुप रञ्जितेषु ॥ (११)
सीता--यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।
रावणः--कौसल्यामातः ! अलमतिमनोरथेन । न ते मानुषैर्दृश्यन्ते ।