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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

( 136 )
भरत—हाय, आपने तो मुझे अनुत्तर सा कर दिया । अच्छा, मैं एक शर्त पर
आपके राज्य का पालन करूँगा ।
राम—वत्स, वह कौन सी शर्त है ।
भरत—मेरे हाथ में धरोहर रखा हुआ आपका राज्य चौदह वर्ष के अन्त में
पुनः आपको लौटाना चाहता हूँ ।
राम—ऐसा ही होवे ।
भरत—आर्य, सुना । हे पूज्ये, सुना । तात, सुना आपने ।
सभी—हम लोग साक्षी हैं ।
भरत—आर्य, मैं एक वरदान और लेना चाहता हूँ ।
राम—वत्स, क्या चाहते हो ? मैं क्या दूँ ? मैं क्या करूँ ?
भरत—आपके चरणों में मस्तक झुकाने वाले मुझे आपके पाँवों में पहनी
हुई ये खड़ाऊ दे दें । जब तक आप अपना वनवास पूरा करके लौटें
तब तक मैं इनका सेवक बन कर आपका राज्य भार संभालूँगा । (२५)
(७) मूल
रामः—(स्वगतम्) हन्त भोः ।
सुचिरेणापि कालेन यशः किञ्चिन्मयार्जितम् ।
अचिरेणैव कालेन भरतेनाद्य सञ्चितम् ॥ (२६)
सीता—आर्यपुत्र ! ननु दीयते खलु प्रथमयाचनं भरताय ।
रामः—तथास्तु । वत्स ! गृह्यताम् ।
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । (गृहीत्वा) आर्य !
अत्राभिषेकोदकमावर्जयितुमिच्छामि ।
रामः—तात ! यदिष्टं भरतस्य तत् सर्वम् क्रियताम् ।
सुमन्त्रः—यदाज्ञापयत्यायुष्मान् ।
भरतः— (आत्मगतम्) हन्त भोः!
श्रद्धेयः स्वजनस्य पौररुचितो लोकस्य दृष्टिक्षमः
स्वर्गस्थस्य नराधिपस्य दयितः गीfull/शीलान्वितोऽहं सुतः ।
भ्रातॄणां गुणशालिनां बहुमतः कीर्तेर्महद् भाजनं
संवादेषु कथाश्रयो गणवतां लब्धप्रियाणां प्रियः ॥ (२७)