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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 296 में से

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पृष्ठ 129

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हम् = क्या (खेद व आश्चर्य सूचक अव्यय, जो स्त्री पात्रो द्वारा प्रयुक्त किया
जाता है) । आशावन्तः = राम के आने की आस लगाए हुए। पुरे = अयोध्या
नगर मे । पौराः = नागरिक । स्थास्यन्ति = विद्यमान होगे । त्वद्दिदृक्षया =
आपके देखने की इच्छा मे । प्रीतिम् अनुराग को । करिष्यामि = करूँ गा ।
प्रमादस्य = कृपा अर्थात् चरण पादुकाएँ । प्रयतिष्ये = प्रयत्न करूँ गा । आरो-
हतः = दोनो चढ़ते हैं । अनुयातृ = पीछे चलने वाले ।
अन्वय-मया सुचिरेण अपि कालेन किञ्चित् यश. अर्जितम् । अद्य
भरतेन अचिरेण एव कालेन सञ्चितम् । (२६)
अन्वय-अहम स्वजनस्य श्रद्देयः, पौररुचितः, लोकस्य दृष्टिक्षमः,
स्वगंस्थस्य नराधिपस्य दयितः शीलान्वित. सुतः, गुणशालिनां भ्रातृणां बहुमतः,
कीर्तेः महत् भाजनम्, गुणवता संवादेपु कथाश्रय., नब्धप्रियाणा प्रियः
जातः । (२७)
अन्वय -- पुरे पौराः आशावन्त. त्वद्दिदृक्षया स्थास्यन्ति । त्वत्प्रसा-
दस्य दर्शनात् तेषा प्रीति करिष्यामि । (२८)
हिन्दी अर्थ
राम- (स्वगत) अहा,
मैंने बहुत दिनों में जितना यश संचित किया था, भरत ने उतना यश
अल्प काल में ही अर्जित कर लिया है । (२६)
सीता-आर्यपुत्र, क्या भरत को आप प्रथम बार मांगी गई वस्तु नहीं देंगे ।
राम-अवश्य । कुमार, यह लो ।
भरत-बड़ी कृपा । (लेकर) आर्य, इन पर राज्याभिषेक के जल को छिटकना
चाहता हूं ।
राम-तात, जो भरत को प्रिय हो, वह सभी किया जाए ।
सुमन्त्र-जैसी आपकी आज्ञा ।
भरत-(मन में) अहा,
अब मैं अपने बान्धवों का विश्वास पात्र बना । नगरवासियों का प्रेम
पात्र, संसार की ओर आंख उठा कर देखने योग्य, स्वर्गवासी महाराज
दशरथ का प्रिय एवं अच्छे गुण वाला पुत्र, गुणी भाइयों का सम्मानी,