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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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( 139 )
प्रशंसा का बहुत बडा आश्रय, गुणीजनों की पारस्परिक वार्ता का
विषय और सफल मनोरथ प्रजा का प्रिय बन गया हूँ । (२७)
राम- हे वत्स भरत, राज्य की थोड़े समय के लिए भी उपेक्षा नही करनी
चाहिए । अतः तुम आज ही विजय के लिए वापस लौट जाओ ।
सीता-अरे, क्या, आज ही कुमार भरत चले जायेगे ।
राम-अधिक स्नेह मत बताओ । आज ही भरत राज्य की रक्षा के निमित्त
वापस जाये ।
भरत--आर्य, मै आज ही चला जाऊँगा ।
प्रजा के लोग आशा लगाए हुए आपको देखने की इच्छा से अयोध्या
मे प्रतीक्षा कर रहे होगे । मैं जाकर उन्हे यह आपकी कृपा अर्थात्
चरण पादुकाएँ दिखाऊँगा और उनको प्रसन्न करूँगा । (२८)
सुमन्त्र-- हे दीर्घायु, अब मै क्या करूँ ?
राम-तात, महाराज की भाँति भरत का पालन करे ।
सुमन्त्र-यदि जीवित रहा, तो प्रयास करूँगा ?
राम-वत्स भरत, मेरे सामने ही रथ पर चढो ।
भरत-जो आज्ञा ।
(दोनो भरत और सुमन्त्र रथ पर बैठते हैं)
राम-हे सीते, जरा इधर तो आओ । वत्स लक्ष्मण, तुम भी इधर आओ ।
आश्रम के द्वार तक हम भी भरत के पीछे चलेगे ।
(इस प्रकार सभी निकल जाते है)
चौथा अंक समाप्त ।