प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
( 98 )
येन प्राणाश्च राज्य च स्त्रीशुल्कार्थे विसर्जिताः ।
इमा दशरथस्य त्व प्रतिमा कि न पृच्छसे ॥ ( ८ )
भरतः—हा तात ! (मूर्च्छितः पतति । पुनः प्रत्यागत्य)
हृदय भव सकामं यत्कृते शकसे त्वं
शृणु पितृनिधनं तद् गच्छ धैर्यम् च तावत् ।
स्पृशति तु यदि नीचो मामयं शुल्कशब्द
स्त्र्यर्थं च भवति सत्यं तत्र देहो विशोध्यः ॥ ( ६ )
आर्य !
देवकुलिकः—आर्येति-इक्ष्वाकुकुलालापः खल्वियम् । कच्चित् कैकेयी-
पुत्रो भरतो भवान् ननु ?
भरतः—अथकिम् अथकिम् । दशरथपुत्रो भरतोऽस्मि, न कैकेय्याः ।
देवकुलिकः—तेन ह्यापृच्छे भवन्तम् ।
भरतः—तिष्ठ । शेषमभिधीयताम् ।
देवकुलिक.—का गतिः । श्रूयताम् । उपरतस्तत्रभवान् दशरथः । सीता-
लक्ष्मणसहायस्य रामस्य वनगमन प्रयोजनं न जाने ।
भरतः—कथं कथमार्योऽपि वनं गतः । (द्विगुण मोहमुपगतः)
शब्दार्थ--देवकुलिकः = पुजारी । सन्निहितसर्वरत्नस्य = सभी प्रकार
की बहुमूल्य वस्तुओं को अपने पास रखने वाले । विश्वजितो यज्ञस्य=विश्वजित्
नामक यज्ञ के । प्रवर्त्तयिता=करने वाले । प्रज्वलितधर्मप्रदीप-=धर्म रूपी
दीपक को सतत जलाने वाले । धर्मपरायणाय=धर्मनिष्ठ को । अभिधीयता=
कहो । सवेशनोत्थापनयोः=सोने के और उठने के समय में । सहस्र=हजार ।
पुण्याहशब्दरवो=पवित्र मन्त्र पाठो की वाचन ध्वनि वाला । एताम्=इस (रक्षा)
को । अतिक्रान्त =पार गई । आवेदित=देना । प्रियावियोग = प्रिय रानी
इन्दुमति का विरह । निर्वेद=विषयो से विमुखता । नित्य=सदा । अवभृतस्नान=
यज्ञ की दीक्षा का अभिषेक । प्रशान्तरजा =रजोगुण को धोने वाले । अजः=
राजा का नाम । श्लाघनीय=प्रशंसनीय । पश्चात्तापाय=प्रिया की अत्यधिक
आसक्ति रूपि अनुताप वाले । पर्याकुलः=व्याकुल । बहुमानव्याक्षिप्तेन=अत्यन्त
सम्मान या गौरव के कारण अन्यत्र लगे हुए । सुव्यक्तं=भली प्रकार से ।
नावधारितं=नही निश्चय कर सका । पितृपितामहः=परदादा । महाराजस्य
( 99 )
:। रथ के । पितामहः=दादा । तातस्य=पिता दशरथ के । धरमाणानाम् =
८) र्म धारण करने वालो के । अतिक्रान्तानाम् मृत्यु को प्राप्त करने वालों के ।
पृच्छे=जाने की अनुमति लेता हूँ । स्त्रीशुल्कार्थे=विवाह के समय स्त्री को
र जाने वाले द्रव्य के लिए । विसर्जिताः=छोड दिए । पृच्छसे=पूछ रहे हो ।
भागत्य=होश में आकर । सकामं=पूर्ण मनोरथ वाले । यत्कृते=जिस विषय
। शकसे=आशका कर रहे थे । स्पृशति=सम्बन्ध युक्त होता है । नीचः=
न्दनीय । विशोध्य=(अग्नि द्वारा) शुद्ध करना चाहिए । आलाप. = बोला
िने का शब्द । शेषम्=अवशिष्ट या बचा हुआ । गति. = उपाय । उपरत=
र गए ।
अन्वय- येन स्त्रीशुल्कार्थे प्राणाः राज्यं च विसर्जिताः, दशरथस्य इमां
प्रतिमा त्वं किम् न पृच्छसे । (८)
अन्वय-हृदय, सकामं भव, त्वं यत्कृते शंकसे, तत् पितृनिधन शृणु,
तावत् धैर्यम् च गच्छ । तु नीचः अयम् शुल्कशब्दः मां स्पृशति, अथ च सत्यम्
भवति, तत्र देहः विशोध्य । (६)
हिन्दी अर्थ
देवकुलिक-ये महाराज दिलीप हैं, जिन्होने सभी रत्नो को इकट्ठा कर,
विश्वजित् नामक यज्ञ को सम्पन्न किया था और धर्म के दीपक को
प्रकाशित किया था ।
भरत - इन धर्म प्राण को नमस्कार । आगे बताइए, ये कौन है ?
देवकुलिक-ये महाराज रघु हैं, जिनके कान सोते-जागते समय पुण्याह वाचन
की मन्त्र ध्वनि से पूर्ण रहा करते थे ।
भरत - ओह, प्रबल मृत्यु ने इस घेरे को भी पार कर लिया । ब्राह्मणो की
सेवा में अपनी पूरी सम्पत्ति समर्पित करने वाले महाराज रघु को
प्रणाम हो । अब कहो, ये श्रीमान् कौन है ?
देवकुलिक-ये महाराज अज हैं, जिन्होंने अपनी प्रिय रानी के विरह में विरक्त
होकर राजपाट को छोड़ दिया था और जो नित्य प्रति किए
जाने वाले यज्ञों के अवसान में अभिषेकों से सम्पूर्ण कल्मषभार को
धो देने वाले थे ।
( 100 )
भरत—प्रशंसनीय पश्चात्ताप करने वाले को नमस्कार है । (दशरथ की प्र
को देखते हुए श्रौर घबरा कर) श्ररे, मेरा हृदय इन महापुरु
गौरवचिन्ता मे लग गया था, इसलिए ठीक से नही समझ सका ।
श्राप फिर से बताइये कि ये कौन हैं ?
देवकुलिक—ये दिलीप हैं ।
भरत—महाराज के प्रपितामह । इसके वाद ।
देवकुलिक—ये हैं रघु ।
भरत—महाराज के पितामह । इसके आगे ।
देवकुलिक—ये श्रीमान् अज हैं ।
भरत—महाराज के पिता । क्या कहा, क्या कहा ?
देवकुलिक—यह दिलीप, यह रघु, यह अज हैं ।
भरत—मैं श्रापसे कुछ पूछना चाहता हूँ । क्या जीवितों की भी प्रति
स्थापित की जाती हैं ?
देवकुलिक—नही, केवल मृतको की ।
भरत—अच्छा, श्रव श्राप मुझे जाने की श्राज्ञा दें ।
देवकुलिक—ठहरो,
जिन्होने स्त्री शुल्क के लिए अपने राज्य श्रौर प्राण सव कुछ
दिए, उन महाराज दशरथ की प्रतिमा के विषय मे श्राप क्यों
नही जानना चाहते । (८)
भरत—हा पिताजी । (वेहोश होकर गिरता है । फिर होश मे श्राकर)
हे हृदय, श्रव तुम्हारी इच्छा पूरी हुई, जिसकी तुम्हे श्राशंका थी,
पिता की मृत्यु के समाचार को सुनो श्रौर धीरज बाँधो । किन्तु हा
यदि स्त्री शुल्क मे याचित राज्य का उद्देश्य मैं बनाया गया होऊँ
तब तो देह की शुद्धि करनी पडेगी श्रर्थात् कड़ी परीक्षा देकर श्रप
निर्दोष होना सिद्ध करना पडेगा । (६)
श्रार्य !
देवकुलिक—'श्रार्य, कह कर वात करना तो इक्ष्वाकु वंशी लोगों का क्रम है
क्या श्राप कैकयी के पुत्र भरत तो नही है ?
( 101 )
[भरत]—और क्या, और क्या । मै दशरथ का पुत्र भरत हूँ, कैकेयी का नही ।
[देव]कुलिक—तो अब आप जा सकते है ।
[भरत]—ठहरो, बची हुई बात भी कह दो ।
[देव]कुलिके—क्या किया जाए । सुनिए । महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई ।
सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन को क्यो चले गए, इसका मुझे
कारण ज्ञात नही है ।
[भर]त—क्या कहा, क्या पूज्य राम भी वन को गए ? (फिर मूच्छित हो
जाता है)
(१) मूल
देवकुलिकः—कुमार ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि ।
[भ]रतः—(समाश्वस्य)
अयोध्यामटवीभूतां पित्रा भ्रात्रा च वर्जिताम् ।
पिपासार्तोऽनुधावामि क्षीणतोयां नदीमिव ॥ (१०)
आर्य ! विस्तरश्रवणं मे मनसः स्थैर्यमुत्पादयति । तत् सर्वमन-
वशेषमभिधीयताम् ।
देवकुलिकः—श्रूयताम्, तत्रभवता राज्ञाभिषिच्यमाने तत्रभवति रामे
भवतो जनन्याऽभिहितं किल ।
भरतः—तिष्ठ,
तं स्मृत्वा शुल्कदोषं भवतु मम सुतो राजेत्यभिहितं
तद्धैर्येणाश्वसत्या व्रज सुत वनमित्यार्याऽप्यभिहितः ।
तं दृष्ट्वा बद्धचीरं निधनमसहत राजा ननु गतः
पात्यन्ते धिक्प्रलापा ननु मयि सदृशाः शेषाः प्रकृतिभिः ॥ (११)
(मोहमुपगतः)
(नेपथ्ये)
उत्सरतार्याः ! उत्सरत ।
देवकुलिकः—(विलोक्य) अये !
काले खल्वागता देव्यः पुत्रे मोहमुपागते ।
हस्तस्पर्शो हि मातृणामजलस्य जलाञ्जलिः ॥ (१२)
(ततः प्रविशन्ति देव्यः सुमन्त्रश्च)
सुमन्त्रः— इत इतो भवत्यः ।
इदं गृहं तत् प्रतिमानृपस्य नः
समुच्छ्रयो यस्य स हर्म्यदुर्लभः ।
असन्निवृत्तैरप्रतिहारिकागतै-
र्विना प्रणामं पथिकैरुपास्यते ॥ (१३)
(प्रविश्यावलोक्य) भवत्यः ! न खलु न खलु प्रवेष्टव्यम् ।
अयं हि पतितः कोऽपि वयःस्थ इव पार्थिवः ।
देवकुलिकः—
परशङ्कामलं कर्तुं गृह्यतां भरतो ह्ययम् ॥ (१४)
(निष्क्रान्तः)
देव्यः—(सहसोपगम्य) हा जात ! भरत !
भरतः—(किञ्चित् समाश्वस्य) आर्य !
सुमन्त्रः—जयतु महा— (इत्यर्धोक्ते सविषादम्) आहो स्वरसादृश्य-
मन्ये प्रतिमास्थो महाराजो व्याहरतीति ।
भरतः—अथ मातृणामिदानीं काऽवस्था ।
देव्यः—जात ! एषा नोऽवस्था । (अवगुण्ठनमपनयन्ति)
सुमन्त्रः—भवत्यः ! निगृह्यतामुत्कण्ठा ।
भरतः—(सुमन्त्रं विलोक्य) सर्वसमुदाचारसन्निकर्षस्तु मा सूचयति
कच्चित् तात ! सुमन्त्रो भवान् ननु ।
सुमन्त्रः—कुमार ! अथ किम् । सुमन्त्रोऽस्मि ।
अन्वास्यमानश्चिरजीवदोषैः
कृतघ्नभावेन विडम्ब्यमानः ।
अहं हि तस्मिन् नृपतौ विपन्ने
जीवामि शून्यस्य रथस्य सूतः ॥ (१५)
शब्दार्थ—समाश्वस्य=आश्वासन पाकर । अटवीभूतां=अरण्य के तुल्य
वर्जिताम्=रहित । पिपासार्तः=पानी की इच्छा से पीडित । अनुधावामि=पीछे
दौडता हूं । क्षीणतोयां=सूखे जल वाली । विस्तरश्रवणं=विस्तार से समाचार
( 103 )
सुनता। स्थैर्यम्=स्थिरता को। अनवशेषम्=सम्पूर्ण रूप से। अभिधीयताम्=
कहा जाए। अभिषिच्यमाने=राज्य की धुरी पर नियोजित करते हुए। शुल्क-
दोष=विवाह के मूल्य रूपी अनर्थ को। स्मृत्वा=याद करके। भवतु=होवे।
मम सुतः=मेरा पुत्र भरत। अभिहितं=कहा। धैर्येण=धैर्यपूर्वक। आश्वसत्या=
साहस प्राप्त होने पर। व्रज = जाओ। सुत=हे पुत्र राम। बद्धचीर=वल्कल
वस्त्र पहने हुए को। निधनम्=मृत्यु को। असदृशं=आरोग्य अर्थात् बिना अवसर
के। पात्यन्ते = गिराए जा रहे हैं। धिक्प्रलापाः=धिक्कार के वाक्य। ननु=
सचमुच मे। मयि=मुझ पर। सदृशाः= समुचित। शेषाः= जननी कैकेयी की
भर्त्सना से बचे हुए। प्रकृतिभिः=प्रजाजनों के द्वारा। मोहम् उपगतः=संज्ञाहीन
हो जाता है। उत्सरत=हटो। आर्याः=सज्जनो। काले=उचित समय पर।
देव्यः= कौशल्या आदि रानियां। उपागते=प्राप्त होने पर। अजलस्य=जलरहित
प्यासे व्यक्ति के लिए। जलाञ्जलिः=जल की अंजलि। इतः इतः=इधर से आइए
इधर से। भवत्यः=आप देवियां। प्रतिमानृपस्य=प्रतिमा रूप से बने राजाओं का
नः=हमारे। समुच्छ्रयः= उन्नत। हर्म्यदुर्लभः=राज सदन से भी बढ़कर।
अयन्त्रितैः=बिना रोके जाने वाले। अप्रतिहारिकागतैः=द्वारपाल की अनुमति के
बिना आने वाले। विना प्रणामं=प्रणाम रहित। पथिकैः=मुसाफिरों द्वारा।
उपास्यते=उपयोग में लिया जाता है। वयःस्थः=युवा। इव=समान। पार्थिवः=
राजा = दशरथ। परशङ्काम्=किसी पराए की आशंका को। अलं कर्तुम्=
मत करो। गृह्यताम्=ग्रहण करो। अन्वास्यमानः=पीछा किए जाते हुए।
चिरजीवदोषैः=दीर्घजीवी पुरुष मे आसानी से प्राप्त होने वाले दूषणों के द्वारा।
कृतघ्नभावेन=किए हुए के उपकार को न मानने की भावना के द्वारा।
विडम्ब्यमानः=हँसी उड़ाया गया। विपन्ने=मर जाने पर। जीवामि=जी रहा
हूँ। सूतः=सारथि।
अन्वय-पित्रा भ्रात्रा च वर्जिताम् अटवीभूताम् अयोध्याम् क्षीणतोयाम्
नदीम् इव पिपासार्तः अनुधावामि। (१०)
अन्वय—तं शुल्कदोषं स्मृत्वा मम सुतः राजा भवतु इति तया अभि-
हितम्। तत् धैर्येण आश्वसन्त्या सुतं वनं व्रज इति आर्यः अपि अभिहितः।
तं बद्धचीरं दृष्ट्वा राजा असदृशं निधनं गतः ननु, प्रकृतिभिः शेषाः सदृशाः
धिक् प्रलापाः ननु मयि पात्यन्ते। (११)
( १०४ )
अन्वय—पुत्रे मोहम् उपागते देव्यःकाले आगताः खलु, मातृणां हस्त-
स्पर्शः हि अजलस्य जलाञ्जलिः । (१२)
अन्वय- - यस्य स हर्म्यदुर्लभः समुच्छ्रयः तत् इदं नः प्रतिमानृपस्य गृहम्,
अनन्वितैः अप्रतिहारिकागतैः पथिकैः प्रणामं विना उपास्यते । (१३)
अन्वय—हि अय कः अपि वयःस्थः पार्थिवः इव पतितः । पर्यङ्ककामं
कर्तुम् अलम्, हि अयम् भरतः, गृह्यताम् । (१४)
अन्वय--चिरजीवदोषैः अन्वास्यमानः, कृतघ्नभावेन विडम्ब्यमानः
अहं. हि तस्मिन् नृपतौ विपन्ने शून्यस्य रथस्य सूतः जीवामि । (१५)
हिन्दी अर्थ
देवकुलिक—कुमार, धैर्य रखो, धैर्य रखो ।
भरत—(होश में आकर)
पिताजी और बड़े भाई राम से शून्य वन के समान इस अयोध्या में मैं
जा रहा हूं । जैसे कोई प्यासा आदमी सूखी नदी की ओर दौड़ता
जा रहा हो । (१०)
आर्य, विस्तारपूर्वक सुनने से मेरे मन को कुछ सहारा मिल रहा है,
अतः समूचे वृत्तान्त को पूरी तरह से कहो ।
देवकुलिक—सुनिए, जब महाराज दशरथ राजकुमार राम का अभिषेक कर
रहे थे उस समय आपकी माता कैकेयी ने कहा ।
भरत—ठहरो,
उस अनर्थकारी विवाह शुल्क को याद कर उसने कहा होगा कि मेरा
पुत्र राजा बने । इस प्रार्थना के सफल हो जाने से उसका बल बढ़ा
होगा और फिर उसने कहा होगा कि राम वन को जाएँ । राम को
वल्कल वस्त्र पहने देख कर महाराज को असामयिक मृत्यु प्राप्त हो
गई होगी । इन सब बातों से दुःखी प्रजावर्ग इन सबका मूल मुझे
मानकर धिक्कारती होगी और उसका धिक्कारना उचित भी है । (११)
(मूर्च्छित हो जाता है)
(नेपथ्य में)
हट जाइए, हट जाइए ।
( 105 )
देवकुलिक—(देख कर) अरे,
पुत्र के संज्ञाहीन होने पर माताएं आ गईं, यह बडा अच्छा हुआ।
क्योकि पुत्र के लिए माता का हस्तस्पर्श प्यासे के लिए जलधारा के
समान हुआ करता है। (१२)
(इसके बाद रानियो व सुमन्त्र का प्रवेश)
सुमन्त्र—देविया, आप इधर से आयें।
जो ऊँचाई में राजमहलो से भी बड़ा है, ऐसा यह हमारा प्रतिमा रूप से
अवस्थित महाराज का सदन है। यहां यात्री लोग स्वतन्त्रतापूर्वक,
पहरेदारों की बिना रोक-टोक के आते-जाते है तथा बिना प्रणाम के
उपासना करते है (१३)
(प्रवेश करके और देखकर)
हे देवियों, आप अन्दर मत आइए, मत आइए।
यहा कोई कुमार गिर पडा है, ऐसा लगता है मानो राजा दशरथ का
युवावस्था का शरीर हो।
देवकुलिक—आप किसी दूसरे की आशंका मत कीजिए। ये भरत है। आप
इन्हे सम्भालिए। (१४)
(निकल जाता है)
रानियां—(शीघ्रता से पास जाकर) हा पुत्र, भरत।
भरत—(कुछ होश मे आकर) आर्य।
सुमन्त्र—जय हो महा—(इस प्रकार आधा कहकर, दुःख पूर्वक) अहा, बोली में
कितनी समानता है। लगता है जैसे दशरथ की प्रतिमा ही बोल रही
हो।
भरत—तो फिर माताओं की अब क्या दशा है?
रानियां—हे पुत्र, हमारी दशा यह है। (घूंघट हटाती हैं)
सुमन्त्र—देवियो, अपने आवेग को रोके।
भरत—(सुमन्त्र को देख कर) सभी प्रकार के व्यवहार में आपकी उपस्थिति
से मुझे जान पड़ता है कि आप सुमन्त्र हैं।
( १०६ )
सुमन्त्र—कुमार, और क्या ? मैं सुमन्त्र ही हूं ।
दीर्घकाल-जीविता ने मुझ मे अनेक बुराइयाँ ला दी। कृतघ्नता ने
मेरा उपहास किया, और अब मै राजा दशरथ के मर जाने पर उनके
सूने रथ का सारथि होकर जी रहा हूं । (१५)
(६) मूल
भरतः—हा तात ! (उत्थाय) तात ! अभिवादनक्रममुपदेष्टुमिच्छामि
मातृणाम् ।
सुमन्त्रः—बाढम् । इयं तत्रभवतो रामस्य जननी देवी कौसल्या ।
भरतः—अम्ब ! अनपराधोऽहमभिवादये ।
कौसल्या—जात ! निःसन्तापो भव ।
भरतः—(आत्मगतम्) आकृष्ट इवास्म्यनेन । (प्रकाशम्) अनु-
गृहीतोऽस्मि । ततस्तत ।
सुमन्त्रः—इयं तत्रभवतो लक्ष्मणस्य जननी देवी सुमित्रा ।
भरतः—अम्ब ! लक्ष्मणेनातिसन्धितोऽहमभिवादये ।
सुमित्रा—जात ! यशोभागी भव ।
भरतः—अम्ब ! इद प्रयतिष्ये । अनुगृहीतोऽस्मि । ततस्ततः ।
सुमन्त्रः—इयं ते जननी ।
भरतः—(सरोषमुत्थाय) आः पापे !
मम मातुश्च मातुश्च मध्यस्था त्वं न शोभसे ।
गङ्गायमुनयोर्मध्ये कुनदीव प्रवेशिता ॥ (१६)
कैकेयी—जात ! किं मया कृतम् ?
भरतः—किं कृतमिति वदसि ?
वयमयशसा चीरेणार्यो नृपो गृहमृत्युना ,
प्रततरुदितैः कृत्स्नायोध्या मृगैः सह लक्ष्मणः ।
दयिततनयाः शोकेनाम्बाः स्नुषाध्वपरिश्रमे
धिगिति वचसा चोग्रेणात्मा त्वया ननु योजिताः ॥ (१७)
कौसल्या—जात ! सर्वसमुदाचारमध्यस्थः किं न वन्दसे मातरम् ?
भरतः—मातरमिति । अम्ब ! त्वमेव मे माता । अम्ब ! अभिवादये ।
( 107 )
कौसल्या-न हि, न हि । इयं ते जननी ।
भरतः-आसीत् पुरा । न त्विदानीम् । पश्यतु भवती-
त्यक्ता स्नेहं शीलसङ्क्रान्तदोषैः
पुत्रास्तावन्नन्वपुत्राः क्रियन्ते ।
लोकेऽपूर्वम् स्थापयाम्येष धर्मम्
भर्तृद्रोहादस्तु माताप्यमाता ॥ (१८)
शब्दार्थ-उपदेष्टुम् इच्छामि = जानना चाहता हूं । बाढम् = हां ।
तत्रभवतः = उन श्रीमान् की । अनपराधः = अपराध नही करने वाला ।
निःसन्तापः = हृदय की वेदना से रहित । भव = बनो । आकृष्टः = तिरस्कृत ।
अस्मि = हूं । अतिसन्धित = ठगा गया । यशोभागी = यशस्वी । प्रयतिष्ये=
प्रयत्न करूँगा । उत्थाय = उठ कर । पापे ! = पाप करने वाली दुष्टे । मध्यस्था
= बीच मे स्थित । शोभसे = सुन्दर लगती हो । कुनदी = बुरी नदी । अयशा
= निन्दा के द्वारा । चीरेण = वल्कल वस्त्र के द्वारा । गृहमृत्युना = यमराज
के घर के द्वारा । प्रततरुदितैः = लगातार आंसू बहाने के द्वारा । कृत्स्ना =
सारी । दयिततनयाः = पुत्रों से प्रेम करने वाली अर्थात् कौसल्या व सुमित्रा
(दयिताः प्रियाः तनयाः पुत्राः यासां ताः अम्बाः) स्नुषा = पुत्रवधू सीता ।
अध्वपरिश्रमैः = मार्ग में चलने के परिश्रम से । धिक् इति वचसा = कैकेयी को
धिक्कार है-इस प्रकार के निन्दा पूर्ण वाक्यो से । उग्रेण = प्रचण्ड या मर्म-
भेदी । आत्मा = स्वयं । त्वया = तुम कैकेयी के द्वारा । ननु = सचमुच में ।
योजिताः = संलग्न किया । जात = हे पुत्र । सर्वसमुदाचारमध्यस्थः = सकल
सदाचार के पालन में प्रवण । भवती = श्रीमती । शीलसंक्रान्तदोषैः = आचरण
में दोष आ जाने के कारण । स्नेहं = ममता को । अपुत्राः क्रियन्ते = अपुत्र के
समान आचरण किया जा रहा है । लोके = संसार में । अपूर्वम् = अनोखे ।
स्थापयामि = प्रवर्तित करता हूं । एषः = यह मैं । धर्मम् = मान्यता को ।
भर्तृद्रोहात् = पति से विरुद्ध आचरण करने के कारण । अस्तु = होवे ।
अमाता = बुरी जननी ।
अन्वय-मम मातुः मातुः च मध्यस्था त्वम् गंगायमुनयोः मध्ये
प्रवेशिता कुनदी इव न शोभसे । (१६)
( 108 )
अन्वय—ननु त्वया वयम् अयशसा योजिताः, आर्यः चीरेण (योजितः)
नृपः गृहमृत्युना, कृत्स्ना अयोध्या प्रततरुदितैः, लक्ष्मणः मृगैः सह (योजितः),
दयिततनयाः अम्बाः शोकेन, स्नुषा अध्वपरिश्रमैः, आत्मा च उग्रेण धिक्
इति वचसा (यजिता) । (१७)
अन्वय—ननु शीलसंक्रान्तदोषैः तावत् पुत्राः स्नेह त्यक्त्वा अपुत्राः
क्रियन्ते । एषः अहम् लोके अपूर्वम् धर्मम् स्थापयामि, भर्तृद्रोहात् माता
अपि अमाता अस्तु । (१८)
हिन्दी अर्थ
भरत—हा तात, (उठकर) तात, अब मैं माताओं को प्रणाम करने का क्रम
जानना चाहता हूँ ।
सुमन्त्र—अच्छा, यह श्री राम की माता देवी कौसल्या हैं।
भरत—माँ, यह निरपराध भरत आपको प्रणाम करता है।
कौसल्या—पुत्र, तुम्हारा दुःख दूर होवे ।
भरत—(मन मे) इस कथन से तो मानो मेरी भर्त्सना की जा रही है। (प्रकट-
रूप से) बड़ी कृपा है । अच्छा, फिर ।
सुमन्त्र—यह लक्ष्मण की मां सुमित्रा देवी हैं।
भरत—माँ, मैं प्रणाम करता हूँ, जिसे राम की सेवा का अवसर न देकर
लक्ष्मण ने ठग लिया है।
सुमित्रा—पुत्र, कीर्ति प्राप्त करने वाले बनो ।
भरत—माँ, इसका प्रयास करूँगा । कृतकृत्य हूँ । इसके बाद ।
सुमन्त्र—यह तुम्हारी माता है ।
त—(क्रोध सहित उठकर) अरी पापिनी,
मेरी जननी कौसल्या और जननी सुमित्रा के बीच बैठी हुई तुम उसी
तरह बुरी लगती हो, जैसे गंगा और यमुना के बीच में प्रविष्ट कोई
कुनदी । (१६)
कैकयी—पुत्र, मैंने क्या किया ?
भरत—'क्या किया' यह कहती हो ।
तुमने हमे (मुझे) अपयश से कलंकित किया, पूज्य राम को वल्कल
धारण करने वाला बना दिया । महाराज को गृहकलह से मरने को
विवश किया। सारी अयोध्या को निरन्तर रुला दिया । लक्ष्मण को
हरिणों का सहवासी बना दिया । पुत्रों से स्नेह करने वाली माताओं
को शोक सागर में डुबो दिया । पुत्रवधू सीता को वन मे भटकने को
बाध्य किया और अपने को भी कठोर धिक्कार का पात्र
बनाया । (१७)
कौसला—पुत्र, सब प्रकार के शिष्टाचार को जानते हुए भी तुम अपनी जननी
को प्रणाम क्यों नही करते हो ?
भरत—क्या अपनी जननी को ? माँ, आप ही मेरी जननी है । माँ, मै प्रणाम
करता हूँ ।
कौसल्या—नही, नही, यह कैकयी तुम्हारी जननी है ।
भरत—पहले थी । किन्तु अब नही है । आप देवी देखिए,
इसने दुष्ट परिजनो के सहवास मे सत्य स्नेह को छोड़ कर बेटों से
नाता तोड लिया है । आज मै संसार मे एक नये धर्म की स्थापना
करने जा रहा हूँ कि जो स्त्री अपने स्वामी से विद्रोह करे, वह माँ
कहलाने की अधिकारिणी नहीं है । (१८)
(७) मूल
कैकेयी—जात ! महाराजस्य सत्यवचनं रक्षन्त्या मया तथोक्तम् ।
भरतः—किमिति किमिति ।
कैकेयी—पुत्रको मे राजा भवत्विति ।
भरतः—अथ स इदानीमार्योऽपि भवत्याः कः ?
पितुर्मे नौरसः पुत्रो न क्रमेणाभिषिच्यते ।
दयिता भ्रातरो न स्युः प्रकृतीनां न रोचते ॥ (१९)
कैकेयी—जात ! शुल्कलुब्धा ननु प्रष्टव्या ।
भरतः—वल्कलैर्हृतराजश्रीः पदातिः सह भार्यया ।
वनवासं त्वयाऽऽज्ञप्तः शुल्केऽप्येतदुदाहृतम् ॥ (२०)
कैकेयी—जात ! देशकाले निवेदयामि ।
भरतः—अयशसि यदि लोभः कीर्तयित्वा किमस्मान्
110 )
किम् नृपफलतर्पं, किम् नरेन्द्रो न दद्यात् ।
अथ तु नृपतिमातेत्येप शब्दस्तवेष्टो
वदतु भवति ! सत्य किम् तवार्यो न पुत्रः ॥ (२१)
कष्टं कृतं भवत्या,
त्वया राज्यैषिण्या नृपतिरसुभिर्नैव गणितः
सुतं ज्येष्ठं च त्व व्रज वनमिति प्रेषितवती ।
न शीर्णम् यद् दृष्ट्वा जनकतनयां वल्कलवती
महो धात्रा सृष्टं भवति ! हृदयं वज्रकठिनम् ॥ (२२)
सुमन्त्रः--कुमार ! एतौ वसिष्ठवामदेवौ सह प्रकृतिभिरभिषेकं
पुरस्कृत्य भवन्तं प्रत्युद्गतौ विज्ञापयतः,
गोपहीना यथा गावो विलयं यान्त्यप्रालिता ।
एवं नृपतिहीना हि विलयं यान्ति वै प्रजाः ॥ (२३)
भरतः--अनुगच्छन्तु मां प्रकृतयः ।
सुमन्त्रः--अभिषेकं विसृज्य क्व भवान् यास्यति ?
भरतः--अभिषेक्रमिति । इहात्रभवत्यै प्रदीयताम् ।
सुमन्त्र--क्व भवान् यास्यति ?
भरतः--तत्र यास्यामि यत्रासौ वर्तते लक्ष्मणप्रियः ।
नायोध्या तं विनायोध्या सायोध्या यत्र राघवः ॥ (२४)
(निष्क्रान्ता सर्वे)
तृतीयोऽङ्कः ।
शब्दार्थ— जात = पुत्र । सत्यवचन - विवाह के समय दिया गया शुल्क
प्रतिज्ञा वाक्य । रक्षन्त्या = सच करने वाली । तथोक्तम् = वैसा कहा । पुत्रकः
-- वेटा । भवत्याः = आपका अर्थात् कैकेयी का । मे = मेरे । औरसः = स्व
योत्पन्न । क्रमेण = वड' की परम्परा से । अभिषिच्यते = राज्याभिषेक किया
जाता है । दयिताः = प्रिय । स्युः = होवे । प्रकृतीना = अमात्य आदि को (यहाँ
'रुच्' के योग मे चतुर्थी आनी चाहिए, किन्तु षष्ठी का प्रयोग किया गया है ।
यह भास का 'आर्ष प्रयोग' है) । रोचते = अच्छा लगता है । शुल्कतुब्धा =
विवाह मे प्रतिज्ञात अर्थ को लेने की लोभी । ननु = क्या । प्रष्टव्या = पूछा
जाना चाहिए । हृतराजश्रीः = जिसकी राजलक्ष्मी ले ली गई है । पदातिः =
( 111 )
पैदल चलने वाला । भार्यया सह = सीता के साथ । आज्ञप्तः = आज्ञा प्राप्त
करके लिया गया है । उदाहृतम् = कहा गया है । देशकाले = उचित स्थान
और अवसर पर । अयशसि = अपयश मे । लोभः = आकर्षण । कीर्तयित्वा =
कह कर या नाम लेकर । किमु = क्या । नृपफलतर्षः = राजभाव से प्राप्त
भोग्य वस्तु की तृष्णा । दद्यात् = प्रदान की । नृपतिमाता = राजा की जननी ।
इष्टः = अभिलषित । भवति = हे देवी । आर्यः = राम । कष्ट = बहुत बुरा
पाप । { राज्यैषिण्या = राज्य की कामुक बनी । असुभिः = प्राणो से । गणितः
–श्राप } । प्रेषितवती = भेजा । शीर्णम् = टूटा । वल्कलवतीम् = वल्कलवस्त्र
–धारण करने वाली को । धात्रा = विधाता के द्वारा । सृष्ट = बनाया गया है ।
वज्रकठिनम् = इन्द्र के आयुध वज्र के समान कठोर । प्रकृतिभिः = मन्त्री आदि
अधिकारियों के साथ । पुरस्कृत्य = आगे करके । प्रत्युद्गतौ = सम्मान करते
[L1
( 112 )
अन्वय-- यत्र असौ लक्ष्मणप्रियः वर्तते, तत्र यास्यामि । अयोध्या तं
विना अयोध्या न । सा अयोध्या यत्र राघवः । (२८)
हिन्दी अर्थ
कैकेयी—पुत्र, महाराज की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए ही मैने वैसा कहा था।
भरत— आपने क्या कहा था ?
कैकयी— कि मेरा बेटा राजा बने ।
भरत— तो फिर वे पूज्य राम आपके क्या हैं ?
क्या राम मेरे पिता दशरथ के स्वयं के पुत्र नहीं हैं ? क्या
अभिषेक ज्येष्ठ के क्रम से नहीं हुआ है ? क्या हम भाइयो मे परस्पर
अनुराग नहीं है ? क्या राम का अभिषेक प्रजाओ की रुचि के अनुसार
नहीं था । (१६)
कैकयी—पुत्र, विवाह शुल्क की लोभी माँ से ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाते ।
भरत —तुमने राज्य को लेकर और वल्कल पहना कर राम को सीता के साथ
जो पैदल वन मे भेज दिया, क्या वह भी विवाह शुल्क मे ही कहा
गया था ? (२०)
कैकयी— पुत्र, उपयुक्त स्थान और समय पर ही बताऊँगी ।
भरत— हे देवी, यदि तुम्हे अपयश ही प्रिय था, तो बीच मे ही मेरा नाम
क्यो लिया ? यदि तुमको राज्य के ऐश्वर्य की कामना थी, तो महाराज
से तुम्हे क्या नहीं मिल सकता था ? यदि तुम्हे ‘राजमाता’ कहलाने
की ही अभिलाषा थी, तो सच बताना, क्या राम तुम्हारे पुत्र नहीं
है ? (२१)
तुमने बहुत बुरा किया है ।
तुमने राज्य के लोभ के कारण महाराज के जीवन की भी चिन्ता
नहीं की और ‘वन मे जाओ’ यह कह कर बड़े पुत्र राम को भी वन मे
भेज दिया । सीता को वल्कल पहने देखकर भी तुम्हारी छाती नहीं
फटी, यह बड़े आश्चर्य की बात है । लगता है, विधाता ने तुम्हारे
हृदय को वज्र के से भी अधिक कठोर बनाया है। (२२)
सुमन्त्र — कुमार, प्रजावर्ग और अमात्यो के साथ महर्षि वसिष्ठ और वामदेव
आपके राज्याभिषेक के लिए आपको सूचित कर रहे हैं कि—
( 113 )
जिस प्रकार गोपाल के बिना गाएँ सुरक्षा के अभाव में नष्ट हो
जाती है, उसी प्रकार राजा के बिना भी प्रजाएँ निश्चित ही
विनाश को प्राप्त करती हैं। (२३)
[भरत]—प्रजा मेरे पीछे-पीछे आए।
[सुमं]त्र—राज्याभिषेक को छोड़ कर आप कहाँ जायेगे ?
[भर]त—अभिषेक ? अभिषेक तो इन देवी को दीजिए।
[सुमं]त्र—आप कहाँ जायेगे ?
[भर]त—जहाँ वे लक्ष्मण के प्रिय राम है, मै वही पर जाऊँगा। अयोध्या
उनके बिना अयोध्या नही है। वही अयोध्या है, जहाँ राम है। (२४)
(सब निकल जाते है)
तीसरा अंक समाप्त।
( 126 )
इदं तत् स्त्रीमयं तेजो जातं क्षेत्रोदराद्धलात् ।
जनकस्य नृपेन्द्रस्य तपसः सन्निदर्शनम् ॥ (१४)
आर्ये ! अभिवादये, भरतोऽहमस्मि ।
सीता—(आत्मगतम्) नहि रूपमेव । स्वरयोगोऽपि स एव । (प्रका-
शम्) वत्स ! चिरजीव ।
भरत—अनुगृहीतोऽस्मि ।
सीता—एहि वत्स ! भ्रातृमनोरथं पूरय ।
सुमन्त्रः—प्रविशतु कुमारः ।
भरतः—तात ! इदानीं कि करिष्यसि ?
सुमन्त्रः—अहं पश्चात् प्रवेक्ष्यामि स्वर्गम् याते नराधिपे ।
विदितार्थस्य रामस्य ममेतत् पूर्वदर्शनम् ॥ (१५)
भरतः--एवमस्तु । (राममुपगम्य) आर्य ! अभिवादये, भरतो-
ऽहमस्मि ।
रामः—(सहर्षम्) एह्येहि इक्ष्वाकुकुमार ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
वक्षः प्रसारय कवाटपुटप्रमाणं
मालिङ्ग मा सुविपुलेन भुजद्वयेन ।
उन्नामयाननमिदं शरदिन्दुकल्पं
प्रह्लादय व्यसनदग्धमिदं शरीरम् ॥ (१६)
भरतः--अनुगृहीतोऽस्मि ।
शब्दार्थ —आत्माभिप्रायम् = मेरी इच्छा को । अनुवर्तयितुम् =
जानना । सत्कृत्य = सत्कार करके । इय=यह सीता । मानहेतोः = सम्मान के
लिए । भावं = स्नेह या वात्सल्य को । तनये = पुत्र पर । निवेश्य = आगे
करके । तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा = हिम से भरे नील कमल दल के समान नेत्रो
वाली । हर्षाम्बुम् = आनन्दाश्रु को । आसारम् इव = धारासम्पात या मूसला-
धार वर्षा के समान । उत्सृजन्ती छोड़ती हुई । हुं = अरे । वेलाम् = समय
पर । वधूः = वह अर्थात् रामपत्नी सीता । स्त्रीमय = स्त्री के रूप मे । तेजः =
ओज । जातम् - उत्पन्न हुआ । क्षेत्रोदरात् = खेत के बीच से । हलात् = हल
चलाते समय । तपसः = तपस्या का । सन्निदर्शनम्=अच्छा उदाहरण । चिरं =
( 127 )
बहुत समय तक । जीव = जीवित रहो । पूरय = सफल करो । पश्चात् = बाद
मे। प्रवेक्ष्यामि = प्रवेश करूँगा । याते = चले जाने पर । विदितार्थस्य =
वृत्तान्त को जानने वाले । पूर्वदर्शनम् = प्रथम बार मिलना । स्वस्ति =
कल्याण हो । प्रसारय = फैलाओ । कवाटपुटप्रमाणम् = किवाड़ो के समान
विस्तीर्ण । आलिङ्ग = भेंट करो । सुविपुलेन = खूब लम्बे । भुजद्वयेन = दोनों
हाथो से । उन्नामय = ऊँचा उठाओ । आननम् = मुख को । शरदिन्दुकल्पम् =
शरत्काल के चन्द्रमा के समान । प्रह्लादय = शीतल बनाओ । व्यसनदग्धम्
= दुख से जले हुए ।
अन्वय— इयं तुषारोत्पलपत्रनेत्रा आसारम् इव हर्षास्रम् उत्सृजन्ती
तनये भावं निवेश्य माता इव स्वयं मानहेतोः गच्छतु । (१३)
अन्वय—हलात् क्षेत्रोदरात् जातम् इद तत् स्त्रीमयं तेजः नृपेन्द्रस्य
जनकस्य तपसः सन्निदर्शनम् । (१४)
अन्वय—अहम् पश्चात् प्रवेक्ष्यामि, नराधिपे स्वर्गम् याते विदितार्थस्य-
रामस्य मम एतत् पूर्वदर्शनम् । (१५)
अन्वय—कवाटपुटप्रमाण वक्षः प्रसारय । मां सुविपुलेन भुजद्वयेन
आलिङ्ग इद । शरदिन्दुकल्पम् आननम् उन्नामय । इदं व्यसनदग्धं शरीरं
प्रह्लादय । (१६)
हिन्दी अर्थ
राम—वत्स लक्ष्मण, क्या इसमें भी तुम मेरी अनुमति की आवश्यकता
समझते हो । जाओ और जल्दी से भरत को सम्मानपूर्वक अन्दर
ले आओ ।
लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा ।
राम—अथवा तुम रुक जाओ ।
यह सीता स्वयं जाए और माँ की तरह सस्नेह भरत का सत्कार
करके उन्हे भीतर ले आए । यह सीता जो ओस की बूँदों से भरे
नील कमल की तरह आंखो वाली है और जिन आँखों से स्वतः
प्रेमाश्रु की धारा वर्षा की झड़ी की तरह वह रही है । (१३)
( 128 )
सीता—जैसी पतिदेव की आज्ञा । (उठ कर, घूम कर और भरत को देख कर)
अरे, मुझसे पहले ही भीतर से आर्यपुत्र बाहर कैसे आ गए ? नहीं,
नहीं । यह तो केवल आकृति की समता है ।
सुमन्त्र—अरे, यह तो बहू है ।
भरतः—क्या, यह पूज्या जनक तनया सीता है ?
यह वही दीप्तिमान् नारी रूप तेज है, जो खेत को जोतते समय पृथ्वी
के गर्भ से उत्पन्न हुआ था और जो राजर्षि जनक की तपस्या का
ज्वलन्त उदाहरण है । (१४)
आर्ये, मैं प्रणाम करता हूं । मैं भरत हूं ।
सीता—(अपने मन में) केवल आकृति ही नहीं, आवाज भी वैसी ही है ।
(प्रकट रूप में) वत्स, चिरजीवी बनो ।
भरत—कृतकृत्य हो गया ।
सीता—आओ वत्स, अपने भाई की इच्छा को पूरी करो ।
सुमन्त्रः—राजकुमार, आप जाइए ।
भरत—तात, इस समय आप क्या करेंगे ?
सुमन्त्र—मैं बाद में आऊँगा क्योंकि महाराज की मृत्यु की सूचना जब से
राम को मिली है, इसके बाद उनसे यह मेरी पहली भेंट है । (१५)
भरत—ऐसा ही हो । (राम के पास जाकर) आर्य, मैं प्रणाम करता हूं । मैं
भरत हूं ।
राम—(प्रसन्नता से) आओ, आओ, इक्ष्वाकु राजकुमार, कल्याण हो । तुम
दीर्घ काल तक जीवित रहो ।
तुम किवाड़ की तरह अपनी चौड़ी छाती फैला कर अपनी विशाल-
काय भुजाओं से मेरा आलिङ्गन करो । तुम शरद् ऋतु के चन्द्रमा
के समान अपने आह्लादक मुख को ऊपर उठाओ तथा शोक की
ज्वाला में जलते हुए मेरे हृदय को शीतल करो । (१६)
भरत—मैं कृतकृत्य हुआ ।
(५) मूल
सुमन्त्रः—(उपेत्य) जयत्वायुष्मान् ।
रामः—हा तात !
( १२९ )
गत्वा पूर्वम् स्वसैन्यैरभिसरिसमये ख समानैर्विमानै
विख्यातो यो विमर्दे स स इति बहुशः सासुराणा सुराणाम् ।
स श्रीमास्त्यक्तदेहो दयितमपि विना स्नेहवन्तं भवन्त
स्वर्गस्थः साम्प्रत कि रमयति पितृभिः स्वैर्नरैन्द्रैर्नरेन्द्रः ॥
( १७ )
सुमन्त्रः—(सशोकम्)
नरपतिनिधनं भवत्प्रवासं
भरतविषादमनाथतां कुलस्य ।
बहुविधमनुभूय दुष्प्रसह्यं
गुण इव बहुवपराद्धमायुषा मे ॥ ( १८ )
सीता—रुदन्तमार्यपुत्रं पुनरपि रोदयति तातः ।
रामः—मैथिलि ! एष व्यवस्थापयाम्यात्मानम् । वत्स ! लक्ष्मण
आपस्तावत् ।
लक्ष्मणः—यदाज्ञापयत्यार्यः ।
भरतः—आर्य ! न खलु न्याय्यम् । क्रमेण शुश्रूषयिष्ये ।
अहमेव यास्यामि । (कलशं गृहीत्वा निष्क्रम्य प्रविश्य)
इमा आपः ।
रामः— (आचम्य) मैथिलि ! विशीर्यते खलु लक्ष्मणस्य व्यापारः ।
सीता—आर्यपुत्र ! नन्वेतेनापि शुश्रूषयितव्यः ।
रामः—सुष्ठु खल्विह लक्ष्मणः शुश्रूषयतु । तत्रस्थो मां भरतः शुश्रू-
षयतु ।
भरतः—प्रसीदत्वार्यः ।
इह स्थास्यामि देहेन तत्र स्थास्यामि कर्मणा ।
नाम्नैव भवतो राज्यं कृतरक्षं भविष्यति ॥ ( १६ )
रामः—वत्स ! कैकेयीमातः ! मा मैवम् ।
पितुर्नियोगादहमागतो वनं
न वत्स दर्पान्न भयान्न विभ्रमात् ।