प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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प्रेमी और स्नेही के बिना स्वर्ग में अपने अन्य पूर्वज राजाओं के
क्या आनन्द पाते होंगे । (१७)
सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) महाराज की मृत्यु, आपका वनवास, भरत की पी-
परिवार का रक्षकहीन होना आदि अनेक प्रकार के कष्टों को दि-
कर मेरी लम्बी उम्र ने गुणों के साथ दोष ही अधिक दिए हैं । (१८)
सीता—तात रोते हुए पतिदेव को और भी अधिक रुला रहे हैं ।
राम—सीते, यह मैं अपने आपको सँभाल रहा हूँ । वत्स लक्ष्मण, जरा पानी
तो लाओ ।
लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा ।
भरत—आर्य, यह उचित नही है । छोटा होने के कारण वारी तो मेरी है ।
मैं ही जल लाऊँगा । (कलश लेकर, बाहर जाकर, पुनः अन्दर आकर)
यह जल है ।
राम— (आचमन करके) सीते, अब तो लक्ष्मण का काम छिन रहा है ।
सीता—पतिदेव, इसे भी तो सेवा करनी चाहिए ।
राम—ठीक है । यहां वन में लक्ष्मण सेवा करे और वहाँ अयोध्या में भरत ।
भरत—आर्य प्रसन्न होइए ।
मैं यहाँ पर शरीर से रहूँगा तथा वहाँ तो केवल मेरा प्रबन्ध रहेगा
राज्य की रक्षा तो आपके नाममात्र से ही हो जायेगी । (१९)
राम—हे वत्स भरत, ऐसा मत कहो ।
हे वत्स, मैं पिता की आज्ञा से वन में आया हूँ । न तो मैं अभिमान से
यहाँ आया हूँ, न भय से अथवा न चित्त के पागलपन से । हमारा
रघुकुल सत्य के लिए प्रसिद्ध है, यह मैं तुमसे कह रहा हूँ । इसे
जानते हुए भी तुम निम्न पथगामी क्यों बन रहे हो । (२०)
सुमन्त्र—तो फिर अब राज्याभिषेक किसका होना चाहिए ?
राम—उसी का होवे, जिसके लिए जननी ने कहा है ।
भरत—आप प्रसन्न होइए । आर्य, अब घाव पर नमक न छिड़कें ।
हे गुणज्ञ मेरा जन्म भी उसी कुल में हुआ है, जिसकी आप शोभा
हैं । मेरे पिता भी वे ही प्रशस्त बुद्धि वाले हैं, जिनके आप यशस्कर