सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

धारण करने वाला बना दिया । महाराज को गृहकलह से मरने को
विवश किया। सारी अयोध्या को निरन्तर रुला दिया । लक्ष्मण को
हरिणों का सहवासी बना दिया । पुत्रों से स्नेह करने वाली माताओं
को शोक सागर में डुबो दिया । पुत्रवधू सीता को वन मे भटकने को
बाध्य किया और अपने को भी कठोर धिक्कार का पात्र
बनाया । (१७)
कौसला—पुत्र, सब प्रकार के शिष्टाचार को जानते हुए भी तुम अपनी जननी
को प्रणाम क्यों नही करते हो ?
भरत—क्या अपनी जननी को ? माँ, आप ही मेरी जननी है । माँ, मै प्रणाम
करता हूँ ।
कौसल्या—नही, नही, यह कैकयी तुम्हारी जननी है ।
भरत—पहले थी । किन्तु अब नही है । आप देवी देखिए,
इसने दुष्ट परिजनो के सहवास मे सत्य स्नेह को छोड़ कर बेटों से
नाता तोड लिया है । आज मै संसार मे एक नये धर्म की स्थापना
करने जा रहा हूँ कि जो स्त्री अपने स्वामी से विद्रोह करे, वह माँ
कहलाने की अधिकारिणी नहीं है । (१८)
(७) मूल
कैकेयी—जात ! महाराजस्य सत्यवचनं रक्षन्त्या मया तथोक्तम् ।
भरतः—किमिति किमिति ।
कैकेयी—पुत्रको मे राजा भवत्विति ।
भरतः—अथ स इदानीमार्योऽपि भवत्याः कः ?
पितुर्मे नौरसः पुत्रो न क्रमेणाभिषिच्यते ।
दयिता भ्रातरो न स्युः प्रकृतीनां न रोचते ॥ (१९)
कैकेयी—जात ! शुल्कलुब्धा ननु प्रष्टव्या ।
भरतः—वल्कलैर्हृतराजश्रीः पदातिः सह भार्यया ।
वनवासं त्वयाऽऽज्ञप्तः शुल्केऽप्येतदुदाहृतम् ॥ (२०)
कैकेयी—जात ! देशकाले निवेदयामि ।
भरतः—अयशसि यदि लोभः कीर्तयित्वा किमस्मान्