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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 296 में से

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पृष्ठ 119

( 128 )
सीता—जैसी पतिदेव की आज्ञा । (उठ कर, घूम कर और भरत को देख कर)
अरे, मुझसे पहले ही भीतर से आर्यपुत्र बाहर कैसे आ गए ? नहीं,
नहीं । यह तो केवल आकृति की समता है ।
सुमन्त्र—अरे, यह तो बहू है ।
भरतः—क्या, यह पूज्या जनक तनया सीता है ?
यह वही दीप्तिमान् नारी रूप तेज है, जो खेत को जोतते समय पृथ्वी
के गर्भ से उत्पन्न हुआ था और जो राजर्षि जनक की तपस्या का
ज्वलन्त उदाहरण है । (१४)
आर्ये, मैं प्रणाम करता हूं । मैं भरत हूं ।
सीता—(अपने मन में) केवल आकृति ही नहीं, आवाज भी वैसी ही है ।
(प्रकट रूप में) वत्स, चिरजीवी बनो ।
भरत—कृतकृत्य हो गया ।
सीता—आओ वत्स, अपने भाई की इच्छा को पूरी करो ।
सुमन्त्रः—राजकुमार, आप जाइए ।
भरत—तात, इस समय आप क्या करेंगे ?
सुमन्त्र—मैं बाद में आऊँगा क्योंकि महाराज की मृत्यु की सूचना जब से
राम को मिली है, इसके बाद उनसे यह मेरी पहली भेंट है । (१५)
भरत—ऐसा ही हो । (राम के पास जाकर) आर्य, मैं प्रणाम करता हूं । मैं
भरत हूं ।
राम—(प्रसन्नता से) आओ, आओ, इक्ष्वाकु राजकुमार, कल्याण हो । तुम
दीर्घ काल तक जीवित रहो ।
तुम किवाड़ की तरह अपनी चौड़ी छाती फैला कर अपनी विशाल-
काय भुजाओं से मेरा आलिङ्गन करो । तुम शरद् ऋतु के चन्द्रमा
के समान अपने आह्लादक मुख को ऊपर उठाओ तथा शोक की
ज्वाला में जलते हुए मेरे हृदय को शीतल करो । (१६)
भरत—मैं कृतकृत्य हुआ ।
(५) मूल
सुमन्त्रः—(उपेत्य) जयत्वायुष्मान् ।
रामः—हा तात !