प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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अन्वय-- यत्र असौ लक्ष्मणप्रियः वर्तते, तत्र यास्यामि । अयोध्या तं
विना अयोध्या न । सा अयोध्या यत्र राघवः । (२८)
हिन्दी अर्थ
कैकेयी—पुत्र, महाराज की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए ही मैने वैसा कहा था।
भरत— आपने क्या कहा था ?
कैकयी— कि मेरा बेटा राजा बने ।
भरत— तो फिर वे पूज्य राम आपके क्या हैं ?
क्या राम मेरे पिता दशरथ के स्वयं के पुत्र नहीं हैं ? क्या
अभिषेक ज्येष्ठ के क्रम से नहीं हुआ है ? क्या हम भाइयो मे परस्पर
अनुराग नहीं है ? क्या राम का अभिषेक प्रजाओ की रुचि के अनुसार
नहीं था । (१६)
कैकयी—पुत्र, विवाह शुल्क की लोभी माँ से ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाते ।
भरत —तुमने राज्य को लेकर और वल्कल पहना कर राम को सीता के साथ
जो पैदल वन मे भेज दिया, क्या वह भी विवाह शुल्क मे ही कहा
गया था ? (२०)
कैकयी— पुत्र, उपयुक्त स्थान और समय पर ही बताऊँगी ।
भरत— हे देवी, यदि तुम्हे अपयश ही प्रिय था, तो बीच मे ही मेरा नाम
क्यो लिया ? यदि तुमको राज्य के ऐश्वर्य की कामना थी, तो महाराज
से तुम्हे क्या नहीं मिल सकता था ? यदि तुम्हे ‘राजमाता’ कहलाने
की ही अभिलाषा थी, तो सच बताना, क्या राम तुम्हारे पुत्र नहीं
है ? (२१)
तुमने बहुत बुरा किया है ।
तुमने राज्य के लोभ के कारण महाराज के जीवन की भी चिन्ता
नहीं की और ‘वन मे जाओ’ यह कह कर बड़े पुत्र राम को भी वन मे
भेज दिया । सीता को वल्कल पहने देखकर भी तुम्हारी छाती नहीं
फटी, यह बड़े आश्चर्य की बात है । लगता है, विधाता ने तुम्हारे
हृदय को वज्र के से भी अधिक कठोर बनाया है। (२२)
सुमन्त्र — कुमार, प्रजावर्ग और अमात्यो के साथ महर्षि वसिष्ठ और वामदेव
आपके राज्याभिषेक के लिए आपको सूचित कर रहे हैं कि—