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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

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बहुत समय तक । जीव = जीवित रहो । पूरय = सफल करो । पश्चात् = बाद
मे। प्रवेक्ष्यामि = प्रवेश करूँगा । याते = चले जाने पर । विदितार्थस्य =
वृत्तान्त को जानने वाले । पूर्वदर्शनम् = प्रथम बार मिलना । स्वस्ति =
कल्याण हो । प्रसारय = फैलाओ । कवाटपुटप्रमाणम् = किवाड़ो के समान
विस्तीर्ण । आलिङ्ग = भेंट करो । सुविपुलेन = खूब लम्बे । भुजद्वयेन = दोनों
हाथो से । उन्नामय = ऊँचा उठाओ । आननम् = मुख को । शरदिन्दुकल्पम् =
शरत्काल के चन्द्रमा के समान । प्रह्लादय = शीतल बनाओ । व्यसनदग्धम्
= दुख से जले हुए ।
अन्वय— इयं तुषारोत्पलपत्रनेत्रा आसारम् इव हर्षास्रम् उत्सृजन्ती
तनये भावं निवेश्य माता इव स्वयं मानहेतोः गच्छतु । (१३)
अन्वय—हलात् क्षेत्रोदरात् जातम् इद तत् स्त्रीमयं तेजः नृपेन्द्रस्य
जनकस्य तपसः सन्निदर्शनम् । (१४)
अन्वय—अहम् पश्चात् प्रवेक्ष्यामि, नराधिपे स्वर्गम् याते विदितार्थस्य-
रामस्य मम एतत् पूर्वदर्शनम् । (१५)
अन्वय—कवाटपुटप्रमाण वक्षः प्रसारय । मां सुविपुलेन भुजद्वयेन
आलिङ्ग इद । शरदिन्दुकल्पम् आननम् उन्नामय । इदं व्यसनदग्धं शरीरं
प्रह्लादय । (१६)
हिन्दी अर्थ
राम—वत्स लक्ष्मण, क्या इसमें भी तुम मेरी अनुमति की आवश्यकता
समझते हो । जाओ और जल्दी से भरत को सम्मानपूर्वक अन्दर
ले आओ ।
लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा ।
राम—अथवा तुम रुक जाओ ।
यह सीता स्वयं जाए और माँ की तरह सस्नेह भरत का सत्कार
करके उन्हे भीतर ले आए । यह सीता जो ओस की बूँदों से भरे
नील कमल की तरह आंखो वाली है और जिन आँखों से स्वतः
प्रेमाश्रु की धारा वर्षा की झड़ी की तरह वह रही है । (१३)