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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

( १०४ )
अन्वय—पुत्रे मोहम् उपागते देव्यःकाले आगताः खलु, मातृणां हस्त-
स्पर्शः हि अजलस्य जलाञ्जलिः । (१२)
अन्वय- - यस्य स हर्म्यदुर्लभः समुच्छ्रयः तत् इदं नः प्रतिमानृपस्य गृहम्,
अनन्वितैः अप्रतिहारिकागतैः पथिकैः प्रणामं विना उपास्यते । (१३)
अन्वय—हि अय कः अपि वयःस्थः पार्थिवः इव पतितः । पर्यङ्ककामं
कर्तुम् अलम्, हि अयम् भरतः, गृह्यताम् । (१४)
अन्वय--चिरजीवदोषैः अन्वास्यमानः, कृतघ्नभावेन विडम्ब्यमानः
अहं. हि तस्मिन् नृपतौ विपन्ने शून्यस्य रथस्य सूतः जीवामि । (१५)
हिन्दी अर्थ
देवकुलिक—कुमार, धैर्य रखो, धैर्य रखो ।
भरत—(होश में आकर)
पिताजी और बड़े भाई राम से शून्य वन के समान इस अयोध्या में मैं
जा रहा हूं । जैसे कोई प्यासा आदमी सूखी नदी की ओर दौड़ता
जा रहा हो । (१०)
आर्य, विस्तारपूर्वक सुनने से मेरे मन को कुछ सहारा मिल रहा है,
अतः समूचे वृत्तान्त को पूरी तरह से कहो ।
देवकुलिक—सुनिए, जब महाराज दशरथ राजकुमार राम का अभिषेक कर
रहे थे उस समय आपकी माता कैकेयी ने कहा ।
भरत—ठहरो,
उस अनर्थकारी विवाह शुल्क को याद कर उसने कहा होगा कि मेरा
पुत्र राजा बने । इस प्रार्थना के सफल हो जाने से उसका बल बढ़ा
होगा और फिर उसने कहा होगा कि राम वन को जाएँ । राम को
वल्कल वस्त्र पहने देख कर महाराज को असामयिक मृत्यु प्राप्त हो
गई होगी । इन सब बातों से दुःखी प्रजावर्ग इन सबका मूल मुझे
मानकर धिक्कारती होगी और उसका धिक्कारना उचित भी है । (११)
(मूर्च्छित हो जाता है)
(नेपथ्य में)
हट जाइए, हट जाइए ।