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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

( 99 )
:। रथ के । पितामहः=दादा । तातस्य=पिता दशरथ के । धरमाणानाम् =
८) र्म धारण करने वालो के । अतिक्रान्तानाम् मृत्यु को प्राप्त करने वालों के ।
पृच्छे=जाने की अनुमति लेता हूँ । स्त्रीशुल्कार्थे=विवाह के समय स्त्री को
र जाने वाले द्रव्य के लिए । विसर्जिताः=छोड दिए । पृच्छसे=पूछ रहे हो ।
भागत्य=होश में आकर । सकामं=पूर्ण मनोरथ वाले । यत्कृते=जिस विषय
। शकसे=आशका कर रहे थे । स्पृशति=सम्बन्ध युक्त होता है । नीचः=
न्दनीय । विशोध्य=(अग्नि द्वारा) शुद्ध करना चाहिए । आलाप. = बोला
िने का शब्द । शेषम्=अवशिष्ट या बचा हुआ । गति. = उपाय । उपरत=
र गए ।
अन्वय- येन स्त्रीशुल्कार्थे प्राणाः राज्यं च विसर्जिताः, दशरथस्य इमां
प्रतिमा त्वं किम् न पृच्छसे । (८)
अन्वय-हृदय, सकामं भव, त्वं यत्कृते शंकसे, तत् पितृनिधन शृणु,
तावत् धैर्यम् च गच्छ । तु नीचः अयम् शुल्कशब्दः मां स्पृशति, अथ च सत्यम्
भवति, तत्र देहः विशोध्य । (६)
हिन्दी अर्थ
देवकुलिक-ये महाराज दिलीप हैं, जिन्होने सभी रत्नो को इकट्ठा कर,
विश्वजित् नामक यज्ञ को सम्पन्न किया था और धर्म के दीपक को
प्रकाशित किया था ।
भरत - इन धर्म प्राण को नमस्कार । आगे बताइए, ये कौन है ?
देवकुलिक-ये महाराज रघु हैं, जिनके कान सोते-जागते समय पुण्याह वाचन
की मन्त्र ध्वनि से पूर्ण रहा करते थे ।
भरत - ओह, प्रबल मृत्यु ने इस घेरे को भी पार कर लिया । ब्राह्मणो की
सेवा में अपनी पूरी सम्पत्ति समर्पित करने वाले महाराज रघु को
प्रणाम हो । अब कहो, ये श्रीमान् कौन है ?
देवकुलिक-ये महाराज अज हैं, जिन्होंने अपनी प्रिय रानी के विरह में विरक्त
होकर राजपाट को छोड़ दिया था और जो नित्य प्रति किए
जाने वाले यज्ञों के अवसान में अभिषेकों से सम्पूर्ण कल्मषभार को
धो देने वाले थे ।