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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

... wait:
"शरऋषिरसाः" or "शरऋषिरुद्राः"?
Wait, look at the letters:
"शर"
then: "ऋ" or "हृ"? "ऋषि"
then: "रसाः"?
Wait, look at the end of line 34:
"शरऋषिरसाः" or "शरऋषिरगाः"?
Wait, look at the top right of L34:
"शरऋषिरसाः (सुवदना की"
Then L35:
"यति). वसुग्रहर्त्तषयः" or "वसुग्रहर्क्षयः"?
Wait, let's check Bhujangavijrimbhita:
Bhujangavijrimbhita has 26 syllables:
यति at: 8 (वसु), 9 (ग्रह), 9? Or 8, 9, 9 = 26?
8 = वसु
9 = ग्रह
Wait, what is 9? अर्क? No, 8 + 9 + 9 = 26? Or 8 + 8 + 10?
In L35: "वसुग्रह..." let's look at the letters:
व - सु - ग्र - ह - र्क्ष - यः? Or "वसुग्रहर्त्तयः"?
Wait, what is the word before (भुजंगविजृंभित की यति)?
"वसुग्रहर्क्षयः" or "

१२२ प्राचीनलिपिमाला.
क् = १. ख् = २. ग् = ३. घ् = ४. ङ् = ५. च् = ६. छ् = ७. ज् = ८. झ् = ९. ञ् = १०.
ट् = ११. ठ् = १२. ड् = १३. ढ् = १४. ण् = १५. त् = १६. थ् = १७. द् = १८. ध् = १९.
न् = २०. प् = २१. फ् = २२. ब् = २३. भ् = २४. म् = २५. य् = ३०. र् = ४०. ल् = ५०.
व् = ६०. श् = ७०. ष् = ८०. स् = ९०. ह् = १००. अ = १. इ = १००. उ = १००००.
ऋ = १००००००. ऌ = १००००००००. ए = १००००००००००. ऐ = १००००००००००००.
ओ = १००००००००००००००. औ = १००००००००००००००००.

इस शैली में स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है. व्यंजन के साथ जहां स्वर मिला हुआ होता
है वहां व्यंजनसूचक अंक को स्वरसूचक अंक से गुणना १ होता है और संयुक्त व्यंजन के साथ जहां
स्वर मिला होता है वहां उक्त संयुक्त व्यंजन के प्रत्येक घटक व्यंजन के साथ वही स्वर माना जाता है
[L

अंक. १२३

१२३४५६७८९०
क्ख्ग्घ्ङ्च्छ्ज्झ्ञ्
ट्ठ्ड्ढ्ण्त्थ्द्ध्न्
प्फ्ब्भ्म्
य्र्ल्व्श्ष्स्ह्[ळ्]¹
इस क्रम में केवल व्यंजनों से ही अंक सूचित होते हैं, स्वर निरर्थक या शून्यसूचक समझे
जाते हैं² और संयुक्त व्यंजन के घटक व्यंजनों में से प्रत्येक से एक एक अंक प्रकट होता है .
संस्कृत लेखकों की शब्दों से अंक प्रकट करने की सामान्य परिपाटी यह है कि पहिले शब्द से इकाई,
दूसरे से दहाई, तीसरे से सैकड़ा आदि अंक सूचित किये जाते हैं (अंकानां वामतो गतिः), परंतु
आर्यभट ने अपने इस क्रम में उक्त परिपाटी के विरुद्ध अंक बतलाये हैं अर्थात् अंतिम अक्षर से
इकाई, उपांत्य से दहाई इत्यादि. इस क्रम में १ का अंक क, ट, प, या य अक्षर से प्रकट होता है
जिससे इसको 'कटपयादि' क्रम कहते हैं.
कभी कभी शिलालेखों³, दानपत्रों⁴, तथा पुस्तकों⁵ के संवत् लिखने में अंक 'कटपयादि'
क्रम से दिये हुए मिलते हैं परंतु उनकी और आर्यभट (दूसरे) की उपर्युक्त शैली में इतना अंतर
है कि उनमें 'अंकानां वामतो गतिः' के अनुसार पहिले अक्षर से इकाई, दूसरे से दहाई आदि के
अंक बतलाये जाते हैं और संयुक्त व्यंजनों में केवल अंतिम व्यंजन° अंक सूचक होता है न कि
प्रत्येक व्यंजन
१. आर्यसिद्धांत में 'ळ' नहीं है, परंतु दक्षिण में इस शैली के अंकों में उसका प्रयोग होता (इं. ऐँ. जि. ४, पृ. २०७)
है इस लिये यहां दिया गया है.
२. सप्तधीर्णा कपाधसञ्झिस्सा (१५८८८८३) मद्यसिन्नधा (५८२७०८) यनाखस्य (आ. सि. २ । ६).
३. कनकणैः (१२१५) सरर्घ (७२८) विंभजेद्वण (आ. सि; १ । ४०). स्फुटभुक्ताक्का (११) कन (१०) घनं खने (२०) रभिसे (२४४०) हृते बिंबं
(आ. सि; ५ । ५).
४. राघवाय (१४४२) गणिते शकवर्षे..॥ राघवाय १४४२ चत्तरसंज्ञ। शकाब्दे (ऐ. इं; जि. ६, पृ. १२१). ओमतोलंघवर्वे
भवति (६६४) गणसणि श्रेष्ठिराष्ट्रित्यवर्गा वचीपालो (इं. ऐँ; जि. २, पृ. ३६०). राकालोके (१३१२) शक। ब्दे सुरपतिसचिवे सिंचयाते
(इं. ऐँ; जि. २, पृ ३६१).
५. भक्त्यालोके (१३१५) शकाब्दे परिसमप्त[तिं] गन्मे श्रीमुखापा[ठ]मासे (ऐँ. इं; जि. ३, पृ. २२६). तत्वलोके (१३४६)
शकस्याब्दे क्रोधिंसंवत्सरे शुभे (ऐँ. इं; जि. ३, पृ. ३८).
६. खगोम्यान्मनवसाप (१५६५१३२) ति कलयुगधने सति । सर्वानुक्रमणीतिज्जाता वेदार्थदीपिका ॥ लक्षाणि पञ्चदश वै पञ्चषष्टिसह-
स्त्रकं । सप्तात्रिंशच्छतं चेति दिनवाक्यार्थ ईरितः ॥ (इं. ऐँ; जि. २१, पृ. ५०). इन दो श्लोकों में षड्गुरुशिष्य ने अपनी 'वेदार्थ-
दीपिका' नामक 'सर्वानुक्रमणी' की टीका की रचना कलियुग के १५६५१३२ दिन व्यतीत होने पर करना बतलाया है.
इस गणना के अनुसार उक्त टीका की रचना कलियुग संवत् ४२८५ = शक सं. ११०६ = वि. सं. १२४१ (तारीख २४ मार्च, ई.
स. ११८४) में होना पाया जाता है.
°. इसी पत्र के टिप्पण ८ में 'शक्त्यालोके' के 'क्त्या' में 'य्' के लिये १ का अंक लिया गया है और 'क्' तथा
'त्' को छोड़ दिया है. ऐसे ही उसी टिप्पण में 'तत्वलोके' के 'त्व' के 'व्' के लिये ४ का अंक लिया है, 'त्' के लिये
कुछ नहीं. ऐसे ही टिप्पण ६ में 'न्त्या' और 'न्मे' में 'य्' और 'म्' के लिये क्रमशः १ और ५ के अंक लिये हैं बाकी के
अक्षरों को छोड़ दिया है.

१२४ प्राचीनलिपिमाला.
ऊपर वर्णन की हुई अक्षरों से अंक सूचित करने की शैलियों के अतिरिक्त दक्षिण में मलबार
और तेलुगु प्रदेश में पुस्तकों के पत्रांक लिखने में एक और भी शैली प्रचलित थी जिसमें 'क' से 'ळ'
तक के अक्षरों से क्रमशः १ से ३४ तक के अंक, फिर 'बारखड़ी' (द्वादशाक्षरी) के क्रम से 'का' से
'ळा' तक 'आ' की मात्रासहित व्यंजनों से क्रमशः ३५ से ६८ तक, जिसके बाद 'कि' से 'ळि' तक
के 'इ' की मात्रासहित व्यंजनों से ६६ से १०२ तक के और उनके पीछे के अंक 'ई', 'उ' आदि
स्वरसहित व्यंजनों से प्रकट किये जाते थे¹. यह शैली शिलालेख और ताम्रपत्रादि में नहीं मिलती.
अक्षरों से अंक प्रकट करने की रीति आर्यभट (प्रथम) ने ही प्रचलित की हो ऐसा नहीं है
क्योंकि उससे बहुत पूर्व भी उसके प्रचार का कुछ कुछ पता लगता है. पाणिनि के सूत्र १. ३. ११ पर
के कात्यायन के वार्तिक और कैयट के दिये हुए उसके उदाहरण से पाया जाता है कि पाणिनि की
अष्टाध्यायी में अधिकार 'स्वरित' नामक वर्णात्मक चिह्नों से बतलाये गये थे और वे वर्ण पाण

अंक. १२५
लिपिपत्र ७२ वां.
इस लिपिपत्र में दो खंड हैं जिनमें से पहिले में कलिंग के गंगवंशियों के दानपत्रों १,
प्रतिहारवंशियों के शिलालेख व दानपत्रों २, भिन्न भिन्न लेख और दानपत्रों ३, मि. बावर के प्राप्त
किये हुए हस्तलिखित पुस्तकों ४, नेपाल के बौद्ध ग्रंथों ५ तथा जैन पुस्तकों ६ से १ से ६ तक के
प्राचीन शैली के अंक उद्धृत किये गये हैं. दूसरे खंड में अशोक के लेखों ७, नानाघाट के लेख ८,
कुशनवंशियों के समय के मथुरा आदि के लेखों ९, क्षत्रपों और आंध्रवंशियों के समय के नासिके
आदि के लेखों १०, क्षत्रपों के सिक्कों ११ तथा जग्गयपेट के लेखों एवं पल्लव शिवस्कंदवर्मन् आदि के
ताम्रपत्रों १२ से प्राचीन शैली के १० से ९० तक के अंक दिये गये हैं.
लिपिपत्र ७३ वां.
इस लिपिपत्र में दो खंड हैं जिनमें से पहिले में गुप्तों और उनके समकालीन राजाओं के लेखा-
दि १३, वाकाटक आदि वंशियों १४ तथा वलभी के राजाओं १५ और शालंकायनवंशियों १६ के दानपत्रों, नेपाल
के लेखों १७ तथा कलिंग के गंगवंशियों के दानपत्रों १८ से १० से ९० तक के प्राचीन शैली के अंक
१. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १२६, १३३; जि. ४, पृ. १४५, १६७. इं. ऍ; जि. १३, पृ. १२१, १२३.
२. ऍ. इं; जि. ५, पृ. २०६. इं ऍ; जि. १५, पृ. ११२, १४०. आठ का अंक जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार बाउक के
वि. सं. ८६४ (ई. स. ८३७) के लेख से, जो राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खा हुआ है, लिया गया है.
३. २ का अंक ऍ. इं; जि. १०, पृ. ५१ से. ४ का ऍ. इं; जि. ५, पृ. ८ से. ५ और ६ के ऍ. इं; जि. ७, पृ. १५८ से.
८ का ऍ. इं; जि. ५. पृ. ८ से. ६ का पहिला रूप ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३०४ से और दूसरा ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १०८ से.
४. बावर मेनुस्क्रिपु. भूमिका, पृ. २६, टेबल ४ था.
५. बू; इं; पे; लेट ६, पंक्ति २०-२३, ३६. इं. ऍ; जि. ६, पृ. ४४, पंक्ति ७, ६.
६. बू; इं; पे; प्लेट ६, पंक्ति २४-२५. इं. ऍ; जि. ६, पृ. ४४, पंक्ति ८.
७. इं. ऍ; जि. २२, पृ. २६८ (सहस्राम). ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३८.
८. आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१.
९. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३८८-६३; जि. २, पृ. २००-२०८; जि. १०, पृ. १०७. आ. स. रि; ई. स. १६०८-६, प्लेट ५६.
१०. देखो, ऊपर पृ. १२४, टिप्पण ६. ११. देखो, ऊपर पृ. १२४, टिप्पण ७.
१२. आ. स. स. इं; जि. १ प्लेट ६२-६३. ऍ. इं; जि. ६, पृ. ८८, ३१६.
१३. फ्ली; गु; इं; प्लेट १-४, ६, १२, १५, १६, ३६, ३८, ३६, ४१. ऍ. इं; जि. ८, पृ. २८७; जि. ६, पृ. १५४; जि. १०,
पृ. ५१.
१४. फ्ली. गु; इं; प्लेट २७, ३४.
१५. ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६३; जि. ११, पृ. ८२, १११, ११३, १७६. इं. ऍ; जि. ५, पृ. २०७, २०६; जि. ६, पृ. १५, १६;
जि. ७, पृ. ६६, ७३, ७४, ७८; जि. ६, पृ. २३६; जि. १४, पृ. ३२८. फ्ली; गु. इं; प्लेट २४-२५. आ. स. रि; ई. स. १६०९-
३, पृ. २३५. ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३. भा. इं; पृ. ५६.
१६. ऍ. इं; जि. ६, पृ. ५६. १७. इं. ऍ; जि. ६, पृ. १६४-७८.
१८. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १२६, १३३; जि. ४, पृ. १६७. इं. ऍ; जि. १३, पृ. १२१, १२३.

  • Wait, is it "तीसरा इं, ऐं;" or "तीसरा इं. ऐं;"?
    • In L16: "तीसरा इं, ऐं; जि. ७, पृ. २४६ से. ४० का"
    • `` २० का पहिला रूप एं. इं; जि ४, पृ. २१० से; दूसरा एं. इं; जि. ८, पृ. २३२ से; तीसरा एं. इं; जि. १०, पृ. ५१ से. ४० का
    • `` पहिला रूप एं. इं; जि. ६, पृ. २६६ से; दूसरा एं. इं; जि. ११, पृ. २२१ से. ५० का पहिला रूप एं. इं; जि. ११, पृ. १६ से;
    • `` दूसरा एं. इं; जि. ५, पृ. ८ से. ६० एं. इं; जि. ६, पृ. २६६ से. ७० ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १०८ से. ८० का पहिला
    • `` रूप एं. इं; जि. ११, पृ. ३०४ से; दूसरा एं. इं; जि. ६, पृ. १३६ से. ६० का पहिला रूप एं. इं; जि. २, पृ. २१ से; दूसरा एं. इं

अंक. १२७

उत्तरार्द्ध में किसी गूर्जर राजा १, राष्ट्रकूट (राठौड़) दंतिदुर्ग २ और शंकरगण ३ के दानपत्रों,
प्रतिहार नागभट ४ और बाउक ५ के लेखों, राष्ट्रकूट दंतिवर्मन् के दानपत्र ६, प्रतिहार भोजदेव के दो
लेखों ७, प्रतिहार महीपाल के लेख ८ तथा पुष्कर के लेख ९ से नवीन शैली के १ से ६ तक के अंक,
शून्यसहित, दिये हैं.

लिपिपत्र ७६ वां.

इस लिपिपत्र के पूर्वार्द्ध में चौलुक्य (सोलंकी) मूलराज १० और शिलारा अपराजित ११ के
दानपत्रों, परमार भोज के शिलाओं पर खुदे हुए 'कूर्मशतक १२', कलचुरि कर्ण १३ और चौलुक्य
त्रिलोचनपाल १४ के दानपत्रों, कलचुरि जाजल्लदेव १५ के लेख, अजमेर से मिली हुई चौहानों के
ऐतिहासिक काव्य की शिलाओं में से पहिली शिला १६, बख्शाली से मिले हुए हस्तलिखित
अंकगणित के पुस्तक १७ एवं बौद्ध पुस्तकों १८ से नवीन शैली के शून्यसहित १ से ६ तक के अंक
दिये गये हैं.
उत्तरार्द्ध के दो खंड किये गये हैं जिनमें से पहिले में शारदा लिपि के लेखों १९, बंगला लिपि
के लेख व दानपत्रों २० और तेलुगुकनडी लिपि के लेखादि २१ से नवीन शैली के शून्यसहित १ से ६
तक के अंक दिये गये हैं. दूसरे खंड में खरोष्ठी लिपि के अंक दिये हैं जिनका विवेचन आगे किया
जायगा.


१. पॅ. इं; जि. २, पृ. २०. २. इं. पँ; जि. ११, पृ. ११२.
३. पँ. इं; जि. ६, पृ. १६७. ४. पँ. इं; जि. ९, पृ. २००.
५. राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए प्रतिहार बाउक के वि. सं. ८९४ के लेख से.
६. पँ. इं; जि. ६, पृ. २६१.
७. पहिले के अंक मेरे विद्वान् मित्र हरविलास सारड़ा से मिली हुई उक्त लेख की उत्तम छाप से और दूसरे के पँ.
इं; जि. १, पृ. १६० से.
८. इं. पँ; जि. १६, पृ. १६४.
९. राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए वि. सं. ९८२ के पुष्कर से मिले हुए लेख से.
१०. इं. पँ; जि. ६, १६३. ११. पॅ. इं; जि. ३, पृ. २७४. १२. पँ. इं; जि. ८, पृ. २४८-६०.
१३. पँ. इं; जि. २, पृ. ३०७. १४. इं. पँ; जि. १२, पृ. २०२. १५. पँ. इं; जि. १, पृ. ३४.
१६. राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खी हुई शिला से.
१७. बू; इं. पे; प्लेट ६ (B), पंक्ति ६-१० (IX, X). १८. बू; इं. पे; प्लेट ६ (B), पंक्ति ११-१२ (XI, XII.)
१९. फ़ो; पॅ. चं. स्ट्रे; प्लेट १६, १७, २०, २३, २४, २५, २६, २८, २९, ३०, ३२, ३३, ४०.
२०. पॅ. इं; जि. २, पृ. ३५२; जि. ५, पृ. १८४-४; जि. १२, पृ. ६, २८, २६, ४१. इं. पँ; जि. १०, पृ. ३४२. ज. बंगा. ए.
सो; ई. स. १८६६, भाग १, प्लेट १-२; १९१०, प्लेट ७.
२१. पहिली पंक्ति पॅ. इं; जि. २, पृ. २७, ८८; जि. ४, पृ. ६२ (c), २१४; जि. ५, पृ. १५१; जि. ६, पृ. २३६. इं. पँ;
जि. ६, पृ. १६८; जि. ११, पृ. १२; दूसरी पंक्ति. ब; सा. इं. पे; प्लेट ३३ से.

२०-खरोष्ठी लिपि के अंक.
( लिपिपत्र ७६ के उत्तरार्द्ध का द्वितीय खंड ).
खरोष्ठी लिपि के अंक उक्त लिपि की नांई विदेशी हैं. अरबी और फ़ारसी की नांई खरोष्ठी
लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है परंतु उसके अंक अरबी और फ़ारसी के अंकों
की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर नहीं लिखे जाते किंतु दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखे जाते हैं
जिसका कारण यही है कि ये अंक अरबी और फ़ारसी के अंकों की नांई भारतीय अंकों से नहीं निकले
किंतु सेमिटिक फिनिशिअन ( या उनसे निकले हुए अरमइक ) अंकों से निकले हुए प्रतीत होते हैं.
ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी से भारतवर्ष में इन अंकों का कुछ पता लगता है. अशोक के शहबाज़-
गढ़ी के लेख की पहिली धर्माज्ञा में १ और २ के लिये क्रमशः एक ( । ) और दो ( ।। ) खड़ी लकीरें,
तीसरी में ५ के लिये पांच ( ।।।।। ) और १३ वीं में ४ के लिये चार ( ।।।। ) खड़ी लकीरें मिलती हैं. ऐसे
ही अशोक के मानसेरा के लेख की पहिली धर्माज्ञा में १ और २ के लिये क्रमशः एक ( । ) और दो ( ।। ),
और तीसरी में पांच के लिये पांच ( ।।।।। ) खड़ी लकीरें खुदी हैं. इससे पाया जाता है कि उस समय
तक तो ६ तक के लिये इन अंकों का वही क्रम रहा हो जो फिनिशिअन में मिलता है. अशोक के पीछे
शक, पार्थिअन और कुशनवंशियों के समय के खरोष्ठी लेखों १ में ये अंक विशेष रूप से मिलते हैं. उनमें
१, २, ३, ४, १०, २० और १०० के लिये पृथक पृथक चिह्न हैं ( देखो, लिपिपत्र ७६ में खरोष्ठी अंक ).
इन्हीं ७ चिह्नों से ३६६ तक के अंक लिखे जाते थे.
इन अंकों में १ से ६ तक के लिये यह क्रम था कि ५ के लिये ४ के अंक की बाईं ओर १; ६ के लिये
४ और २; ७ के लिये ४ और ३; ८ के लिये दो बार ४; और ६ के लिये ४, ४ और १ लिखे जाते थे.
११ से १६ तक के लिये १० की बाईं ओर उपर्युक्त क्रम से १ से ६ तक के अंक लिखे जाते थे. २०
से २६ के लिये २० की बाईं ओर १ से ६ तक के और ३० के लिये २० और १० लिखे जाते थे.
३१ से ९६ तक के अंक २०, १० और १ से ६ तक के अंकों को मिलाने से बनते थे, जैसे कि
७४ के लिये २०, २०, २०, १० और ४; और ६६ के लिये २०, २०, २०, २०, १०, ४, ४ और १.
१०० के लिये उक्त चिह्न के पूर्व १ का अंक रक्खा जाता था. २०० के लिये १०० के पूर्व २ का
और ३०० के लिये ३ का अंक लिखा जाता था. ४०० के लिये १०० के पूर्व ४ का चिह्न लिखा जाता था या
चार खड़ी लकीरें बनाई जाती थीं इसका कुछ पता नहीं चलता क्योंकि ३७४ के आगे का कोई अंक अब
तक नहीं मिला.
अशोक के पीछे के उपर्युक्त ७ चिह्नों में से १, २ और ३ के लिये क्रमशः १, २ और ३ खड़ी लकीरें हैं
जो फिनिशिअन क्रम से ही हैं. ४ के अंक का चिह्न × है जो ई. स. पूर्व के सेमिटिक लिपि के किसी लेख में नहीं
मिलता. संभव है कि ब्राह्मी के ४ के अंक ( + ) को ही टेढ़ा लिखने से यह चिह्न बना हो. १० का चिह्न
फिनिशिअन के १० के आड़े चिह्न को खड़ा लिखने से बना हो ऐसा प्रतीत होता है (देखो, ऊपर पृ. ११३
में दिया हुआ नक्शा). उसी (फिनिशिअन) चिह्न से पल्माइरावालों का एवं टीमा के लेख का उक्त अंक
का चिह्न बना है. २० का चिह्न फिनिशिअन अंकों में मिलने वाले २० के अंक के ४ चिह्नों में से तीसरा है.
१. इन संवत् वाले लेखों के लिये देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ७, ६; और पृ. ३३, टिप्पण १.

भारतवर्ष की वर्तमान लिपियां. १२६
१०० का चिह्न फिनिशियन् अंकों के १०० के चिह्न के ४ रूपों में से चौथे से मिलता हुआ है, केवल उसके
पूर्व एक की खड़ी लकीर अधिक लगी है. ऐसी दशा में इन चिह्नों में से ४ के चिह्न के सिवाय सब
का फिनिशियन् से निकला हुआ होना अनुमान होता है.
लिपिपत्र ७६ के उत्तरार्द्ध का द्वितीय खंड.
इस खंड में ५ खड़ी पंक्तियां हैं जिनमें से पहिली और चौथी में वर्तमान नागरी अंक हैं
और दूसरी, तीसरी तथा पांचवीं में उन्हीं के सूचक खरोष्ठी अंक हैं. दूसरी पंक्ति में अशोक के शहबा-
ज़गढ़ी और मानसेरा के लेखों १ से और तीसरी तथा पांचवीं में शक, पार्थियन् और कुशनवंशियों
के समय के संवत्वाले खरोष्ठी लेखों २ से अंक दिये गये हैं.
२१—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियां.
( लिपिपत्र ७७ से ८१ ).
भारतवर्ष की समस्त वर्तमान आर्य लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि ही है. ये भिन्न भिन्न
लिपियां किन किन परिवर्तनों के बाद बनीं यह लिपिपत्र १ से ६४ तक में दी हुईं भिन्न भिन्न
लिपियों से मालूम हो सकता है. उन सब में नागरी सार्वदेशिक है और बहुधा सारे भारतवर्ष
में उसका प्रचार बना हुआ है इतना ही नहीं किंतु यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान आदि में जहां
जहां संस्कृत का पठनपाठन होता है वहां के संस्कृतज्ञ लोगों में भी उसका आदर है. हिंदी, मराठी
तथा संस्कृत के पुस्तक उसीमें छपते हैं. बाकी की लिपियां एकदेशिक हैं और भारतवर्ष के भिन्न
भिन्न विभागों में से किसी न किसी में उनका प्रचार है.
लिपिपत्र ७७ वां.
इस लिपिपत्र में शारदा ( कश्मीरी ), टाकरी और गुरुमुखी ( पंजाबी ) लिपियां तथा उनके
अंक दिये गये हैं.
शारदा लिपि—कश्मीर देश की अधिष्ठात्री देवी शारदा मानी जाती है जिससे वह देश
'शारदादेश' या 'शारदामंडल' कहलाता है और उसीपर से वहां की लिपि को 'शारदा लिपि'
कहते हैं. पीछे से उसको 'देवादेश' ३ भी कहते थे. मूल शारदा लिपि ई. स. की दसवीं शताब्दि के
आस पास 'कुटिल लिपि' से निकली और उसका प्रचार कश्मीर तथा पंजाब में रहा. उसीमें परि-
वर्तन होकर वर्तमान शारदा लिपि बनी जिसका प्रचार अब कश्मीर में बहुत कम रह गया है.
उसका स्थान बहुधा नागरी, गुरुमुखी या टाकरी ने ले लिया है.
टाकरी लिपि—यह शारदा का घसीट रूप है, क्योंकि इसके इ, ई, उ, ए, ग, घ, च, ञ,
ड, ढ, त, थ, द, ध, प, भ, म, य, र, ल और ह अक्षर वर्तमान शारदा के उक्त अक्षरों से मिलते
१. देखो, ऊपर पृ. १२८.
२. इन लेखों के लिये देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ७, ६ ; और पृ. ३३, टि. १, २.
३. फो; पँ. वं. स्टे; पृ. ४३, ४७.
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

१३० प्राचीनलिपिमाला.
जुलते हैं. बाकी के अक्षरों में जो अंतर है वह विशेष कर त्वरा से तथा चलती कलम से पूरा अक्षर
लिखने से ही हुआ है. 'ख' के स्थान में 'ष' लिखा जाता है. जंबू तथा पंजाब के सारे उत्तरी
पहाड़ी प्रदेश में (शायद शिमला ज़िले को छोड़कर १) इसका प्रचार है और यह भिन्न भिन्न विभागों
में कुछ कुछ भिन्नता से लिखी जाती है. जो जंबू के इलाके में प्रचलित है उसको 'डोगरी'
और जो चंबा राज्य में लिखी जाती है उसको 'चमिआली' कहते हैं. जब महाजन आदि मामूली
पढ़े हुए लोग, जिनको स्वरों की मात्रा तथा उनके ह्रस्व दीर्घ का ज्ञान नहीं होता, इसको लिखते
हैं तब कभी कभी स्वरों की मात्राएं या तो नहीं लगाई जातीं या उनके स्थान पर मूल स्वर भी
लिख दिये जाते हैं. इसीसे टाकरी का पढ़ना बाहरवालों के लिये बहुत कठिन होता है और जो शिला-
लेख इस समय उसमैं खोदे जाते हैं उनका पढ़ना भी बहुधा कठिन होता है२. 'टाकरी' नाम
की उत्पत्ति का ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि 'ठाकुरी' (ठक्कुरी) शब्द से उसकी
उत्पत्ति हो अर्थात् राजपूत ठाकुरों (ठक्कुरों) की लिपि; अथवा टांक (लवाणा) जाति के व्यौपा-
रियों की लिपि होने के कारण इसका नाम टाकरी हुआ हो.
गुरुमुखी लिपि—पंजाब के महाजनों तथा अन्य मामूली पढ़े हुए लोगों में पहिले एक
प्रकार की 'लंडा' नाम की महाजनी लिपि प्रचलित थी, जिसमें सिंधी की नांई स्वरों की मात्राएं
लगाई नहीं जाती थीं और जो अब तक वहां पर कुछ कुछ प्रचलित है. ऐसा कहते हैं कि सिक्खों के
धर्मग्रंथ पहिले उसी लिपि में लिखे जाते थे जिससे वे शुद्ध पढ़े नहीं जाते थे, इसलिये गुरु अंगद
(ई. स. १५३८-५२) ने अपने धर्मग्रंथों की शुद्धता के लिये स्वरों की मात्रावाली नई लिपि, जिसमें
नागरी के समान शुद्ध लिखा और पढ़ा जावे, बनाई, जिससे उसको 'गुरुमुखी' अर्थात् 'गुरु के मुख
से निकली हुई' लिपि कहते हैं. इसके अधिकतर अक्षर उस समय की शारदा लिपि से ही लिये गये
हैं क्योंकि उ, ऋ, ओ, घ, च, छ, ट, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, भ, म, य, श, ष और स अक्षर अब तक
वर्तमान शारदा से मिलते जुलते हैं. इसके अंक नागरी से लिये गये हैं. सिक्खों के धर्मग्रंथ इसीमें
लिखे और छापे जाते हैं इतना ही नहीं किंतु नागरी के साथ साथ इसका प्रचार पंजाब में बढ़ रहा है.

लिपिपत्र ७८ वां.
इस लिपिपत्र में वर्तमान कैथी, बंगला और मैथिल लिपियां तथा उनके अंक दिये गये हैं.
कैथी लिपि—यह लिपि वास्तव में नागरी का किंचित् परिवर्तित रूप ही है. कायस्थ (कायथ)
अर्थात् अहलकार लोगों की त्वरा से लिखी जानेवाली लिपि होने से इसको 'कैथी' (कायथी) कहते
हैं. जैसे मामूली पढ़े हुए लोगों की लिपियों में संस्कृत की पूरी वर्णमाला का उपयोग नहीं होता
वैसे ही इसमें भी ऋ, ङ और ञ अक्षर नहीं है, और व तथा 'ब' में अंतर नहीं है. 'व' को 'ब' से
भिन्न बतलाने के लिये टाइप के अक्षरों में 'व' के नीचे एक बिंदी लगाई जाती है. अ, ख और झ
नागरी से भिन्न हैं जिनमें से 'अ' तो नागरी के 'श्र' को चलती कलम से लिखने में ऊपर ग्रंथि बन
जाने के कारण 'अ' सा बन गया है और 'ख' नागरी के 'ष' का विकार मात्र है. पहिले यह लिपि
गुजराती की नांई लकीर खींच कर लिखी जाती थी परंतु टाइप में सरलता के विचार से सिरखेंचक
लकीर मिटा दी गई है. बिहार की पाठशालाओं में नीचे की श्रेणियों में इस लिपि की छपी हुई पुस्तकें
पढ़ाई जाती हैं. देशभेद के अनुसार इसके मुख्य तीन भेद हैं अर्थात् मिथिला, मगध और भोजपुर
की कैथी.

२ फो; पैं. बं. स्टे; पृ. ४७.

बंगला लिपि—बंग ( बंगाल ) देश की लिपि होने के कारण इसको बंगला कहते हैं. प्राचीन
बंगला लिपि प्राचीन पूर्वी नागरी से निकली है (देखो, ऊपर पृ. ४३) और उसीमें परिवर्तन होते होते
वर्तमान बंगला लिपि बनी. इस लिपि में नागरी के समान अक्षर पूर्ण हैं और इसका साहित्य भारतवर्ष
की सब भाषाओं के साहित्य से बढ़ा हुआ है जिसका कारण यही है कि भारतवर्ष में सर्कार अंग्रेज़ी
का राज्य सब से पहिले बंगाल में हुआ जिससे विद्या का सूर्य वहां सबसे पहिले फिर उदय हुआ.
यह लिपि सारे बंगाल और आसाम में प्रचलित है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसमें छपने लग
गये थे परंतु अब वे बहुधा नागरी में ही छपते हैं. बंगभाषा के पुस्तक आदि ही इसमें छपते हैं.
मैथिल लिपि—मिथिला (तिरहुत) देश के ब्राह्मणों की लिपि, जिसमें संस्कृत ग्रंथ लिखे जाते हैं,
'मैथिल' कहलाती है. यह लिपि वस्तुतः बंगला का किंचित् परिवर्तित रूप ही है और इसका
बंगला के साथ वैसा ही संबंध है जैसा कि कैथी का नागरी से है. मिथिला प्रदेश के अन्य लोग
नागरी या कैथी लिखते हैं.
लिपिपत्र ७६ वां.
इस लिपिपत्र में उड़िया, गुजराती और मोडी ( मराठी ) लिपियां दी गई हैं.
उड़िया लिपि—उड्र ( उड़िया वा उड़ीसा ) देश की प्रचलित लिपि को उक्त देश के नाम
पर से उड़िया कहते हैं. यह लिपि पुरानी बंगला से निकली हो ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि
इसके अधिकतर अक्षर हन्नाकोल के लेख के अक्षरों से मिलते हुए हैं और ए, ऐ, ओ
और औ तो वर्तमान बंगला ही हैं. इस लिपि के अक्षर सरसरी तौर से देखनेवालों को विलक्षण
मालूम देंगे परंतु इस विलक्षणता का मुख्य कारण कुछ तो अक्षरों को चलनी कलम से लिखना
और कुछ उनके गोलाईदार लंबे सिर ही हैं जिनका दाहिनी ओर का अंश नीचे को झुका हुआ
रहता है. ये सिर भी बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पंडिघी और कामरूप के वैद्यदेव के दान-
पत्रों में मिलनेवाले ८ ऐसे सिरों ( देखो, लिपिपत्र ३३ ) के परिवर्द्धित रूप या विकास मात्र हैं. इन
सिरों को हटा कर देखा जावे तो मूल अक्षर बहुत ही सरल हैं. इस लिपि में स्वरों की मात्राओं के
चिह्न भी बंगला शैली के ही हैं.
गुजराती लिपि—गुजरात देश में प्रचलित होने के कारण इसको गुजराती कहते हैं. सारे
गुजरात, काठियावाड़ और कच्छ में इसका प्रचार है. काठियावाड़ के हालार विभाग के बहुत से
लोगों की भाषा कच्छी से मिलती हुई हालारी है और कच्छवालों की कच्छी है परंतु उन लोगों की
लिपि गुजराती ही है. यह लिपि भी कैथी की नांई नागरी का किंचित् विकृत रूप ही है. अ, इ,
ख, च, ज, झ, फ और ब ये आठ अक्षर त्वरा से लिखे जाने के कारण नागरी से अब भिन्न बन गये हैं.
उनमें से 'ख' तो 'ष' से बना है और 'इ' तथा 'झ' जैन शैली की नागरी से लिये हैं. इन आठों
अक्षरों का विकासक्रम नीचे बतलाये अनुसार है—
अ= अ अ अ અ. इ= इ इ ई ઈ. ख= ष ष ख ખ. च= च च च ચ.
ज= ज ज ज જ. झ= झ झ झ ઝ. फ= फ फ् फ્ ફ. ब= ब व ब બ.
गुजराती लिपि के अक्षर पहिले सिर की लकीर खींच कर लिखे जाते थे और व्यौपारी लोग
अब तक अपनी बहियों तथा पत्रों में वैसे ही लिखते हैं, परंतु टाइप बनानेवालों ने सरलता के लिये
सिरों के चिह्न मिटा दिये तब से वे बिना लकीर भी लिखे जाते हैं.
मोडी लिपि—इसकी उत्पत्ति के विषय में पूना की तरफ के कोई कोई ब्राह्मण ऐसां प्रसिद्ध
करते हैं कि हेमाडपंत अर्थात् प्रसिद्ध हेमाद्रि पंडित ने इसको लंका से लाकर महाराष्ट्र देश में प्रब-
लित किया, परंतु इस कथन में कुछ भी सत्यता नहीं पाई जाती क्योंकि प्रसिद्ध शिवाजी के पहिले

६१२ प्राचीनलिपिमाला
इसके प्रचार का कोई पता नहीं चलता. शिवाजी ने जब अपना नया राज्य स्थापित किया तब नागरी
को अपनी राजकीय लिपि बनाया परंतु उसके प्रत्येक अक्षर के ऊपर सिर की लकीर बनाने के कारण
कुछ कम त्वरा से वह लिखी जाती थी इस लिये उसको त्वरा से लिखी जाने के योग्य बनाने के
विचार से शिवाजी के 'चिटनीस' (मंत्री, सरिस्तेदार) बालाजी अवाजी ने इसके अक्षरों को मोड़
(तोड़ मरोड़) कर नई लिपि तय्यार की जिससे इसको 'मोड़ी' कहते हैं. पेशवाओं के समय में
बिवलकर नामक पुरुष ने उसमें कुछ और फेर फार कर अक्षरों को अधिक गोलाई दी२. यह लिपि
सिर के स्थान में लंबी लकीर खींच कर लिखी जाती है और बहुधा एक अथवा अधिक शब्द या
सारी पंक्ति चलती कलम से लिखी जाती है. इसमें 'इ', तथा 'ई' और 'उ' की मात्राओं में
ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है और न हलंत व्यंजन हैं. इसके अक्षरों में से 'इ' और 'ज' गुज-
राती के उक्त अक्षरों के समान हैं. 'ख', 'प', 'ब' और 'र' प्राचीन तेलुगु-कनड़ी के उक्त अक्षरों
से लिये हों ऐसा पाया जाता है. 'ट' और 'ठ' के रूप एकसा हैं; उनके बीच का भेद बतलाने के
लिये 'ठ' के बीच में एक बिंदी लगाई जाती है. अ, उ, क, ञ, य, ल, व, स और ह के रूपों में
नागरी से अधिक अंतर पड़ा है. बाक़ी के अक्षर नागरी से मिलते जुलते ही हैं. बंबई इहाते की
मराठी की प्रारंभिक पाठशालाओं में इसकी छपी हुई लिथो की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं. इसका
प्रचार महाराष्ट्र देश की कचहरियों में है और मराठी बोलनेवाले बहुधा पत्रव्यवहार या हिसाब में
इसे काम में लाते हैं. बंबई इहाते के बाहर के मरहटों के राज्यों में भी इसका कुछ कुछ प्रचार है.
राजपूताने में इस लिपि में खुदे हुए दो शिलालेख भी देखने में आये जो मरहटों के समय के
ही हैं.
लिपिपत्र ८० वां.
इस लिपिपत्र में तेलुगु, कनड़ी और ग्रंथ लिपियां दी गई हैं.
तेलुगु और कनड़ी लिपियां—ये दोनों लिपिपत्र ४३ से ५१ में दी हुई प्राचीन तेलुगु-कनड़ी
लिपि से निकली हैं. इनके अधिकतर अक्षर परस्पर मिलते जुलते ही हैं. केवल उ, ऊ, ऋ, क, त, स
और ह में अंतर है. इन दोनों लिपियों में 'ए' और 'ओ' के ह्रस्व तथा दीर्घ, दो दो भेद हैं.
नागरी लिपि में यह भेद न होने से हमने दीर्घ 'ए' और दीर्घ 'ओ' के लिये नागरी के 'ए' और
'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनका भेद बतलाया है. तेलुगु लिपि का प्रचार मद्रास इहाते
के पूर्वी समुद्रतट के हिस्से, हैदराबाद राज्य के पूर्वी तथा दक्षिणी हिस्सों एवं मध्यप्रदेश के सब से
दक्षिणी हिस्से में है. कनड़ी लिपि का प्रचार बहुधा सारे मैसोर राज्य, कुर्ग, नीलगिरि प्रदेश, माइ-
सोर के निकट के पश्चिमी घाट प्रदेश और बंबई इहाते के दक्षिणी कोने (बीजापुर, बेलगांव तथा
धारवाड़ जिलों और उत्तरी कनड़ा प्रदेश) में है. 'तेलुगु' नाम की उत्पत्ति संभवतः 'त्रिलिंग'
( त्रिलिंग, तिलिंगाना) देश के नाम पर से हो; और कनड़ी की कन्नड (प्राचीन 'कर्णाट')
देश के नाम से है.
ग्रंथ लिपि—दक्षिण के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि, जिसमें अक्षरों की न्यूनता के कारण
संस्कृत भाषा लिखी नहीं जा सकती, प्रचलित है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इस लिपि में लिखे जाते
हैं. इसीसे इसको ग्रंथ लिपि (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) कहते हैं. यह लिपि लिपिपत्र ५२ से
१ चिटणीस (चिटणवीस) =चिट्ठी नवीस, जैसे कि फडणीस (फडनवीस) =फर्द नवीस.
२ इं. ऐं.; जि. ३४, पृ. २७-८.

वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३३
५६ तक में दी हुई प्राचीन ग्रंथ लिपि से निकली है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसी लिपि में छपने लग
गये थे परंतु अब बहुधा नागरी में छपने लगे हैं.
लिपिपत्र ८१ वां.
इस लिपिपत्र में मलयाळम्, तुळु और तामिळ लिपियां दी गई हैं.
मलयाळम् लिपि—मलयाळम् अर्थात् केरल देश की लिपि होने से इसको मलयाळम् या केरल
लिपि कहते हैं. यह लिपि ग्रंथ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर घसीट रूप में
भी ग्रंथ लिपि से मिलते हुए हैं. इसका प्रचार दक्षिणी कन्नड़ा प्रदेश के दक्षिणी विभाग, सारे
मलबार और कोचीन एवं त्रावनकोर राज्य के अधिकतर हिस्से (त्रिचेंद्रम् से उत्तर के) में है.
तामिळ भाषा बोलनेवाले बहुधा संस्कृत पुस्तक लिखने में ग्रंथ लिपि की नांई इसका प्रयोग
करते हैं.
तुळु लिपि—ग्रंथ लिपि से निकली हुई मलयाळम् लिपि का ही यह किंचित् परिवर्तित रूप है.
इस लिपि का प्रचार दक्षिणी कन्नड़ा प्रदेश के तुळु भाषाभाषी लोगों में संस्कृत ग्रंथ लिखने में ही है.
तामिळ लिपि—यह लिपि लिपिपत्र ६०-६२ में दी हुई प्राचीन तामिळ लिपि से बनी है.
'तामिळ' शब्द की उत्पत्ति देश और जातिसूचक 'द्रमिळ' (द्रविड़) शब्द से हुई है. तामिळ
भाषा आर्य लोगों की संस्कृत भाषा से बिलकुल भिन्न है तो भी उसके अक्षर आर्य लिपियों से ही
लिये गये हैं (देखो, ऊपर पृ. ४४, ६५). इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ होने से संस्कृत भाषा इस
में लिखी नहीं जा सकती इसलिये संस्कृत शब्दों का जहां प्रयोग होता है वहां वे ग्रंथ लिपि में लिखे
जाते हैं. इसमें 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. ६१).
इसका प्रचार मद्रास इहाते के, मद्रास से कुछ ऊपर तक के, दक्षिणपूर्वी हिस्से अर्थात् उत्तरी आर्काट,
चिंग्लेपट, दक्षिणी आर्काट, सलेम्, कोईम्बाटोर, त्रिचिनापोली, तंजौर, मदुरा और तिन्नैवल्लि जिलों एवं
त्रावनकोर राज्य के दक्षिणी अंश (त्रिचेंद्रम् से नीचे नीचे) और पदुक्कोटा राज्य में है.
२२-भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति.
(लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक).
भारतवर्ष की नागरी, शारदा, बंगला, तेलुगु, कन्नड़ी, ग्रंथ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान
(उर्दू को छोड़ कर) लिपियों का मूल 'ब्राह्मी' लिपि है, परंतु ये लिपियां अपनी मूल लिपि से इतनी
भिन्न हो गई हैं कि जिनको प्राचीन लिपियों से परिचय नहीं है वे सहसा यह स्वीकार भी न करेंगे
कि ये सब लिपियां एक ही मूल लिपि से निकली हैं. लेखनप्रवाह सदा एक ही स्रोत में नहीं
बहता किंतु लेखकों की लेखनरुचि के अनुसार समय के साथ भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण करता रहता
है; इसीसे सब देशों की प्राचीन लिपियां पलटती रही हैं. हमारे यहां की भिन्न भिन्न लिपियां एक
ही मूल स्रोत की शाखा प्रशाखाएं हैं जिनके विकास के मुख्य कारण ये हैं—
(अ) अक्षरों को भिन्न भिन्न प्रकार से सुंदर बनाने का यत्न करना.

१३४ प्राचीनलिपिमला.
(आ) अक्षरों पर सिर की आड़ी लकीर लगाना.
(इ) कलम को उठाये बिना अक्षर को पूरा लिखना.
(ई) त्वरा से लिखना.
लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक में भारतवर्ष की ६ मुख्य लिपियों का
विकासक्रम बतलाया गया है जिसमें प्रत्येक अक्षर के जो रूपांतर दिये हैं उनमें से अधिकतर
लिपिपत्र १ से ६४ तक से ही लिये गये हैं.
लिपिपत्र ८२ वां.
इस लिपिपत्र में वर्तमान नागरी और शारदा (कश्मीरी) लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
नागरी लिपि की उत्पत्ति.
नागरी आदि जितनी लिपियों की उत्पत्ति लिपिपत्र ८२ से ८४ में दी है उनमें पहिले
वर्तमान लिपि का प्रत्येक अक्षर दे कर उसके बाद = चिह्न दिया है. उसके पीछे अशोक के समय से
लगा कर वर्तमान रूप बनने तक के सब रूपांतर दिये हैं. प्रत्येक रूप अनेक लेखादि में मिलता है
और प्रत्येक लेखादि का पता देने से विस्तार बहुत बढ़ जाता है अतएव केवल एक स्थल का पता
दिया जायगा.
अ—इसका पहिला रूप अशोक के गिरनार के पास के चट्टान के लेख (लिपिपत्र १) से लिया
गया है (बहुधा प्रत्येक लिपि के प्रत्येक अक्षर का पहिला रूप उसी लेख से लिया गया है इस लिये आगे
पहिले रूप का विवेचन केवल वहीं किया जायगा जहां वह रूप किसी दूसरे स्थल से लिया गया है).
दूसरा रूप मथुरा के लेखों (लिपिपत्र ६) से लिया है जिसमें 'अ' की बाईं ओर के नीचे के
अंश में दो बार कोण बनाये हैं. तीसरा रूप कोटा के लेख (लिपि पत्र २१) से है जिसमें 'अ' की
बाईं ओर के नीचे के अंश को अर्द्धवृत्त का सा रूप देकर मूल अक्षर से उसे विलग कर दिया है.
चौथा रूप देवल के लेख (लिपिपत्र २५) से और पांचवां चीरवा के लेख (लिपिपत्र २७) से लिया
गया है. छठा रूप वर्तमान नागरी है. (लिपिपत्र ८२ से ८४ तक में प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति
में अंतिम रूप वर्तमान अक्षर ही है इसलिये उसका भी आगे विवेचन न किया जायगा).
इस प्रकार प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति का विवेचन करने से विस्तार बढ़ जाता है इस लिये
आगे 'पहिला रूप', 'दूसरा रूप' आदि के लिये केवल उनकी संख्या के पहिले अक्षर 'प', 'दू'
आदि लिखे जायंगे और उनके आगे जिस लिपिपत्र या लेख से वह रूप लिया है उसका अंक
या नाम मात्र दिया जायगा और जहां बहुत ही आवश्यकता होगी वहीं विवेचन किया जायगा.
प्रत्येक रूप में क्या अंतर पड़ा यह उक्त रूपों को परस्पर मिला कर देखने से पाठकों को मालूम
हो जायगा.
अ—'अ' का यह रूप दक्षिण में लिखा जाता है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के 'अ'
के समान हैं; चौ. १८ (इसमें बाईं ओर का नीचे का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल गया
है); पां. चौथे का रूपांतर ही है.
इ—दू. १७ (जयनाथ का दानपत्र—इसमें ऊपर की बिंदी के स्थान में सिर की आड़ी
लकीर, और नीचे की दोनों बिंदियों को भीतर से खाली बनाया है); ती. २६; चौ. २७; पां. चौथे
के समान.

वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३५
उ-दू. ६; ती. में नीचे के अंत को अधिक मोड़ा है; चौ. १८.
ए-दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. १६ (महानामन् का लेख); चौ. १७ (करंडांडा
का लेख); पां. २५ (कूर्भशतक).
क-दू. कुशनवंशियों के लेखों से; ती. ८; चौ. १६; पां. २३.
ख-प. २ (खालसी); दू. ६; ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २६ (जाजल्लदेव का लेख).
ग-दू. और ती. ६; चौ. १६.
घ-दू. ८; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. २५ (उदेपुर का लेख); पां. २५ (उज्जैन
का लेख).
ङ-प. बुद्धगया के स्तंभ से; दू. १८ ('ङ्ग्शो' में); ती. २५ (उज्जैन का लेख).
च-दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख)
छ-दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. तीसरे से बना.
ज-दू. ७; ती. २१ (झालरापाटन का लेख); चौ. २५ (उज्जैन का लेख.)
झ-'झ' का यह रूप जैन शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र
का लेख); ती. २१ (कोटा का लेख).
झ-'झ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है. इसके पहिले तीन रूप
पूर्व के 'झ' के समान हैं. चौ. २६ (हस्तलिखित पुस्तकों से); पां. चौथे से बना.
ञ-दू. ८; ती. १६ ('ञ्ज' में) ट-दू. १६; ती. २१ (झालरापाटन का लेख).
ठ-प. २ (अशोक का देहली का लेख); दू. ती. २५ (उज्जैन का लेख).
ड-'ड' का यह रूप जैन शैली की नागरी में प्रचलित है. दू. ८; ती. १६; चौ. १८; पां.
चौथे से बना; छ. २७ (सूंधा के लेख की पंक्ति के अंत में).
ड-पहिले तीन रूप पूर्व के 'ड' के समान; चौ. २७.
ढ-नागरी लिपि की वर्णमाला में केवल यही अक्षर ऐसा है जो अपने मूल रूप में बना
रहा है. केवल सिर की आड़ी लकीर बढ़ी है.
ण-दू. ६; ती. दूसरे से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में 'ण' का चौथा रूप); चौ. १८; पां.
१६ (उष्णीषविजयधारणी).
ण-'ण' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है और नागरी के 'ण' के 'ए'
जैसे अंश को चलती क़लम से मिलवां लिखने से बना है.
त-दू. पहिले का रूपांतर (देखो, लिपिपत्र ४); ती. २७.
थ-दू. ती. १८; चौ. २५ (उज्जैन का लेख).
द-दू. ५ ('पभोसा का लेख); ती. ५ (शोडास का मथुरा का लेख); चौ. ६; पां. १८;
छ. १६ (उष्णीषविजयधारणी).
ध-दू. २०; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. २७ (ओरिशा का लेख).
न-दू. ६; ती. २०. प-दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६.
फ-दू. १८; ती. १७ (पाली का दानपत्र); चौ. सीयदॊनी के लेख से.
ब-दू. २०; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. १६; पां. चौलुक्य भीमदेव के दानपत्र से.
'व' और 'ब' में भेद न रहने से 'ब' को स्पष्ट बतलाने के लिये 'व' के भीतर बिंदी लगाई जाने
लगी जो पीछे से कुछ तिरछी लकीर के रूप में परिणत हो गई.

१३६ प्राचीनलिपिमाला.
भ—दू. ३ ( नानाघाट का लेख ); ती. ५ ( शोडास का लेख ); चौ. १६; पां. २६ ( जाजल्ल-
देव का लेख ).
भ—'भ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. पूर्व के 'भ' के
पांचवें रूप में बाईं ओर के अंश में ऊपर की तरफ़ ग्रंथि लगाने से यह बना है.
म—दू. ५ ( शोडास का लेख ); ती. १६; चो. १८ ('म्' में).
य—दू. १; ती. दूसरे रूप को चलती कलम से पूरा लिखने से बना ( देखो, लिपिपत्र ६
में मथुरा के लेखों के 'र्थ्य' और 'श्य' में ); चौ. १६ ( बुद्धगया का लेख ).
र—दू. १८; ती. २०; चौ. २३ ( जोधपुर का लेख ).
ल—दू. ६; ती २१ ( दुर्गगण का लेख ); चो. २१ ( ओसिआ का लेख ).
व—दू. ती. ५ ( मथुरा के चार जैन लेख ); चौ. २३; पां. २४.
श—प. २ ( अशोक का खालसी का लेख ); दू. ६; ती. १८; चौ. १६ ( उष्णीषविजयधारणी );
पां. २०.
ष—प. ३ ( घोसुंडी के लेख के 'र्षे' में ); दू. ६; ती. १८; चौ. तोरमाण के लेख से.
स—दू. ५ ( मथुरा के जैन लेख ); ती. १७ ( करंडांडा का लेख ); चौ. बिलसद के लेख से;
पां. १६ ( उष्णीषविजयधारणी ).
ह—दू. ५ ( शोडास का लेख ); ती. ८; चौ. अप्सद के लेख से; पां. २५ ( उज्जैन का लेख ).
ळ—दू. ७; ती. दूसरे का रूपांतर ( देखो लिपिपत्र ५० में चेन्नोलू के लेख का 'ळ' ).
क्ष—प. ७; दू. ८; ती. १६; चौ. १६ ( उष्णीषविजयधारणी ); पां. २७ ( चीरवा का लेख ).
ज्ञ—प. ८; दू. पहिले का रूपांतर ; ती. २१ ( ओसिआ का लेख ).
वर्तमान नागरी लिपि के ई, ॡ, ओ और औ ये चार अक्षर उनके मूल अक्षरों के रूपांतर
नहीं हैं. 'ई', 'इ' के ऊपर रेफ का सा चिह्न लगा कर१; 'ॡ', ल् के साथ ऋ की मात्रा जोड़
कर; 'ओ' और 'औ', 'अ' के साथ क्रमशः उक्त स्वरों की मात्राएं लगा कर, बनाये जाते हैं.
'ऊ' और 'ऐ' प्राचीन अक्षरों के रूपांतर ही हैं. 'ऋ' प्राचीन 'ऋ' के स्थानापन्न हो ऐसा
पाया जाता है ( देखो, लिपिपत्र १६ में दी हुई 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला
का 'ऋ' ). वर्तमान 'ओं' में जो 'ओ' का रूप ॐ लिखा जाता है वह प्राचीन 'औ' का
रूपांतर है ( देखो, लिपिपत्र १८, १६, २१ और ३५ में दिया हुआ 'औ' ), परंतु उज्जैन के
लेख के अंत की पूरी वर्णमाला ( लिपिपत्र २५ ) म 'ओ' का रूप वैसा ही दिया है जिससे
अनुमान होता है कि ई. स. की ११ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नागरी के लेखक 'ओ' के
स्थान में 'औ' के प्राचीन रूप का व्यवहार करने और 'औ' के लिये नया चिह्न लिखने लग
गये थे. 'झ' का वर्तमान नागरी रूप किसी प्राचीन रूप से नहीं बना, नवीन कल्पित है.
शारदा ( कश्मीरी ) लिपि की उत्पत्ति.
शारदा लिपि नागरी की बहिन होने से उसके उत्पत्तिक्रम में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के
रूपों में से कुछ ठीक वे ही हैं जो नागरी की उत्पत्ति में दिये हैं. इसलिये उन रूपों का वर्णन
१ नागरी में इस प्रकार के 'ई' की कल्पना का कुछ कुछ पता ई. स. की ६ ठी शताब्दी से लगता है. 'उष्णीषविजय-
धारणी' के अंत की वर्णमाला में 'इ' पर बिंदी ( लिपिपत्र १६ ) और राजा भोज के 'कूर्मशतक' में रेफ सा चिह्न
मिलता है ( लिपिपत्र २४ ).

वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३७
न कर बाकी का ही किया जायगा.
अ—चौ. तीसरे से बना (बाईं ओर का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल जाने से).
इ—दू. १८; ती. २४; चौ. तीसरे से बना (ऊपर की दोनों बिंदियों को चलती कलम से
लिखने से); पां. ३१ (अथर्ववेद).
ई—प. १० ('ई' से मिलता हुआ); दू १६ (आसीरगढ़ की मुद्रा); ती. ३० (बैजनाथ की
प्रशस्ति).
उ—नागरी के समान.
ए—ती. २८; चौ. ३१ (अथर्ववेद).
ओ—प. १; दू. ६; ती. दूसरे का रूपांतर; चौ. १७ (देखो, 'औ' में); पां. चौथे का
नीचे का अंश ऊपर की ओर अधिक बढ़ जाने से बना.
क—पां. २९. ख—चौ. २८. ग—नागरी के समान.
घ—ती. दूसरे से बना. ङ—दू. पहिले से बना. च—ती. चौ. २६.
छ—दू. ६. ज—ती. २८; चौ. २६. झ—चौ. तीसरे से बना; पां. ३१ (शाकुंतल).
ञ—ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे को चलती कलम से लिखने से नीचे गांठ बन गई.
ट—ती. २१ (दुर्गगण का लेख). ठ—मूल रूप में बना रहा.
ड—जैन शैली की नागरी के 'ङ' के समान.
ढ—दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. ३० (सोमवर्मन् का दानपत्र).
ण—चौ. २६. त—दू. ती. ८, चौ २८. थ—चौ. ३१. द—पां. १८.
ध—दू. ती. १६. न—नागरी के समान (प्रारंभ की ग्रंथि को छोड़ कर).
प—नागरी के समान. फ—दू. ३१ (शाकुंतल). ब—नागरी के समान.
भ—चौ. १८. म—नागरी के समान (सिररहित).
य, र, ल, व—चारों नागरी के समान. श—चौ तीसरे से बना.
ष—नागरी के समान. स—चौ. तीसरे से बना. ह—ती. दूसरे से बना.
वर्तमान शारदा लिपि के अक्षर अपने प्राचीन रूपों से नागरी की अपेक्षा अधिक मिलते
हुए हैं और उनमें पूरे स्वर वर्ण उनके प्राचीन चिह्नों से ही बने हैं.
लिपिपत्र ८३ वां.
इस लिपिपत्र में बंगला और कनड़ी लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
बंगला लिपि की उत्पत्ति.
बंगला लिपि प्राचीन नागरी की पुत्री है इस लिये उसकी उत्पत्ति में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के
भिन्न भिन्न रूपों में से कितने एक नागरी के उक्त रूपों से मिलते हैं अत एव उनको छोड़ कर
बाकी का ही विवेचन किया जायगा और जो अक्षर नागरी के समान हैं वा जिनके वर्तमान
रूप के पूर्व के सब रूप नागरी की उत्पत्ति में बतलाये हुए रूपों के सदृश हैं उनको भी
नागरी के समान कहेंगे.
अ—दक्षिणी शैली की नागरी के समान (मध्य की आड़ी लकीर तिरछी).
इ—पां. जैन शैली से. उ—नागरी के समान.
ए—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). ओ—चौ. १८.
क—पां. चौथे से बना.

१३८ प्राचीनलिपिमाला.
ख—ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्र से; पां. ३२
(देवपारा का लेख).
ग—ती. ६; चौ. ३२. घ—नागरी के समान. ङ—ती. १६ (उष्णीषविजय-
धारणी); चौ. ३५ (हस्राकोल का लेख).
च—ती. ३४. छ—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी). ज—नागरी के समान.
झ—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी); चौ. तीसरे का रूपांतर; पां. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र).
ञ—ती. ३५ (इस्राकोल का लेख). ट—ती. २३ (जोधपुर का लेख).
ठ—दू. १६ (उज्जैन का लेख). ड—नागरी के समान.
ढ—नागरी के समान. ण—पां. कन्हेरी के लेख से; छ. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र).
त—चौ. ३३ (तर्पंडिघी का दानपत्र); पां. ३४ (हस्तलिखित पुस्तकें).
थ—चौ. ३२. द—चौ. ३२. ध—नागरी के समान.
न—नागरी के समान. प—चौ. तीसरे से बना. फ—नागरी के समान.
ब—नागरी के समान. भ—ती. १८, चौ. २३ (जोधपुर के लेख के 'भू' में).
म—नागरी के समान. य—नागरी के समान.
र—ती. ३२ (देवपारा का लेख); चौ. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र). ल—नागरी के समान.
व—नागरी के समान. श—चौ. २५ (देवल का लेख); पां. ३२ (देवपारा का लेख).
ष—नागरी के समान. स—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). ह—नागरी के समान.
वर्तमान बंगला लिपि के स्वर मूल स्वरों से बने हैं; केवल 'ई' नागरी की नांई 'इ' से बना है.
कन्नड़ी लिपि की उत्पत्ति.
अ—दू. ४५; ती. ४७; चौ. ४६; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
इ—दू. ४० (कर्कराज का दानपत्र); ती. ४५ (पुलुकेशिन् का दानपत्र); चौ. ४५. (चेंड-
लूर का दानपत्र).
ई—प. ३६ (मंदसौर का लेख); दू. पहिले से बना; ती. ४७; चौ. ५० (अनंकोँडा का लेख).
ए—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १५; चौ. ४५ (चेंडलूर का दानपत्र); पां. ४८
(राजा अम्म का दानपत्र).
ओ—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ५०.
क—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपल); चौ. ४७; पां. ५०
(चेब्रोलू का लेख).
ख—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १३; चौ. ४७
ग—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४३ (उरुकुपल्लि का दानपत्र).
घ—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपत्र); चौ. ४५ (चेंडलूर
का दानपत्र); पां. ५० (अनंकोँडा का लेख).
ङ—दू. ४४ (काकुस्थवर्मन् के दानपत्र के 'ङ्गो' में); ती. दूसरे से बना.
च—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख), ती. ४६; चौ. ४८; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
छ—दू. ८; ती. ४०; चौ. ५० (चेब्रोलू का लेख).
ज—दू. ४३; ती. ४७; चौ. ४८ (राजा भीम का दानपत्र).
झ—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे से बना; पां. ५०.

वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३६
ज—दू. ७; ती. ४४ ( 'ज्ञा' में ) ; चौ. ४८ ( 'ज्ञा' में ).
ट—दू. ४५ ( बादामी का लेख ); ती. दूसरे से बना; चौ. ४८; पां. ५१ (दोनेपुंडी का दानपत्र ).
ठ—दू. ५१. ड—प. २ ( खालसी ); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५०.
ढ—दू. ती. ४७; चौ. ५०. ण—दू. १२; ती. ४५; चौ. ४८; पां. ४६.
त—दू. ६; ती. ४७; चौ. ४८. थ—दू. ४४ ( काकुस्थवर्मन् का दानपत्र ); ती. ४७.
द—प. २ ( जौगड़ ) ; दू. ७; ती. ४३ ( पिकिर का दानपत्र ); चौ. ४८; पां. ५०.
ध—दू. ६ ( गौतमीपुत्र शातकर्णी के लेख ) ; ती. १३ ; चौ. ४६; पां. ५०.
न—दू. ४३ ( उरुवुपल्लि का दानपत्र ) ; ती. ४५ ( चेंडलूर का दानपत्र ) ; चौ. ५०.
प—दू. ६ ( वासिष्ठीपुत्र के लेख) ; ती ४५ ; चौ. ५० ; पां. ५१ ( राजा गणदेव का दानपत्र ).
फ—दू. ८; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ५०.
ब—दू. ४३ ( विष्णुगोपवर्मन् का दानपत्र ) ; ती. ४३ ( सिंहवर्मन् का दानपत्र ); चौ. ४७.
भ—दू. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ) ; ती. ४८; चौ. ४६; पां. ५०.
म—दू. ६; ती. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ); चौ. ४६; पां. ५०.
य—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४५; पां. ४८. र—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ४८.
ल—दू. ८; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४८. व—दू. ६; ती. १३; चौ ४६; पां. ५०.
श—प. २ ( खालसी ) ; दू. ७; ती. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ) ; चौ ४५; पां. ५०.
ष—प. ३ ( घोसुंडी के 'र्षं' में ) ; दू. ४४; ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१.
स—दू. ४७; ती. ४८. ह—दू. ७; ती. ४३; चौ. ५०; पां. ५१.
ळ—प. ७; दू. ४७; ती. ५०; चौ. ५१ ( वनपल्ली का दानपत्र ).
वर्तमान कनड़ी लिपि का 'उ' प्राचीन 'उ' से नहीं बना किंतु 'अ' के साथ 'उ' की मात्रा जोड़ने
से बना है. उसी 'उ' से 'ऊ' बना है. 'ऋ' का कोई प्राचीन रूप नहीं मिलता. संभव है कि उष्णी-
षविजयधारणी के अंत की वर्णमाला के 'ऋ' जैसे ही अक्षर में विकार हो कर वह बना हो. 'ऐ' और
'औ' उनके प्राचीन रूपों से ही बने हैं. 'ऐ' लिपिपत्र ३८ के 'ऐ' से, और 'औ' लिपिपत्र ४३ और
५० में मिलनेवाले 'औ' से बना है १.
लिपिपत्र ८४ वां.
इस लिपिपत्र में ग्रंथ और तामिळ लिपियों की उत्पत्ति दी गई है.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो कनड़ी
लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं, इस लिये ऐसे रूपों को छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन
किया जायगा.
अ—ती. ५२ ( मामल्लपुरम् के लेख ); चौ. ५४ ( उदयेंदिरम् का दानपत्र ) ; पां. ५६.
इ—पां. ५३ ( नंदिवर्मन् का दानपत्र ).
१. वर्तमान तेलुगु लिपि कनड़ी से बहुत मिलती हुई है. जिन अक्षरों में विशेष अंतर है वे उ, ऋ, क, त, श और
ह हैं. इनमें से 'उ' उसके प्राचीन रूप से बना है (विकासक्रम के लिये देखो, क्रमशः लिपिपत्र ४४, ४७ और ५० में मिलने
वाले उक्त अक्षर के रूप). 'क' कनड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षर के पांचवें रूप की आड़ी लकीर और नीचे के वृत्त
को चलती कलम से कुछ अंतर के साथ लिखने से बना है. 'त' के बाईं ओर के अंत में ग्रंथि और लगा दी है. 'श' और
'ह' भी कनड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षरों के उपांत्य रूपों के विकार मात्र हैं.

५३ (मावलीपुरम् का लेख ); पां. चौथे से बना."
Wait, "चौ. ५३" - yes, dot after चौ.

Line 20:
"त—ती. ५२; चौ. ५६."

Line 21:
"थ—दू. ११ (कार्ली के लेख ); ती. ५२ (कांचीपुरम् का लेख ); चौ. ५२ (कूरम् का दानपत्र ):"
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It's a colon: : or semicolon ;? Looks like a colon :!

Line 22:
"पां. चौथे से बना."

Line 23:
"द—दू. ५२ (मामल्लपुरम् के लेख ); ती. ५३; चौ. ५६."

Line 24:
"ध—ती. ४३ (पिकिर का दानपत्र ); चौ. ५२ (कांचीपुरम् का लेख )."

Line 25:
"न—दू. १२ (जग्गयपेट के लेख ); ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र ); चौ. ५४ (पृथ्वीपति का"

Line 26:
"दानपत्र ); पां. ५६."

Line 27:
"प—ती. ५४. फ—ती. ५३; चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख )."

Line 28:
"ब—दू. १३; ती. ४५