प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ प्राचीनलिपिमाला.
ऊपर वर्णन की हुई अक्षरों से अंक सूचित करने की शैलियों के अतिरिक्त दक्षिण में मलबार
और तेलुगु प्रदेश में पुस्तकों के पत्रांक लिखने में एक और भी शैली प्रचलित थी जिसमें 'क' से 'ळ'
तक के अक्षरों से क्रमशः १ से ३४ तक के अंक, फिर 'बारखड़ी' (द्वादशाक्षरी) के क्रम से 'का' से
'ळा' तक 'आ' की मात्रासहित व्यंजनों से क्रमशः ३५ से ६८ तक, जिसके बाद 'कि' से 'ळि' तक
के 'इ' की मात्रासहित व्यंजनों से ६६ से १०२ तक के और उनके पीछे के अंक 'ई', 'उ' आदि
स्वरसहित व्यंजनों से प्रकट किये जाते थे¹. यह शैली शिलालेख और ताम्रपत्रादि में नहीं मिलती.
अक्षरों से अंक प्रकट करने की रीति आर्यभट (प्रथम) ने ही प्रचलित की हो ऐसा नहीं है
क्योंकि उससे बहुत पूर्व भी उसके प्रचार का कुछ कुछ पता लगता है. पाणिनि के सूत्र १. ३. ११ पर
के कात्यायन के वार्तिक और कैयट के दिये हुए उसके उदाहरण से पाया जाता है कि पाणिनि की
अष्टाध्यायी में अधिकार 'स्वरित' नामक वर्णात्मक चिह्नों से बतलाये गये थे और वे वर्ण पाण