प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
भूमिका.
प्राचीन काल में आर्य जाति विद्या और सभ्यता में सर्वोच्च पद पा चुकी थी और एशिया खंड
ही आर्यों की सभ्यता का मूल स्थान था जहांसे बहुधा दुनिया भर में धर्म, विद्या और सभ्यता का
प्रचार हुआ. एशिया में भारत, ईरान और असीरिआवाले तथा आफ्रिका में मिसरवाले बड़ी
उन्नत दशा को पहुंचे थे, परंतु परिवर्तनशील समय किसी को सर्वदा एक दशा में नहीं रहने देता.
अनेक राष्ट्रविप्लव होते होते ईरान, असीरिआ और मिसरवाले तो अपने प्राचीन साहित्य आदि के
उत्तराधिकारी न रहे परंतु भारतवर्ष के आर्य लोगों ने वैसी ही अनेक आपत्तियां सहने पर भी अपनी
प्राचीन सभ्यता के गौरवरूपी अपने प्राचीन साहित्य को बहुत कुछ बचा रक्खा और विद्या के संबंध में
सारे भूमंडल के लोग थोड़े बहुत उनके ऋणी हैं.
ऐसे प्राचीन गौरववाले भारतवर्ष का मुसलमानों के यहां आने के पहिले का शृंखलाबद्ध इतिहास,
जिसे आधुनिक काल के विद्वान् वास्तविक इतिहास कह सकें, नहीं मिलता. भारतवर्ष बड़ा ही
विस्तीर्ण देश है, जहां पर प्राचीन काल से ही एक ही राजा का राज्य नहीं रहा किंतु समय समय
पर अनेक स्वतंत्र राज्यों का उदय और अस्त होता रहा; विदेशियों के अनेक आक्रमणों से प्राचीन
नगर नष्ट होते और उनपर नये बसते गये और मुसलमानों के समय में तो राजपूताने के बड़े अंश को छोड़
कर भारतवर्ष के बहुधा सब हिंदू राज्य अस्त हो गये इतना ही नहीं किंतु बहुत से प्राचीन नगर,
मंदिर, मठ आदि धर्मस्थान तथा प्राचीन पुस्तकालय नष्ट कर दिये गये. ऐसी दशा में इस विशाल
देश के शृंखलाबद्ध प्राचीन इतिहास का मिलना सर्वथा असंभव है, परंतु यह निर्विवाद है कि यहां-
वाले इतिहास विद्या के प्रेमी अवश्य थे और समय समय पर इतिहास से संबंध रखनेवाले अनेक
ग्रंथ यहां लिखे गये थे. वैदिक साहित्य आर्यों की प्राचीन दशा का विस्तृत हाल प्रकट करता है.
रामायण में रघुवंश का और महाभारत में कुरुवंश का विस्तृत इतिहास एवं उस समय की इस देश
की दशा तथा लोगों के आचार विचार आदि का वर्णन मिलता है. मत्स्य, वायु, विष्णु और
भागवत आदि पुराणों में सूर्य और चंद्रवंशी राजाओं की प्राचीन काल से लगा कर भारत के युद्ध
के पीछे की कई शताब्दियों तक की वंशावलियां, कितने एक राजाओं का कुछ कुछ वृत्तांत एवं नंद,
मौर्य, शुंग, कण्व और आंध्रवंशी राजाओं की नामावलियां तथा प्रत्येक राजा के राज्यकाल के
वर्षों की संख्या तक मिलती है. आंध्रों के पीछे के समय में भी अनेक ऐतिहासिक पुस्तक लिखे गये
थे जिनमें से बाणभट्टरचित 'हर्षचरित'; वाक्पतिराज का 'गउडवहो'; पद्मगुप्त (परिमल) प्रणीत
'नवसाहसांकचरित'; बिल्हण का 'विक्रमांकदेवचरित'; संध्याकरनंदिरचित 'रामचरित'; कल्हण
तथा जोनराज की 'राजतरंगिणी'; हेमचंद्ररचित 'द्व्याश्रयकाव्य' तथा 'कुमारपालचरित'; जयानक
(जयरथ) का 'पृथ्वीराजविजय'; सोमेश्वर की 'कीर्तिकौमुदी'; अरिसिंहरचित 'सुकृतसंकीर्तन';
जयसिंहसूरि का 'हंमीरमदमर्दन'; मेरुतुंग का 'प्रबंधचिंतामणि'; राजशेखर का 'चतुर्विंशतिप्रबंध'; चंद्र-
प्रभसूरिप्रणीत 'प्रभावकचरित'; गंगादेवीविरचित 'कंपरायचरितम्' (मधुराविजयम्); जयसिंहसूरि, चारि-
त्रसुंदरगणि तथा जिनमंडनोपाध्याय के भिन्न भिन्न तीन 'कुमारपालचरित'; जिनहर्षगणि का 'वस्तुपाल-
चरित'; नयचंद्रसूरिप्रणीत 'हंभीरमहाकाव्य'; आनंदभट्ट का 'बल्लालचरित'; गंगाधर पंडितरचित
'मंडलीकमहाकाव्य'; राजनाथ का 'अच्युतराजाभ्युदयकाव्य'; तथा 'मूषकवंशम्' आदि कई ग्रंथ अब
तक मिल चुके हैं और नये मिलते जाते हैं. इनके अतिरिक्त हिंदी, गुजराती और तामिल आदि भाषाओं
में लिखे हुए कई ऐतिहासिक पुस्तक मिले हैं, परंतु ये सब पुस्तक भी इस विस्तीर्ण देश पर राज्य करनेवाले
अनेक राजवंशों में से थोड़ेसों का कुछ इतिहास प्रकट करते हैं. इनमें बड़ी त्रुटि यह है कि बहुधा
भूमिका.
संवतों का तो अभाव ही है, और वे शुद्ध इतिहास की दृष्टि से नहीं किंतु काव्यरूप में अतिशयोक्ति
से लिखे गये हैं.
बुद्ध के समय से इधर का इतिहास जानने के लिये धर्मबुद्धि से अनेक राजवंशियों और
धनाढ्य पुरुषों के बनवाये हुए बहुत से स्तूप, मंदिर, गुफा, तालाब, बावड़ी आदि पर लगाये हुए एवं
स्तंभों और मूर्तियों के आसनों पर खुदे हुए अनेक लेख, जो मुसलमानों से बचने पाये, तथा मंदिर
मठ आदि के अर्पण की हुई अथवा ब्राह्मणादि को दी हुई भूमि के दानपत्र एवं अनेक राजाओं के
सिक्के, जो सांप्रतकाल में सत्य इतिहास के मुख्य साधन माने जाते हैं, बहुतायत के साथ उपलब्ध
होने से उनके द्वारा बहुत कुछ प्राचीन इतिहास मालूम हो सकता था; परंतु उनकी ओर किसीने
दृष्टि न दी और समय के साथ लिपियों में परिवर्तन होते रहने से प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी
लोग भूल गये जिससे इतिहास के ये अमूल्य साधन हर एक प्रदेश में, कहीं अधिक कहीं कम, उप-
स्थित होने पर भी निरुपयोगी हो गये.
देहली के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुगलक ने अशोक के लेखवाले दो स्तंभ ला कर देहली में
खड़े करवाये. उनपर के लेखों का आशय जानने के लिये सुल्तान ने बहुत से विद्वानों को एकत्र
किया; परंतु वे उन लेखों को न पढ़ सके. ऐसा भी कहते हैं कि बादशाह अकबर को भी उन लेखों का आशय
जानने की बहुत कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान् ऐसा न था कि उनको पढ़ कर
बादशाह की जिज्ञासा पूर्ण कर सकता. प्राचीन लिपियों का पढ़ना भूल जाने के कारण जब कहीं ऐसा प्राचीन
लेख मिल जाता है कि जिसके अक्षर पढ़े नहीं जाते तो उसको देख कर लोग अनेक कल्पना करते
हैं. कोई उसके अक्षरों को देवताओं के अक्षर बतलाते हैं, कोई गड़े हुए धन का बीजक कहते और कोई
उसको सिद्धिदायक यंत्र बतलाते हैं. इस अज्ञान के कारण प्राचीन वस्तुओं की कुछ भी कद्र न रही
इतना ही नहीं किंतु टूटे हुए मंदिरों आदि के शिलालेख तोड़ फोड़ कर कहीं मामूली पत्थरों की तरह
चुनाई के काम में लाये गये; कहीं उनकी भंग, मसाला आदि पीसने की सिलाएं बनाई गईं; और कहीं
नये मंदिर, मकान आदि की सीढ़ियां, लघने आदि बनाने में भी वे काम में लाये गये जिसके अनेक
उदाहरण मिले हैं. कई प्राचीन ताम्रपत्र तांबे के भाव बेचे जा कर उनके बरतन बनाये गये. सोने
चांदी के असंख्य सिक्के गलाये जा कर उनके जेवर बने और अब तक बनते जाते हैं. तांबे के प्राचीन
सिक्के तो अब तक सालाना मनों गलाये जाते हैं.
विद्या की अवनति के साथ हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बची खुची सामग्री की यह
दशा हुई. प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तकों का मिलना भी सर्व साधारण के लिये कठिन हो गया जिस-
से प्रायः १७५ वर्ष ही पहिले तक इस देश के मुसलमानों के पूर्व के इतिहास की यह दशा थी कि विक्रम,
बापारावल, भोज, सिद्धराज जयसिंह, पृथ्वीराज, जयचंद, रावल समरसी ( समरसिंह ) आदि
प्रसिद्ध राजाओं के नाममात्र सुनने में आते थे परंतु यह कोई नहीं जानता था कि वे कब हुए और
उनके पहिले उन वंशों में कौन कौन से राजा हुए. भोज का चरित्र लिखनेवाले बल्लाल पंडित को
भी यह मालूम न था कि मुंज ( वाक्पतिराज ) सिंधुराज ( सिंधुल ) का बड़ा भाई था और उसके
मारे जाने पर सिंधुराज को राज्य मिला था, क्यों कि 'भोजप्रबन्ध' में सिंधुल (सिंधुराज ) के मरने
पर उसके छोटे भाई मुंज का राजा होना लिखा है. जब भोज का इतिहास लिखनेवाले को
भी भोज के वंश के इतिहास का सामान्य ज्ञान भी न था तब सर्व साधारण में ऐतिहासिक ज्ञान की
क्या अवस्था होनी चाहिये यह सहज ही अनुमान हो सकता है. ऐसी दशा में बड़वों ( भाटों ),
जागों आदि ने राजाओं की ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पूर्व की वंशावलियां गढ़ंत कर सैंकड़ों मन-
माने नाम उनमें दर्ज कर दिये और वे पुस्तक भी इतिहास के सच्चे साधन और अमूल्य समझे
जा कर बहुत गुप्त रक्खे जाने लगे.
भूमिका.
इस देश पर सर्कार अंग्रेज़ी का राज्य होने पर देश भर में फिर शांति का प्रचार हुआ, कल-
कत्ता सर्कार अंग्रेज़ी की राजधानी बना और विद्या का सूर्य, जो कई शताब्दियों से अस्त सा हो रहा
था, फिर उदय हुआ. पश्चिमी शैली से अंग्रेज़ी की पढ़ाई शुरू होने के साथ संस्कृत और देशी
भाषाओं की पढ़ाई भी होने लगी. कई अंग्रेज़ों ने केवल विद्यानुराग से संस्कृत पढ़ना शुरू किया
और सर विलियम जोन्स ने शाकुंतल नाटक का अंग्रेज़ी अनुवाद किया जिससे कविकुलगुरु कालि-
दास को यूरोप के सर्वोत्तम कवि शेक्सपियर का पद मिला इतना ही नहीं किंतु हिंदुओं का संस्कृत
साहित्य कितनी उच्च कोटि का है यह दुनिया को मालूम हुआ और क्रमशः यूरोप में भी संस्कृत का
पठनपाठन शुरू हुआ.
ई. स. १७८४ में सर विलियम जोन्स के यत्न से एशिया के इतिहास, शिल्प, साहित्य आदि
के शोध के लिये कलकत्ते में 'एशियाटिक सोसाइटी बंगाल' नाम का समाज स्थापित हुआ. तब से
ही भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की खोज का प्रारंभ हुआ मानना चाहिये. कई अंग्रेज़ और देशी
विद्वानों ने समाज का उद्देश सफल करने को लेख लिखे जो ई. स. १७८८ में 'एशियाटिक रिसर्चेस'
(एशियासंबंधी शोध) नामक ग्रंथमाला की पहिली जिल्द में प्रकाशित हुए और ई. स. १७९७
तक उक्त ग्रंथमाला की ५ जिल्दें प्रकट हुईं. ई. स. १७९८ में उनका नया संस्करण चोरी से
ही इंग्लैंड में छापा गया. उनकी मांग यहां तक बढ़ी कि पांच छः बरसों में ही उनके दो और
संस्करण छप गये और ऍम. ए. लॅबॉम् नामक विद्वान् ने 'रिसर्चेज् एशियाटिक्स' नाम से उनका फ्रेंच
अनुवाद भी छाप डाला जिसकी बहुत कुछ प्रशंसा हुई. ई. स. १८३९ तक उक्त ग्रंथमाला की २०
जिल्दें छप गईं फिर उसका छपना तो बंद हो गया परंतु ई. स. १८३२ से 'जर्नल ऑव् दी एशिया-
टिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल' नामक उक्त समाज का सामयिक पत्र निकलना प्रारंभ हुआ जो अब तक
साक्षर वर्ग की बड़ी सेवा कर रहा है.
इस प्रकार उक्त समाज के द्वारा एशिया के प्राचीन शोध की ओर यूरोप में भी विद्वानों का
ध्यान गया और ई. स. १८२३ के मार्च में लंदन नगर में उसी उद्देश से 'रॉयल एशियाटिक सोसा-
इटी' नामक समाज स्थापित हुआ और उसकी शाखाएं बंबई और सीलोन में भी स्थापित हुईं. ऐसे
ही समय समय पर फ्रान्स, जर्मनी, इटली आदि यूरोप के अन्य देशों तथा अमेरिका, जापान आदि
में भी एशियासंबंधी भिन्न भिन्न विषयों के शोध के लिये समाज स्थापित हुए जिनके जर्नलों (साम-
यिक पुस्तकों) में भारतवर्ष के प्राचीन शोधसंबंधी विषयों पर अनेक लेख प्रकट हुए और होते ही
जा रहे हैं. यूरोप के कई विद्वानों ने चीनी, तिब्बती, पाली, अरबी आदि भाषाएं पढ़ कर उनमें से
जो कुछ सामग्री भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालनेवाली थी वह एकत्रित कर बहुत
कुछ प्रकाशित की.
एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के द्वारा कार्य आरंभ होते ही कई विद्वान् अपनी अपनी रुचि
के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों के शोध में लगे. कितने एक विद्वानों ने यहां के ऐतिहासिक शोध में
लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र और सिक्कों का टटोलना शुरू किया. इस प्रकार भारतवर्ष की
प्राचीन लिपियों पर विद्वानों की दृष्टि पड़ी. भारतवर्ष जैसे विशाल देश में लेखनशैली के प्रवाह ने लेखकों
की भिन्न रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण किये थे जिससे प्राचीन ब्राह्मी लिपि से गुप्त, कुटिल,
नागरी, शारदा, बंगला, पश्चिमी, मध्यदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग तामिळ आदि अनेक लिपियां
निकलीं और समय समय पर उनके कई रूपांतर होते गये जिससे सारे देश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना
कठिन हो गया था; परंतु चार्ल्स विल्किन्स, पंडित राधाकांत शर्मा, कर्नल जेम्स टॉड के गुरु यति ज्ञान-
चंद्र, डॉक्टर बी. जी. बॅबिंगटन्, वॉल्टर इलिअट, डा. मिल, डब्ल्यू. ऐच. वॉथन, जेम्स प्रिन्सेप आदि
विद्वानों ने ब्राह्मी और उससे निकली हुई उपर्युक्त लिपियों को बड़े परिश्रम से पढ़ कर उनकी वर्ण-
२
मात्राओं का ज्ञान प्राप्त किया. इसी तरह जेम्स प्रिन्सेप, मि. नॉरिस तथा जनरल कनिंगहाम आदि
विद्वानों के श्रम से विदेशी खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला भी मालूम हो गई. इन सब विद्वानों का यत्न
प्रशंसनीय है परंतु जेम्स प्रिन्सेप का अगाध श्रम, जिससे अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का तथा
खरोष्ठी लिपि के कई अक्षरों का ज्ञान प्राप्त हुआ, विशेष प्रशंसा के योग्य है. (प्राचीन लिपियों के
पढ़े जाने के वृत्तान्त के लिये देखो, इस पुस्तक के पृष्ठ ३७-४१).
प्रारंभ में इस देश में प्राचीन शोध के संबंध में जो कुछ कार्य हुआ वह भिन्न भिन्न विद्वानों
और समाजों के द्वारा ही होता रहा. ई. स. १८४४ में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने सरकारी तौर से
भी इस कार्य का किया जाना आवश्यक समझ कर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में निवेदन किया
और ई. स. १८४७ में लॉर्ड हार्डिंज के प्रस्ताव पर ‘बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स' ने इस काम के लिये खर्च
की मंजूरी दी परंतु ई. स. १८६० तक उसका वास्तविक फल कुछ भी न हुआ. ई. स. १८६१ में
संयुक्त प्रदेश के चीफ़ इंजीनियर कर्नल ए. कनिंगहाम ने इस विषय की योजना तय्यार कर भारत के
गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग की सेवा में पेश की जो स्वीकृत हुई और सरकार की ओर से 'आर्कि-
ऑलॉजिकल सर्वे' नामक महकमा कायम हुआ तथा जनरल कनिंगहाम उसके अध्यक्ष नियत हुए.
सरकार के इस बड़े उपयोगी कार्य को हाथ में लेने से प्राचीन शोध के काम में बहुत कुछ उन्नति
हुई; जनरल कनिंगहाम ने उत्तरी और डॉ. जेम्स बर्जेस ने पश्चिमी व दक्षिणी भारत में
प्राचीन शोध का कार्य किया. इन दोनों विद्वानों ने कई उत्तम रिपोर्टें छाप कर बड़ी प्रतिष्ठा
प्राप्त की. ई. स. १८७२ से डॉ. बर्जेस ने 'इंडियन ऐंटिक्वेरी' नामक भारतीय प्राचीन शोध
का मासिक पत्र निकालना प्रारंभ किया जो अब तक चल रहा है और जिसमें प्राचीन शोध संबंधी
लेखों के अतिरिक्त अनेक शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्के छप चुके हैं. ई. स. १८७७ में गवर्नमेंट की
तरफ से जनरल कनिंगहाम ने उस समय तक मौर्य वंशी राजा अशोक के जितने शिलालेख मालूम
हुए थे उनका एक पुस्तक और ई. स. १८८८ में जे. एफ़. फ्लीट ने गुप्तों और उनके समकालीन राजा-
ओं के शिलालेखों तथा दानपत्रों का अनुपम ग्रंथ प्रकट किया. उसी वर्ष से आर्किऑलॉजिकल सर्वे के
महकमे से 'ऐपिग्राफ़िआ इंडिका' नामक त्रैमासिक पुस्तक का छपना प्रारंभ हुआ, जिसमें केवल शिला-
लेख और दानपत्र ही प्रकट होते हैं. इस समय इसकी १४ वीं जिल्द छप रही है. प्राचीन इतिहास
के लिये ये जिल्दें रत्नाकर के समान हैं. ऐसे ही उसी महकमे की ओर से ई. स. १८६० से 'साउथ
इंडियन इन्स्क्रिप्शनस' नामक पुस्तक का छपना भी प्रारंभ हुआ, जिसमें दक्षिण के संस्कृत, तामिळ
आदि भाषाओं के शिलालेख और दानपत्र छपते हैं और जिसकी ८ हिस्सों में ३ जिल्दें अब तक छप
चुकी हैं. ये भी बड़े महत्व की हैं.
प्राचीन विषयों के प्रेमी लॉर्ड कर्जन ने आर्किऑलॉकिल् विभाग को विशेष उन्नति दी और
डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्किऑलॉजी की अध्यक्षता में भारत के प्रत्येक विभाग के लिये अलग
अलग सुपरिंटेंडेंट नियत किये. तब से प्राचीन शोध के इस विभाग का कार्य विशेष उत्तमता से
चल रहा है और डाइरेक्टर जनरल एवं भिन्न भिन्न विभागों के सुपरिंटेंडेंटों की सालाना रिपोर्टों में
बहुतसे उपयोगी विषय भरे रहते हैं.
प्राचीन शोध के कार्य के संबंध में भिन्न भिन्न समाजों तथा सरकार ने प्राचीन शिलालेख,
दानपत्र, सिक्के, मुद्राएँ, प्राचीन मूर्तियां तथा शिल्प के उत्तम उत्तम नमूने आदि प्राचीन वस्तुओं का
संग्रह करना भी शुरू किया और ऐसी वस्तुओं के बड़े बड़े संग्रह बंबई (एशियाटिक सोसाइटी में),
कलकत्ता (इंडियन म्यूज़ियम और एशियाटिक सोसाइटी बंगाल में), मद्रास, नागपुर, अजमेर,
लाहौर, पेशावर, मथुरा, लखनऊ आदि के म्यूज़िमों (अजायबघरों) में संगृहीत हो चुके हैं और
[भूमिका.]
उनमें से कई एक की सूचियां भी छप गई हैं. जनरल कनिंगहाम ने अपने संग्रह के भारतीय
प्राचीन सिक्कों की चार जिल्दें १ और लंदन के ब्रिटिश म्यूज़िअम् ने अपने संग्रह की तीन २
जिल्दें छपवाईं. ऐसे ही पंजाब म्यूज़िअम् ( लाहोर ), इंडिअन म्यूज़िअम् आदि के संग्रहों के
सिक्कों की चित्रों सहित सूचियां छप चुकी हैं. इंडियन् ऐंटिक्वेरी, आर्किऑलॉजिकल सर्वे की भिन्न
भिन्न रिपोर्टों, एशियाटिक् सोसाइटियों के जर्नलों तथा कई स्वतंत्र पुस्तकों में भी कई सिक्के प्रकट
हुए हैं.
जब सर्कार अंग्रेज़ी की तरफ से प्राचीन शोध का प्रशंसनीय कार्य होने लगा तब कितने
एक विद्याप्रेमी देशी राज्यों ने भी अपने यहां प्राचीन शोधसंबंधी कार्यालय स्थापित किये. भाव-
नगर दरबार ने अपने पंडितों के द्वारा काठियावाड़, गुजरात और राजपूताना के अनेक शिलालेख
और दानपत्रों की नकलें तय्यार करवा कर उनमें से कई एक 'भावनगर प्राचीनशोधसंग्रह'
( भाग प्रथम ) और 'भावनगर इनस्क्रिप्शन्स' नामक पुस्तकों में प्रकट किये. काठियावाड़ के पोलि-
टिकल एजेंट कर्नल वॉटसन् का प्राचीन वस्तुओं का प्रेम देख कर काठियावाड़ के राजाओं ने मिल
कर राजकोट में 'वॉटसन् म्यूज़िअम्' स्थापित किया जिसमें कई प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों
और पुस्तकों आदि का अच्छा संग्रह है. माईसोर राज्य ने ऐसी वस्तुओं का संग्रह किया इतना ही
नहीं किंतु प्राचीन शोध के लिये आर्किऑलॉजिकल विभाग स्थापित कर अपने विस्तृत राज्य में
मिलनेवाले हज़ारों शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों को 'एपियाफ़िया कर्नाटिका' नामक ग्रंथमाला की
कई बड़ी बड़ी जिल्दों में प्रसिद्ध किया और ई. स. १८८५ से अपने प्राचीन शोध विभाग की सालाना
रिपोर्टें भी, जो बड़े महत्व की हैं, छपाना आरंभ किया. चंबा राज्य ने प्राचीन वस्तुओं का अच्छा संग्रह
किया जिसके प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों को प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. फोजल ने 'ऐंटिक्विटीज़
आफ़ दी चंबा स्टेट' नामक अमूल्य ग्रंथ में प्रसिद्ध कर प्राचीन लिपियों का अभ्यास करनेवालों के
लिये शारदा लिपि की बड़ी सामग्री एकत्रित कर दी. त्रावनकोर तथा हैदराबाद राज्यों ने भी अपने
यहां वैसा ही प्रशंसनीय कार्य प्रारंभ कर दिया है. उदयपुर (मेवाड़), झालावाड़, ग्वालियर,
धार, भोपाल, बड़ौदा, जूनागढ़, भावनगर आदि राज्यों में भी प्राचीन वस्तुओं के संग्रह हुए हैं और
होते जाते हैं.
इस प्रकार सर्कार अंग्रेज़ी की उदार सहायता, और एशियाटिक सोसाइटियों, देशी राज्यों, साधा-
रण गृहस्थों तथा विद्वानों के श्रम से हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बहुत कुछ सामग्री उपलब्ध हुई
है जिससे नंद, मौर्य, ग्रीक, शातकर्णी (आंध्रभृत्य), शक, पार्थिअन, कुशन, क्षत्रप, आभीर, गुप्त, हूण,
यौद्धेय, बैस, लिच्छिवि, परिव्राजक, राजर्षितुल्य, वाकाटक, मुखर (मौखरी), मैत्रक, गुहिल, चापो-
त्कट (चावड़े), चालुक्य (सोलंकी), प्रतिहार (पड़िहार), परमार, चाहमान (चौहान), राष्ट्रकूट
(राठौड़), कच्छपघात (कछवाहा), तोमर (तंवर), कलचुरि (हैहय), त्रैकूटक, चंद्रात्रेय (चंदेल),
यादव, गुर्जर, मिहिर, पाल, सेन, पल्लव, चोल, कदंब, शिलार, सेंद्रक, काकतीय, नाग, निकुंभ,
बाण, मत्स्य, शालंकायन, शैल, मूषक, चतुर्थवर्ण (रेड्डि) आदि अनेक राजवंशों का बहुत कुछ
वृत्तांत, उनकी वंशावलियां एवं कई एक राजाओं का निश्चित समय भी मालूम होता है इतना ही नहीं,
किंतु अनेक विद्वानों, धर्माचार्यों, धनाढ्यों, दानी, वीर आदि प्रसिद्ध पुरुषों के नाम, उनके वृत्तांत तथा समय
१. 'कॉइन्स ऑफ़ एन्श्यंट इंडिया'; 'कॉइन्स ऑफ़ मिडिएवल् इंडिया'; 'कॉइन्स ऑफ़ दी इंडोसीथियन्स'; और
'कॉइन्स ऑफ़ दी लेटर इंडोसीथियन्स'.
२. 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी ग्रीक ऐंड सीथिक् किंग्स ऑफ़ बाक्ट्रिया ऐंड इंडिया'; 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी आन्ध्र डाइ-
नेस्टी, दी वेस्टर्न क्षत्रप्स, दी त्रैकूटक डाइनेस्टी ऐंड दी बोधि डाइनेस्टी'; और 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी गुप्त डाइनेस्टीज़'.
आदि का पता चलता है. ऐसे ही भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों में चलनेवाले भिन्न भिन्न संवतों के प्रारंभ
का निश्चय होता है. इसी तरह प्राचीन काल के देशों, ज़िलों, नगरों, गांवों आदि भूगोल से संबंध रखने-
वाले नामों तथा उनके वर्तमान स्थलों का ज्ञान हो सकता है. प्राचीन शोध के संबंध में जो कुछ कार्य अब तक
हुआ है वह बड़े महत्त्व का है तो भी यह कहना अनुचित न होगा कि वह अब तक प्रारंभिक दशा में है और
इस विशाल देश के किमी किमी अंश में ही हुआ है. आगे के लिये इतना विस्तीर्ण क्षेत्र बिना
टटोला हुआ पड़ा है कि सैकड़ों विद्वान् बहुत वर्षों तक लगे रहें तो भी उसकी समाप्ति होना कठिन है.
हमारे यहां प्राचीन शोध का कार्य बहुत ही आवश्यक है और जितने अधिक विद्वान् उधर
प्रवृत्त हों उतना ही अधिक लाभकारी होगा परंतु अभी तक उसमें बहुत ही कम विद्वानों की रुचि
प्रवृत्त हुई है. इसका मुख्य कारण यही है कि तत्संबंधी साहित्य इतने भिन्न भिन्न पुस्तकों में बिखरा
हुआ है कि बंबई, कलकत्ता जैसे बड़े शहरों को, जहां पर उत्तम पुस्तकालय हैं, छोड़ कर अन्यत्र उन
सब पुस्तकों का दर्शन होना भी कठिन है.
ई. स. १८६३ तक कोई ऐसा पुस्तक नहीं बना था कि केवल उस एक ही पुस्तक की सहायता
से हिमालय से कन्याकुमारी तक और द्वारिका से उड़ीसे तक की समस्त प्राचीन लिपियों का पढ़ना
कोई भी विद्वान् आसानी के साथ सीख सके. इस अभाव को मिटाने के लिये मैंने ई. स. १८६४
में 'प्राचीन लिपिमाला' नामक छोटासा पुस्तक प्रकट किया, जिसको यहां के और यूरोप के विद्वानों
ने उपयोगी बतलाया इतना ही नहीं किंतु उसको इस विषय का प्रथम पुस्तक प्रकट कर उसका आदर
किया. उस समय तक इस विषय का कोई पाठ्य पुस्तक न होने के कारण विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं
में प्राचीन लिपियों को स्थान नहीं मिला था परंतु उक्त पुस्तक के प्रसिद्ध होने के पीछे प्राचीन लिपियों
का विषय विश्वविद्यालयों की एम. ए. की पढ़ाई में रक्खा गया और कलकत्ता युनिवर्सिटी ने इस
पुस्तक को उक्त विषय का पाठ्य पुस्तक स्थिर किया. ऐसे ही अन्य युनिवर्सिटियों के विद्यार्थी लोग
भी अपनी पढ़ाई में उक्त पुस्तक का सहारा लेने लगे. कई देशी एवं यूरोपियन् विद्वानों ने उससे
भारतीय प्राचीन लिपियों का पढ़ना सुगमता के साथ सीखा. थोड़े ही बरसों में उसकी सब प्रतियां
उठ गईं इतना ही नहीं, किंतु उसकी मांग यहां तक बढ़ी कि बीस गुना मूल्य देने पर भी उसका
मिलना कठिन हो गया. इसपर मेरे कई एक विद्वान् मित्रों ने उसका नवीन संस्करण छपवाने
का आग्रह किया; परंतु गत २५ वर्षों में प्राचीन शोध में बहुत कुछ उन्नति हुई जिससे उसीको
दुबारा छपवाना ठीक न समझ कर मैंने अब तक के शोध के साथ यह विस्तृत नवीन संस्करण
तय्यार किया है जो प्रथम संस्करण से करीब तिगुने से भी अधिक बढ़ गया है. इसमें पहिले
संस्करण से बहुत अधिक शिलालेखों, दानपत्रों और सिक्कों से वर्णमालाएं बनाई गई हैं और वे लिपियों
के विकासक्रम के अनुसार जमाई गई हैं जिससे गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा ( कश्मीरी ), बंगला,
पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग, तामिळ आदि लिपियों का एक ही सामान्य लिपि ब्राह्मी
से क्रमशः विकास कैसे हुआ एवं भारतवर्ष की सब वर्तमान आर्य लिपियों की उत्पत्ति कैसे हुई यह
आसानी से मालूम हो सकता है.
इस बड़े ग्रंथ को देख कर कोई विद्वान् यह शंका न करें कि इतनी बहुत लिपियों का ज्ञान
संपादन कर भारत के प्राचीन लेखादि का पढ़ना बहुत ही कठिन है, क्योंकि वास्तव में यह बात नहीं है
केवल एक प्रारंभ की ब्राह्मी लिपि को समझते ही आगे के लिये मार्ग बहुत ही सुगम हो जाता है जिस
का कारण यही है कि आगे की लिपियों में बहुत ही थोड़ा थोड़ा अंतर पड़ता जाता है जिससे उनके
सीखने में अधिक श्रम नहीं पड़ता. मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि संस्कृतज्ञ विद्वान् छः
मास से भी कम समय में इस पुस्तक के सहारे प्राचीन लिपियों के पढ़ने का ज्ञान अच्छी तरह
भूमिका.
संपादन कर सकता है. मेरे पास आकर पढ़नेवालों में से एक विद्वान् ने तो उससे भी थोड़े समय में
अच्छी तरह पढ़ना सीख लिया.
मनुष्य की बुद्धि के सब से बड़े महत्त्व के दो कार्य भारतीय ब्राह्मी लिपि और वर्तमान शैली
के अंकों की कल्पना हैं. इस बीसवीं शताब्दी में भी हम संसार की बड़ी उन्नतिशील जातियों की
लिपियों की तरफ़ देखते हैं तो उनमें उन्नति की गंध भी नहीं पाई जाती. कहीं तो ध्वनि और उसके
सूचक चिह्नों (अक्षरों) में साम्य ही नहीं है जिससे एक ही चिह्न से एक से अधिक ध्वनियां प्रकट
होती हैं और कहीं एक ही ध्वनि के लिये एक से अधिक चिह्नों का व्यवहार होता है और अक्षरों
के लिये कोई शास्त्रीय क्रम ही नहीं. कहीं लिपि वर्णात्मक नहीं किंतु चित्रात्मक ही है. ये लिपियां
मनुष्य जाति के ज्ञान की प्रारंभिक दशा की निर्माण स्थिति से अब तक कुछ भी आगे नहीं बढ़
सकीं परंतु भारतवर्ष की लिपि हजारों वर्षों पहिले भी इतनी उच्च कोटि को पहुंच गई थी कि उस-
की उत्तमता की कुछ भी समानता संसार भर की कोई दूसरी लिपि अब तक नहीं कर सकती. इसमें
ध्वनि और लिखितवर्ण का संबंध ठीक वैसा ही है जैसा कि फोनोग्राफ की ध्वनि और उसकी
चूड़ियों पर के चिह्नों के बीच है. इसमें प्रत्येक आर्य ध्वनि के लिये अलग अलग चिह्न होने से जैसा
बोला जावे वैसा ही लिखा जाता है और जैसा लिखा जावे वैसा ही पढ़ा जाता है तथा वर्णक्रम वैज्ञा-
निक रीति से स्थिर किया गया है. यह उत्तमता किसी अन्य लिपि में नहीं है. ऐसे ही प्राचीन
काल में संसार भर की अंक विद्या भी प्रारंभिक दशा में थी. कहीं अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों
के लिये काम में लाते थे, तो कहीं इकाई के १ से ६ तक के ६ चिह्न, एवं दहाइयों के १० से ६० तक के
६, और सैकड़ा, हज़ार आदि के भिन्न भिन्न चिह्न थे. उन २० चिह्नों से केवल एक लाख के नीचे
की ही संख्या प्रकट होती थी और प्रत्येक चिह्न अपनी नियत संख्या ही प्रकट कर सकता था. भार-
तवर्ष में भी अंकों का प्राचीन क्रम यही था परंतु इस जटिल अंकक्रम से गणित विद्या में विशिषे
उन्नति नहीं हो सकती थी जिससे यहांवालों ने ही वर्तमान अंकक्रम निकाला जिसमें १ से ९ तक
के नव अंक और खाली स्थानसूचक शून्य इन दस चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चल सकता
है. भारतवर्ष से ही यह अंकक्रम संसार भर ने सीखा और वर्तमान समय में गणित और
उससे संबंध रखनेवाले अन्य शास्त्रों में जो उन्नति हुई है वह इसी क्रम के कारण से ही है.
इन्हीं दोनों बातों से प्राचीन काल के भारतीय आर्य लोगों की बुद्धि और विद्यासंबंधी उन्नत दशा का
अनुमान होता है. इन्हीं दोनों विषयों एवं उनके समय समय के भिन्न भिन्न रूपोंतरों के संबंध का
यह पुस्तक है.
हिंदी भाषा में इस पुस्तक के लिखे जाने के दो कारण हैं. प्रथम तो यह कि हमारे यहां के
केवल संस्कृत जाननेवाले बड़े बड़े पंडितों को जब कोई १००० वर्ष से अधिक प्राचीन शिलालेख,
दानपत्र, सिक्का या पुस्तक मिल जाता है तो वे जिस भाषा में वह लिखा गया हो उसके विद्वान् होने
पर भी उसको पढ़ नहीं सकते जिससे उसकी लिपि को तिरुंगी या कनड़ी आदि कह कर टाल जाते
हैं और उसका आशय जान नहीं सकते. यह थोड़े खेद की बात नहीं है. यदि वे इस पुस्तक के सहारे
थोड़े से श्रम से सारे भारतवर्ष की नहीं तो अपने प्रदेश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी सीख जावें
तो उनकी विद्वत्ता के लिये सोने के साथ सुगंधि हो जाय और हमारे यहां के प्राचीन शोध को सहा-
यता भी मिले. जिन विद्यापीठों में केवल संस्कृत की पढ़ाई होती है वहां की उच्च श्रेणियों में यदि
यह पुस्तक पढ़ाया जावे तो संस्कृतज्ञ विद्वानों में जो इतिहास के ज्ञान की त्रुटि पाई जाती है उसकी
कुछ पूर्ति हो जायगी. हिंदी न जाननेवाले जो विद्वान् प्राचीन शोध में अनुराग दिखाते हैं वे संस्कृत
तो पढ़े ही होते हैं और देवनागरी लिपि से भी भली भांति परिचित होते हैं. भले ही वे इस पुस्तक
. अंत में खरोष्ठी लिपि दी गई है. १ से
- In image: "की समस्त वर्तमान (उर्दू के अतिरिक्त) लिपियां निकली हैं. अंत में खरोष्ठी लिपि दी गई है. १ से" - perfect.
Line 11:
७० तक के लिपिपत्रों के बनाने में क्रम ऐसा रक्खा गया है कि प्रथम स्वर, फिर व्यंजन, उसके
- In image: "७० तक के लिपिपत्रों के बनाने में क्रम ऐसा रक्खा गया है कि प्रथम स्वर, फिर व्यंजन, उसके" - perfect.
Line 12:
पीछे क्रम से हलंत व्यंजन, स्वरमिलित व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के
- In image: "पीछे क्रम से हलंत व्यंजन, स्वरमिलित व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के" - perfect.
Line 13:
चिह्नों सहित व्यंजन और अंत में 'ॐ' का सांकेतिक चिह्न (यदि हो तो) दिया गया है. १ से
- In image: "चिह्नों सहित व्यंजन और अंत में 'ॐ' का सांकेतिक चिह्न (यदि हो तो) दिया गया है. १ से" - perfect.
Line 14:
५६ तक और ६५ से ७० तक के लिपिपत्रों में से प्रत्येक के अंत में अभ्यास के लिये कुछ पंक्तियां
- In image: "५६ तक और ६५ से ७० तक के लिपिपत्रों में से प्रत्येक के अंत में अभ्यास के लिये कुछ पंक्तियां
भूमिका.
टिप्पणों में दिये हुए संस्कृत के अवतरणों को हिंदी से भिन्न बतलाने के लिये बारीक टाइप
में छापना आरंभ किया था परंतु टाइप कमज़ोर होने के कारण छपते समय कई अक्षरों के साथ
की मात्राएं, और विशेष कर 'उ' की मात्राएं, टूट गईं जिससे परिशिष्ट में ऐसे अवतरणों के
लिये पहिले से भिन्न टाइप काम में लाना पड़ा है.
इस प्रकार के पुस्तक की रचना के लिये बहुत अधिक सामग्री एकत्र करने की आवश्यकता
पड़ी. इस कार्य में मेरे कई एक विद्वान् मित्रों ने मेरी सहायता की है जिसके लिये मैं उनका उपकार
मानता हूं. उनमें से मुंशी हरबिलास सारडा बी. ए., जज, स्माल काज़ेज़ कोर्ट, अजमेर; प्रसिद्ध
इतिहासवेत्ता मुंशी देवीप्रसादजी जोधपुरवाले, और बाबू पूर्णचंद्र नाहर एम. ए., बी. एल., कलकत्ता,
विशेष धन्यवांद के पात्र हैं.
इस पुस्तक के संबंध में मेरे विद्वान् मित्र पंडित चंद्रधरशर्मा गुलेरी, बी. ए., हेड पंडित, मेयो
कॉलेज, अजमेर, ने बड़ी सहायता की है जिसके लिये मैं उनका विशेष रूप से अनुगृहीत हूं.
जिन विद्वानों के लेख और ग्रंथों से मैने सहायता ली है उनके नाम यथास्थान दिये गये हैं. उन
सब का भी मैं ऋणी हूं. पंडित जीयालालशर्मा ने लिपिपत्र बनाने और मि. जे. इंगलिस, मॅनेजर,
स्कॉटिश मिशन प्रेस, अजमेर, ने इस पुस्तक को उत्तमता से छापने में बड़ा परिश्रम उठाया है इस
लिये मैं उनको भी धन्यवाद देना अपना कर्तव्य समझता हूं.
राजपूताना म्यूज़िअम्, अजमेर, |
वि. सं. १६७५ श्रावण शुक्ला ६, | गौरीशंकर हीराचंद ओझा.
ता. १३ ऑगस्ट ई. स. १६१८. |
नवीन शैली के अंक ... ... ... ११५-११६शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली ... ... ... ११६-१२१अक्षरों से अंक बतलाने की भारतीय शैली ... ... ... १२१-१२४खरोष्ठी लिपि के अंक ... ... ... १२५-१२६(wait, is it १२५ or १२८? It represents 125-126).भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियां ... ... ... १२६-१३३भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति ... ... ... १३३-१४१वर्तमान नागरी अंकों की उत्पत्ति ... ... ... १४१-१४२लेखन सामग्री ... ... ... १४२-१५८परिशिष्ट ( भारतीय संवत् ) ... ... ... १५६-१८६(or १५६-१९६)सप्तर्षि संवत् ( लौकिक संवत् ) ... ... ... १५६-१६१(Wait, looks like१५६-१६१or१५८-१६१)कलियुग संवत् ... ... ... -१६१-१६३वीरनिर्वाण संवत् ... ... ... १६३
: सूचीपत्र.
लक्ष्मणसेन संवत् ... ... ... ... ... १८८—१८६
पुड्डुवैप्पु संवत् ... ... ... ... १८६
राज्याभिषेक संवत् ... ... ... ...१८६—१८७
बार्हस्पत्य संवत्सर ( १२ वर्ष का ) ... ... ... १८७
बार्हस्पत्य संवत्सर ( ६० वर्ष का ) ... ... ... १८७—१८६
ग्रहपरिवृत्ति संवत्सर ... ... ... ... ... १८६
सौर वर्ष ... ... ... ... ... १८६
चांद्रवर्ष ... ... ... ... ...१८६—१६०
हिजरी सन् ... ... ... ... ... १६०—१६१
शाहूर (अरबी, सूर) सन् ... ... ... ... १६१
फसली सन् ... ... ... ... ... १६२
विलायती सन् ... ... ... ... ... १६२
अमली सन् ... ... ... ... ... १६२
बंगाली सन् ... ... ... ... ... १६२—१६३
मगि सन् ... ... ... ... ... १६३
इलाही सन् ... ... ... ... ... १६३—१६४
ईसवी सन् ... ... ... ... ... १६४—१६५
परिशिष्ट में दिये हुए भिन्न भिन्न संवतों का ईसवी सन् से संबंध ... १६६
लिपिपत्र १-८४
(ब्राह्मी लिपि—लिपिपत्र १-१५).
लिपिपत्र पहिला—मौर्यवंशी राजा अशोक के गिरनार के चट्टान पर के लेख से.
,, दूसरा—मौर्यवंशी राजा अशोक के अन्य लेखों से.
,, तीसरा—रामगढ़, घोसुंडी, बेसनगर आदि के लेखों से.
,, चौथा—भट्टिप्रोलु के स्तूप के १० लेखों से.
,, पांचवां—पभोसा और मथुरा के लेखों से.
,, छठा—कुशन वंशी राजाओं के समय के मथुरा, सारनाथ आदि के लेखों से.
,, सातवां—शक उषवदात और उसकी स्त्री दत्तमित्रा के नासिक के ५ लेखों से.
,, आठवां—क्षत्रपवंशी राजा रुद्रदामन् के गिरनार के चट्टान के लेख से.
,, नवां—सातवाहन (आंध्र) वंशी राजाओं के नासिक के लेखों से.
,, १० वां—पश्चिमी क्षत्रप, त्रैकूटक और आंध्रवंशी राजाओं के सिक्कों से.
,, ११ वां—दक्षिण की भिन्न भिन्न गुफाओं के लेखों से.
,, १२ वां—अमरावती और जग्गयपेट के लेखों से.
,, १३ वां—मोयिडवोलु से मिले हुए पल्लववंशी शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र से.
,, १४ वां—कौंडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र से.
,, १५ वां—हीरहडगल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र से.
(गुप्त लिपि—लिपिपत्र १६-१७).
,, १६ वां—गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के इलाहाबाद के स्तंभ के लेख से.
,, १७ वां—गुप्तों के समय के भिन्न भिन्न लेख और दानपत्रों से.
(कुटिल लिपि—लिपिपत्र १८-२३).
,, १८ वां—राजा यशोधर्मन् के समय के मंदसोर के लेख से.
,, १६ वां—प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों तथा लेखादि से.
𑁋
सूचीपत्र
लिपिपत्र २० वां—मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय के लेख से.
" २१ वां—राजा हर्ष के दानपत्र तथा राजा अंशुवर्मन्, दुर्गगण आदि के लेखों से.
" २२ वां—चंबा के राजा मेरुवर्मन् के ५ लेखों से.
" २३ वां—प्रतिहारवंशी राजा नागभट, बाउक और कक्कुका के लेखों से.
(नागरी लिपि—लिपिपत्र २४-२७).
" २४ वां—जाईकदेव के दानपत्र, विजयपाल के लेख और हस्तलिखित पुस्तकों से.
" २५ वां—देवल, धार, उदयपुर (ग्वालियर) और उज्जैन के लेखों से.
" २६ वां—चंद्रदेव के दानपत्र, हस्तलिखित पुस्तक और जाजल्लदेव के लेख से.
" २७ वां—परमार धारावर्ष, चाहमान चाचिगदेव और गुहिल समरसिंह के समय लेखों से.
(शारदा लिपि—लिपिपत्र २८-३१).
" २८ वां—सराहां से मिली हुई सात्यकि के समय की प्रशस्ति से.
" २९ वां—सुंगल से मिले हुए राजा विदग्ध के दानपत्र से.
" ३० वां—भिन्न भिन्न दानपत्रों और शिलालेखों से.
" ३१ वां—कुलु के राजा बहादुरसिंह के दानपत्र और हस्तलिखित पुस्तकों से.
(बंगला लिपि—लिपिपत्र ३२-३५).
" ३२ वां—बंगाल के राजा नारायणपाल और विजयसेन के समय के लेखों से.
" ३३ वां—बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्रों से.
" ३४ वां—बल्लालेंद्र के दानपत्र और हस्तलिखित पुस्तकों से.
" ३५ वां—हन्नाकोल के लेख और पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र से.
(पश्चिमी लिपि—लिपिपत्र ३६-४०).
" ३६ वां—राजा नरवर्मन और कुमारगुप्त के समय के मंदसोर के लेखों से.
" ३७ वां—धरुनी के राजा ध्रुवसेन और धरसेन (दूसरे) के दानपत्रों से.
" ३८ वां—गहलक सिंहादित्य और वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के दानपत्रों से.
" ३९ वां—त्रैकूटकवंशी दईसेन और गुर्जरवंशी रणग्रह तथा दद्द (दूसरे) के दानपत्रों से.
" ४० वां—चालुक्य युवराज श्रयाश्रय (शीलादित्य) और राष्ट्रकूट कर्कराज के दानपत्रों से.
(मध्यप्रदेशी लिपि—लिपिपत्र ४१-४२).
" ४१ वां—वाकाटकवंशी राजा प्रवरसेन (दूसरे) के तीन दानपत्रों से.
" ४२ वां—पृथिवीसेन, महासुदेव और तिविरदेव के दानपत्रों से.
(तेलुगु-कनड़ी लिपि—लिपिपत्र ४३-५१).
" ४३ वां—पल्लववंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् और सिंहवर्मन् के दानपत्रों से.
" ४४ वां—कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन् और काकुस्थवर्मन् क दानपत्रों से.
" ४५ वां—चालुक्यवंशी राजाओं के लेख और दानपत्रों से.
" ४६ वां—केंदूर से मिले हुए चालुक्यवंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के दानपत्र से.
" ४७ वां—कडब से मिले हुए राष्ट्रकूटवंशी राजा प्रभूतवर्ष (गोविंदराज तीसरे) के दानपत्र से.
" ४८ वां—पूर्वी चालुक्यवंशी राजा भीम (दूसरे) और अम्म (दूसरे) के दानपत्रों से.
" ४९ वां—कोरमंगिल से मिले हुए पूर्वी चालुक्यवंशी राजराज के दानपत्र से.
" ५० वां—काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव और गणपति के समय के लेखों से.
" ५१ वां—नामय नायक, अलवेम और गणादेव के दानपत्रों से.
१५
या ... wait, उड़िया!
"उड़िया, गुजराती और मोडी ( मराठी ) लिपियां."
- Let's check line 44:
१२ (page number at the bottom center).
- Format output:
Prefix each line with,, etc. Clean line-by-line transcription.सूचीपत्र
( ग्रंथ लिपि—लिपिपत्र ५२-५६ )
लिपिपत्र ५२ वां—पल्लववंशी राजाओं के समय के १० लेखों और कूरम के दानपत्र से.
,, ५३ वां—पल्लव और पांड्यवंशी राजाओं के समय के लेख और दानपत्रों से.
,, ५४ वां—पल्लववंशी नन्दिवर्मन ( पल्लवमल्ल ) और गंगवंशी पृथ्वीपति ( दूसरे ) के दानपत्रों से
,, ५५ वां—कुलोत्तुंगचोड और विक्रमचोड के लेखों तथा बाणवंशी विक्रमादित्य के दानपत्र से
,, ५६ वां—पांड्यवंशो सुंदरपांड्य के लेख और यादव विरुपाक्ष तथा गिरिभूपाल के दानपत्रों से.
( कलिंग लिपि—लिपिपत्र ५७-५९).
,, ५७ वां—कलिंग नगर के
पुस्तकों के संक्षिप्त नामसंकेतों का परिचय.
—————
आ. स; . . . .
आ. स. इं; . . . } ... 'आर्किऑलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया' की सालाना रिपोर्टें; ई. स. १९०२-३ से.
आ. स. रि; . . /
आ. स. उवे. इं; .
आ. स. वे. इं; . . } ... आर्किऑलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया.
आ. स. स. इं; . ... आर्किऑलॉजिकल सर्वे ऑफ़ सदर्न इंडिया.
इ; हि; इं; . . ... इलियट् अनुगादित 'हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया.'
इं. पँ; . . . ... इंडियन एंटिक्वेरी.
इं; मॅ; . . . ... इंडिका ऑफ़ मेगेस्थिनीज़.
ए. इं; . . .
ऍ. इं; . . . } ... एपिग्राफ़िया इंडिका.
ए. ब्रि; . . .
ए. सा. ब्रि; . . } ... एन्साइक्लोपीडिआ ब्रिटानिका.
ए. रि; . . . ... एशियाटिक रिसर्चेज़.
ऍ. ऑ; . . ... ऍनेक्डोटा ऑक्सोनिएन्शिया (आर्यन सीरीज़).
क; आ. स. इं. रि;
क; आ. स. रि; . . } ... कनिंगहाम की 'आर्किऑलॉजिकल सर्वे' की रिपोर्टें.
क; ईं; ईं; . . ... कनिंगहाम रचित इंडिअन् ईराज़.
क; कॉ. प. इं; . ... कनिंगहाम संगृहीत 'कॉइन्स ऑफ़ एन्श्यंट इंडिया'.
क; कॉ. मि. ई; . ... कनिंगहाम संगृहीत 'कॉइन्स ऑफ़ मिडिएवलू इंडिया'.
क; म. बो; . . ... कनिंगहाम का 'महाबोधी'.
की; लि. इं. नॉ. इं; ... कीलहॉर्न संगृहीत 'लिस्ट ऑफ़ इन्स्क्रिप्शन्स ऑफ़ नॉर्डर्न इंडिया'.
की; लि. इं. स. इं; ... कीलहॉर्न संगृहीत 'लिस्ट ऑफ़ इन्स्क्रिप्शन्स ऑफ़ सदर्न इंडिया'.
को; मि. ए; . . ... कीलब्रुक का 'मिसलेनिअस एसेज'.
गा; कॅ. ग्री. सी; . ... पर्सी गार्डनर संगृहीत 'दी कॉइन्स ऑफ़ ग्रीक ऍड इंडो-सीथिक किंग्स ऑफ़ बाकद्रिया
'ऐंड इंडिया'.
गौ; सो. प्रा. इ; . ... गौरीशंकर हीराचंद ओझा का 'सोलंकियों का प्राचीन इतिहास'
ज. अ. ओ. सो; . ... जर्नल ऑफ़ दी अमेरिकन आरिएंटल सोसाइटी.
ज. ए; . . . ... 'जर्नल एशियाटिक'.
ज. ए. सो. वंगा;
ज. बंगा. ए. सो; } ... जर्नल ऑफ़ दी एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल.
ज. ए. सो. बंब; .
ज. बंब. ए. सो; . } ... जर्नल ऑफ़ दी बॉम्बे ब्रँच ऑफ़ दी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी.
ज. बॉ. ब्रँ. रा. ए. सो; /
ज. रॉ. ए. सो; . ... जर्नल ऑफ़ दी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी.
टे; आ; . . . ... आइज़क टेलर का 'आल्फ़ाबेट'.
१४
पुस्तकों के संक्षिप्त नामसंकेतों का परिचय.
ट्रा. आ. सी; . . ... त्रावनकोर आर्किऑलॉजिकल सीरीज़.
ड; क्रॉ. इं; . . ... मिस् डफ़ का 'क्रॉनॉलॉजी ऑफ़ इंडिया'.
डे; बु. इं; . . ... राइज़ डेविड्ज़ का 'बुद्धिस्ट इंडिया'.
न्यु. क्रॉ; . . ... न्युमिस्मैटिक् क्रॉनिकल.
प्रिं; ऍ; . . ... प्रिंसेप का 'ऍंटिकिटीज़'.
प्रो. रि. आ. स. वे. इं; ... प्रोग्रेस रिपोर्ट ऑफ़ दी ऑर्किऑलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया.
फो(वो); पँ. चं. स्टे; ... फोजल संपादित 'ऍंटिकिटीज़ ऑफ़ दी चंबा स्टेट'.
फ्ली; गु. इ; . ... फ्लीट संपादित 'गुप्त इन्स्क्रिप्शन्स'.
ब; आ. स. वे. इं; . ... बर्जेस संपादित 'आर्किऑलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया'.
ब; सा. ई. पे; . ... बर्नेल का 'साउथ इंडियन पेलिओग्राफी'.
बा; ऍ. इं; . . ... बार्नेट का 'ऍंटिकिटीज़ ऑफ़ इंडिया'.
बी; बु. रे. वे. व; . ... सेम्युअल बील का 'बुद्धिस्ट रेकर्ड ऑफ़ दी वेस्टर्न वर्ल्ड'.
बु. नं; कॅ. बु. त्रि; . ... बुन्यु नन्जियो का 'कॅटलॉग आफ दी चाइनीज़ ट्रांसलेशन ऑफ़ बुद्धिस्ट त्रिपिटक'.
बू; इं. पे; . . ... बूलर का 'इंडियन पेलिओग्राफी'.
बू. इं. स्ट; . . ... बूलर का 'इंडियन स्टडीज' ( संख्या ३ ).
बें; ज. ने; . . ... सिसिल बेंडाल का 'जर्नी इन् नेपाल'.
बंब. गॅ; . . ... बॉम्बे गॅज़िटिअर्.
भा. इं; . . ... भावनगर इनस्क्रिप्शन्स.
भं. कॉ. व्हॉ; . . ... भंडारकर कॉमेमोरेशन व्हॉल्युम.
मू; रि. ऐ. ई. सी. ... मूलर की 'रिपोर्ट ऑन एन्श्यंट इन्स्क्रिप्शन्स ऑफ़ सीलोन'.
मॅ; हि. प. सं. लि; ... मॅक्समूलर का 'हिस्ट्री ऑफ़ एन्श्यंट संस्कृत लिटरेचर'.
रा; ऍ. क; . . ... राइस संपादित 'ऐपिग्राफ़िआ कर्नाटिका'.
रा; कॅ. कॉ. आं. क्ष . } ... ऱॅप्सन् संपादित 'कॅटलॉग ऑफ़ दी कॉइन्स ऑफ़ दी आंध्र डाइनैस्टी, दी त्रैकूटक डाइने-
रॅ. कॅ. कॉ. आं. क्ष. } स्टी ऐंड दी बोधि डाइनैस्टी'.
रि. रा. म्यू. अ; ... रिपोर्ट ऑफ़ दी राजपूताना म्यूज़ियम, अजमेर.
रॅ. ए. इं; . . ... ऱॅप्सन् का 'एन्श्यंट इंडिया'.
वे; इं. स्ट; . . ... वेबर का 'इंडिश्चे स्टाडियन'.
सा (सॅ); अ. इं; ... ऍडवर्ड सॅचो अनुवादित 'अल्बेरुनीज़ इंडिया'.
सु; ग. त; . . ... सुधाकर द्विवेदी की 'गणकतरंगिणी'.
से. बु. ई; . . ... सेक्रेड बुक्स ऑफ़ दी ईस्ट.
स्मि; अ. हि. इं; . ... विन्सेंट ए. स्मिथ का 'अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया'.
स्मि; कॅ. कॉ. ई. म्यु; ... विन्सेंट ए. स्मिथ संपादित 'कॅटलॉग ऑफ़ दी कॉइन्स इन दी इंडियन म्यूज़ियम्'.
ह; कॅ. पा; . . ... हरप्रसाद शास्त्री संपादित 'कॅटलॉग ऑफ़ पामलीफ़ ऐंड सिलेक्टेड पेपर मॅन्युस्क्रिप्ट्स
बिलाँगिंग टु दी दरबार लाइब्रेरी, नेपाल'.
हु; सा. ई. इं; . ... हुल्श संपादित 'साउथ इंडियन इन्स्क्रिप्शन्स'.
हवा; कॅ. कॉ. पं. म्यू; ... हवाइटहेड संपादित 'कॅटलॉग ऑफ़ दी कॉइन्स इन् दी पंजाब म्यूज़ियम्, लाहोर'.
१५.
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
भारतीय
प्राचीनलिपिमाला.
१—भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता.
भारतीय आर्य लोगों का मत यह है कि उनके यहां बहुत प्राचीन काल से लिखने का प्रचार
चला आता है और उनकी लिपि (ब्राह्मी), जिसमें प्रत्येक अक्षर या चिन्ह एक ही ध्वनि या उच्चारण
का सूचक है और जो संसारभर की लिपियों में सब से सरल और निर्दोष है, स्वयं ब्रह्मा १ ने बनाई है;
परंतु कितने एक यूरोपियन् विद्वानों का यह कथन है कि भारतीय आर्य लोग पहिले लिखना नहीं
जानते थे, उनके वेदादि ग्रंथों का पठनपाठन केवल कथनश्रवणद्वारा ही होता था और पीछे से
उन्होंने विदेशियों से लिखना सीखा.
मैक्समूलर ने लिखा है कि 'मैं निश्चय के साथ कहता हूं कि पाणिनि की परिभाषा में एक भी
शब्द ऐसा नहीं है जो यह सूचित करे कि लिखने की प्रणाली पहिले से थी२,' और वह पाणिनि का
समय ईसवी सन् पूर्व की चौथी शताब्दी मानता है.
बर्नेल का कथन है कि 'फ़िनिशियन् लोगों से भारतवासियों ने लिखना सीखा और फ़िनिशि-
यन् ३ अक्षरों का, जिनसे दक्षिणी अशोकलिपि (ब्राह्मी) बनी, भारतवर्ष में ई.स. पूर्व ५०० से
पहिले प्रवेश नहीं हुआ और संभवतः ई.स. पूर्व ४०० से पहिले नहीं४.'
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता बूलर, जो 'सेमिटिक् ५' लिपि से ही भारतवर्ष की प्राचीन लिपि (ब्राह्मी) की
उत्पत्ति मानता है, मैक्समूलर तथा बर्नेल के निर्णय किये समय को स्वीकार न कर लिखता है कि
'ई.स. पूर्व ५०० के आसपास, अथवा उससे भी पूर्व, ब्राह्मी लिपि का बड़े श्रम से निर्माण करने का
कार्य समाप्त हो चुका था और भारतवर्ष में 'सेमिटिक्' अक्षरों के प्रवेश का समय ई.स. पूर्व ८०० के
क़रीब माना जा सकता है, तो भी यह अनुमान अभी स्थिर नहीं कहा जा सकता. भारतवर्ष या
सेमिटिक देशों के और प्राचीन लेखों के मिलने से इसमें परिवर्तन की आवश्यकता हुई तो अभी अभी
मिले हुए प्रमाणों से मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि [भारतवर्ष] में लिपि के प्रवेश का समय
१. षण्मासिके तु समये भ्रान्तिः संजायते यतः। धात्राक्षराणि सृष्टानि पत्रारूढान्यतः पुरा॥ ('आह्निकतत्व' और 'ज्योति-
स्तत्व' में बृहस्पति का वचन). नाकरिष्यद्यदि ब्रह्मा लिखितं चक्षुरुत्तमम्। तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभा गतिः॥ (नारदस्मृति).
बृहस्पतिरचित मनु के वार्तिक में भी ऐसा ही लिखा है (से. बु. ई; जिल्द २३, पृ. ३०४); और चीनी यात्री हुयुएंत्संग,
जिसने ई. स. ६२६ से ६४५ तक इस देश की यात्रा की, लिखता है कि 'भारतवासियों की वर्णमाला के अक्षर ब्रह्मा ने बनाये
थे और उनके रूप (रूपांतर) पहले से अब तक चले आ रहे हैं' (बी.बु.रे.वे.व; जिल्द १, पृ. ७७).
२. मै.हि.ए.सं.लि; पृ. २६२ (अलाहाबाद का छुपा.)
३. फ़िनिशियन् = फ़िनिशिया के रहने वाले. एशिया के उत्तरपश्चिमी विभाग के 'सीरिया' नामक देश (तुर्कराज्य
में) को ग्रीक (यूनानी) तथा रोमन लोग 'फ़िनिशिया' कहते थे. वहां के निवासी प्राचीन काल में बड़े व्यवसायी तथा
शिक्षित थे. उन्होंने ही यूरोप वालों को लिखना सिखलाया और यूरोप की प्राचीन तथा प्रचलित लिपियां उन्हींकी लिपि से
निकली हैं.
४. ब; सा.इं.पे; पृ. ६.
५. अरबी, इथिओपिक, अरमइक, सीरिअक, फ़िनिशियन्, हिब्रू आदि पश्चिमी एशिया और आफ्रिका खंड की भाषा-
ओं तथा उनकी लिपियों को 'सेमिटिक्' अर्थात् बाइबलप्रसिद्ध नूह के पुत्र शेम की संतति की भाषाएं और लिपियां कहते ह.
२
प्राचीनलिपिमाला.
अधिक प्राचीन सिद्ध होगा और उसके वास्ते शायद ई.स. पूर्व की १० वीं शताब्दि या उससे भी
पूर्व का समय स्थिर करना होगा१.
अब हमें यह निश्चय करना आवश्यक है कि भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता का
पता कहां तक चल सकता है.
'भोजपत्र२, ताड़पत्र३ या कागज़४ पर लिखे हुए पुस्तक हज़ारों वर्ष रह नहीं सकते, विशेषतः
शिलालेख. | भारतवर्ष के जलवायु में, परंतु पत्थर या धातु पर खुदे हुए अक्षर यत्नपूर्वक
रहें और हवा तथा बारिश से बचने पावें तो बहुत समय तक बच सकते हैं. इस
देश में जो प्राचीन शिलालेख विशेष संख्या में मिले हैं वे मौर्यवंशी राजा अशोक के समय के, अर्थात्
ई.स. पूर्व की तीसरी शताब्दी के हैं, और पाषाण के विशाल स्तंभों अथवा चटानों पर खुदे हुए हैं.
ये पेशावर से माइसोर तक और काठिआवाड़ से उड़ीसा तक अर्थात् क़रीब क़रीब सारे भारतवर्ष५ में
मिल चुके हैं. इनसे पाया जाता है कि उस समय सारे भारतवर्ष में लिखने का प्रचार भली भांति था,
जैसा कि इस समय है. इन लेखों में देशभेद से कितने एक अक्षरों की आकृति में कुछ भिन्नता६ पाई
जाती है और किसी किसी अक्षर के कई रूप मिलते हैं, जिससे अनुमान होता है कि उस समय भी लिखने
की कला इस देश में नवीन नहीं, किंतु सुदीर्घ काल से चली आती थी.
अशोक से पूर्व के अभी तक केवल दो छोटे छोटे शिलालेख मिले हैं, जिनमें से एक अजमेर
ज़िले के बड़ली७ गांव से मिला है और दूसरा नेपाल की तराई के पिप्रावा नामक स्थान के एक स्तूप के
भीतर से मिले हुए पात्र पर, जिसमें बुद्धदेव की अस्थि रक्खी गई थी, खुदा है. इनमें से पहिला
एक स्तंभ पर खुदे हुए लेख का टुकड़ा है, जिसकी पहिली पंक्ति में 'वीर[१]य भगव[त]' और दूसरी
में 'चतुरासिति व[स]' खुदा है. इस लेख का ८४ वां वर्ष जैनों के अंतिम तीर्थंकर वीर (महावीर)
के निर्वाण संवत् का ८४ वां वर्ष होना चाहिये. यदि यह अनुमान ठीक हो तो यह लेख ई.स. पूर्व
१. बू; इं. पे; पृ. १७ (अंग्रेज़ी अनुवाद).
२. भोजपत्र पर लिखा हुआ सब से पुराना संस्कृत पुस्तक, जो अब तक मिला है, 'संयुक्तआगम' नामक, बौद्ध
सूत्र है. वह डॉ. स्टाइन को खोतान प्रदेश के खदालिक् स्थान में मिला था. उसकी लिपि ई.स. की चौथी शताब्दी की
मानी जाती है.
३. ताड़पत्र पर लिखे हुए पुस्तकों में सब से पुराना, जो मिला है, एक नाटक का कुछ त्रुटित अंश है. वह ई.स.
की दूसरी शताब्दी के आसपास का लिखा हुआ माना जाता है, और जिसको डॉ. लूडर्स ने छपवाया है (Kleinere
Sanskrit-Texte, part I.).
४. काग़ज़ पर लिखे हुए सब से पुराने भारतीय प्राचीन लिपि के चार संस्कृत पुस्तक मध्य एशिया में यारकंद नगर
से ६० मील दक्षिण 'कुगिअर' स्थान से वेबर को मिले, जिनका समय डॉ. हॉर्नली ने ई.स. की पांचवीं शताब्दी अनुमान
किया है (ज. ए. सो. बंगा; जि. ६२, पृ. ८).
५. अशोक के लेख नीचे लिखे हुए स्थानों में मिले हैं:-
शाहबाज़गढ़ी (पंजाब के ज़िले युसुफ़ज़ई में); मान्सेरा (पंजाब के ज़िले हज़ारा में); देहली; खालसी (संयुक्त प्रदेश के
ज़िले देहरादून में); सारनाथ (बनारस के पास); लौरिआ अरराज अथवा रधिआ, लौरिआ नवंदगढ़ अथवा मथिआ और
रामपुरवा (तीनों उत्तरी बिहार के ज़िले चंपारन में); सहस्राम (बंगाल के ज़िले शाहाबाद में); निग्लिवा और रुमिंदेई
(दोनों नेपाल की तराई में); धौली (उड़ीसा के ज़िले कटक में); जौगड़ (मद्रास के ज़िले गंजाम में); बैराट (राजपुताना के
जयपुर राज्य में); गिरनार (काठिआवाड़ में); सोपारा (बंबई से ३७ मील उत्तर थाना ज़िले में); सांची (भोपाल राज्य में);
रूपनाथ (मध्यप्रदेश में); मस्की (हैदराबाद राज्य में) और सिद्धापुर (माइसोर राज्य में).
लिपिपत्र पहिले में केवल गिरनार के लेख से अक्षर छांटे गये हैं और दूसरे में अशोक के अन्य लेखों के
मुख्य मुख्य अक्षर. इन दोनों पत्रों को मिलाने से भिन्न भिन्न लेखों में अक्षरों की जो भिन्नता और एक अक्षर के कई रूप पाये
जाते हैं वे स्पष्ट होंगे.
६. बड़ली गांव से मिला हुआ लेख, जो... राजपुताना... में मुझे
मिला था.
३ भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता.
(५२७-८४=) ४४३ का १ होगा. इसकी लिपि अशोक के लेखों की लिपि से पहिले की प्रतीत होती
है. इसमें 'वीराय' का 'वी' अक्षर 𑀯𑀻 है. उक्त 'वी' में जो 'ई' की मात्रा का चिन्ह ( है वह
न तो अशोक के लेखों में और न उनसे पिछले किसी लेख में मिलता है, अत एव वह चिन्ह अशोक
से पूर्व की लिपि का होना चाहिये, जिसका व्यवहार अशोक के समय में मिट कर उसके स्थान में
नया चिन्ह ⫫ बर्ताव में आने लग गया होगा २.
दूसरे अर्थात् पिप्रावा के लेख ३ से प्रकट होता है कि बुद्ध की अस्थि शाक्य जाति के लोगों ने
मिलकर उस (स्तूप) में स्थापित की थी. इस लेख को बूलर ने अशोक के समय से ४ पहले का
माना है. वास्तव में यह बुद्ध के निर्वाणकाल अर्थात् ई.स. पूर्व ४८७ के ५ कुछ ही पीछे का होना
चाहिये.
इन शिलालेखों से प्रकट है कि ई.स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी में लिखने का प्रचार इस देश में
कोई नई बात न थी.
[भारतवर्ष में रहे हुए यूनानी लेखक.] निआर्कस् ६ कहता है कि 'यहां के लोग रूई (या रूई के चिथड़ों) को कूट कूट कर
लिखने के वास्ते ७ काग़ज़ बनाते ८ हैं. मॅगेस्थिनीज़ ९ लिखता है कि 'यहां पर
१. महामहोपाध्याय डॉ. सतीशचंद्र विद्याभूषण ने भी इस लेख को वीर संवत् ८४ का माना है.
२. अशोक के समय अथवा उससे पूर्व व्यंजन के साथ जुड़ने वाली स्वरों की मात्राओं में से केवल 'ई' की
प्राचीन मात्रा लुप्त होकर उसके स्थान में नया चिन्ह काम में आने लगा ऐसा ही नहीं, किंतु 'ओ' की मात्रा में भी परिव-
र्तन हुआ होगा, क्योंकि महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के लेख में 'ओ' की मात्रा तीन प्रकार से लगी है : — 'पो' के
साथ एक प्रकार की, 'नौ' और 'मौ' के साथ दूसरे प्रकार की और 'यो' के साथ तीसरी तरह की है (देखो लिपिपत्र = वां).
इनमें से पहिले प्रकार की मात्रा तो अशोक के लेखों की शैली की ही है ('ओ' की मात्रा की बाईं तरफ एक और आड़ी
लकीर जोड़ी गई है), परंतु दूसरे प्रकार की मात्रा की उत्पत्ति का पता अशोक के लेखों में नहीं लगता और न पिछले
किसी लेख में उसका प्रचार पाया जाता है, जिससे यही अनुमान होता है कि उसका रूपांतर अशोक से पूर्व ही हो
गया हो और किसी लेखक को उसका ज्ञान होने से उसने उसका भी प्रयोग किया हो, जैसे कि कुटिल लिपि की 'आ' की
मात्रा ノ (जो व्यंजन के ऊपर लगाई जाती थी) का लिखना इस समय से कई शताब्दी पूर्व से ही उठ गया है और उसके स्थान
में व्यंजन की दाहिनी ओर एक खड़ी लकीर '।' लगाई जाती है, परंतु कितने एक पुस्तकलेखकों को अब भी उसका ज्ञान है
और जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़ जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसके लिखने का स्थान नहीं होता तब वे
उसके ऊपर कुटिल लिपि का ノ चिन्ह लगा देते हैं.
३. जिस पत्थर के पात्र पर यह लेख खुदा है वह इस समय कलकत्ते के 'इंडियन म्यूज़िअम्' में है.
४. ज. रॉ. ए. सो; सन् १८६८, पृ. ३८६.
५. बुद्ध का देहांत (निर्वाण) ई.स. पूर्व ४८७ के क़रीब कुसिनार नगर में हुआ. उनके शरीर को चन्दन की
लकड़ियों से जला कर उनकी जली हुई अस्थियों के ८ हिस्से किये गये और राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लकप्प, राम-
ग्राम, पावा, वेठदीप और कुसिनार वालों ने उन्हें लेकर अपने अपने यहां उनपर स्तूप बनवाये. कपिलवस्तु शाक्यराज्य की
राजधानी थी और बुद्ध वहीं के शाक्यजाति के राजा शुद्धोदन का पुत्र था अत एव पिप्रावा के स्तूप से निकली हुई अस्थि
कपिलवस्तु के हिस्से की, और वहां का स्तूप बुद्ध के निर्वाण के समय के कुछ ही पीछे का बना हुआ, होना चाहिये. ऐसा
मानने में लिपिसंबंधी कोई भी बाधा नहीं आती.
६. ई. स. पूर्व ३२६ में भारतवर्ष पर चढ़ाई करनेवाले यूनान के बादशाह अलेक्ज़ैंडर (सिकंदर) के सेनापतियों
में से एक निआर्कस् भी था. वह उसके साथ पंजाब में रहा और वहां से नावों द्वारा जो सेना लड़ती भिड़ती सिंधु के
मुख तक पहुंची उसका सेनापति भी वही था. उसने इस चढ़ाई का विस्तृत वृत्तांत लिखा था, जिसका खुलासा एरि-
अन् ने अपनी 'इंडिका' नामक पुस्तक में किया.
७. मॅक्समुलर का लिखना है कि 'निआर्कस् भारतवासियों का रूई से काग़ज़ बनाने की कला का जानना
प्रकट करता है, मॅ. हि. ए. सं. लि; पृ. ३६७.
८. बू; इं. पे; पृ. ६.
९. ई.स. पूर्व ३०६ के आसपास सीरिआ के बादशाह सेल्युकस् (Seleukos Nikator) ने मॅगेस्थिनीज़ नामक
प्राचीनलिपिमाला. ४
दस दस स्टेडिआ¹ के अंतर पर पाषाण लगे हैं², जिनसे धर्मशालाओं का तथा दूरी का पता लगता
है, नये वर्ष के दिन भावी फल (पंचांग) सुनाया जाता है³, जन्मपत्र बनाने के लिये जन्मसमय लिखा
जाता है⁴ और न्याय 'स्मृति'⁵ के अनुसार होता है.'
इन दोनों लेखकों के कथन से स्पष्ट है कि ई.स. पूर्व की चौथी शताब्दि में यहां के लोग रूई
(या चिथड़ों) से काग़ज़⁶ बनाना जानते थे, पंचांग तथा जन्मपत्र बनते थे जैसे कि अब तक
चले आते हैं और मीलों के पत्थर तक लगाये जाते थे. ये लेखनकला की प्राचीनता के सूचक हैं.
बौद्धों के 'शील'⁷ ग्रंथ में बौद्ध साधुओं (श्रमणों) के लिये जिन जिन बातों का निषेध किया
गया है उनमें 'अक्खरिका' (अक्षरिका) नामक खेल भी शामिल है, जिसे
[बौद्ध पुस्तक.] बालक भी खेला करते थे. इस खेल में खेलने वालों को अपनी पीठ पर या
आकाश में [अंगुलि से] लिखा हुआ अक्षर बूझना पड़ता था⁸.
॰ 'विनय'⁹ संबंधी पुस्तकों में 'लेख' (लिखने की कला) की प्रशंसा की है१० और बौद्ध आर्याओं
के लिये सांसारिक कलाओं के सीखने का निषेध होने पर भी 'लिखना' सीखने की उनके वास्ते
आज्ञा है¹¹. यदि कोई बौद्ध साधु (श्रमण) किसी मनुष्य को आत्मघात की प्रशंसा में कुछ लिखे
(लेखं छिन्दति) तो उसे प्रत्येक अक्षर के लिये दुक्कत (दुष्कृत = पाप) होगा¹², और गृहस्थियों के ल-
ड़कों के वास्ते लिखने का पेशा सुख से जीवन निर्वाह करने का साधन माना गया है¹³.
विद्वान को अपना राजदूत बना कर मौर्यवंशी राजा चंद्रगुप्त के दरबार (पाटलिपुत्र) में भेजा था. वह ५ वर्ष के लगभग
यहां रहा और उसने इस देश के विषय में 'इंडिका' नामक पुस्तक ई.स. पूर्व की चौथी शताब्दी के अंत के आसपास
लिखी, जो नष्ट होगई परंतु दूसरे लेखकों ने उससे जो जो अंश उद्धृत किया है वह उपलब्ध है.
१. एक स्टेडिअस् (Stadium) ६०६ फुट ६ इंच का होता है ('स्टेडिआ', 'स्टेडिअम्' शब्द का बहुवचन है).
२. इं. मं; पृ. १२५-२६. ३. इं. मं; पृ. ६१. ४. इं. मं; पृ. १२६.
५. मॅगस्थिनीज़ ने मूल में 'स्मृति' (धर्मशास्त्र) शब्द के अर्थ 'याददाश्त' का प्रयोग किया है, जिसपर से कितने
एक यूरोपियन् विद्वानों ने यहां पर उस समय लिखे हुए क़ानून का न होना मान लिया है, परंतु बूलर ने लिखा है कि
मॅगस्थिनीज़ का आशय 'स्मृति' के पुस्तकों से है (वृ; इं; पे; पृ. ६).
६. विलायती कागज़ों के प्रचार के पूर्व यहां पर चिथड़ों को कूट कूट कर उनके गूदे से काग़ज़ बनाने के पुराने
ढंग के कारखाने कई जगह थे, परन्तु विलायती काग़ज़ अधिक सुंदर और सस्ते होने से वे बंद हो गये, तो भी गोशुंडा (मेवाड़
में) आदि में अब तक पुराने ढंग से काग़ज़ बनते हैं.
७. बौद्ध धर्मग्रंथ 'सुत्तंत' (सूत्रांत) के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में जो बुद्ध के कथोपकथन हैं वे 'शील'
अर्थात 'आचार के उपदेश' कहलाते हैं. उसके संग्रह का समय डॉ. राइस डेविड्ज़ ने ई.स. पूर्व ४५० के आस पास बत-
लाया है (डे; बु. इं; पृ. १०७), किंतु बौद्ध लोग 'शील' को स्वयं बुद्ध का वचन मानते हैं.
८. ब्रह्मजालसुत्त, १४; सामञ्ञफलसुत्त, ४६; डे; बु. इं; पृ. १०८.
९. जिस वर्ष बुद्ध का निर्वाण हुआ उसी वर्ष (ई.स. पूर्व ४८७ के आसपास) उनके मुख्य शिष्य काश्यप की
इच्छानुसार मगध के राजा अजातशत्रु की सहायता से राजगृह के पास की सप्तपर्णी गुफा के बड़े दालान में बौद्धों का पहिला
संघ एकत्र हुआ जिसमें ५०० अर्हत (बड़े दरजे के साधु) उपस्थित थे. वहां पर उपालि ने, जिसको स्वयं बुद्ध ने 'विनय'
का अद्वितीय ज्ञाता माना था, 'विनय' सुनाया, जो बुद्ध का कहा हुआ 'विनय' माना गया. बौद्धों के धर्मग्रंथों के तीन विभाग
'विनय,' 'सुत्त' (सूत्र) और 'अभिधम्म' (अभिधर्म) हैं, जिनमें से प्रत्येक को 'पिटक' कहते हैं. प्रत्येक पिटक में कई ग्रंथ
हैं और तीनों मिलकर 'त्रिपिटक' कहलाते हैं. 'विनय' में बौद्ध साधुओं के आचार का विषय है. ओल्डनवर्ग के मत में
'विनय' के कितने एक अंश ई.स. पूर्व ४०० से पहिले के हैं.
१०. डे; बु. इं; पृ. १०८; भिक्खुपाचित्तिय, २,२.
११. डे; बु. इं; पृ. १०८. १२. डे; बु. इं; पृ. १०८-६.
१३. डे; बु. इं; पृ. १०८.