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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 318 में से

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पृष्ठ 33

प्राचीनलिपिमाला. ४
दस दस स्टेडिआ¹ के अंतर पर पाषाण लगे हैं², जिनसे धर्मशालाओं का तथा दूरी का पता लगता
है, नये वर्ष के दिन भावी फल (पंचांग) सुनाया जाता है³, जन्मपत्र बनाने के लिये जन्मसमय लिखा
जाता है⁴ और न्याय 'स्मृति'⁵ के अनुसार होता है.'
इन दोनों लेखकों के कथन से स्पष्ट है कि ई.स. पूर्व की चौथी शताब्दि में यहां के लोग रूई
(या चिथड़ों) से काग़ज़⁶ बनाना जानते थे, पंचांग तथा जन्मपत्र बनते थे जैसे कि अब तक
चले आते हैं और मीलों के पत्थर तक लगाये जाते थे. ये लेखनकला की प्राचीनता के सूचक हैं.
बौद्धों के 'शील'⁷ ग्रंथ में बौद्ध साधुओं (श्रमणों) के लिये जिन जिन बातों का निषेध किया
गया है उनमें 'अक्खरिका' (अक्षरिका) नामक खेल भी शामिल है, जिसे
[बौद्ध पुस्तक.] बालक भी खेला करते थे. इस खेल में खेलने वालों को अपनी पीठ पर या
आकाश में [अंगुलि से] लिखा हुआ अक्षर बूझना पड़ता था⁸.
॰ 'विनय'⁹ संबंधी पुस्तकों में 'लेख' (लिखने की कला) की प्रशंसा की है१० और बौद्ध आर्याओं
के लिये सांसारिक कलाओं के सीखने का निषेध होने पर भी 'लिखना' सीखने की उनके वास्ते
आज्ञा है¹¹. यदि कोई बौद्ध साधु (श्रमण) किसी मनुष्य को आत्मघात की प्रशंसा में कुछ लिखे
(लेखं छिन्दति) तो उसे प्रत्येक अक्षर के लिये दुक्कत (दुष्कृत = पाप) होगा¹², और गृहस्थियों के ल-
ड़कों के वास्ते लिखने का पेशा सुख से जीवन निर्वाह करने का साधन माना गया है¹³.
विद्वान को अपना राजदूत बना कर मौर्यवंशी राजा चंद्रगुप्त के दरबार (पाटलिपुत्र) में भेजा था. वह ५ वर्ष के लगभग
यहां रहा और उसने इस देश के विषय में 'इंडिका' नामक पुस्तक ई.स. पूर्व की चौथी शताब्दी के अंत के आसपास
लिखी, जो नष्ट होगई परंतु दूसरे लेखकों ने उससे जो जो अंश उद्धृत किया है वह उपलब्ध है.
१. एक स्टेडिअस् (Stadium) ६०६ फुट ६ इंच का होता है ('स्टेडिआ', 'स्टेडिअम्' शब्द का बहुवचन है).
२. इं. मं; पृ. १२५-२६. ३. इं. मं; पृ. ६१. ४. इं. मं; पृ. १२६.
५. मॅगस्थिनीज़ ने मूल में 'स्मृति' (धर्मशास्त्र) शब्द के अर्थ 'याददाश्त' का प्रयोग किया है, जिसपर से कितने
एक यूरोपियन् विद्वानों ने यहां पर उस समय लिखे हुए क़ानून का न होना मान लिया है, परंतु बूलर ने लिखा है कि
मॅगस्थिनीज़ का आशय 'स्मृति' के पुस्तकों से है (वृ; इं; पे; पृ. ६).
६. विलायती कागज़ों के प्रचार के पूर्व यहां पर चिथड़ों को कूट कूट कर उनके गूदे से काग़ज़ बनाने के पुराने
ढंग के कारखाने कई जगह थे, परन्तु विलायती काग़ज़ अधिक सुंदर और सस्ते होने से वे बंद हो गये, तो भी गोशुंडा (मेवाड़
में) आदि में अब तक पुराने ढंग से काग़ज़ बनते हैं.
७. बौद्ध धर्मग्रंथ 'सुत्तंत' (सूत्रांत) के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में जो बुद्ध के कथोपकथन हैं वे 'शील'
अर्थात 'आचार के उपदेश' कहलाते हैं. उसके संग्रह का समय डॉ. राइस डेविड्ज़ ने ई.स. पूर्व ४५० के आस पास बत-
लाया है (डे; बु. इं; पृ. १०७), किंतु बौद्ध लोग 'शील' को स्वयं बुद्ध का वचन मानते हैं.
८. ब्रह्मजालसुत्त, १४; सामञ्ञफलसुत्त, ४६; डे; बु. इं; पृ. १०८.
९. जिस वर्ष बुद्ध का निर्वाण हुआ उसी वर्ष (ई.स. पूर्व ४८७ के आसपास) उनके मुख्य शिष्य काश्यप की
इच्छानुसार मगध के राजा अजातशत्रु की सहायता से राजगृह के पास की सप्तपर्णी गुफा के बड़े दालान में बौद्धों का पहिला
संघ एकत्र हुआ जिसमें ५०० अर्हत (बड़े दरजे के साधु) उपस्थित थे. वहां पर उपालि ने, जिसको स्वयं बुद्ध ने 'विनय'
का अद्वितीय ज्ञाता माना था, 'विनय' सुनाया, जो बुद्ध का कहा हुआ 'विनय' माना गया. बौद्धों के धर्मग्रंथों के तीन विभाग
'विनय,' 'सुत्त' (सूत्र) और 'अभिधम्म' (अभिधर्म) हैं, जिनमें से प्रत्येक को 'पिटक' कहते हैं. प्रत्येक पिटक में कई ग्रंथ
हैं और तीनों मिलकर 'त्रिपिटक' कहलाते हैं. 'विनय' में बौद्ध साधुओं के आचार का विषय है. ओल्डनवर्ग के मत में
'विनय' के कितने एक अंश ई.स. पूर्व ४०० से पहिले के हैं.
१०. डे; बु. इं; पृ. १०८; भिक्खुपाचित्तिय, २,२.
११. डे; बु. इं; पृ. १०८. १२. डे; बु. इं; पृ. १०८-६.
१३. डे; बु. इं; पृ. १०८.