प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका.
इस देश पर सर्कार अंग्रेज़ी का राज्य होने पर देश भर में फिर शांति का प्रचार हुआ, कल-
कत्ता सर्कार अंग्रेज़ी की राजधानी बना और विद्या का सूर्य, जो कई शताब्दियों से अस्त सा हो रहा
था, फिर उदय हुआ. पश्चिमी शैली से अंग्रेज़ी की पढ़ाई शुरू होने के साथ संस्कृत और देशी
भाषाओं की पढ़ाई भी होने लगी. कई अंग्रेज़ों ने केवल विद्यानुराग से संस्कृत पढ़ना शुरू किया
और सर विलियम जोन्स ने शाकुंतल नाटक का अंग्रेज़ी अनुवाद किया जिससे कविकुलगुरु कालि-
दास को यूरोप के सर्वोत्तम कवि शेक्सपियर का पद मिला इतना ही नहीं किंतु हिंदुओं का संस्कृत
साहित्य कितनी उच्च कोटि का है यह दुनिया को मालूम हुआ और क्रमशः यूरोप में भी संस्कृत का
पठनपाठन शुरू हुआ.
ई. स. १७८४ में सर विलियम जोन्स के यत्न से एशिया के इतिहास, शिल्प, साहित्य आदि
के शोध के लिये कलकत्ते में 'एशियाटिक सोसाइटी बंगाल' नाम का समाज स्थापित हुआ. तब से
ही भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की खोज का प्रारंभ हुआ मानना चाहिये. कई अंग्रेज़ और देशी
विद्वानों ने समाज का उद्देश सफल करने को लेख लिखे जो ई. स. १७८८ में 'एशियाटिक रिसर्चेस'
(एशियासंबंधी शोध) नामक ग्रंथमाला की पहिली जिल्द में प्रकाशित हुए और ई. स. १७९७
तक उक्त ग्रंथमाला की ५ जिल्दें प्रकट हुईं. ई. स. १७९८ में उनका नया संस्करण चोरी से
ही इंग्लैंड में छापा गया. उनकी मांग यहां तक बढ़ी कि पांच छः बरसों में ही उनके दो और
संस्करण छप गये और ऍम. ए. लॅबॉम् नामक विद्वान् ने 'रिसर्चेज् एशियाटिक्स' नाम से उनका फ्रेंच
अनुवाद भी छाप डाला जिसकी बहुत कुछ प्रशंसा हुई. ई. स. १८३९ तक उक्त ग्रंथमाला की २०
जिल्दें छप गईं फिर उसका छपना तो बंद हो गया परंतु ई. स. १८३२ से 'जर्नल ऑव् दी एशिया-
टिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल' नामक उक्त समाज का सामयिक पत्र निकलना प्रारंभ हुआ जो अब तक
साक्षर वर्ग की बड़ी सेवा कर रहा है.
इस प्रकार उक्त समाज के द्वारा एशिया के प्राचीन शोध की ओर यूरोप में भी विद्वानों का
ध्यान गया और ई. स. १८२३ के मार्च में लंदन नगर में उसी उद्देश से 'रॉयल एशियाटिक सोसा-
इटी' नामक समाज स्थापित हुआ और उसकी शाखाएं बंबई और सीलोन में भी स्थापित हुईं. ऐसे
ही समय समय पर फ्रान्स, जर्मनी, इटली आदि यूरोप के अन्य देशों तथा अमेरिका, जापान आदि
में भी एशियासंबंधी भिन्न भिन्न विषयों के शोध के लिये समाज स्थापित हुए जिनके जर्नलों (साम-
यिक पुस्तकों) में भारतवर्ष के प्राचीन शोधसंबंधी विषयों पर अनेक लेख प्रकट हुए और होते ही
जा रहे हैं. यूरोप के कई विद्वानों ने चीनी, तिब्बती, पाली, अरबी आदि भाषाएं पढ़ कर उनमें से
जो कुछ सामग्री भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालनेवाली थी वह एकत्रित कर बहुत
कुछ प्रकाशित की.
एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के द्वारा कार्य आरंभ होते ही कई विद्वान् अपनी अपनी रुचि
के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों के शोध में लगे. कितने एक विद्वानों ने यहां के ऐतिहासिक शोध में
लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र और सिक्कों का टटोलना शुरू किया. इस प्रकार भारतवर्ष की
प्राचीन लिपियों पर विद्वानों की दृष्टि पड़ी. भारतवर्ष जैसे विशाल देश में लेखनशैली के प्रवाह ने लेखकों
की भिन्न रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण किये थे जिससे प्राचीन ब्राह्मी लिपि से गुप्त, कुटिल,
नागरी, शारदा, बंगला, पश्चिमी, मध्यदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग तामिळ आदि अनेक लिपियां
निकलीं और समय समय पर उनके कई रूपांतर होते गये जिससे सारे देश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना
कठिन हो गया था; परंतु चार्ल्स विल्किन्स, पंडित राधाकांत शर्मा, कर्नल जेम्स टॉड के गुरु यति ज्ञान-
चंद्र, डॉक्टर बी. जी. बॅबिंगटन्, वॉल्टर इलिअट, डा. मिल, डब्ल्यू. ऐच. वॉथन, जेम्स प्रिन्सेप आदि
विद्वानों ने ब्राह्मी और उससे निकली हुई उपर्युक्त लिपियों को बड़े परिश्रम से पढ़ कर उनकी वर्ण-
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