सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

[भूमिका.]

उनमें से कई एक की सूचियां भी छप गई हैं. जनरल कनिंगहाम ने अपने संग्रह के भारतीय
प्राचीन सिक्कों की चार जिल्दें १ और लंदन के ब्रिटिश म्यूज़िअम् ने अपने संग्रह की तीन २
जिल्दें छपवाईं. ऐसे ही पंजाब म्यूज़िअम् ( लाहोर ), इंडिअन म्यूज़िअम् आदि के संग्रहों के
सिक्कों की चित्रों सहित सूचियां छप चुकी हैं. इंडियन् ऐंटिक्वेरी, आर्किऑलॉजिकल सर्वे की भिन्न
भिन्न रिपोर्टों, एशियाटिक् सोसाइटियों के जर्नलों तथा कई स्वतंत्र पुस्तकों में भी कई सिक्के प्रकट
हुए हैं.
जब सर्कार अंग्रेज़ी की तरफ से प्राचीन शोध का प्रशंसनीय कार्य होने लगा तब कितने
एक विद्याप्रेमी देशी राज्यों ने भी अपने यहां प्राचीन शोधसंबंधी कार्यालय स्थापित किये. भाव-
नगर दरबार ने अपने पंडितों के द्वारा काठियावाड़, गुजरात और राजपूताना के अनेक शिलालेख
और दानपत्रों की नकलें तय्यार करवा कर उनमें से कई एक 'भावनगर प्राचीनशोधसंग्रह'
( भाग प्रथम ) और 'भावनगर इनस्क्रिप्शन्स' नामक पुस्तकों में प्रकट किये. काठियावाड़ के पोलि-
टिकल एजेंट कर्नल वॉटसन् का प्राचीन वस्तुओं का प्रेम देख कर काठियावाड़ के राजाओं ने मिल
कर राजकोट में 'वॉटसन् म्यूज़िअम्' स्थापित किया जिसमें कई प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों
और पुस्तकों आदि का अच्छा संग्रह है. माईसोर राज्य ने ऐसी वस्तुओं का संग्रह किया इतना ही
नहीं किंतु प्राचीन शोध के लिये आर्किऑलॉजिकल विभाग स्थापित कर अपने विस्तृत राज्य में
मिलनेवाले हज़ारों शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों को 'एपियाफ़िया कर्नाटिका' नामक ग्रंथमाला की
कई बड़ी बड़ी जिल्दों में प्रसिद्ध किया और ई. स. १८८५ से अपने प्राचीन शोध विभाग की सालाना
रिपोर्टें भी, जो बड़े महत्व की हैं, छपाना आरंभ किया. चंबा राज्य ने प्राचीन वस्तुओं का अच्छा संग्रह
किया जिसके प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों को प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. फोजल ने 'ऐंटिक्विटीज़
आफ़ दी चंबा स्टेट' नामक अमूल्य ग्रंथ में प्रसिद्ध कर प्राचीन लिपियों का अभ्यास करनेवालों के
लिये शारदा लिपि की बड़ी सामग्री एकत्रित कर दी. त्रावनकोर तथा हैदराबाद राज्यों ने भी अपने
यहां वैसा ही प्रशंसनीय कार्य प्रारंभ कर दिया है. उदयपुर (मेवाड़), झालावाड़, ग्वालियर,
धार, भोपाल, बड़ौदा, जूनागढ़, भावनगर आदि राज्यों में भी प्राचीन वस्तुओं के संग्रह हुए हैं और
होते जाते हैं.
इस प्रकार सर्कार अंग्रेज़ी की उदार सहायता, और एशियाटिक सोसाइटियों, देशी राज्यों, साधा-
रण गृहस्थों तथा विद्वानों के श्रम से हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बहुत कुछ सामग्री उपलब्ध हुई
है जिससे नंद, मौर्य, ग्रीक, शातकर्णी (आंध्रभृत्य), शक, पार्थिअन, कुशन, क्षत्रप, आभीर, गुप्त, हूण,
यौद्धेय, बैस, लिच्छिवि, परिव्राजक, राजर्षितुल्य, वाकाटक, मुखर (मौखरी), मैत्रक, गुहिल, चापो-
त्कट (चावड़े), चालुक्य (सोलंकी), प्रतिहार (पड़िहार), परमार, चाहमान (चौहान), राष्ट्रकूट
(राठौड़), कच्छपघात (कछवाहा), तोमर (तंवर), कलचुरि (हैहय), त्रैकूटक, चंद्रात्रेय (चंदेल),
यादव, गुर्जर, मिहिर, पाल, सेन, पल्लव, चोल, कदंब, शिलार, सेंद्रक, काकतीय, नाग, निकुंभ,
बाण, मत्स्य, शालंकायन, शैल, मूषक, चतुर्थवर्ण (रेड्डि) आदि अनेक राजवंशों का बहुत कुछ
वृत्तांत, उनकी वंशावलियां एवं कई एक राजाओं का निश्चित समय भी मालूम होता है इतना ही नहीं,
किंतु अनेक विद्वानों, धर्माचार्यों, धनाढ्यों, दानी, वीर आदि प्रसिद्ध पुरुषों के नाम, उनके वृत्तांत तथा समय
१. 'कॉइन्स ऑफ़ एन्श्यंट इंडिया'; 'कॉइन्स ऑफ़ मिडिएवल् इंडिया'; 'कॉइन्स ऑफ़ दी इंडोसीथियन्स'; और
'कॉइन्स ऑफ़ दी लेटर इंडोसीथियन्स'.
२. 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी ग्रीक ऐंड सीथिक् किंग्स ऑफ़ बाक्ट्रिया ऐंड इंडिया'; 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी आन्ध्र डाइ-
नेस्टी, दी वेस्टर्न क्षत्रप्स, दी त्रैकूटक डाइनेस्टी ऐंड दी बोधि डाइनेस्टी'; और 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी गुप्त डाइनेस्टीज़'.