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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 318 में से

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पृष्ठ 15

भूमिका.

संवतों का तो अभाव ही है, और वे शुद्ध इतिहास की दृष्टि से नहीं किंतु काव्यरूप में अतिशयोक्ति
से लिखे गये हैं.
बुद्ध के समय से इधर का इतिहास जानने के लिये धर्मबुद्धि से अनेक राजवंशियों और
धनाढ्य पुरुषों के बनवाये हुए बहुत से स्तूप, मंदिर, गुफा, तालाब, बावड़ी आदि पर लगाये हुए एवं
स्तंभों और मूर्तियों के आसनों पर खुदे हुए अनेक लेख, जो मुसलमानों से बचने पाये, तथा मंदिर
मठ आदि के अर्पण की हुई अथवा ब्राह्मणादि को दी हुई भूमि के दानपत्र एवं अनेक राजाओं के
सिक्के, जो सांप्रतकाल में सत्य इतिहास के मुख्य साधन माने जाते हैं, बहुतायत के साथ उपलब्ध
होने से उनके द्वारा बहुत कुछ प्राचीन इतिहास मालूम हो सकता था; परंतु उनकी ओर किसीने
दृष्टि न दी और समय के साथ लिपियों में परिवर्तन होते रहने से प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी
लोग भूल गये जिससे इतिहास के ये अमूल्य साधन हर एक प्रदेश में, कहीं अधिक कहीं कम, उप-
स्थित होने पर भी निरुपयोगी हो गये.
देहली के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुगलक ने अशोक के लेखवाले दो स्तंभ ला कर देहली में
खड़े करवाये. उनपर के लेखों का आशय जानने के लिये सुल्तान ने बहुत से विद्वानों को एकत्र
किया; परंतु वे उन लेखों को न पढ़ सके. ऐसा भी कहते हैं कि बादशाह अकबर को भी उन लेखों का आशय
जानने की बहुत कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान् ऐसा न था कि उनको पढ़ कर
बादशाह की जिज्ञासा पूर्ण कर सकता. प्राचीन लिपियों का पढ़ना भूल जाने के कारण जब कहीं ऐसा प्राचीन
लेख मिल जाता है कि जिसके अक्षर पढ़े नहीं जाते तो उसको देख कर लोग अनेक कल्पना करते
हैं. कोई उसके अक्षरों को देवताओं के अक्षर बतलाते हैं, कोई गड़े हुए धन का बीजक कहते और कोई
उसको सिद्धिदायक यंत्र बतलाते हैं. इस अज्ञान के कारण प्राचीन वस्तुओं की कुछ भी कद्र न रही
इतना ही नहीं किंतु टूटे हुए मंदिरों आदि के शिलालेख तोड़ फोड़ कर कहीं मामूली पत्थरों की तरह
चुनाई के काम में लाये गये; कहीं उनकी भंग, मसाला आदि पीसने की सिलाएं बनाई गईं; और कहीं
नये मंदिर, मकान आदि की सीढ़ियां, लघने आदि बनाने में भी वे काम में लाये गये जिसके अनेक
उदाहरण मिले हैं. कई प्राचीन ताम्रपत्र तांबे के भाव बेचे जा कर उनके बरतन बनाये गये. सोने
चांदी के असंख्य सिक्के गलाये जा कर उनके जेवर बने और अब तक बनते जाते हैं. तांबे के प्राचीन
सिक्के तो अब तक सालाना मनों गलाये जाते हैं.
विद्या की अवनति के साथ हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बची खुची सामग्री की यह
दशा हुई. प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तकों का मिलना भी सर्व साधारण के लिये कठिन हो गया जिस-
से प्रायः १७५ वर्ष ही पहिले तक इस देश के मुसलमानों के पूर्व के इतिहास की यह दशा थी कि विक्रम,
बापारावल, भोज, सिद्धराज जयसिंह, पृथ्वीराज, जयचंद, रावल समरसी ( समरसिंह ) आदि
प्रसिद्ध राजाओं के नाममात्र सुनने में आते थे परंतु यह कोई नहीं जानता था कि वे कब हुए और
उनके पहिले उन वंशों में कौन कौन से राजा हुए. भोज का चरित्र लिखनेवाले बल्लाल पंडित को
भी यह मालूम न था कि मुंज ( वाक्पतिराज ) सिंधुराज ( सिंधुल ) का बड़ा भाई था और उसके
मारे जाने पर सिंधुराज को राज्य मिला था, क्यों कि 'भोजप्रबन्ध' में सिंधुल (सिंधुराज ) के मरने
पर उसके छोटे भाई मुंज का राजा होना लिखा है. जब भोज का इतिहास लिखनेवाले को
भी भोज के वंश के इतिहास का सामान्य ज्ञान भी न था तब सर्व साधारण में ऐतिहासिक ज्ञान की
क्या अवस्था होनी चाहिये यह सहज ही अनुमान हो सकता है. ऐसी दशा में बड़वों ( भाटों ),
जागों आदि ने राजाओं की ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पूर्व की वंशावलियां गढ़ंत कर सैंकड़ों मन-
माने नाम उनमें दर्ज कर दिये और वे पुस्तक भी इतिहास के सच्चे साधन और अमूल्य समझे
जा कर बहुत गुप्त रक्खे जाने लगे.