प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका.
प्राचीन काल में आर्य जाति विद्या और सभ्यता में सर्वोच्च पद पा चुकी थी और एशिया खंड
ही आर्यों की सभ्यता का मूल स्थान था जहांसे बहुधा दुनिया भर में धर्म, विद्या और सभ्यता का
प्रचार हुआ. एशिया में भारत, ईरान और असीरिआवाले तथा आफ्रिका में मिसरवाले बड़ी
उन्नत दशा को पहुंचे थे, परंतु परिवर्तनशील समय किसी को सर्वदा एक दशा में नहीं रहने देता.
अनेक राष्ट्रविप्लव होते होते ईरान, असीरिआ और मिसरवाले तो अपने प्राचीन साहित्य आदि के
उत्तराधिकारी न रहे परंतु भारतवर्ष के आर्य लोगों ने वैसी ही अनेक आपत्तियां सहने पर भी अपनी
प्राचीन सभ्यता के गौरवरूपी अपने प्राचीन साहित्य को बहुत कुछ बचा रक्खा और विद्या के संबंध में
सारे भूमंडल के लोग थोड़े बहुत उनके ऋणी हैं.
ऐसे प्राचीन गौरववाले भारतवर्ष का मुसलमानों के यहां आने के पहिले का शृंखलाबद्ध इतिहास,
जिसे आधुनिक काल के विद्वान् वास्तविक इतिहास कह सकें, नहीं मिलता. भारतवर्ष बड़ा ही
विस्तीर्ण देश है, जहां पर प्राचीन काल से ही एक ही राजा का राज्य नहीं रहा किंतु समय समय
पर अनेक स्वतंत्र राज्यों का उदय और अस्त होता रहा; विदेशियों के अनेक आक्रमणों से प्राचीन
नगर नष्ट होते और उनपर नये बसते गये और मुसलमानों के समय में तो राजपूताने के बड़े अंश को छोड़
कर भारतवर्ष के बहुधा सब हिंदू राज्य अस्त हो गये इतना ही नहीं किंतु बहुत से प्राचीन नगर,
मंदिर, मठ आदि धर्मस्थान तथा प्राचीन पुस्तकालय नष्ट कर दिये गये. ऐसी दशा में इस विशाल
देश के शृंखलाबद्ध प्राचीन इतिहास का मिलना सर्वथा असंभव है, परंतु यह निर्विवाद है कि यहां-
वाले इतिहास विद्या के प्रेमी अवश्य थे और समय समय पर इतिहास से संबंध रखनेवाले अनेक
ग्रंथ यहां लिखे गये थे. वैदिक साहित्य आर्यों की प्राचीन दशा का विस्तृत हाल प्रकट करता है.
रामायण में रघुवंश का और महाभारत में कुरुवंश का विस्तृत इतिहास एवं उस समय की इस देश
की दशा तथा लोगों के आचार विचार आदि का वर्णन मिलता है. मत्स्य, वायु, विष्णु और
भागवत आदि पुराणों में सूर्य और चंद्रवंशी राजाओं की प्राचीन काल से लगा कर भारत के युद्ध
के पीछे की कई शताब्दियों तक की वंशावलियां, कितने एक राजाओं का कुछ कुछ वृत्तांत एवं नंद,
मौर्य, शुंग, कण्व और आंध्रवंशी राजाओं की नामावलियां तथा प्रत्येक राजा के राज्यकाल के
वर्षों की संख्या तक मिलती है. आंध्रों के पीछे के समय में भी अनेक ऐतिहासिक पुस्तक लिखे गये
थे जिनमें से बाणभट्टरचित 'हर्षचरित'; वाक्पतिराज का 'गउडवहो'; पद्मगुप्त (परिमल) प्रणीत
'नवसाहसांकचरित'; बिल्हण का 'विक्रमांकदेवचरित'; संध्याकरनंदिरचित 'रामचरित'; कल्हण
तथा जोनराज की 'राजतरंगिणी'; हेमचंद्ररचित 'द्व्याश्रयकाव्य' तथा 'कुमारपालचरित'; जयानक
(जयरथ) का 'पृथ्वीराजविजय'; सोमेश्वर की 'कीर्तिकौमुदी'; अरिसिंहरचित 'सुकृतसंकीर्तन';
जयसिंहसूरि का 'हंमीरमदमर्दन'; मेरुतुंग का 'प्रबंधचिंतामणि'; राजशेखर का 'चतुर्विंशतिप्रबंध'; चंद्र-
प्रभसूरिप्रणीत 'प्रभावकचरित'; गंगादेवीविरचित 'कंपरायचरितम्' (मधुराविजयम्); जयसिंहसूरि, चारि-
त्रसुंदरगणि तथा जिनमंडनोपाध्याय के भिन्न भिन्न तीन 'कुमारपालचरित'; जिनहर्षगणि का 'वस्तुपाल-
चरित'; नयचंद्रसूरिप्रणीत 'हंभीरमहाकाव्य'; आनंदभट्ट का 'बल्लालचरित'; गंगाधर पंडितरचित
'मंडलीकमहाकाव्य'; राजनाथ का 'अच्युतराजाभ्युदयकाव्य'; तथा 'मूषकवंशम्' आदि कई ग्रंथ अब
तक मिल चुके हैं और नये मिलते जाते हैं. इनके अतिरिक्त हिंदी, गुजराती और तामिल आदि भाषाओं
में लिखे हुए कई ऐतिहासिक पुस्तक मिले हैं, परंतु ये सब पुस्तक भी इस विस्तीर्ण देश पर राज्य करनेवाले
अनेक राजवंशों में से थोड़ेसों का कुछ इतिहास प्रकट करते हैं. इनमें बड़ी त्रुटि यह है कि बहुधा