प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंमात्राओं का ज्ञान प्राप्त किया. इसी तरह जेम्स प्रिन्सेप, मि. नॉरिस तथा जनरल कनिंगहाम आदि
विद्वानों के श्रम से विदेशी खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला भी मालूम हो गई. इन सब विद्वानों का यत्न
प्रशंसनीय है परंतु जेम्स प्रिन्सेप का अगाध श्रम, जिससे अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का तथा
खरोष्ठी लिपि के कई अक्षरों का ज्ञान प्राप्त हुआ, विशेष प्रशंसा के योग्य है. (प्राचीन लिपियों के
पढ़े जाने के वृत्तान्त के लिये देखो, इस पुस्तक के पृष्ठ ३७-४१).
प्रारंभ में इस देश में प्राचीन शोध के संबंध में जो कुछ कार्य हुआ वह भिन्न भिन्न विद्वानों
और समाजों के द्वारा ही होता रहा. ई. स. १८४४ में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने सरकारी तौर से
भी इस कार्य का किया जाना आवश्यक समझ कर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में निवेदन किया
और ई. स. १८४७ में लॉर्ड हार्डिंज के प्रस्ताव पर ‘बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स' ने इस काम के लिये खर्च
की मंजूरी दी परंतु ई. स. १८६० तक उसका वास्तविक फल कुछ भी न हुआ. ई. स. १८६१ में
संयुक्त प्रदेश के चीफ़ इंजीनियर कर्नल ए. कनिंगहाम ने इस विषय की योजना तय्यार कर भारत के
गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग की सेवा में पेश की जो स्वीकृत हुई और सरकार की ओर से 'आर्कि-
ऑलॉजिकल सर्वे' नामक महकमा कायम हुआ तथा जनरल कनिंगहाम उसके अध्यक्ष नियत हुए.
सरकार के इस बड़े उपयोगी कार्य को हाथ में लेने से प्राचीन शोध के काम में बहुत कुछ उन्नति
हुई; जनरल कनिंगहाम ने उत्तरी और डॉ. जेम्स बर्जेस ने पश्चिमी व दक्षिणी भारत में
प्राचीन शोध का कार्य किया. इन दोनों विद्वानों ने कई उत्तम रिपोर्टें छाप कर बड़ी प्रतिष्ठा
प्राप्त की. ई. स. १८७२ से डॉ. बर्जेस ने 'इंडियन ऐंटिक्वेरी' नामक भारतीय प्राचीन शोध
का मासिक पत्र निकालना प्रारंभ किया जो अब तक चल रहा है और जिसमें प्राचीन शोध संबंधी
लेखों के अतिरिक्त अनेक शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्के छप चुके हैं. ई. स. १८७७ में गवर्नमेंट की
तरफ से जनरल कनिंगहाम ने उस समय तक मौर्य वंशी राजा अशोक के जितने शिलालेख मालूम
हुए थे उनका एक पुस्तक और ई. स. १८८८ में जे. एफ़. फ्लीट ने गुप्तों और उनके समकालीन राजा-
ओं के शिलालेखों तथा दानपत्रों का अनुपम ग्रंथ प्रकट किया. उसी वर्ष से आर्किऑलॉजिकल सर्वे के
महकमे से 'ऐपिग्राफ़िआ इंडिका' नामक त्रैमासिक पुस्तक का छपना प्रारंभ हुआ, जिसमें केवल शिला-
लेख और दानपत्र ही प्रकट होते हैं. इस समय इसकी १४ वीं जिल्द छप रही है. प्राचीन इतिहास
के लिये ये जिल्दें रत्नाकर के समान हैं. ऐसे ही उसी महकमे की ओर से ई. स. १८६० से 'साउथ
इंडियन इन्स्क्रिप्शनस' नामक पुस्तक का छपना भी प्रारंभ हुआ, जिसमें दक्षिण के संस्कृत, तामिळ
आदि भाषाओं के शिलालेख और दानपत्र छपते हैं और जिसकी ८ हिस्सों में ३ जिल्दें अब तक छप
चुकी हैं. ये भी बड़े महत्व की हैं.
प्राचीन विषयों के प्रेमी लॉर्ड कर्जन ने आर्किऑलॉकिल् विभाग को विशेष उन्नति दी और
डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्किऑलॉजी की अध्यक्षता में भारत के प्रत्येक विभाग के लिये अलग
अलग सुपरिंटेंडेंट नियत किये. तब से प्राचीन शोध के इस विभाग का कार्य विशेष उत्तमता से
चल रहा है और डाइरेक्टर जनरल एवं भिन्न भिन्न विभागों के सुपरिंटेंडेंटों की सालाना रिपोर्टों में
बहुतसे उपयोगी विषय भरे रहते हैं.
प्राचीन शोध के कार्य के संबंध में भिन्न भिन्न समाजों तथा सरकार ने प्राचीन शिलालेख,
दानपत्र, सिक्के, मुद्राएँ, प्राचीन मूर्तियां तथा शिल्प के उत्तम उत्तम नमूने आदि प्राचीन वस्तुओं का
संग्रह करना भी शुरू किया और ऐसी वस्तुओं के बड़े बड़े संग्रह बंबई (एशियाटिक सोसाइटी में),
कलकत्ता (इंडियन म्यूज़ियम और एशियाटिक सोसाइटी बंगाल में), मद्रास, नागपुर, अजमेर,
लाहौर, पेशावर, मथुरा, लखनऊ आदि के म्यूज़िमों (अजायबघरों) में संगृहीत हो चुके हैं और