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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 318 में से

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पृष्ठ 31

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प्राचीनलिपिमाला.

अधिक प्राचीन सिद्ध होगा और उसके वास्ते शायद ई.स. पूर्व की १० वीं शताब्दि या उससे भी
पूर्व का समय स्थिर करना होगा१.
अब हमें यह निश्चय करना आवश्यक है कि भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता का
पता कहां तक चल सकता है.
'भोजपत्र२, ताड़पत्र३ या कागज़४ पर लिखे हुए पुस्तक हज़ारों वर्ष रह नहीं सकते, विशेषतः
शिलालेख. | भारतवर्ष के जलवायु में, परंतु पत्थर या धातु पर खुदे हुए अक्षर यत्नपूर्वक
रहें और हवा तथा बारिश से बचने पावें तो बहुत समय तक बच सकते हैं. इस
देश में जो प्राचीन शिलालेख विशेष संख्या में मिले हैं वे मौर्यवंशी राजा अशोक के समय के, अर्थात्
ई.स. पूर्व की तीसरी शताब्दी के हैं, और पाषाण के विशाल स्तंभों अथवा चटानों पर खुदे हुए हैं.
ये पेशावर से माइसोर तक और काठिआवाड़ से उड़ीसा तक अर्थात् क़रीब क़रीब सारे भारतवर्ष५ में
मिल चुके हैं. इनसे पाया जाता है कि उस समय सारे भारतवर्ष में लिखने का प्रचार भली भांति था,
जैसा कि इस समय है. इन लेखों में देशभेद से कितने एक अक्षरों की आकृति में कुछ भिन्नता६ पाई
जाती है और किसी किसी अक्षर के कई रूप मिलते हैं, जिससे अनुमान होता है कि उस समय भी लिखने
की कला इस देश में नवीन नहीं, किंतु सुदीर्घ काल से चली आती थी.
अशोक से पूर्व के अभी तक केवल दो छोटे छोटे शिलालेख मिले हैं, जिनमें से एक अजमेर
ज़िले के बड़ली७ गांव से मिला है और दूसरा नेपाल की तराई के पिप्रावा नामक स्थान के एक स्तूप के
भीतर से मिले हुए पात्र पर, जिसमें बुद्धदेव की अस्थि रक्खी गई थी, खुदा है. इनमें से पहिला
एक स्तंभ पर खुदे हुए लेख का टुकड़ा है, जिसकी पहिली पंक्ति में 'वीर[१]य भगव[त]' और दूसरी
में 'चतुरासिति व[स]' खुदा है. इस लेख का ८४ वां वर्ष जैनों के अंतिम तीर्थंकर वीर (महावीर)
के निर्वाण संवत् का ८४ वां वर्ष होना चाहिये. यदि यह अनुमान ठीक हो तो यह लेख ई.स. पूर्व


१. बू; इं. पे; पृ. १७ (अंग्रेज़ी अनुवाद).
२. भोजपत्र पर लिखा हुआ सब से पुराना संस्कृत पुस्तक, जो अब तक मिला है, 'संयुक्तआगम' नामक, बौद्ध
सूत्र है. वह डॉ. स्टाइन को खोतान प्रदेश के खदालिक् स्थान में मिला था. उसकी लिपि ई.स. की चौथी शताब्दी की
मानी जाती है.
३. ताड़पत्र पर लिखे हुए पुस्तकों में सब से पुराना, जो मिला है, एक नाटक का कुछ त्रुटित अंश है. वह ई.स.
की दूसरी शताब्दी के आसपास का लिखा हुआ माना जाता है, और जिसको डॉ. लूडर्स ने छपवाया है (Kleinere
Sanskrit-Texte, part I.).
४. काग़ज़ पर लिखे हुए सब से पुराने भारतीय प्राचीन लिपि के चार संस्कृत पुस्तक मध्य एशिया में यारकंद नगर
से ६० मील दक्षिण 'कुगिअर' स्थान से वेबर को मिले, जिनका समय डॉ. हॉर्नली ने ई.स. की पांचवीं शताब्दी अनुमान
किया है (ज. ए. सो. बंगा; जि. ६२, पृ. ८).
५. अशोक के लेख नीचे लिखे हुए स्थानों में मिले हैं:-
शाहबाज़गढ़ी (पंजाब के ज़िले युसुफ़ज़ई में); मान्सेरा (पंजाब के ज़िले हज़ारा में); देहली; खालसी (संयुक्त प्रदेश के
ज़िले देहरादून में); सारनाथ (बनारस के पास); लौरिआ अरराज अथवा रधिआ, लौरिआ नवंदगढ़ अथवा मथिआ और
रामपुरवा (तीनों उत्तरी बिहार के ज़िले चंपारन में); सहस्राम (बंगाल के ज़िले शाहाबाद में); निग्लिवा और रुमिंदेई
(दोनों नेपाल की तराई में); धौली (उड़ीसा के ज़िले कटक में); जौगड़ (मद्रास के ज़िले गंजाम में); बैराट (राजपुताना के
जयपुर राज्य में); गिरनार (काठिआवाड़ में); सोपारा (बंबई से ३७ मील उत्तर थाना ज़िले में); सांची (भोपाल राज्य में);
रूपनाथ (मध्यप्रदेश में); मस्की (हैदराबाद राज्य में) और सिद्धापुर (माइसोर राज्य में).
लिपिपत्र पहिले में केवल गिरनार के लेख से अक्षर छांटे गये हैं और दूसरे में अशोक के अन्य लेखों के
मुख्य मुख्य अक्षर. इन दोनों पत्रों को मिलाने से भिन्न भिन्न लेखों में अक्षरों की जो भिन्नता और एक अक्षर के कई रूप पाये
जाते हैं वे स्पष्ट होंगे.
६. बड़ली गांव से मिला हुआ लेख, जो... राजपुताना... में मुझे
मिला था.