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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 318 में से

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पृष्ठ 20

भूमिका.
संपादन कर सकता है. मेरे पास आकर पढ़नेवालों में से एक विद्वान् ने तो उससे भी थोड़े समय में
अच्छी तरह पढ़ना सीख लिया.
मनुष्य की बुद्धि के सब से बड़े महत्त्व के दो कार्य भारतीय ब्राह्मी लिपि और वर्तमान शैली
के अंकों की कल्पना हैं. इस बीसवीं शताब्दी में भी हम संसार की बड़ी उन्नतिशील जातियों की
लिपियों की तरफ़ देखते हैं तो उनमें उन्नति की गंध भी नहीं पाई जाती. कहीं तो ध्वनि और उसके
सूचक चिह्नों (अक्षरों) में साम्य ही नहीं है जिससे एक ही चिह्न से एक से अधिक ध्वनियां प्रकट
होती हैं और कहीं एक ही ध्वनि के लिये एक से अधिक चिह्नों का व्यवहार होता है और अक्षरों
के लिये कोई शास्त्रीय क्रम ही नहीं. कहीं लिपि वर्णात्मक नहीं किंतु चित्रात्मक ही है. ये लिपियां
मनुष्य जाति के ज्ञान की प्रारंभिक दशा की निर्माण स्थिति से अब तक कुछ भी आगे नहीं बढ़
सकीं परंतु भारतवर्ष की लिपि हजारों वर्षों पहिले भी इतनी उच्च कोटि को पहुंच गई थी कि उस-
की उत्तमता की कुछ भी समानता संसार भर की कोई दूसरी लिपि अब तक नहीं कर सकती. इसमें
ध्वनि और लिखितवर्ण का संबंध ठीक वैसा ही है जैसा कि फोनोग्राफ की ध्वनि और उसकी
चूड़ियों पर के चिह्नों के बीच है. इसमें प्रत्येक आर्य ध्वनि के लिये अलग अलग चिह्न होने से जैसा
बोला जावे वैसा ही लिखा जाता है और जैसा लिखा जावे वैसा ही पढ़ा जाता है तथा वर्णक्रम वैज्ञा-
निक रीति से स्थिर किया गया है. यह उत्तमता किसी अन्य लिपि में नहीं है. ऐसे ही प्राचीन
काल में संसार भर की अंक विद्या भी प्रारंभिक दशा में थी. कहीं अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों
के लिये काम में लाते थे, तो कहीं इकाई के १ से ६ तक के ६ चिह्न, एवं दहाइयों के १० से ६० तक के
६, और सैकड़ा, हज़ार आदि के भिन्न भिन्न चिह्न थे. उन २० चिह्नों से केवल एक लाख के नीचे
की ही संख्या प्रकट होती थी और प्रत्येक चिह्न अपनी नियत संख्या ही प्रकट कर सकता था. भार-
तवर्ष में भी अंकों का प्राचीन क्रम यही था परंतु इस जटिल अंकक्रम से गणित विद्या में विशिषे
उन्नति नहीं हो सकती थी जिससे यहांवालों ने ही वर्तमान अंकक्रम निकाला जिसमें १ से ९ तक
के नव अंक और खाली स्थानसूचक शून्य इन दस चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चल सकता
है. भारतवर्ष से ही यह अंकक्रम संसार भर ने सीखा और वर्तमान समय में गणित और
उससे संबंध रखनेवाले अन्य शास्त्रों में जो उन्नति हुई है वह इसी क्रम के कारण से ही है.
इन्हीं दोनों बातों से प्राचीन काल के भारतीय आर्य लोगों की बुद्धि और विद्यासंबंधी उन्नत दशा का
अनुमान होता है. इन्हीं दोनों विषयों एवं उनके समय समय के भिन्न भिन्न रूपोंतरों के संबंध का
यह पुस्तक है.
हिंदी भाषा में इस पुस्तक के लिखे जाने के दो कारण हैं. प्रथम तो यह कि हमारे यहां के
केवल संस्कृत जाननेवाले बड़े बड़े पंडितों को जब कोई १००० वर्ष से अधिक प्राचीन शिलालेख,
दानपत्र, सिक्का या पुस्तक मिल जाता है तो वे जिस भाषा में वह लिखा गया हो उसके विद्वान् होने
पर भी उसको पढ़ नहीं सकते जिससे उसकी लिपि को तिरुंगी या कनड़ी आदि कह कर टाल जाते
हैं और उसका आशय जान नहीं सकते. यह थोड़े खेद की बात नहीं है. यदि वे इस पुस्तक के सहारे
थोड़े से श्रम से सारे भारतवर्ष की नहीं तो अपने प्रदेश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी सीख जावें
तो उनकी विद्वत्ता के लिये सोने के साथ सुगंधि हो जाय और हमारे यहां के प्राचीन शोध को सहा-
यता भी मिले. जिन विद्यापीठों में केवल संस्कृत की पढ़ाई होती है वहां की उच्च श्रेणियों में यदि
यह पुस्तक पढ़ाया जावे तो संस्कृतज्ञ विद्वानों में जो इतिहास के ज्ञान की त्रुटि पाई जाती है उसकी
कुछ पूर्ति हो जायगी. हिंदी न जाननेवाले जो विद्वान् प्राचीन शोध में अनुराग दिखाते हैं वे संस्कृत
तो पढ़े ही होते हैं और देवनागरी लिपि से भी भली भांति परिचित होते हैं. भले ही वे इस पुस्तक