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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 318 में से

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पृष्ठ 30

भारतीय
प्राचीनलिपिमाला.
१—भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता.
भारतीय आर्य लोगों का मत यह है कि उनके यहां बहुत प्राचीन काल से लिखने का प्रचार
चला आता है और उनकी लिपि (ब्राह्मी), जिसमें प्रत्येक अक्षर या चिन्ह एक ही ध्वनि या उच्चारण
का सूचक है और जो संसारभर की लिपियों में सब से सरल और निर्दोष है, स्वयं ब्रह्मा १ ने बनाई है;
परंतु कितने एक यूरोपियन् विद्वानों का यह कथन है कि भारतीय आर्य लोग पहिले लिखना नहीं
जानते थे, उनके वेदादि ग्रंथों का पठनपाठन केवल कथनश्रवणद्वारा ही होता था और पीछे से
उन्होंने विदेशियों से लिखना सीखा.
मैक्समूलर ने लिखा है कि 'मैं निश्चय के साथ कहता हूं कि पाणिनि की परिभाषा में एक भी
शब्द ऐसा नहीं है जो यह सूचित करे कि लिखने की प्रणाली पहिले से थी२,' और वह पाणिनि का
समय ईसवी सन् पूर्व की चौथी शताब्दी मानता है.
बर्नेल का कथन है कि 'फ़िनिशियन् लोगों से भारतवासियों ने लिखना सीखा और फ़िनिशि-
यन् ३ अक्षरों का, जिनसे दक्षिणी अशोकलिपि (ब्राह्मी) बनी, भारतवर्ष में ई.स. पूर्व ५०० से
पहिले प्रवेश नहीं हुआ और संभवतः ई.स. पूर्व ४०० से पहिले नहीं४.'
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता बूलर, जो 'सेमिटिक् ५' लिपि से ही भारतवर्ष की प्राचीन लिपि (ब्राह्मी) की
उत्पत्ति मानता है, मैक्समूलर तथा बर्नेल के निर्णय किये समय को स्वीकार न कर लिखता है कि
'ई.स. पूर्व ५०० के आसपास, अथवा उससे भी पूर्व, ब्राह्मी लिपि का बड़े श्रम से निर्माण करने का
कार्य समाप्त हो चुका था और भारतवर्ष में 'सेमिटिक्' अक्षरों के प्रवेश का समय ई.स. पूर्व ८०० के
क़रीब माना जा सकता है, तो भी यह अनुमान अभी स्थिर नहीं कहा जा सकता. भारतवर्ष या
सेमिटिक देशों के और प्राचीन लेखों के मिलने से इसमें परिवर्तन की आवश्यकता हुई तो अभी अभी
मिले हुए प्रमाणों से मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि [भारतवर्ष] में लिपि के प्रवेश का समय
१. षण्मासिके तु समये भ्रान्तिः संजायते यतः। धात्राक्षराणि सृष्टानि पत्रारूढान्यतः पुरा॥ ('आह्निकतत्व' और 'ज्योति-
स्तत्व' में बृहस्पति का वचन). नाकरिष्यद्यदि ब्रह्मा लिखितं चक्षुरुत्तमम्। तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभा गतिः॥ (नारदस्मृति).
बृहस्पतिरचित मनु के वार्तिक में भी ऐसा ही लिखा है (से. बु. ई; जिल्द २३, पृ. ३०४); और चीनी यात्री हुयुएंत्संग,
जिसने ई. स. ६२६ से ६४५ तक इस देश की यात्रा की, लिखता है कि 'भारतवासियों की वर्णमाला के अक्षर ब्रह्मा ने बनाये
थे और उनके रूप (रूपांतर) पहले से अब तक चले आ रहे हैं' (बी.बु.रे.वे.व; जिल्द १, पृ. ७७).
२. मै.हि.ए.सं.लि; पृ. २६२ (अलाहाबाद का छुपा.)
३. फ़िनिशियन् = फ़िनिशिया के रहने वाले. एशिया के उत्तरपश्चिमी विभाग के 'सीरिया' नामक देश (तुर्कराज्य
में) को ग्रीक (यूनानी) तथा रोमन लोग 'फ़िनिशिया' कहते थे. वहां के निवासी प्राचीन काल में बड़े व्यवसायी तथा
शिक्षित थे. उन्होंने ही यूरोप वालों को लिखना सिखलाया और यूरोप की प्राचीन तथा प्रचलित लिपियां उन्हींकी लिपि से
निकली हैं.
४. ब; सा.इं.पे; पृ. ६.
५. अरबी, इथिओपिक, अरमइक, सीरिअक, फ़िनिशियन्, हिब्रू आदि पश्चिमी एशिया और आफ्रिका खंड की भाषा-
ओं तथा उनकी लिपियों को 'सेमिटिक्' अर्थात् बाइबलप्रसिद्ध नूह के पुत्र शेम की संतति की भाषाएं और लिपियां कहते ह.