सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

भूमिका.
टिप्पणों में दिये हुए संस्कृत के अवतरणों को हिंदी से भिन्न बतलाने के लिये बारीक टाइप
में छापना आरंभ किया था परंतु टाइप कमज़ोर होने के कारण छपते समय कई अक्षरों के साथ
की मात्राएं, और विशेष कर 'उ' की मात्राएं, टूट गईं जिससे परिशिष्ट में ऐसे अवतरणों के
लिये पहिले से भिन्न टाइप काम में लाना पड़ा है.
इस प्रकार के पुस्तक की रचना के लिये बहुत अधिक सामग्री एकत्र करने की आवश्यकता
पड़ी. इस कार्य में मेरे कई एक विद्वान् मित्रों ने मेरी सहायता की है जिसके लिये मैं उनका उपकार
मानता हूं. उनमें से मुंशी हरबिलास सारडा बी. ए., जज, स्माल काज़ेज़ कोर्ट, अजमेर; प्रसिद्ध
इतिहासवेत्ता मुंशी देवीप्रसादजी जोधपुरवाले, और बाबू पूर्णचंद्र नाहर एम. ए., बी. एल., कलकत्ता,
विशेष धन्यवांद के पात्र हैं.
इस पुस्तक के संबंध में मेरे विद्वान् मित्र पंडित चंद्रधरशर्मा गुलेरी, बी. ए., हेड पंडित, मेयो
कॉलेज, अजमेर, ने बड़ी सहायता की है जिसके लिये मैं उनका विशेष रूप से अनुगृहीत हूं.
जिन विद्वानों के लेख और ग्रंथों से मैने सहायता ली है उनके नाम यथास्थान दिये गये हैं. उन
सब का भी मैं ऋणी हूं. पंडित जीयालालशर्मा ने लिपिपत्र बनाने और मि. जे. इंगलिस, मॅनेजर,
स्कॉटिश मिशन प्रेस, अजमेर, ने इस पुस्तक को उत्तमता से छापने में बड़ा परिश्रम उठाया है इस
लिये मैं उनको भी धन्यवाद देना अपना कर्तव्य समझता हूं.
राजपूताना म्यूज़िअम्, अजमेर, |
वि. सं. १६७५ श्रावण शुक्ला ६, | गौरीशंकर हीराचंद ओझा.
ता. १३ ऑगस्ट ई. स. १६१८. |