सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

३ भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता.
(५२७-८४=) ४४३ का १ होगा. इसकी लिपि अशोक के लेखों की लिपि से पहिले की प्रतीत होती
है. इसमें 'वीराय' का 'वी' अक्षर 𑀯𑀻 है. उक्त 'वी' में जो 'ई' की मात्रा का चिन्ह ( है वह
न तो अशोक के लेखों में और न उनसे पिछले किसी लेख में मिलता है, अत एव वह चिन्ह अशोक
से पूर्व की लिपि का होना चाहिये, जिसका व्यवहार अशोक के समय में मिट कर उसके स्थान में
नया चिन्ह ⫫ बर्ताव में आने लग गया होगा २.
दूसरे अर्थात् पिप्रावा के लेख ३ से प्रकट होता है कि बुद्ध की अस्थि शाक्य जाति के लोगों ने
मिलकर उस (स्तूप) में स्थापित की थी. इस लेख को बूलर ने अशोक के समय से ४ पहले का
माना है. वास्तव में यह बुद्ध के निर्वाणकाल अर्थात् ई.स. पूर्व ४८७ के ५ कुछ ही पीछे का होना
चाहिये.
इन शिलालेखों से प्रकट है कि ई.स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी में लिखने का प्रचार इस देश में
कोई नई बात न थी.
[भारतवर्ष में रहे हुए यूनानी लेखक.] निआर्कस् ६ कहता है कि 'यहां के लोग रूई (या रूई के चिथड़ों) को कूट कूट कर
लिखने के वास्ते ७ काग़ज़ बनाते ८ हैं. मॅगेस्थिनीज़ ९ लिखता है कि 'यहां पर


१. महामहोपाध्याय डॉ. सतीशचंद्र विद्याभूषण ने भी इस लेख को वीर संवत् ८४ का माना है.
२. अशोक के समय अथवा उससे पूर्व व्यंजन के साथ जुड़ने वाली स्वरों की मात्राओं में से केवल 'ई' की
प्राचीन मात्रा लुप्त होकर उसके स्थान में नया चिन्ह काम में आने लगा ऐसा ही नहीं, किंतु 'ओ' की मात्रा में भी परिव-
र्तन हुआ होगा, क्योंकि महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के लेख में 'ओ' की मात्रा तीन प्रकार से लगी है : — 'पो' के
साथ एक प्रकार की, 'नौ' और 'मौ' के साथ दूसरे प्रकार की और 'यो' के साथ तीसरी तरह की है (देखो लिपिपत्र = वां).
इनमें से पहिले प्रकार की मात्रा तो अशोक के लेखों की शैली की ही है ('ओ' की मात्रा की बाईं तरफ एक और आड़ी
लकीर जोड़ी गई है), परंतु दूसरे प्रकार की मात्रा की उत्पत्ति का पता अशोक के लेखों में नहीं लगता और न पिछले
किसी लेख में उसका प्रचार पाया जाता है, जिससे यही अनुमान होता है कि उसका रूपांतर अशोक से पूर्व ही हो
गया हो और किसी लेखक को उसका ज्ञान होने से उसने उसका भी प्रयोग किया हो, जैसे कि कुटिल लिपि की 'आ' की
मात्रा ノ (जो व्यंजन के ऊपर लगाई जाती थी) का लिखना इस समय से कई शताब्दी पूर्व से ही उठ गया है और उसके स्थान
में व्यंजन की दाहिनी ओर एक खड़ी लकीर '।' लगाई जाती है, परंतु कितने एक पुस्तकलेखकों को अब भी उसका ज्ञान है
और जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़ जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसके लिखने का स्थान नहीं होता तब वे
उसके ऊपर कुटिल लिपि का ノ चिन्ह लगा देते हैं.
३. जिस पत्थर के पात्र पर यह लेख खुदा है वह इस समय कलकत्ते के 'इंडियन म्यूज़िअम्' में है.
४. ज. रॉ. ए. सो; सन् १८६८, पृ. ३८६.
५. बुद्ध का देहांत (निर्वाण) ई.स. पूर्व ४८७ के क़रीब कुसिनार नगर में हुआ. उनके शरीर को चन्दन की
लकड़ियों से जला कर उनकी जली हुई अस्थियों के ८ हिस्से किये गये और राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लकप्प, राम-
ग्राम, पावा, वेठदीप और कुसिनार वालों ने उन्हें लेकर अपने अपने यहां उनपर स्तूप बनवाये. कपिलवस्तु शाक्यराज्य की
राजधानी थी और बुद्ध वहीं के शाक्यजाति के राजा शुद्धोदन का पुत्र था अत एव पिप्रावा के स्तूप से निकली हुई अस्थि
कपिलवस्तु के हिस्से की, और वहां का स्तूप बुद्ध के निर्वाण के समय के कुछ ही पीछे का बना हुआ, होना चाहिये. ऐसा
मानने में लिपिसंबंधी कोई भी बाधा नहीं आती.
६. ई. स. पूर्व ३२६ में भारतवर्ष पर चढ़ाई करनेवाले यूनान के बादशाह अलेक्ज़ैंडर (सिकंदर) के सेनापतियों
में से एक निआर्कस् भी था. वह उसके साथ पंजाब में रहा और वहां से नावों द्वारा जो सेना लड़ती भिड़ती सिंधु के
मुख तक पहुंची उसका सेनापति भी वही था. उसने इस चढ़ाई का विस्तृत वृत्तांत लिखा था, जिसका खुलासा एरि-
अन् ने अपनी 'इंडिका' नामक पुस्तक में किया.
७. मॅक्समुलर का लिखना है कि 'निआर्कस् भारतवासियों का रूई से काग़ज़ बनाने की कला का जानना
प्रकट करता है, मॅ. हि. ए. सं. लि; पृ. ३६७.
८. बू; इं. पे; पृ. ६.
९. ई.स. पूर्व ३०६ के आसपास सीरिआ के बादशाह सेल्युकस् (Seleukos Nikator) ने मॅगेस्थिनीज़ नामक