न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
न्यायबिन्दु १३
(उत्तर) सिद्धसम्बन्धमें प्रयोग किये जाने चाहिये । (यही दिखलाते हुए कहते हैं)
सर्व एते साधनधर्मा यथास्वं प्रमाणैः सिद्धसाधनधर्म-
मात्रानुबन्ध एव साध्यधर्मेऽवगन्तव्याः ।
यह स्वभावहेतु ( साधनधर्म ) निश्चितसाधनधर्ममात्रानुबन्धिसाधनधर्ममें ही प्रयोग
किये जाने चाहिये । अन्यत्र नहीं ।
( गमक होनेसे साधन और पराश्रित होनेसे धर्म कहा जाता है । साधन धर्म-
मात्रसे अभिप्राय केवल साधनधर्मसे ही है । अनुबन्ध अन्वयव्याप्तिको कहते हैं ।
जैसे—धूम पावकानुवन्धि ( अनुवन्धि-अनुबन्धवाला ) है । जो अपने अनुरूप
प्रमाणोंसे सिद्ध हो उसको यहाँ निश्चित कहा है । अतएव स्वभावहेतुका प्रयोग ऐसे
निश्चितसाधनधर्ममात्रको अनुबन्ध करने वाले साधनधर्ममें ही किया जाना चाहिये । )
तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् ।
[ क्योंकि जो साध्यधर्म साधनधर्ममात्रानुबन्धि है ] वह ही उस साधनधर्मका
स्वभाव है । और स्वभाव ही हेतु है ।
[ यद्यपि साध्यधर्म साधनका स्वभाव होता है, तथा साधन हेतु होता है तथापि
साधन प्रतिज्ञार्थैकदेशहेतु नहीं है । ]
( धर्म और धर्मी के समुदायको प्रतिज्ञा कहते हैं । एकदेश एक भाग को कहते
हैं । यदि प्रतिज्ञा ( धर्म और धर्मी ) के ही किसी भाग को ( धर्म या धर्मी को )
हेतु बनाया जावेगा तो वह प्रयोग साध्यको सिद्ध न कर सकनेके कारणसे हेतु का
एकदोष हो जाता है । जैसे—'अग्नि उष्ण है; क्योंकि वह उष्ण है' में 'उष्णत्व' हेतु
प्रतिज्ञार्थैकदेशहेतु है ! )
वस्तुतस्तयोस्तादात्म्यात्तन्निष्पत्तावनिष्पन्नस्य तत्स्वभा-
वत्वाभावाद् व्यभिचारसंभवाच्च ।
क्योंकि वास्तवमें साध्य और साधन का तादात्म्य होता है । और जो तन्निष्पत्तिमें
अनिष्पन्न है ( जो जिसका नियमसे कारण नहीं होता वह तन्निष्पत्ति ( उसकी उत्पत्ति )
में अनिष्पन्न ( उत्पन्न न होने वाला ) होता है ) वह उस स्वभाववाला नहीं होता और
उसमें व्यभिचार भी आता है ।
कार्यहेतोरपि प्रयोगः । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा महानसादा-
वस्ति चेह धूम इति । इहापि सिद्ध एव ।
कार्यहेतु का प्रयोग—
जहाँपर धूम होता है वहां अग्नि होती है; जैसे पाकशाला आदिमें । उसी प्रकार
यहाँ भी धूम है । इस लिये यहाँ भी अग्नि सिद्ध ही है ।
कार्यकारणभावे कारणे साध्ये कार्यहेतुर्वक्तव्यः ।
कार्यकारणभावमें कारणके साध्य होनेपर कार्यको हेतु कहना चाहिये ।
१४ भाषाटीका सहित
वैधर्म्यवतः प्रयोगो यत्समुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एव ।
यथा नीलादिविशेषः । न चैवमिहोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्य सत उप-
लब्धिर्घटस्येत्यनुपलब्धिप्रयोगः ।
वैधर्म्यवत् का प्रयोग—
जो सत् और उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता है वह अवश्य उपलब्ध होता है । जैसे—
नील आदि विशेष । उसी प्रकार यहाँ उपलब्धिलक्षणप्राप्त सत् घटकी उपलब्धि नहीं
है । अतएव यह अनुपलब्धि प्रयोग है ।
असत्यनित्यत्वे नास्ति सत्त्वमुत्पत्तिमत्त्वं कृतकत्वं वा ।
असच्च शब्द उत्पत्तिमान्कृतको वेति स्वभावहेतोः प्रयोगः ।
[ स्वभावहेतुके वैधर्म्यप्रयोगको कहते हैं—]
अनित्यत्व ( साध्य ) का अभाव होने पर भी सत्त्व, उत्पत्तिमत्त्व अथवा कृतकत्व नहीं
हो सकते । शब्द असत् होते हुए भी उत्पत्तिमान् तथा कृतक होता है, यह स्वभावहेतु
का प्रयोग है ।
असत्यग्नौ न भवत्येव धूमोऽत्र चास्तीति कार्यहेतोः प्रयोगः ।
अग्नि के न होने पर धूम भी नहीं होता, उसी प्रकार यहाँ है । ( अर्थात् अग्निके
न होनेसे धूम नहीं है ) । यह कार्यहेतु का प्रयोग है ।
साधर्म्येणापि हि प्रयोगेऽर्थाद्वैधर्म्यगतिरिति । असति
तस्मिन्साध्येनं हेतोरन्वयाभावात् ।
साधर्म्य ( अन्वय ) के प्रयोगसे वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) अर्थात् ही आ जाता है ।
क्योंकि व्यतिरेकके अभावमें हेतुका साध्यसे अन्वय न हो सकेगा ।
( व्याप्तिके दो भेद हैं । एक अन्वयव्याप्ति, दूसरी व्यतिरेकव्याप्ति । एकके होने
पर दूसरे का नियमसे होना अन्वय है । जैसे—धूमके सद्भावमें अग्निका सद्भाव अवश्य
होनेके कारण धूमका अग्निके साथ अन्वय है । एकके न होने पर दूसरेका भी
नियमसे न होना व्यतिरेक है । जैसे—अग्निके अभावमें धूम का अभाव ।
तथा वैधर्म्येणाप्यन्वयगतिः । असति तस्मिन्साध्यो-
भावे हेत्वभावस्यासिद्धेः ।
उसी प्रकार वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) से भी अन्वय स्वयं ही आ जाता है । क्योंकि
अन्वयके न होनेपर साध्यके अभावमें हेतुका अभाव भी सिद्ध न होगा ।
१. पीटर्सन संस्करण में 'साध्ये न' पाठ है । संस्कृत टीका में भी यही कर दिया गया है ।
किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है ।
२. पीटर्सन संस्करण में 'साध्यभावे' पाठ है । संस्कृत टीकामें भी यही कर दिया गया है ।
किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है ।
न्यायबिन्दु १५
न हि स्वभावप्रतिबन्धे सत्येकस्य निवृत्तावप-
रस्य नियमेन निवृत्तिः ।
स्वभावप्रतिबन्धके होनेपर एककी निवृत्तिमें दूसरेकी निवृत्ति नियमसे नहीं होती ।
स च द्विप्रकारः । सर्वस्य तादात्म्यलक्षणस्तदुत्पत्ति-
लक्षणश्चेत्युक्तम् ।
वह स्वभावप्रतिबन्ध ( सब प्रतिवद्धका ) दो प्रकारका होता है—
तादात्म्यलक्षण और तदुत्पत्तिलक्षण ।
तेन हि निवृत्तिं कथयता प्रतिबन्धो दर्शनीयः ।
[ स्वभावप्रतिबन्ध होनेपर निवर्त्यनिवर्तकभावके होनेके कारण से ] [ वह साध्यकी
निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिको कहनेवाले [ निवर्त्यनिवर्तकमें ] प्रतिबन्धको देखे ।
तस्मान्निवृत्तिवचनमाक्षिप्तप्रतिबन्धोपदर्शनमेव भवति ।
[ साधनके साध्यमें प्रतिबद्ध होनेसे साध्यकी निवृत्ति होनेपर साधनकी निवृत्ति भी
हो जाती है ] अतएव [ साध्यकी निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिका कहना उस प्रतिबन्ध
का दिखलाना ही हो जाता है ।
यच्च प्रतिबन्धोपदर्शनं तदेवान्वयवचनमित्येकेनापि वाक्येनान्व-
यमुखेन व्यतिरेकमुखेन वा प्रयुक्तेन सपक्षासपक्षयोर्लिङ्गस्य सदस-
त्त्वख्यापनं कृतं भवतीति नावश्यवाक्यद्वयप्रयोगः ।
और वह प्रतिबन्धोपदर्शन ही (प्रतिबन्ध का दिखलाना ही) अन्वयवचन है ।
इस प्रकार प्रयोग किये हुए एक ही अन्वयमुख अथवा व्यतिरेकमुख वाक्यसे सपक्षमें
लिङ्गका सत्त्व अथवा असत्त्व कहा जाता है । इस प्रकार दो वाक्योंके प्रयोगकी कोई
आवश्यकता नहीं रहती ।
अनुपलब्धावपि यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एवेत्युक्तेऽनु-
पलभ्यमानं तादृशमसदिति प्रतीतेरन्वयसिद्धिः ।
अनुपलब्धिमें भी 'जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है' ऐसा
कहने पर उसी प्रकारका 'अनुपलभ्यमान ( न मिलनेवाला ) पदार्थ असत् है' ऐसी
प्रतीति हो जानेसे अन्वयकी सिद्धि हो जाती है ।
द्वयोरप्यनयोः प्रयोगेऽवश्यं पक्षनिर्देशः ।
इन दोनों प्रयोगोंमें पक्षका निर्देश ( कहना ) अवश्य होना चाहिये ।
यस्मात्साधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं
सन्नोपलभ्यते सोऽसद्व्यवहारविषयः ।
क्योंकि साधर्म्यवत् प्रयोगमें भी जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध
नहीं होता वह असत् व्यवहारका विषय है ।
१६ न्या०
१६ भाषाटीका सहित
नोपलभ्यते चात्रोपलब्धिलक्षणप्राप्तो घट इत्युक्ते
सामर्थ्यादेव नेह घट इति भवति ।
'यहां उपलब्धिलक्षणप्राप्त घट नहीं है' ऐसा कहनेपर 'यहां घट नहीं है' यह
सामर्थ्यसे ही आ जाता है।
तथा वैधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि 'यः सद्द्व्यवहारविषय उपलब्धिलक्ष-
णप्राप्तः स उपलभ्यत एव, न तथात्र तादृशो घट उपलभ्यत'
इत्युक्ते सामर्थ्यादेव नेह सद्द्व्यवहारविषय इति भवति ।
उसी प्रकार वैधर्म्यवत् प्रयोगमें भी 'जो सद्द्व्यवहारका विषय और उपलब्धिलक्षण-
प्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है इसी प्रकार यहां वैसा घट उपलब्ध नहीं है' यह
कहनेपर सामर्थ्यसे ही 'यहां पर घट सद्द्व्यवहारका विषय नहीं है' यह हो जाता है।
कीदृशः पुनः पक्ष इति निर्देश्यः ।
'अब पक्ष कैसा होता है' यह कहा जाता है।
स्वरूपेणैव स्वयमिष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति ।
जो स्वरूपसे ही स्वयं इष्ट और अनिराकृत हो उसे पक्ष कहते हैं।
स्वरूपेणेति साध्यत्वेनेष्टः । स्वरूपेणैवेति साध्यत्वेनेष्टो न
साधनत्वेनापि ।
यथा शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये चाक्षुषत्वं हेतुः ।
'स्वरूपसे इष्ट' शब्दसे पक्षको साध्य बतलाया है। स्वरूपसे ही साध्यरूपसे ही माना
गया है साधनरूपसे भी नहीं माना गया ।
जैसे—शब्दकी अनित्यताको साध्य करनेमें चाक्षुषत्व ( नेत्रसे उत्पन्न होना )
हेतु देना ।
शब्देऽसिद्धत्वात्साध्यं न पुनस्तदिह साध्यत्वेनैवेष्टं साधनत्वे-
नाप्यभिधानात् ।
वह शब्दमें असिद्ध होनेसे साध्य है। उसको यहां केवल साध्य ही नहीं माना है।
क्योंकि उसे साधन भी कहा है।
'स्वयं इस पदका समर्थन—
स्वयमिति वादिना यस्तदा साधनमाह । एतेन यद्यपि क्वचि-
च्छास्त्रे स्थितः साधनमाह । तच्छास्त्रकारेण तस्मिन् धर्मिण्यनेकधर्मा-
भ्युपगमेऽपि यस्तदा तेन वादिना धर्मः स्वयं साधयितुमिष्टः स एव
साध्यो नेतर इत्युक्तं भवति ।
१. पीटर्सन संस्करण का 'निराकृतः' पाठ अशुद्ध है।
२, पीटर्सन संस्करण का 'स्थितसाधनमाह' पाठ हमारी सम्मति में अशुद्ध है।
न्यायबिन्दु १७
जो स्वयं वादीसे माना गया हो [ पक्ष वही होगा ] ( जो वादके समयमें साधनको
कहे उसे वादी कहते हैं ) इससे यद्यपि वादी किसी शास्त्रमें स्थिर रहकर साधनको
कहता है [ तथापि ] उस शास्त्रकारके उस धर्मीमें माने हुए अनेक धर्मीमें से भी वादी
जिस धर्मको साधना चाहे वही साध्य होता है, अन्य नहीं ।
'इष्ट' पदकी सार्थकता—
इष्ट इति यत्रार्थे विवादेन साधनमुपन्यस्तं तस्य सिद्धिमिच्छता
सोऽनुक्तोऽपि वचनेन साध्यस्तदधिकरणत्वाद्विवादस्य ।
वादीने विवादके द्वारा सिद्ध करनेकी इच्छा रखते हुए जिस अर्थमें साधन दिया
है वह अर्थ वचनसे न कहा जानेपर भी साध्य है, क्योंकि विवादका अधिकरण वही है ।
यथा परार्थाश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनासनाद्यङ्गवदिति। अत्रा-
त्मार्था इत्यनुक्तावप्यात्मार्थतानेनोक्तमात्रमेव साध्यमित्युक्तं भवति ।
जैसे—चक्षु आदि पदार्थ ( दूसरेके लिये ) हैं । क्योंकि वह शयन, आसन
आदि अङ्गोंके समान संघातरूप हैं । यहां पर 'आत्मार्थ ( आत्माके लिये )' यह न
कहे जानेपर भी तात्पर्यसे निकलने वाली आत्मार्थता ही साध्य है, ऐसा कहा जाता है ।
'अनिराकृत' इस पदका समर्थन—
अनिराकृत इति । एतल्लक्षणयोगेऽपि यः साधयितुमिष्टोऽप्यर्थः
प्रत्यक्षानुमानप्रतीतिस्ववचनैर्निराक्रियते न स पक्ष इति प्रदर्शनार्थम्¹ ।
जिस अर्थको सिद्ध करना चाहते हैं उसमें उपर्युक्त सब लक्षणोंके होनेपर भी
यदि वह प्रत्यक्ष, अनुमान, प्रतीति और स्ववचनसे निराकृत ( निराकरण किया
हुआ ) हो तो वह पक्ष नहीं हो सकता । [ अनिराकृत पद ] यह दिखलानेके लिये
दिया गया है ।
तत्र प्रत्यक्षनिराकृतो यथा—अश्रावणः शब्द इति ।
प्रत्यक्षनिराकृत ( जिसका प्रत्यक्ष प्रमाणसे निराकरण किया जावे )—
जैसे—शब्द कर्ण इन्द्रियका विषय नहीं है ।
अनुमाननिराकृतो यथा—नित्यः शब्द इति ।
अनुमाननिराकृत—
जैसे—शब्द नित्य है ।
प्रतीतिनिराकृतो यथा—अचन्द्रः शशीति ।
प्रतीतिनिराकृत—
जैसे—शशी चन्द्रशब्दका वाच्य नहीं है ।
स्ववचननिराकृतो यथा—नानुमानं प्रमाणम् ।
१. पीटर्सन संस्करण में यहाँ विराम चिह्न नहीं है ।
१८ भाषाटीका सहित
स्ववचननिराकृत --
जैसे—अनुमान प्रमाण नहीं है ।
एतदेव तु यद्यसत्यार्थमन्यान्यसत्यार्थानि न दर्शितानि भवन्ति ।
यदि इसीको असत्यार्थ कहें तो अन्य वचन असत्यार्थ नहीं कहे जा सकते ।
इति चत्वारः पक्षाभासा निराकृता भवन्ति ।
इस प्रकार चारों पक्षाभास निराकरण किये जाते हैं ।
सिद्धस्यासिद्धस्यापि साधनत्वेनाभिमतस्य स्वयं वादिना तदा
साधयितुमनिष्टस्योक्तमात्रस्य निराकृतस्य च विपर्ययेण साध्यस्तेनैव
स्वरूपेणाभिमतो वादिन इष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति पक्षलक्षणमनवद्यं
दर्शितं भवति ।
जो पदार्थ सिद्ध ( विपरीत हेतुसे सिद्ध किया हुआ भी साध्य हो सकता है )
अथवा असिद्ध भी साधनरूपसे माना गया हो, तथा स्वयंवादीको अभिष्ट न हो और
उपरोक्त प्रत्यक्ष आदि निराकृतोंसे विपरीत हो तथावादीके द्वारा साध्य माना गया हो,
तथा जो इष्ट और अनिराकृत हो वह पक्ष होता है । यह पक्षका निर्दोष लक्षण है ।
त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानमित्युक्तम् ।
इस प्रकार त्रिरूपलिङ्गका अभिधानरूप परार्थानुमान कहा गया ।
तत्र त्रयाणां रूपाणामेकस्यापि रूपस्यानुक्तौ साधनाभासः ।
उक्तावप्यसिद्धौ संदेहे वा ।
तीनों रूपोंमेंसे एकके भी न कहनेसे साधनाभास या हेत्वाभास हो जाता है ।
[ अथवा तीनों रूपोंके ] कहे जानेपर भी हेतुके असिद्ध होने या उसमें संदेह होनेसे
ही हेत्वाभास हो जाता है ।
प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोरेकस्य रूपस्य धर्मिसम्बन्धस्यासिद्धौ
संदेहे चासिद्धो हेत्वाभासः ।
प्रतिपाद्य और प्रतिपादकमेंसे धर्मिसम्बन्धी एकरूप ( पक्षधर्मत्व ) के सिद्ध न
होनेपर अथवा उसमें संदेह होनेपर असिद्धहेत्वाभास होता है ।
यथा अनित्यः शब्द इति साध्ये चाक्षुषत्वमुभयासिद्धम् ।
जैसे—‘शब्द अनित्य है, क्योंकि वह चाक्षुष ( चक्षुका विषय ) है’ में चाक्षुषत्व
हेतु उभयासिद्ध है । ( जो वादी और प्रतिवादी दोनों के लिये असिद्ध हो उसे उभया-
सिद्ध कहते हैं ) ।
१. पीटर्सन संस्करण का ‘निराकृतः’ पाठ अशुद्ध है ।
२. पी० सं० में यहाँ विराम न होने से हेत्वाभास सामान्य और असिद्ध हेत्वाभास का
लक्षण निकालने में बड़ी कठिनता पड़ती है ।
न्यायबिन्दु १६
चेतनास्तरव इति साध्ये सर्वत्वगपहरणे मरणं प्रतिवाद्यसिद्धं
विज्ञानेन्द्रियायुर्निरोधलक्षणस्य मरणस्यानेनाभ्युपगमात्तस्य च तरुष्व-
सम्भवात् ।
'वृक्ष सजीव होते हैं, क्योंकि वह सब छालके उतर जाने पर मर जाते हैं ( सूख
जाते हैं ) । इसमें वृक्षका सब छालके उतर जाने पर मर जाना प्रतिवादी ( बौद्ध )
को असिद्ध है । [ अतः यह प्रतिवाद्यसिद्ध हेत्वाभास है । ] क्योंकि बौद्धदर्शन विज्ञान,
इन्द्रिय और आयुके निरोध होनेको ही मरण मानता है, जिसका होना वृक्षोंमें
असम्भव है ।
अचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमत्त्वमनित्यं वा सांख्यस्य
स्वयं वादिनोऽसिद्धम् ।
'सुख आदि अचेतन हैं, क्योंकि वह उत्पत्तिमान् अथवा अनित्य हैं' इसमें
उत्पत्तिमत्व अथवा अनित्यत्व स्वयं वादी अर्थात् सांख्यको ही असिद्ध है । [ अतः
यह हेतु वाद्यसिद्ध है । ]
तथा स्वयं तदाश्रयस्य वा संदेहेऽसिद्धः ।
तथा स्वयं उस साध्यधर्मीके संदिग्ध होनेसे हेतु संदिग्धसिद्ध भी है ।
[ अपने आप संदेह किये हुएका उदाहरण — ]
यथा वाष्पादिभावेन संदिह्यमानो भूतसंघातोऽग्निसिद्धावुपदिश्य-
मानः संदिग्धसिद्धः ।
जैसे—वाष्प आदि भावसे सन्देह किया हुआ पृथ्वी आदिका समूह अग्निकी
सिद्धिके लिये ग्रहण किये जानेपर संदिग्धसिद्ध है । ( कहीं दूर पर धूल आदिको
उड़ती हुई देखकर उसको धूम समझकर उससे अग्निको सिद्ध करने लगनेसे
अभिप्राय है । )
[ आश्रयासिद्धका उदाहरण ]—
यथेह निकुञ्जे मयूरः केकायितादिति ।
तदापातदेशविभ्रमे ।
जैसे—इस निकुञ्जमें मोर है । क्योंकि इधरसे ही मोरका शब्द आ रहा है । उस
शब्दके आनेके स्थानमें विभ्रम हो सकनेसे यह आश्रयणासिद्ध है ।
धर्म्यसिद्धावप्यसिद्धो यथा सर्वगत आत्मेति साध्ये सर्वत्रो-
पलभमानगुणत्वम् ।
धर्मीके सिद्ध होनेपर भी असिद्ध—
जैसे—'आत्मा सर्वगत ( सर्वत्र व्याप्त ) है' इस साध्यमें सर्वत्र उपलब्ध होनेका गुण
असिद्ध है ।
२० भाषाटीका सहित
तथैकस्य रूपस्यासपक्षेऽसत्त्वस्या¹सिद्धावनैकान्तिको हेत्वाभासः ।
तथा एकरूप (असपक्षमें असत्त्व) की असिद्धिमें अनैकान्तिक हेत्वाभास होता है।
यथा शब्दस्यानित्यत्वादिके धर्मे साध्ये प्रमेयत्वादिको धर्मः
सपक्षविपक्षयोः ।
जैसे—शब्दके अनित्यत्व आदि धर्मके साध्यमें प्रमेयत्व आदि धर्म सपक्ष और
विपक्ष दोनोंमें रहते हैं।
सर्वत्रैकदेशे वा वर्तमानस्तथास्यैव रूपस्य संदेहेऽप्यनैकान्तिक एव ।
अथवा सर्वत्र या एकदेशमें रहने वाले इसी रूप (असपक्षमें असत्त्व) के संदेहमें
भी अनैकान्तिक ही है।
यथाऽसर्वज्ञः कश्चिद्विवक्षितः पुरुषो रागादिमान् वेति साध्ये
वक्तृत्वादिको धर्मः संदिग्धविपक्षव्यावृत्तिकः । सर्वत्रैकदेशे वा सर्वज्ञो
वक्ता नोपलभ्यते इति ।
जैसे—'कोई विवक्षित पुरुष सर्वज्ञ अथवा रागादिमान् है' इस साध्यमें वक्तृत्व
आदिधर्म संदिग्धविपक्षव्यावृत्ति वाले हैं। [क्योंकि] सर्वज्ञ वक्ता सर्वत्र अथवा एकदेशमें
कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
एवं प्रकारस्यानुपलम्भस्यादृश्यात्मविषयत्वेन संदेहे हेतुत्वात् ।
क्योंकि अदृश्यात्मविषय वाला (जिसका विषय अदृश्यात्मा है) अनुपलम्भ
संदेहमें कारण है।
असर्वज्ञविपर्ययाद्वक्तृत्वादेर्व्यावृत्तिः संदिग्धा । वक्तृत्वसर्वज्ञ-
त्वयोर्विरोधाभावाच्च ।
असर्वज्ञका विपर्यय होनेसे वक्तृत्व आदिकी व्यावृत्ति संदिग्ध है [निश्चय नहीं है।]
क्योंकि सर्वज्ञत्व और वक्तृत्वमें विरोधाभाव भी है।
( व्याप्तिमान् व्यतिरेकको बतलाते हैं— ]
यः सर्वज्ञः स वक्ता न भवतीत्यदर्शनेऽपि व्यतिरेको न
सिध्यति, सन्देहात्² ।
जो सर्वज्ञ होता है वह वक्ता नहीं होता। इस प्रकार सर्वज्ञ वक्ता के न देखे जाने
पर भी व्यतिरेक सिद्ध नहीं होता। क्योंकि उसमें सन्देह है।
द्विविधो हि पदार्थानां विरोधः ।
पदार्थोंका विरोध दो ही प्रकारका होता है। [जिनमेंसे प्रथम विरोध दिखलाया
जाता है—]
१. पी० सं० का 'सत्वस्य' पाठ अशुद्ध है।
२. पी० सं० में 'संदेहात्' के पश्चात् विरामचिह्न न देकर उसकी अगले वाक्यमें सन्धि कर
दी है, जिससे उसका अर्थ कुछ नहीं बैठता।
[ न्यायबिन्दु २१
अविकलकारणस्य भवतोऽन्यभावः ।
अविकल (सम्पूर्ण) कारणवाले (जिसके सब कारण उपस्थित हों) विद्यमान
पदार्थका अन्यभाव होना (विद्यमानसे अन्यभाव अर्थात् अभाव होना।)
अभावाद्विरोधगतिः ।
अभावसे ही विरोध चल सकता है।
शीतोष्णस्पर्शवत् ।
जैसे—शीतस्पर्श और उष्णस्पर्श का विरोध है।
अब दूसरे विरोधको दिखलाते हैं—
परस्परपरिहारस्थितलक्षणतया वा भाववत् ।
परस्परपरिहारस्थितलक्षणतासे भावके समान विरोध है। (जो एक दूसरेका
परिहार करके अथवा उसका अभाव करके स्थित हों वह वस्तुएं परस्परपरिहारस्थित-
लक्षण वाली हैं। जैसे—भाव और अभाव।)
स च द्विविधोऽपि विरोधो वक्तृत्वसर्वज्ञत्वयोर्न सम्भवति ।
वह दोनों ही प्रकारका विरोध वक्तृत्व और सर्वज्ञत्वमें संभव नहीं है।
न चाविरुद्धविधेरनुपलब्धावप्यभावगतिः। रागादीनां वचनादेश्च
कार्यकारणभावासिद्धेः ।
अविरुद्धविधिकी अनुपलब्धिमें भी अभाव नहीं हो सकता। क्योंकि राग आदिकों
और वचन आदिका कार्यकारणभाव असिद्ध है।
अर्थान्तरस्य वा कारणस्य निवृत्तौ न वचनादेर्निवृत्तिरिति
संदिग्धव्यतिरेकोऽनैकान्तिको वचनादिः ।
अथवा अर्थान्तरकारणकी निवृत्तिमें (सहचारिके दर्शनमात्रसे) वचन आदि की
निवृत्ति नहीं होती। अतएव सर्वज्ञमें वचन आदि संदिग्धव्यतिरेक अनैकान्तिक हैं।
द्वयो रूपयोर्विपर्ययसिद्धौ विरुद्धः ।
दो रूपोंके विरुद्ध सिद्ध हो जानेपर विरुद्ध हेत्वाभास होता है।
कयोर्द्वयोः ? सपक्षे सत्त्वस्यासपक्षे चासत्त्वस्य । यथाकृत-
कत्वं प्रयत्नानन्तरीयकत्वं च नित्यत्वे साध्ये विरुद्धो हेत्वाभासः ।
किन दो के ? सपक्षमें सत्त्व और असपक्षमें असत्त्व के ।
जैसे—नित्यत्वके सिद्ध करनेमें कृतकत्व और प्रयत्नानन्तरीयकत्व विरुद्ध
हेत्वाभास हैं।
अनयोः सपक्षेऽसत्त्वमसपक्षे च सत्त्वमिति विपर्ययसिद्धिः ।
इन दोनोंके सपक्षमें न रहने और असपक्षमें रहनेसे विपर्ययकी सिद्धि होती है।
१. पी० सं० का 'सपक्षे' पाठ ठीक नहीं है।
२२ भाषाटीका सहित
एतौ च साध्यविपर्ययसाधनाद्विरुद्धौ ।
यह दोनों साध्य ( नित्यत्व ) के विपरीत ( अनित्यत्व ) का साधन करनेसे
विरुद्ध हैं।
तत्र च तृतीयोऽपीष्टविघातकृद्विरुद्धः ।
एक तीसरा इष्टविघातकृत् विरुद्ध भी है।
यथा परार्थाश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनाशनाद्यङ्गवदिति ।
जैसे—चक्षु आदि परार्थ हैं। क्योंकि वह शयन, आसन आदि पुरुषके उपभोगके
अङ्गोंके समान संघात ( परमाणुसंचितिरूप ) हैं।
तदिष्टसंहतपरार्थ्यविपर्ययसाधनाद्विरुद्धः ।
वह [ वादी सांख्यके ] इष्ट असंहत ( विषय ) की परार्थताके विपरीत को साधन
करनेसे विरुद्ध है।
स इह कस्मान्नोक्तः ?
वह यहां क्यों नहीं कहा गया ?
अनयोरेवान्तर्भावात् ।
क्योंकि उसका इन दोनोंमें ही अन्तर्भाव हो जाता है।
न ह्ययमाभ्यां साध्यविपर्ययसाधनत्वेन भिद्यते ।
क्योंकि यह इष्टविघातकृत् इन दोनों हेतुओंसे साध्यविपर्ययसाधनताकी अपेक्षा
भिन्न नहीं है।
न हीष्टोक्तयोः साध्यत्वेन कश्चिद्विशेषः इति द्वयो रूपयोरेकस्या-
सिद्धावपरस्या च संदेहेऽनैकान्तिकः ।
क्योंकि इष्ट और उक्तमें [ एक दूसरेका साध्य होनेसे ] कोई विशेष नहीं है।
अतएव दो रूपोंमेंसे एकके असिद्ध होने तथा दूसरेके संदिग्ध होनेसे अनैकान्ति-
कता आती है।
यथा वीतरागः कश्चित्सर्वज्ञो वा वक्तृत्वादिति
व्यतिरेकोऽत्रासिद्धः । संदिग्धोऽन्वयः ।
जैसे—कोई वीतराग अथवा सर्वज्ञ है, क्योंकि वह वक्ता है। यहाँ पर व्यतिरेक
असिद्ध और अन्वय संदिग्ध है।
सर्वज्ञवीतरागयोर्विप्रकर्षाद्वचनादेस्तत्र सत्त्वमसत्त्वं वा संदिग्ध-
मनयोरेव द्वयो रूपयोः संदेहेऽनैकान्तिकः ।
सर्वज्ञ और वीतरागके विप्रकर्ष ( दूर ) होनेसे वहां वचन आदिका होना या न
होना संदिग्ध है। अतएव इन दोनों रूपोंमें संदेह होनेसे वक्तृत्व हेतु अनैकान्तिक है।
न्यायबिन्दु २३
सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति ।
जैसे—जीवित शरीर आत्मासहित है, क्योंकि उसमें प्राण आदि हैं।
न हि सात्मकनिरात्मकाभ्यामन्यो राशिरस्ति ।
यत्र प्राणादिर्वर्तते ।
सात्मक और निरात्मकसे भिन्न ऐसी कोई राशि नहीं है जहां प्राण आदि हों ।
आत्मनो वृत्तिव्यवच्छेदाभ्यां सर्वसंग्रहात् ।
आत्माके सद्भाव और अभावसे सबका संग्रह करनेसे [ अन्यराशिका अभाव है । ]
नाप्यनयोरेकत्र वृत्तिनिश्चयः ।
इन दोनों [ सात्मक और निरात्मक ] में एक स्थानमें सद्भावका निश्चय नहीं है ।
सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्धे प्राणादेरसिद्धिः ।
क्योंकि सात्मक अथवा निरात्मक रूपसे प्रसिद्ध होनेसे प्राण आदिकी असिद्धि
हो जावेगी ।
तस्माज्जीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः ।
अतएव प्राण आदि जीवितशरीर-सम्बन्धी हैं।
सात्मकादनात्मकाच्च सर्वस्माद्व्यावृत्तत्वेनासिद्धेः ।
क्योंकि सात्मक और निरात्मक सबसे व्यावृत्त होनेसे असिद्ध है ।
ताभ्यां न व्यतिरिच्यते न तत्रान्वेति । एकात्मन्यप्यसिद्धेः ।
उसका न तो उन दोनोंसे व्यतिरेक और न अन्वय ही है । क्योंकि वह (दोनों)
एक आत्मामें भी सिद्ध नहीं हो सकते ।
नापि सात्मकान्निरात्मकाच्च तस्यान्वयव्यतिरेकयोरभावनिश्चयः ।
सात्मक और निरात्मकसे भी उसके अन्वय और व्यतिरेकके अभावका निश्चय
नहीं होता ।
एकाभावनिश्चयस्यापराभावनान्तरीयकत्वात् ।
क्योंकि एक के अभावका निश्चय दूसरेके अभावके निश्चय का अव्यभिचारी होता है।
अन्वयव्यतिरेकयोरन्योन्यव्यवच्छेदरूपत्वात् ।
क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक अन्योन्यव्यवच्छेद रूप हैं।
अत एवान्वयव्यतिरेकयोः सन्देहादनैकान्तिकः ।
अतएव अन्वय और व्यतिरेकमें सन्देह होनेसे अनैकान्तिक है।
साध्येतरयोरतो निश्चयाभावात् ।
क्योंकि इससे साध्य और उसके विरोधीके निश्चयका अभाव है ।
१७ न्या०
२४ भाषाटीका सहित
एवं त्रयाणां रूपाणामेकैकस्य द्वयोर्द्वयोर्वा रूपयोरसिद्धौ संदेहे
च यथायोगमसिद्धविरुद्धानैकान्तिकास्त्रयो हेत्वाभासाः ।
इस प्रकार तीनों रूपोंमें से एक २ अथवा दो २ रूपों के असिद्ध अथवा सन्दिग्ध
होने पर यथायोग असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक ये तीन हेत्वाभास होते हैं ।
विरुद्धाव्यभिचार्यपि संशयहेतुरुक्तः । स इह कस्मान्नोक्तः ?
( शंका ) विरुद्धाव्यभिचारी भी संशयका कारण कहा गया है । उसको यह क्यों
नहीं कहा ?
( जो हेत्वन्तरसे सिद्ध किये हुए के विरुद्ध होता है वह व्यभिचारको प्राप्त नहीं
होता । वही विरुद्धाव्यभिचारी है । अथवा जो विरुद्ध होते हुए अन्य साधनसे सिद्ध
किये हुए धर्मके विरुद्ध साधन करनेसे व्यभिचारी हो वह अपने साध्यसे व्यभिचरित
न होनेसे विरुद्धाव्यभिचारी होता है । जैसे हेत्वन्तर धूमसे सिद्ध किये हुए अग्नियुक्त
पर्वत के जलयुक्त तालाब विरुद्ध है । अतएव तालाब पर्वत में व्यभिचरित नहीं हो
सकता । अथवा जो विरुद्ध होते हुए अन्य साधन धूम से सिद्ध किये हुए धर्म अग्नि
के विरुद्ध जल को सिद्ध न करनेसे उसमें अव्यभिचारी हो वह अपने साध्यसे व्यभिचरित
न होनेसे विरुद्धाव्यभिचारी है । )
अनुमानविषयेऽसंभवात् ।
( उत्तर ) अनुमान के विषय ( त्रैरूप्य ) में असम्भव होनेसे उसका कथन यहाँ
नहीं किया गया है ।
न हि संभवोऽस्ति कार्यस्वभावयोरुक्तलक्षणयोरनुपलम्भस्य च
विरुद्धतायाः । न चान्योऽव्यभिचारी ।
क्योंकि उक्त लक्षण ( त्रैरूप्य ) वाले कार्य, स्वभाव और अनुपलब्ध की विरुद्धता
सम्भव नहीं है । और [ उनसे भिन्न ] अन्य कोई अव्यभिचारी भी नहीं है, [ अतएव
उन्हींमें हेतुता है । ]
[ तब आचार्य दिङ्नागने इस हेतुदोषको किस स्थल पर कहा है ? इसके लिये
कहते हैं— ]
तस्माद्वस्तुदर्शनबलप्रवृत्तमागमाश्रयमनुमानमाश्रित्य तदर्थ-
विचारेषु विरुद्धाव्यभिचारी साधनदोष उक्तः ।
अवस्तु के दर्शन के बलसे प्रवृत्त हुए आगमाश्रय अनुमानका आश्रय लेकर उसके
अर्थके विचारोंमें विरुद्धाव्यभिचारी साधन दोष कहा है ।
शास्त्रकाराणामर्थेषु भ्रान्त्या विपरीतस्य स्वभावोपसंहारसंभवात् ।
क्योंकि अर्थमें भ्रान्ति हो जानेसे शास्त्रकारोंका विपरीतको स्वभाव कह देना
सम्भव है ।
न्यायबिन्दु २५
न ह्यस्य सम्भवो यथावस्थितवस्तुस्थितित्त्वादात्मकार्येषूपलम्भेषु ।
यह यथावस्थितवस्तुकी स्थिति और आत्मकार्यों के उपलम्भ में सम्भव नहीं है ।
तत्रोदाहरणं यत्सर्वदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभिः सम्बध्यते
तत्सर्वगतं यथाकाशमभिसंबध्यते सर्वदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभि-
र्युगपत्सामान्यमिति ।
इसका उदाहरण—जो सर्वदेशावस्थित ( सब स्थानों में रहने वाले ) अपने
सम्बन्धियों से सम्बन्धित होता है वह सर्वगत है । जैसे—आकाश सर्वदेशावस्थित
स्वसम्बन्धियों से एक साथ सामान्य ही सम्बन्धित होता है ।
तत्संबन्धिस्वभावमात्रानुबन्धिनी तद्देशसंनिहितस्वभावता ।
तद्देशसंनिहितस्वभावता तत्सम्बन्धिस्वभावमात्रको कारण करने वाली है ।
न हि यो यत्र नास्ति स तद्देशमात्मना व्याप्नो-
तीति स्वभावहेतुप्रयोगः ।
'जो जहाँ पर नहीं है वह उस प्रदेशको अपने द्वारा व्याप्त भी नहीं करता' यह
स्वभावहेतु का प्रयोग है ।
द्वितीयोऽपि प्रयोगो यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं सन्नोपलभ्यते न
तत्तत्रास्ति । तद्यथा कचिदविद्यमानो घटः ।
दूसरा प्रयोग—जो उपलब्धि लक्षण प्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध नहीं होता वह
वहाँ पर नहीं है । जैसे—कहीं अविद्यमान घट ।
नोपलभ्यते चोपलब्धिलक्षणप्राप्तं सामान्यं व्यक्त्यन्तरालेष्विति ।
व्यक्तियों के अन्तराल में उपलब्धिलक्षण प्राप्त सामान्य उपलब्ध नहीं होता ।
अयमनुपलम्भप्रयोगः स्वभावश्च परस्परविरुद्धार्थ-
साधनादेकत्र संशयं जनयतः ।
यह अनुपलब्धप्रयोग और स्वभाव परस्पर विरुद्ध अर्थको साधन करने से एक
स्थान में संशय को उत्पन्न करते हैं ।
त्रिरूपो हेतुरुक्तः ।
इस प्रकार त्रिरूप हेतु कह दिया ।
तावतैवार्थप्रतीतिर्न पृथग्दृष्टान्तो नाम साधनावयवः कश्चित् ।
तेन नास्य लक्षणं पृथगुच्यते, गतार्थत्वात् ।
१. पी० सं० में 'न' नहीं है । डाक्टर शतीशचन्द्र विद्याभूषण के लेखसे विदित होता है
कि न्यायविन्दु के तिब्बती भाषा के अनुवाद में 'न' है । हमारी सम्मति में भी यहाँ इसका
होना आवश्यक है !
२६ भाषाटीका सहित
उतनेसे ही अर्थकी प्रतीति हो जानेसे दृष्टान्त नामवाला कोई पृथक् अवयव साधन
में नहीं है । इसलिये उसका लक्षण पृथक् नहीं कहा [ क्योंकि उतने से ही ] अर्थ
विदित हो जाता है ।
हेतोः सपक्ष एव सत्त्वमसपक्षाच्च सर्वतो व्यावृत्तौ रूपमुक्त-
मभेदेन पुनर्विशेषेण कार्यस्वभावयोर्जन्मत-
न्मात्रानुबन्धौ दर्शनीयावुक्तौ ।
क्योंकि हेतु का सपक्ष में ही रहना और सब विपक्षोंका उससे शून्य रहना ये
दोनों रूप कह दिये । विशेष अभेदसे कार्य जन्म [ ज्ञातव्य ] और स्वभाव का तन्मात्रा-
नुबन्ध दर्शनीय कह दिया ।
तच्च दर्शयता यत्र धूमस्तत्राग्निरसत्यग्नौ न क्वचिद् धूमो
यथा महानसेतरयोः ।
उसको दिखलाते हुए 'जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है' । अग्नि के अभाव
में धूम भी नहीं होता । जैसे पाकशाला और तालाब में ।'
यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वमनित्यत्वाभावे कृतकत्वासंभवो
यथा घटाकाशयोरिति दर्शनीयम् ।
जहाँ कृतकत्व होता है वहाँ अनित्य होता है । अनित्यत्व के अभाव में कृतकत्व
असम्भव है । जैसे घट और आकाश में । यह सब देखना चाहिए ।
न ह्यन्यथा सपक्षविपक्षयोः सदसत्त्वे यथोक्त-
प्रकारे शक्ये दर्शयितुम् ।
तत्कार्यतानियमः कार्यलिङ्गस्य स्वभावलिङ्गस्य
च स्वभावेन व्याप्तिः ।
क्योंकि अन्यथा यथोक्तप्रकार के सपक्ष और विपक्षमें सत्त्व और असत्त्व और
कार्यलिङ्ग का तत्कार्यतानियम और स्वभावलिङ्ग की स्वभाव से व्याप्ति नहीं दिखलायी
जा सकती ।
अस्मिंश्चार्थे दर्शिते दर्शित एव दृष्टान्तो भवति ।
इस अर्थ के समझ जाने पर दृष्टान्त समझ में आ ही जाता है ।
एतावन्मात्ररूपत्वात्तस्येति ।
क्योंकि वह केवल उतना ही है ।
एतेनैव दृष्टान्तदोषा अपि निरस्ता भवन्ति ।
इससे ही दृष्टान्तदोषों का भी निराकरण हो जाता है ।
यथा-नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् , कर्मवत्परमाणुवद् घटवदिति ।
न्यायबिन्दु २७
जैसे—शब्द नित्य है, क्योंकि वह कर्म, परमाणु और घटके समान अमूर्त है ।
साध्यसाधनधर्मोभयविकलास्तथा सन्दिग्धसाध्यधर्मादयश्च ।
साध्यधर्मविकल, साधनधर्मविकल, उभयविकल तथा सन्दिग्धसाध्यधर्म आदि
(सन्दिग्धसाधनधर्म तथा सन्दिग्धोभय) [दृष्टान्त दोष हैं]। (इनमें से कर्म
साध्यविकल, परमाणु साधनविकल और घट उभयविकल दृष्टान्त हैं।)
यथा रागादिमानयं वचनाद्रथ्यापुरुषवत् ।
जैसे—यह राग आदि से युक्त हैं, क्योंकि मार्गमें चलनेवाले पुरुषके समान
बोलता है (यह संदिग्धसाध्यधर्म का उदाहरण है)।
मरणधर्मोऽयं पुरुषो रागादिसत्त्वाद्रथ्यापुरुषवत् ।
यह पुरुष मरणधर्मवाला है, क्योंकि यह मार्ग में चलने वालों के समान
रागादिमान् है। (यह संदिग्धसाधनधर्म दृष्टान्त है।)
असर्वज्ञोऽयं रागादिमत्त्वाद्रथ्यापुरुषवदिति ।
यह असर्वज्ञ है क्योंकि यह रथ्यापुरुष (मार्ग में चलने वाले पुरुष) के समान
रागादिमान् है। (यह सन्दिग्धोभय दृष्टान्त है।)
अनन्वयोऽप्रदर्शितान्वयश्च ।
अनन्वय और अप्रदर्शितान्वय भी [दृष्टान्त दोष हैं।]
(जिस दृष्टान्तमें साध्य और साधनमें सम्भवता तो दिखलाई दे किन्तु वह
साध्यसे व्याप्त न हो वह अनन्वय है। जिस दृष्टान्त में अन्वय के होते हुए भी उसे
कहने वाले ने दिखलाया न हो उसे अप्रदर्शितान्वय कहते हैं।)
यथा यो वक्ता स रागादिमानिष्टपुरुषवत् ।
जैसे—जो वक्ता होता है वह इष्ट पुरुष के समान रागादिमान् होता है। (यह
अनन्वय का उदाहरण है।)
अनित्यः शब्दः कृतकत्वाद्घटवदिति ।
शब्द अनित्य है। क्योंकि वह घटके समान कृतक होता है। (यह अप्रदर्शि-
तान्वय का उदाहरण है।)
तथा विपरीतान्वयः ।
तथा विपरीतान्वय—
यदनित्यं तत्कृतकम् ।
जो अनित्य होता है वह कृतक होता है।
इति साधर्म्येण ।
यह साधर्म्य से [नौ दृष्टान्त कह दिए।]
वैधर्म्येणापि परमाणुवत्कर्मवदाकाशवदिति साध्याद्यव्यतिरेकिणः ।
२८ भाषाटीका सहित
वैधर्म्य से भी 'परमाणु, कर्म और आकाशके समान' ये साध्याव्यतिरेकि आदि
दृष्टान्त दोषों के उदाहरण हैं ।
(इसमें परमाणु साध्याव्यतिरेकि, कर्म साधनाव्यतिरेकि और आकाश उभया-
व्यतिरेकि दृष्टान्त हैं ।)
तथा संदिग्धसाध्यव्यतिरेकादयः ।
तथा संदिग्धसाध्यव्यतिरेक आदि—
यथाऽसर्वज्ञाः कपिलादयोऽनाप्ता वा । अविद्यमानसर्वज्ञताप्त-
तालिङ्गभूतप्रमाणातिशयशासनत्वादिति ।
जैसे—कपिल आदि असर्वज्ञ अथवा अनाप्त हैं, क्योंकि उनमें सर्वज्ञता का
लिङ्गभूत प्रमाणातिशयशासन नहीं है ।
अत्र वैधर्म्योदाहरणं यः सर्वज्ञ आप्तो वा स ज्योति-
र्ज्ञानादिकमुपदिष्टवान् ।
यद्यथा-ऋषभवर्धमानादिरिति ।
इस प्रमाणमें वैधर्म्य उदाहरण—
जो सर्वज्ञ या आप्त होता है वह ज्योतिर्ज्ञान आदि का उपदेश देता है । जैसे—
ऋषभ और वर्धमान आदि [ जैन तीर्थंकर । ]
तत्रासर्वज्ञतानाप्ततयोः साध्यधर्मयोः संदिग्धो व्यतिरेकः ।
क्योंकि साध्यधर्म असर्वज्ञता और अनाप्तता में व्यतिरेक सन्दिग्ध है ।
संदिग्धसाधनव्यतिरेकः ।
यथा—न त्रयीविदा ब्राह्मणेन ग्राह्यवचनः कश्चि-
त्पुरुषो रागादिमत्त्वादिति ।
सन्दिग्धसाधन व्यतिरेक—
कोई पुरुष त्रयीवित् (जो ऋक्, यजुः और साम इन तीनों वेदों को जानता है )
ब्राह्मणसे ग्राह्यवचनवाला (जिसका वचन ग्रहण किये जाने योग्य हो) नहीं हैं।
क्योंकि पुरुष राग आदि से युक्त होता है ।
अत्र वैधर्म्योदाहरणम् ।
ये ग्राह्यवचना न ते रागादिमन्तस्तद्यथा गौतमादयो धर्मशास्त्राणां
प्रणेतार इति गौतमादिभ्यो रागादिमत्त्वस्य साधनधर्मस्य व्यावृत्तिः।
उसमें वैधर्म्योदाहरण—
जो ग्राह्यवचन वाले होते हैं । वह रागादिमान् नहीं होते । जैसे—गौतम आदि
१. पी० सं० में 'सर्वज्ञाः' पाठ है, जो अशुद्ध है ।
न्यायबिन्दु २६
धर्मशास्त्रोंके बनानेवाले। इस प्रकार गौतम आदिसे रागादिमत्त्व साधनधर्म की
व्यावृत्ति की।
संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेकः ।
यथाऽवीतरागाः कपिलादयः परिग्रहाग्रहयोगादिति ।
संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेक—
जैसे—कपिल आदि वीतराग नहीं है; क्योंकि उनमें परिग्रह और आग्रह है।
अत्र वैधर्म्योदाहरणम् ।
यो वीतरागो न तस्य परिग्रहाग्रहौ यथा ऋषभादेरिति ।
ऋषभादेरवीतरागत्वपरिग्रहाग्रहयोगयोः साध्यसाधनधर्मयोः
संदिग्धो व्यतिरेकः ।
इसमें वैधर्म्योदारण—
जो वीतराग होता है उसके परिग्रह और आग्रह नहीं होता। जैसे—ऋषभ आदि।
ऋषभ आदि के साध्यधर्म अवीतरागत्व और साधनधर्म परिग्रह और आग्रहके योगमें
व्यतिरेक संदिग्ध है।
अव्यतिरेको यथाऽवीतरागो वक्तृत्वात् ।
अव्यतिरेक—
वक्ता होनेसे वीतराग नहीं है।
वैधर्म्योदाहरणं यत्र वीतरागत्वं नास्ति स वक्ता । यथोपलखण्ड
इति । यद्यप्युपलखण्डादुभयं व्यावृत्तया सर्वो वीतरागो न
वक्तेति व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेरव्यतिरेकः ।
वैधर्म्योदाहरण—
जिसमें वीतरागता होती है वह वक्ता नहीं होता। जैसे—पाषाणखण्ड। यद्यपि
पाषाणखण्डसे दोनों की व्यावृत्ति हो जानेसे 'सभी वीतराग वक्ता नहीं होते' इस व्याप्तिसे
व्यतिरेकके सिद्ध न होनेसे अव्यतिरेक है।
अप्रदर्शितव्यतिरेको यथा—अनित्यः शब्दः कृतकत्वादाकाशवदिति।
अप्रदर्शितव्यतिरेक—
जैसे—शब्द अनित्य है; क्योंकि वह आकाशके समान कृतक है।
वैधर्म्येणापि विपरीतव्यतिरेको यथा यदकृतकं तन्नित्यं भवतीति ।
वैधर्म्यसे भी विपरीतव्यतिरेक—
जो कृतक नहीं होता वह नित्य होता है।
न ह्येभिर्दृष्टान्ताभासै र्हेतोः सामान्यलक्षणं सपक्ष एव सत्त्वं विपक्षे
३० भाषाटीका सहित
च सर्वत्रासत्त्वमेव निश्चयेन शक्यं दर्शयितुं विशेषलक्षणं वा ।
इन दृष्टान्ताभासों से हेतुका सामान्यलक्षण, सपक्षमें ही रहना और विपक्षमें सर्वत्र
अभाव अथवा विशेषलक्षणको निश्चय रूपसे दिखला ही नहीं सकते ।
तदर्थापत्त्यैषां निरासो वेदितव्यः ।
अत एव उनका निराकरण अर्थापत्ति ( सामर्थ्य ) से ही जान लेना चाहिये ।
दूषणं न्यूनतायुक्तिः ।
न्यूनता का कहना दूषण है ।
ये पूर्वं न्यूनतादयः साधनदोषा उक्तास्तेषामुद्भावनं दूषणम् ।
जो पहिले न्यूनता आदि साधनदोष कहे हैं उनका कहना दूषण है ।
तेन परेष्टार्थसिद्धिप्रतिबन्धात् ।
क्योंकि उससे दूसरेके इष्ट अर्थ की सिद्धिमें रुकावट होती है ।
दूषणाभासास्तु जातयः ।
दूषणाभास जातियाँ हैं ।
अभूतदोषोद्भावनानि जात्युत्तराणीति ।
अभूत दोषका प्रकट करना जात्युत्तर है ।
इति तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
न्यायबिन्दुः समाप्तः ।
इति तृतीय परिच्छेद समाप्त ।
न्यायविन्दु समाप्त ।
१. मुद्रित पुस्तक में 'अनुभूत०' पाठ है । किन्तु टीका से हमारे ही पाठ की पुष्टि होती है ।
इसके अतिरिक्त पहिले पाठ से अर्थ भी ठीक नहीं बैठता ।
इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (Text) अंकित नहीं है; यह एक कोरा पृष्ठ (Blank Page) है।
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