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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

न्यायबिन्दु २५
न ह्यस्य सम्भवो यथावस्थितवस्तुस्थितित्त्वादात्मकार्येषूपलम्भेषु ।
यह यथावस्थितवस्तुकी स्थिति और आत्मकार्यों के उपलम्भ में सम्भव नहीं है ।
तत्रोदाहरणं यत्सर्वदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभिः सम्बध्यते
तत्सर्वगतं यथाकाशमभिसंबध्यते सर्वदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभि-
र्युगपत्सामान्यमिति ।
इसका उदाहरण—जो सर्वदेशावस्थित ( सब स्थानों में रहने वाले ) अपने
सम्बन्धियों से सम्बन्धित होता है वह सर्वगत है । जैसे—आकाश सर्वदेशावस्थित
स्वसम्बन्धियों से एक साथ सामान्य ही सम्बन्धित होता है ।
तत्संबन्धिस्वभावमात्रानुबन्धिनी तद्देशसंनिहितस्वभावता ।
तद्देशसंनिहितस्वभावता तत्सम्बन्धिस्वभावमात्रको कारण करने वाली है ।
न हि यो यत्र नास्ति स तद्देशमात्मना व्याप्नो-
तीति स्वभावहेतुप्रयोगः ।
'जो जहाँ पर नहीं है वह उस प्रदेशको अपने द्वारा व्याप्त भी नहीं करता' यह
स्वभावहेतु का प्रयोग है ।
द्वितीयोऽपि प्रयोगो यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं सन्नोपलभ्यते न
तत्तत्रास्ति । तद्यथा कचिदविद्यमानो घटः ।
दूसरा प्रयोग—जो उपलब्धि लक्षण प्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध नहीं होता वह
वहाँ पर नहीं है । जैसे—कहीं अविद्यमान घट ।
नोपलभ्यते चोपलब्धिलक्षणप्राप्तं सामान्यं व्यक्त्यन्तरालेष्विति ।
व्यक्तियों के अन्तराल में उपलब्धिलक्षण प्राप्त सामान्य उपलब्ध नहीं होता ।
अयमनुपलम्भप्रयोगः स्वभावश्च परस्परविरुद्धार्थ-
साधनादेकत्र संशयं जनयतः ।
यह अनुपलब्धप्रयोग और स्वभाव परस्पर विरुद्ध अर्थको साधन करने से एक
स्थान में संशय को उत्पन्न करते हैं ।
त्रिरूपो हेतुरुक्तः ।
इस प्रकार त्रिरूप हेतु कह दिया ।
तावतैवार्थप्रतीतिर्न पृथग्दृष्टान्तो नाम साधनावयवः कश्चित् ।
तेन नास्य लक्षणं पृथगुच्यते, गतार्थत्वात् ।
१. पी० सं० में 'न' नहीं है । डाक्टर शतीशचन्द्र विद्याभूषण के लेखसे विदित होता है
कि न्यायविन्दु के तिब्बती भाषा के अनुवाद में 'न' है । हमारी सम्मति में भी यहाँ इसका
होना आवश्यक है !