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न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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[ न्यायबिन्दु २१
अविकलकारणस्य भवतोऽन्यभावः ।
अविकल (सम्पूर्ण) कारणवाले (जिसके सब कारण उपस्थित हों) विद्यमान
पदार्थका अन्यभाव होना (विद्यमानसे अन्यभाव अर्थात् अभाव होना।)
अभावाद्विरोधगतिः ।
अभावसे ही विरोध चल सकता है।
शीतोष्णस्पर्शवत् ।
जैसे—शीतस्पर्श और उष्णस्पर्श का विरोध है।
अब दूसरे विरोधको दिखलाते हैं—
परस्परपरिहारस्थितलक्षणतया वा भाववत् ।
परस्परपरिहारस्थितलक्षणतासे भावके समान विरोध है। (जो एक दूसरेका
परिहार करके अथवा उसका अभाव करके स्थित हों वह वस्तुएं परस्परपरिहारस्थित-
लक्षण वाली हैं। जैसे—भाव और अभाव।)
स च द्विविधोऽपि विरोधो वक्तृत्वसर्वज्ञत्वयोर्न सम्भवति ।
वह दोनों ही प्रकारका विरोध वक्तृत्व और सर्वज्ञत्वमें संभव नहीं है।
न चाविरुद्धविधेरनुपलब्धावप्यभावगतिः। रागादीनां वचनादेश्च
कार्यकारणभावासिद्धेः ।
अविरुद्धविधिकी अनुपलब्धिमें भी अभाव नहीं हो सकता। क्योंकि राग आदिकों
और वचन आदिका कार्यकारणभाव असिद्ध है।
अर्थान्तरस्य वा कारणस्य निवृत्तौ न वचनादेर्निवृत्तिरिति
संदिग्धव्यतिरेकोऽनैकान्तिको वचनादिः ।
अथवा अर्थान्तरकारणकी निवृत्तिमें (सहचारिके दर्शनमात्रसे) वचन आदि की
निवृत्ति नहीं होती। अतएव सर्वज्ञमें वचन आदि संदिग्धव्यतिरेक अनैकान्तिक हैं।
द्वयो रूपयोर्विपर्ययसिद्धौ विरुद्धः ।
दो रूपोंके विरुद्ध सिद्ध हो जानेपर विरुद्ध हेत्वाभास होता है।
कयोर्द्वयोः ? सपक्षे सत्त्वस्यासपक्षे चासत्त्वस्य । यथाकृत-
कत्वं प्रयत्नानन्तरीयकत्वं च नित्यत्वे साध्ये विरुद्धो हेत्वाभासः ।
किन दो के ? सपक्षमें सत्त्व और असपक्षमें असत्त्व के ।
जैसे—नित्यत्वके सिद्ध करनेमें कृतकत्व और प्रयत्नानन्तरीयकत्व विरुद्ध
हेत्वाभास हैं।
अनयोः सपक्षेऽसत्त्वमसपक्षे च सत्त्वमिति विपर्ययसिद्धिः ।
इन दोनोंके सपक्षमें न रहने और असपक्षमें रहनेसे विपर्ययकी सिद्धि होती है।
१. पी० सं० का 'सपक्षे' पाठ ठीक नहीं है।

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