न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबिन्दु २३
सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति ।
जैसे—जीवित शरीर आत्मासहित है, क्योंकि उसमें प्राण आदि हैं।
न हि सात्मकनिरात्मकाभ्यामन्यो राशिरस्ति ।
यत्र प्राणादिर्वर्तते ।
सात्मक और निरात्मकसे भिन्न ऐसी कोई राशि नहीं है जहां प्राण आदि हों ।
आत्मनो वृत्तिव्यवच्छेदाभ्यां सर्वसंग्रहात् ।
आत्माके सद्भाव और अभावसे सबका संग्रह करनेसे [ अन्यराशिका अभाव है । ]
नाप्यनयोरेकत्र वृत्तिनिश्चयः ।
इन दोनों [ सात्मक और निरात्मक ] में एक स्थानमें सद्भावका निश्चय नहीं है ।
सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्धे प्राणादेरसिद्धिः ।
क्योंकि सात्मक अथवा निरात्मक रूपसे प्रसिद्ध होनेसे प्राण आदिकी असिद्धि
हो जावेगी ।
तस्माज्जीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः ।
अतएव प्राण आदि जीवितशरीर-सम्बन्धी हैं।
सात्मकादनात्मकाच्च सर्वस्माद्व्यावृत्तत्वेनासिद्धेः ।
क्योंकि सात्मक और निरात्मक सबसे व्यावृत्त होनेसे असिद्ध है ।
ताभ्यां न व्यतिरिच्यते न तत्रान्वेति । एकात्मन्यप्यसिद्धेः ।
उसका न तो उन दोनोंसे व्यतिरेक और न अन्वय ही है । क्योंकि वह (दोनों)
एक आत्मामें भी सिद्ध नहीं हो सकते ।
नापि सात्मकान्निरात्मकाच्च तस्यान्वयव्यतिरेकयोरभावनिश्चयः ।
सात्मक और निरात्मकसे भी उसके अन्वय और व्यतिरेकके अभावका निश्चय
नहीं होता ।
एकाभावनिश्चयस्यापराभावनान्तरीयकत्वात् ।
क्योंकि एक के अभावका निश्चय दूसरेके अभावके निश्चय का अव्यभिचारी होता है।
अन्वयव्यतिरेकयोरन्योन्यव्यवच्छेदरूपत्वात् ।
क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक अन्योन्यव्यवच्छेद रूप हैं।
अत एवान्वयव्यतिरेकयोः सन्देहादनैकान्तिकः ।
अतएव अन्वय और व्यतिरेकमें सन्देह होनेसे अनैकान्तिक है।
साध्येतरयोरतो निश्चयाभावात् ।
क्योंकि इससे साध्य और उसके विरोधीके निश्चयका अभाव है ।
१७ न्या०