सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 162

१८ भाषाटीका सहित
स्ववचननिराकृत --
जैसे—अनुमान प्रमाण नहीं है ।
एतदेव तु यद्यसत्यार्थमन्यान्यसत्यार्थानि न दर्शितानि भवन्ति ।
यदि इसीको असत्यार्थ कहें तो अन्य वचन असत्यार्थ नहीं कहे जा सकते ।
इति चत्वारः पक्षाभासा निराकृता भवन्ति ।
इस प्रकार चारों पक्षाभास निराकरण किये जाते हैं ।
सिद्धस्यासिद्धस्यापि साधनत्वेनाभिमतस्य स्वयं वादिना तदा
साधयितुमनिष्टस्योक्तमात्रस्य निराकृतस्य च विपर्ययेण साध्यस्तेनैव
स्वरूपेणाभिमतो वादिन इष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति पक्षलक्षणमनवद्यं
दर्शितं भवति ।
जो पदार्थ सिद्ध ( विपरीत हेतुसे सिद्ध किया हुआ भी साध्य हो सकता है )
अथवा असिद्ध भी साधनरूपसे माना गया हो, तथा स्वयंवादीको अभिष्ट न हो और
उपरोक्त प्रत्यक्ष आदि निराकृतोंसे विपरीत हो तथावादीके द्वारा साध्य माना गया हो,
तथा जो इष्ट और अनिराकृत हो वह पक्ष होता है । यह पक्षका निर्दोष लक्षण है ।
त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानमित्युक्तम् ।
इस प्रकार त्रिरूपलिङ्गका अभिधानरूप परार्थानुमान कहा गया ।
तत्र त्रयाणां रूपाणामेकस्यापि रूपस्यानुक्तौ साधनाभासः ।
उक्तावप्यसिद्धौ संदेहे वा ।
तीनों रूपोंमेंसे एकके भी न कहनेसे साधनाभास या हेत्वाभास हो जाता है ।
[ अथवा तीनों रूपोंके ] कहे जानेपर भी हेतुके असिद्ध होने या उसमें संदेह होनेसे
ही हेत्वाभास हो जाता है ।
प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोरेकस्य रूपस्य धर्मिसम्बन्धस्यासिद्धौ
संदेहे चासिद्धो हेत्वाभासः ।
प्रतिपाद्य और प्रतिपादकमेंसे धर्मिसम्बन्धी एकरूप ( पक्षधर्मत्व ) के सिद्ध न
होनेपर अथवा उसमें संदेह होनेपर असिद्धहेत्वाभास होता है ।
यथा अनित्यः शब्द इति साध्ये चाक्षुषत्वमुभयासिद्धम् ।
जैसे—‘शब्द अनित्य है, क्योंकि वह चाक्षुष ( चक्षुका विषय ) है’ में चाक्षुषत्व
हेतु उभयासिद्ध है । ( जो वादी और प्रतिवादी दोनों के लिये असिद्ध हो उसे उभया-
सिद्ध कहते हैं ) ।
१. पीटर्सन संस्करण का ‘निराकृतः’ पाठ अशुद्ध है ।
२. पी० सं० में यहाँ विराम न होने से हेत्वाभास सामान्य और असिद्ध हेत्वाभास का
लक्षण निकालने में बड़ी कठिनता पड़ती है ।