न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ें२० भाषाटीका सहित
तथैकस्य रूपस्यासपक्षेऽसत्त्वस्या¹सिद्धावनैकान्तिको हेत्वाभासः ।
तथा एकरूप (असपक्षमें असत्त्व) की असिद्धिमें अनैकान्तिक हेत्वाभास होता है।
यथा शब्दस्यानित्यत्वादिके धर्मे साध्ये प्रमेयत्वादिको धर्मः
सपक्षविपक्षयोः ।
जैसे—शब्दके अनित्यत्व आदि धर्मके साध्यमें प्रमेयत्व आदि धर्म सपक्ष और
विपक्ष दोनोंमें रहते हैं।
सर्वत्रैकदेशे वा वर्तमानस्तथास्यैव रूपस्य संदेहेऽप्यनैकान्तिक एव ।
अथवा सर्वत्र या एकदेशमें रहने वाले इसी रूप (असपक्षमें असत्त्व) के संदेहमें
भी अनैकान्तिक ही है।
यथाऽसर्वज्ञः कश्चिद्विवक्षितः पुरुषो रागादिमान् वेति साध्ये
वक्तृत्वादिको धर्मः संदिग्धविपक्षव्यावृत्तिकः । सर्वत्रैकदेशे वा सर्वज्ञो
वक्ता नोपलभ्यते इति ।
जैसे—'कोई विवक्षित पुरुष सर्वज्ञ अथवा रागादिमान् है' इस साध्यमें वक्तृत्व
आदिधर्म संदिग्धविपक्षव्यावृत्ति वाले हैं। [क्योंकि] सर्वज्ञ वक्ता सर्वत्र अथवा एकदेशमें
कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
एवं प्रकारस्यानुपलम्भस्यादृश्यात्मविषयत्वेन संदेहे हेतुत्वात् ।
क्योंकि अदृश्यात्मविषय वाला (जिसका विषय अदृश्यात्मा है) अनुपलम्भ
संदेहमें कारण है।
असर्वज्ञविपर्ययाद्वक्तृत्वादेर्व्यावृत्तिः संदिग्धा । वक्तृत्वसर्वज्ञ-
त्वयोर्विरोधाभावाच्च ।
असर्वज्ञका विपर्यय होनेसे वक्तृत्व आदिकी व्यावृत्ति संदिग्ध है [निश्चय नहीं है।]
क्योंकि सर्वज्ञत्व और वक्तृत्वमें विरोधाभाव भी है।
( व्याप्तिमान् व्यतिरेकको बतलाते हैं— ]
यः सर्वज्ञः स वक्ता न भवतीत्यदर्शनेऽपि व्यतिरेको न
सिध्यति, सन्देहात्² ।
जो सर्वज्ञ होता है वह वक्ता नहीं होता। इस प्रकार सर्वज्ञ वक्ता के न देखे जाने
पर भी व्यतिरेक सिद्ध नहीं होता। क्योंकि उसमें सन्देह है।
द्विविधो हि पदार्थानां विरोधः ।
पदार्थोंका विरोध दो ही प्रकारका होता है। [जिनमेंसे प्रथम विरोध दिखलाया
जाता है—]
१. पी० सं० का 'सत्वस्य' पाठ अशुद्ध है।
२. पी० सं० में 'संदेहात्' के पश्चात् विरामचिह्न न देकर उसकी अगले वाक्यमें सन्धि कर
दी है, जिससे उसका अर्थ कुछ नहीं बैठता।