न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ भाषाटीका सहित
एवं त्रयाणां रूपाणामेकैकस्य द्वयोर्द्वयोर्वा रूपयोरसिद्धौ संदेहे
च यथायोगमसिद्धविरुद्धानैकान्तिकास्त्रयो हेत्वाभासाः ।
इस प्रकार तीनों रूपोंमें से एक २ अथवा दो २ रूपों के असिद्ध अथवा सन्दिग्ध
होने पर यथायोग असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक ये तीन हेत्वाभास होते हैं ।
विरुद्धाव्यभिचार्यपि संशयहेतुरुक्तः । स इह कस्मान्नोक्तः ?
( शंका ) विरुद्धाव्यभिचारी भी संशयका कारण कहा गया है । उसको यह क्यों
नहीं कहा ?
( जो हेत्वन्तरसे सिद्ध किये हुए के विरुद्ध होता है वह व्यभिचारको प्राप्त नहीं
होता । वही विरुद्धाव्यभिचारी है । अथवा जो विरुद्ध होते हुए अन्य साधनसे सिद्ध
किये हुए धर्मके विरुद्ध साधन करनेसे व्यभिचारी हो वह अपने साध्यसे व्यभिचरित
न होनेसे विरुद्धाव्यभिचारी होता है । जैसे हेत्वन्तर धूमसे सिद्ध किये हुए अग्नियुक्त
पर्वत के जलयुक्त तालाब विरुद्ध है । अतएव तालाब पर्वत में व्यभिचरित नहीं हो
सकता । अथवा जो विरुद्ध होते हुए अन्य साधन धूम से सिद्ध किये हुए धर्म अग्नि
के विरुद्ध जल को सिद्ध न करनेसे उसमें अव्यभिचारी हो वह अपने साध्यसे व्यभिचरित
न होनेसे विरुद्धाव्यभिचारी है । )
अनुमानविषयेऽसंभवात् ।
( उत्तर ) अनुमान के विषय ( त्रैरूप्य ) में असम्भव होनेसे उसका कथन यहाँ
नहीं किया गया है ।
न हि संभवोऽस्ति कार्यस्वभावयोरुक्तलक्षणयोरनुपलम्भस्य च
विरुद्धतायाः । न चान्योऽव्यभिचारी ।
क्योंकि उक्त लक्षण ( त्रैरूप्य ) वाले कार्य, स्वभाव और अनुपलब्ध की विरुद्धता
सम्भव नहीं है । और [ उनसे भिन्न ] अन्य कोई अव्यभिचारी भी नहीं है, [ अतएव
उन्हींमें हेतुता है । ]
[ तब आचार्य दिङ्नागने इस हेतुदोषको किस स्थल पर कहा है ? इसके लिये
कहते हैं— ]
तस्माद्वस्तुदर्शनबलप्रवृत्तमागमाश्रयमनुमानमाश्रित्य तदर्थ-
विचारेषु विरुद्धाव्यभिचारी साधनदोष उक्तः ।
अवस्तु के दर्शन के बलसे प्रवृत्त हुए आगमाश्रय अनुमानका आश्रय लेकर उसके
अर्थके विचारोंमें विरुद्धाव्यभिचारी साधन दोष कहा है ।
शास्त्रकाराणामर्थेषु भ्रान्त्या विपरीतस्य स्वभावोपसंहारसंभवात् ।
क्योंकि अर्थमें भ्रान्ति हो जानेसे शास्त्रकारोंका विपरीतको स्वभाव कह देना
सम्भव है ।