सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 166

२२ भाषाटीका सहित
एतौ च साध्यविपर्ययसाधनाद्विरुद्धौ ।
यह दोनों साध्य ( नित्यत्व ) के विपरीत ( अनित्यत्व ) का साधन करनेसे
विरुद्ध हैं।
तत्र च तृतीयोऽपीष्टविघातकृद्विरुद्धः ।
एक तीसरा इष्टविघातकृत् विरुद्ध भी है।
यथा परार्थाश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनाशनाद्यङ्गवदिति ।
जैसे—चक्षु आदि परार्थ हैं। क्योंकि वह शयन, आसन आदि पुरुषके उपभोगके
अङ्गोंके समान संघात ( परमाणुसंचितिरूप ) हैं।
तदिष्टसंहतपरार्थ्यविपर्ययसाधनाद्विरुद्धः ।
वह [ वादी सांख्यके ] इष्ट असंहत ( विषय ) की परार्थताके विपरीत को साधन
करनेसे विरुद्ध है।
स इह कस्मान्नोक्तः ?
वह यहां क्यों नहीं कहा गया ?
अनयोरेवान्तर्भावात् ।
क्योंकि उसका इन दोनोंमें ही अन्तर्भाव हो जाता है।
न ह्ययमाभ्यां साध्यविपर्ययसाधनत्वेन भिद्यते ।
क्योंकि यह इष्टविघातकृत् इन दोनों हेतुओंसे साध्यविपर्ययसाधनताकी अपेक्षा
भिन्न नहीं है।
न हीष्टोक्तयोः साध्यत्वेन कश्चिद्विशेषः इति द्वयो रूपयोरेकस्या-
सिद्धावपरस्या च संदेहेऽनैकान्तिकः ।
क्योंकि इष्ट और उक्तमें [ एक दूसरेका साध्य होनेसे ] कोई विशेष नहीं है।
अतएव दो रूपोंमेंसे एकके असिद्ध होने तथा दूसरेके संदिग्ध होनेसे अनैकान्ति-
कता आती है।
यथा वीतरागः कश्चित्सर्वज्ञो वा वक्तृत्वादिति
व्यतिरेकोऽत्रासिद्धः । संदिग्धोऽन्वयः ।
जैसे—कोई वीतराग अथवा सर्वज्ञ है, क्योंकि वह वक्ता है। यहाँ पर व्यतिरेक
असिद्ध और अन्वय संदिग्ध है।
सर्वज्ञवीतरागयोर्विप्रकर्षाद्वचनादेस्तत्र सत्त्वमसत्त्वं वा संदिग्ध-
मनयोरेव द्वयो रूपयोः संदेहेऽनैकान्तिकः ।
सर्वज्ञ और वीतरागके विप्रकर्ष ( दूर ) होनेसे वहां वचन आदिका होना या न
होना संदिग्ध है। अतएव इन दोनों रूपोंमें संदेह होनेसे वक्तृत्व हेतु अनैकान्तिक है।