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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

न्यायबिन्दु १६
चेतनास्तरव इति साध्ये सर्वत्वगपहरणे मरणं प्रतिवाद्यसिद्धं
विज्ञानेन्द्रियायुर्निरोधलक्षणस्य मरणस्यानेनाभ्युपगमात्तस्य च तरुष्व-
सम्भवात् ।
'वृक्ष सजीव होते हैं, क्योंकि वह सब छालके उतर जाने पर मर जाते हैं ( सूख
जाते हैं ) । इसमें वृक्षका सब छालके उतर जाने पर मर जाना प्रतिवादी ( बौद्ध )
को असिद्ध है । [ अतः यह प्रतिवाद्यसिद्ध हेत्वाभास है । ] क्योंकि बौद्धदर्शन विज्ञान,
इन्द्रिय और आयुके निरोध होनेको ही मरण मानता है, जिसका होना वृक्षोंमें
असम्भव है ।
अचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमत्त्वमनित्यं वा सांख्यस्य
स्वयं वादिनोऽसिद्धम् ।
'सुख आदि अचेतन हैं, क्योंकि वह उत्पत्तिमान् अथवा अनित्य हैं' इसमें
उत्पत्तिमत्व अथवा अनित्यत्व स्वयं वादी अर्थात् सांख्यको ही असिद्ध है । [ अतः
यह हेतु वाद्यसिद्ध है । ]
तथा स्वयं तदाश्रयस्य वा संदेहेऽसिद्धः ।
तथा स्वयं उस साध्यधर्मीके संदिग्ध होनेसे हेतु संदिग्धसिद्ध भी है ।
[ अपने आप संदेह किये हुएका उदाहरण — ]
यथा वाष्पादिभावेन संदिह्यमानो भूतसंघातोऽग्निसिद्धावुपदिश्य-
मानः संदिग्धसिद्धः ।
जैसे—वाष्प आदि भावसे सन्देह किया हुआ पृथ्वी आदिका समूह अग्निकी
सिद्धिके लिये ग्रहण किये जानेपर संदिग्धसिद्ध है । ( कहीं दूर पर धूल आदिको
उड़ती हुई देखकर उसको धूम समझकर उससे अग्निको सिद्ध करने लगनेसे
अभिप्राय है । )
[ आश्रयासिद्धका उदाहरण ]—
यथेह निकुञ्जे मयूरः केकायितादिति ।
तदापातदेशविभ्रमे ।
जैसे—इस निकुञ्जमें मोर है । क्योंकि इधरसे ही मोरका शब्द आ रहा है । उस
शब्दके आनेके स्थानमें विभ्रम हो सकनेसे यह आश्रयणासिद्ध है ।
धर्म्यसिद्धावप्यसिद्धो यथा सर्वगत आत्मेति साध्ये सर्वत्रो-
पलभमानगुणत्वम् ।
धर्मीके सिद्ध होनेपर भी असिद्ध—
जैसे—'आत्मा सर्वगत ( सर्वत्र व्याप्त ) है' इस साध्यमें सर्वत्र उपलब्ध होनेका गुण
असिद्ध है ।