नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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**अर्थहीन—**अर्थ की असम्बद्धता या अपूर्ण अर्थ की बहुलता से यह दोष
होता है। इसे मम्मटादि सम्मत न्यूनपद या निरर्थक के रूप में समझा जा
सकता है।
**भिन्नार्थ—**अविवक्षित अर्थ को कहने या ग्राम्यशब्दों के प्रयोग करने पर
यह दोष होता है। इसके दूसरे लक्षण से अनपेक्षित अर्थ में अभिहित अर्थ का
परिणत होना भी इसी दोष का स्वरूप हो जाएगा। इसे मम्मटादि सम्मत
प्रकाशितविरुद्धता या विरुद्धमतिकृत् के समान समझा जा सकता है।
**एकार्थ—**एक ही वर्ण्य के लिये अनेक पदों का प्रयोग करना जो
पुनरुक्तता सा लगे तो 'एकार्थ' दोष कहलाता है।
**अभिप्लुतार्थ—**पद्य के प्रत्येक पाद में अर्थ का समाप्त हो जाना, जो
कि एक दूसरे से निरपेक्ष हों तो 'अभिप्लुतार्थ' दोष होता है अथवा लम्बे
समास का एक पूरे पद्य के पाद में प्रयोग के द्वारा अर्थ को दुर्बोध बनाना।
इसे मम्मटादि सम्मत क्लिष्टत्व के समान माना जा सकता है।
**न्यायादपेत—**लोकपरम्परा के विरोध होने या देश, काल, कला,
न्याय या आगम के विरुद्ध किसी उपयुक्त तर्क के न देने पर यह दोष होता
है। इसमें प्रतिज्ञा या दृष्टान्त का विरोध या अभाव रहता है। यह मम्मटादि
सम्मत विद्याविरुद्धता या प्रसिद्धिविरुद्धता जैसे दोषों के समान समझा जा
सकता है।
**विषम—**छन्द या वृत्तों के अनुचित प्रयोग करने पर यह छन्दोशैथिल्य
के कारण दोष होता है। यह विवक्षित अर्थ या रस के प्रतिकूल होता है।
मम्मटादि सम्मत हतवृत्तता के समान इसे समझा जा सकता है।
**विसन्धि—**जब पदों को सन्धि के नियमानुसार न रख कर सन्धिहीन
स्थिति में प्रयुक्त किया जाता है तो यह दोष होता है।
**शब्दच्युत—**उचित शब्दों के यथासमय प्रयोग न करने से यह दोष
होता है। इस दोष का क्षेत्र विस्तीर्ण है जिसमें विवक्षित भाव का प्रकाशन
न होना इस दोष की स्थिति निर्माण करता है। क्योंकि ऐसे अपशब्दों के
प्रयोग से विवक्षित अर्थ के बोध में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इसे सम्मटादि
सम्मत अवाचकत्व, असमर्थत्व तथा च्युतसंस्कृति जैसा समझा जा सकता है।
यह व्याकरण से भी एक ओर सम्बन्ध रखता है तथा अर्थ से भी।
इस प्रकार इस दोषनिरूपण के विवरण से स्पष्ट है कि शब्द के साधु
प्रयोग, वर्ण्य या अर्थ के उपयुक्त काव्यरचना करना तथा रसानुवर्ती छन्द
५ ना० द्वि० भू०
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का विधान होने से काव्य उत्तम या निर्दोष होता है। यद्यपि भरतमुनि के
समय शब्द और अर्थ में विभाजन होकर दोष विचार आरम्भ नहीं हो पाया
था परन्तु ऐसे विभाजन की सम्भावनाओं के आधार अवश्य निर्मित हो
चुके थे। भरत के दोषनिरूपण ने उत्तरभावी आचार्यों को दोषों के सूक्ष्म
विवेचन (तथा दोषों की अनित्यता तथा अनौचित्य जैसे बिन्दुओं पर विचार)
करने की प्रेरणा (अवश्य) दी। नाट्यशास्त्र में अलङ्कारों की संख्या
अतिन्यून तथा सीमित रहने से अलङ्कार में आनेवाले दोषों की चर्चा नहीं
हो पायी यद्यपि दोष के आधार का तत्व भरतमुनि ने ही संकेतित किया
है। भरतमुनि ने निर्दोषता को उत्तम काव्यरचना का सौन्दर्य मानकर
काव्य में अदोषत्व का विचार मुख्य बिन्दुरूप में स्थापित किया जो काव्यशास्त्र
के इतिहास में विशेषतः उल्लेखनीय तथा महत्वपूर्ण भी है।
गुणविधान—काव्यगत गुणों का विवरण भी इसी क्रम में आता है।
भरतमुनि ने दस गुणों के विवरण के प्रसङ्ग में दोषों के अभाव या विपर्यय के
रूप में 'गुण' को प्रतिपादित किया था। इस काव्यगुण के विवेचन ने शब्दार्थ
तथा रसाश्रित गुणविवेचन को आधार प्रदान किया। वाचिक-अभिनय में
नाट्य-प्रयोग की दृष्टि से किया गया यह गुणनिरूपण रीतिवादी एवं रसवादी
प्रवृत्तियों का मूल विचारबिन्दु बन कर उन्हें प्रभावित करने में आगे
चल कर समर्थ हो सका जिसके प्रवर्तन का श्रेय भी भरतमुनि को ही है।
गुणस्वरूप—भरत ने दोषों की तरह गुणों के भी दस प्रभेद कर
उनका विवरण दिया है। ये हैं—( १ ) श्लेष, ( २ ) प्रसाद, ( ३ ) समता,
( ४ ) समाधि, ( ५ ) माधुर्य, ( ६ ) ओज, ( ७ ) सौकुमार्य, ( ८ ) अर्थ-
व्यक्ति, ( ६ ) उदारता तथा ( १० ) कान्ति। क्रमशः संक्षेप में इनके
स्वरूप इस प्रकार हैं—
श्लेष—जहाँ पदों की श्लिष्टता अभिलषित अर्थपरम्परा या समुदाय
से सम्बद्ध रहती हो अथवा जहाँ पद में गहन विचार की अर्थधारा स्वभावतः
स्फुट होती हो तो वहाँ श्लेष गुण होता है। अभिनवगुप्तपाद ने इसके लक्षण-
गत दोनों पाठों को शब्द तथा अर्थश्लेष अलङ्कार का उद्भव स्रोत निदर्शित
किया है।
प्रसाद—शब्दार्थ के आह्लादक संयोग से अर्थ के स्वच्छ स्फटिक की
तरह प्रतिभासित होने पर 'प्रसाद' गुण होता है। अपनी अर्थ विमलता
के कारण यह अर्थगुण हो जाता है—यह अभिनवगुप्तपाद आचार्य
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ने माना है। तीन गुणों को ही काव्य में मान्य करने वाले मम्मटादि ने भी
इसे एक गुण ही स्वीकृत किया है ।
समता—जिसमें न अधिक असमस्त पद तथा न व्यर्थाभिधायी या
दुर्बोध पद हों तो 'समता' गुण होता है। अन्य पाठ के अनुसार गुण तथा
अलङ्कारों का समुचित योग होना 'समता' है। आचार्य हेमचन्द्र ने अन्य पाठ
को मान्य कर बतलाया कि भिन्न अधिकरण में अवस्थित गुण तथा अलङ्कार
परस्पर विभूषित नहीं करते। सर्वेश्वर ने भी (अपने साहित्यसार ग्रन्थ में)
यही पाठ स्वीकार किया। वामन ने समता को वृत्ति में अन्तर्भुक्त किया
तथा अन्य कुछ आचार्य मार्ग की भिन्नता के कारण समता को दोष मानने
लगे थे ।
समाधि—इष्टार्थ की अभिव्यक्ति के लिये उपमा को ग्रहण करना या
कविप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त पद या वाक्य से विशिष्ट अर्थान्तर की प्रतीति होना
'समाधि' है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द का गुण निरूपित कर
विस्तृत विवरण दिया है ।
माधुर्य—वाक्य की बार-बार आवृत्ति होने पर भी उद्वेग रहित मधुरता
का बना रहना 'माधुर्य' हैं। इस गुण को मम्मटादि ने त्रिगुण में मान्यता दी
है तथा अभिनवगुप्त इसे अर्थगुण बतलाते हैं ।
ओज—जिसमें समासबहुल रचना हो तथा जो अनेक विचित्र, उदार
तथा परस्पर अपेक्षित अर्थों से अनुमत रहे तो 'ओज' गुण होता है। अन्य
पाठ के अनुसार शब्दार्थ की समृद्धि से उदात्त अर्थ का प्रतिभासित होना
'ओज' है। आचार्य हेमचन्द्र ने ओज के इसी लक्षण को मान्य करते हुए
इसे प्रकृत कवि कर्म निरूपित किया । आचार्य अभिनवगुप्त पाद ने ओज को
अर्थगुण माना तथा मम्मटादि ने इसे त्रिगुण में एक गुण के रूप में मान्य
किया। डॉ० वी० राघवन्¹ ने इसके पाठ में 'सानुरागैः' के सानु शब्द के
स्थान पर काकुशब्द सुझाया तथा तदनुसार अर्थसङ्गति को बैठाने का आग्रह
किया। परन्तु ऐसे पाठ को मानने का आधार (किन्हीं नाट्यशास्त्र की
प्राचीन प्रति या हस्तलेखों में प्राप्त नहीं होने) स्पष्टतः प्राप्त नहीं होता ।
दूसरे अभिनवगुप्तपाद ने इसके दोनों पाठों की भी परम्परा के अनुगत व्याख्या
दी है तथा इसी कारण विषय के अनुगत स्वतन्त्र कल्पना को अधिक बढ़ावा
मिलने के सभी अवसर क्षीण हो गये हैं ।
१. द्रष्ट-डॉ० राघवन्-भोज का शृङ्गारप्रकाश-पृष्ठ २६८ ।
( ६८ )
सौकुमार्य—सुखपूर्वक उच्चारण या प्रयोग के उपयुक्त तथा सुश्लिष्ट
सन्धि एवं कोमल अर्थ से अनुप्राणित रचना ‘सौकुमार्य’ कहलाती है। आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द तथा अर्थ गुण मानकर बतलाया है कि ‘सुकुमारता’
दोनों में होती है। दण्डी तथा हेमचन्द्राचार्य ने इसे शब्दगुण माना है।
अर्थव्यक्ति—नाट्य या काव्य व्यापार में सुप्रसिद्ध तथा लोकप्रसिद्ध
पदार्थ या क्रिया का अभिधान होने से अर्थ का सुस्पष्ट अवबोध होना
‘अर्थव्यक्ति’ है। अन्य पाठ के अनुसार पात्र के द्वारा अपने मनोबल के योग
द्वारा प्रेक्षक के हृदय में अवस्थित भाव या वस्तु का अभिनय द्वारा प्रस्तुती-
करण ‘अर्थव्यक्ति’ होता है। आचार्य हेमचन्द्र ने इसी अन्य पाठ को लिया है।
आचार्य वामन इसे अर्थगुण तथा दण्डी एवं अन्य आचार्य इसे जाति या
स्वाभावोक्ति अलङ्कार के निकटवर्ती मानते हैं। विश्वनाथ कविराज तथा
मम्मट भट्ट आदि ने इसे प्रसाद गुण स्वीकार नहीं किया ।
उदारत्व ( उदात्तता, उदारता )—विविध दिव्यभावों से विभूषित
तथा शृङ्गार एवं अद्भुत रसों से समायोजित ‘उदारत्व’ गुण है। अन्य पाठ
के अनुसार अनेक विशिष्ट या सूक्ष्म अर्थों तथा सौष्ठव से पूर्ण रचना ‘उदात्त’
कहलाती है। इस अन्य पाठ को हेमचन्द्र, वामन तथा भोज ने लिया है।
उदारत्व काव्य का प्राणभूत तत्व माना जाता है। आचार्य वामन ने उदारता
को ग्राम्यत्व दोष का अभाव बतलाया तथा ओज में अन्तर्भाव माना क्योंकि
दोषाभाव स्वतन्त्र गुण नहीं हो सकता । श्री मम्मट तथा विश्वनाथ कविराज
आदि ने भी वामन का अनुसरण किया परन्तु आचार्य अभिनवगुप्त इसे
शब्द गुण मान कर व्याख्या करते हैं।
कान्ति—चन्द्र के समान मन तथा श्रोत्र को आह्लादित करने वाली,
लीला आदि चेष्टालङ्कारों से रमणीय शब्दबन्ध या रचना ‘कान्ति’ कहलाती
है। वामन ने इसे ‘दीप्तरस’ कहा तथा दण्डी इसमें लोकसीमा का अतिक्रमण
मानते हैं। आचार्य अभिनवगुप्तपाद इसे शब्दगुण मानते हैं, परन्तु कान्ति में
अर्थगुण का भी समन्वय दिखलाई पडता है।
गुण-स्वरूप तथा स्थिति-मीमांसा—नाट्यशास्त्र में निर्देशित गुण
निरूपण से स्पष्ट है कि ये शब्द तथा अर्थ दोनों को ही ध्यान में रखकर
भरतमुनि ने निरूपित किये थे तथा इनकी विभाजक रेखा भी इन गुणलक्षणों
में देखी जा सकती है, किन्तु यह तथ्य केवल परिभाषित स्वरूप के परिशीलन
से प्राप्त होता है। इस परिशीलन से बाद में दो मत प्रधानतः उभरते हैं
जिनमें प्रथम मत में भी दो वर्ग हैं। इनमें भरतमुनि, वामन तथा अभिनव-
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गुप्तपाद के अनुसार ये गुण शब्द तथा अर्थ दोनों से सम्बद्ध हैं। द्वितीय
वर्ग के आचार्य दण्डी का मत है कि श्लेष जैसे कुछ गुण शब्दों से, प्रसाद
जैसे कुछ गुण अर्थों से तथा सौकुमार्य जैसे कुछ गुण दोनों से सम्बद्ध हैं।
आचार्य वामन के मत में भरत निरूपित दस गुण शब्दों के तथा दस
अर्थगुण होते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर गुण बीस हैं। भोजराज
ने वामन का अनुसरण करते हुए चौबीस गुणों का प्रतिपादन किया। इनके
मत में गुणयोग नित्य हैं तथा अलंकृत होने पर भी गुण-रहित काव्य प्रीतिकर
नहीं होता। काव्य में गुण-आदान नियमतः या नित्य होता है तथा अलङ्कार
का विधान कामचार है। उद्भट के काव्यालङ्कारसूत्र के व्याख्याकार
प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार गुण काव्य का नित्य धर्म होता है। जयदेव ने
चन्द्रालोक में वामन के अनुसार ही गुणों का विवरण दिया है।
इन गुणों की संख्या के विषय में भी दो भिन्न-भिन्न मत साहित्य में
विकसित हुए। सर्वप्राचीन आचार्य तथा गुणों के प्रवर्तक भरतमुनि के मत में
गुणों की संख्या दस है। इस मत का अनुसरण वामन, दण्डी तथा अभिनव-
गुप्तपादाचार्य करते हैं। द्वितीयमत के अनुसार गुणों की संख्या मात्र तीन हैं।
इस मत के प्रवर्तक आचार्य भामह हैं जो काव्य के लिये तीन गुणों—माधुर्य,
ओज तथा प्रसाद—का ही उल्लेख करते हैं। भामह का आधार भरत तथा
दण्डी से भिन्न है तथा वे दस गुणों की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करते।
आगे इस मत का अनुसरण किया आनन्दवर्धनाचार्य तथा उनके अनुयायी
मम्मटादि ने भी गुणों की संख्या तीन मान कर। ये भी कुछ गुणों को
स्वतन्त्रगुण न मान कर उन्हें दोषाभाव तथा कुछ गुणों को अलङ्कारों के
अन्तर्गत स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार काव्यगुणों के विषय में दो परस्पर स्वतन्त्र या निरपेक्ष मत
विकसित हुए थे। इनमें एक का भरतमुनि ने तथा अन्य का प्रवर्तन आचार्य
भामह ने किया था। यह भी इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि जहाँ आचार्य
भरत नाट्यविद्या के सम्प्रदाय के प्रमुख थे वहीं आचार्य भामह काव्यशास्त्र के
प्रमुख रहे। दोनों में इस विषय में भिन्नता है कि काव्यरचना के साधनवर्ग
में कौन अधिक अपेक्षित है। इस क्रम में भरतमुनि के मत में नाट्यरचना के
लिये गुणों की अधिक आवश्यकता होगी, अलङ्कारों की नहीं। इसी कारण
काव्यरचना के साधनों में नाट्यशास्त्रीय आचार्य भरत ने अपने साधनों की
सूची में काव्यगुणों तथा लक्षणों की संख्या अधिक रखी तथा अलङ्कारों की
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कम । दूसरे पक्ष के आचार्यों में—जिनमें भामह प्रमुख थे—काव्यरचना के
साधनों की सूची में अलङ्कारों पर प्रधानरूप से ध्यान देते हुए अलङ्कारों को
अधिक संख्या में रख कर अन्य ऐसे तत्वों को भी काव्यरचना के साधनों में
सम्मिलित कर लिया गया जिन्हें नाट्यशास्त्र में काव्यगुणों की सूची में रखा
गया था ।
**गुणों का सम्बन्ध—**इसके अतिरिक्त आचार्यों में गुणों के सम्बन्ध
में भी मतैक्य नहीं है। काव्यलक्षणवादी आचार्य भामह के अनुसार काव्य
गुणों का शब्द तथा अर्थ के साथ विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्ध है। इनके
अनुसार माधुर्य आदि गुण इसी प्रकार शब्द एवं अर्थ के गुण हैं जैसे सामान्य
व्यवहार में दूध का गुण सहज मधुर होता है। परन्तु अन्यपक्ष में इस विषय
में भी भिन्न मत हैं। काव्यगुणों का रस के साथ रसानुभवात्मा समवाय
सम्बन्ध रहता है, क्योंकि काव्य की मधुरता अनुभवस्वरूप होती है। अतएव
इसमें शब्द तथा अर्थ की सत्ता मात्र अवस्थित नहीं होती। यह केवल दृष्टि-
भेद मात्र था परमार्थतः दोनों की विवेचना ने वास्तविकता का ही प्रतिपादन
किया पर भिन्न दृष्टि अपेक्षाभेद से रहती ही है ऐसा समझना चाहिए।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आचार्य आनन्दवर्द्धन, अभिनवगुप्तपाद, मम्मट,
हेमचन्द्राचार्य, जयदेव तथा विश्वनाथ कविराज के विचारों का स्रोत भरत-
मुनि के नाट्यशास्त्र में विद्यमान है। इन आचार्यों ने गुण, अलङ्कार तथा
लक्षण जैसे काव्याङ्गों का विवेचन रस के सन्दर्भ में ही किया तथा भरत की
रसवादी दृष्टि को इनकी समीक्षापद्धतियों ने आत्मसात् कर लिया। भरत के
अनुसार कोई काव्यार्थ रस के बिना प्रवृत्त ही नहीं हो सकता था।
ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने काव्य एवं नाट्य के प्राण के रूप में उसे साहित्य
के साधनों में शीर्ष स्थान प्रदान किया। इनके मत में रस रूप आत्मा के
गुण नित्य धर्म हैं तथा ये समान अङ्गों के माध्यम से आत्मरूप रस के
उपकारक होते हैं। आनन्दवर्धनाचार्य की इस नव्यसमीक्षा ने साहित्य के
क्षेत्र में मौलिक उद्भावना की तथा भरत के रससिद्धान्त को पुनरुज्जीवित
करते हुए ध्वनिसिद्धान्त की स्थापना की जो काव्यशास्त्रीय समीक्षा के इतिहास
में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
**भाषाविधान—**नाट्यशास्त्र के अष्टादश अध्याय में वाचिक अभिनय के
अन्तर्गत काव्यशरीर के अङ्गों के रूप में छन्द, लक्षण, अलङ्कार, गुण आदि के
विवेचन क्रम में भाषा का भी विचार किया गया कि यह काव्य या नाट्य का
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शरीर है तथा सर्वस्व भी । भाषा के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में विभिन्न
भाषाओं, सम्बोधनादि विधियों, पात्रों के नामकरण तथा पाठ्यविधि जैसे
नाट्योपयोगी विषयों को लेकर उनका तात्विक विवेचन हुआ है । जिनमें से
इस अध्याय में भाषा का विशेषरूप में विवरण दिया गया है ।
भाषाएँ—नाट्यशास्त्र में भाषाविषयक विवरण संक्षेप में हैं, जो
संस्कृत तथा प्राकृत के है। इस अष्टादशअध्याय के अतिरिक्त ध्रुवाध्याय
( अध्याय ३२ ) में भी प्राकृतभाषा के अनेक उदाहरण प्राप्य हैं, जो इस
भाषा की ऐतिहासिक स्थिति के अध्ययन में बड़ा मूल्य रखते हैं। इसके विषय
में नाट्यशास्त्र के चतुर्थभाग में विशिष्ट रूप में विचार किया जा रहा है ।
यहाँ ( इसके अतिरिक्त ) सामान्य तथ्य यह है कि रङ्गमञ्च पर व्यवहार में
आने वाली भाषाओं में नाटकादि की ( प्राचीन काल में ) प्रयुज्यमान भाषायें
संस्कृत तथा प्राकृत रही हैं। भाषा के इसी तथ्य को भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र
में अपनी ही पद्धति में इस प्रकार रखा भी है—
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया दशरूपप्रयोगतः ।
संस्कृतं प्राकृतञ्चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥
अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ।
तथा योन्यन्तरी चैव भाषा नाट्ये प्रतिष्ठिता ॥
( नाट्यशास्त्र १८ । २५-२६ )
इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि ने रूपकों में प्रयुक्त की जाने वाली
भाषा के ये चार प्रभेद किये—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा,
( ३ ) जातिभाषा तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अतिभाषा वैदिक
शब्दबहुल भाषा है । आर्यभाषा श्रेष्ठजन की भाषा होती है तथा योन्यन्तरी
भाषा मनुष्येतर या पशुपक्षियों की भाषा मानी जाती है ।
जातिभाषा के प्रधानतः दो भेद होते हैं—(१) संस्कृत तथा (२) प्राकृत
जिनका रूपकादि में प्रयोग होता है । इनमें जो संस्कार गुण से सम्पन्न भाषा
है वही संस्कृत भाषा है, जिसमें देशादि भेद से स्वरूप में अन्तर नहीं पड़ता ।
जनभाषा है प्राकृत जिसमें संस्कारगुण सम्पन्नता नहीं होती तथा इसी कारण
जिसमें देशादि भेद के कारण प्रकृति में भिन्नता आ जाती है । इनमें संस्कृत
तथा प्राकृत भाषा के व्यवहार रूपकों में सम्भाषणप्रथा के अनुगत रखे
जाते थे । यह सम्भाषणप्रथा भाषा के प्रयोग का विचार करने पर किस
विशिष्ट पात्र को किस विधि से सम्भाषण करना है—इस प्रश्न पर आकर
विस्तीर्ण रूप धारण करती है तथा थोड़ी उलझन भी उत्पन्न करती है ।
( ७२ )
भाषा-नियम—भरतमुनि ने पात्रानुसारी भाषा के नियम दिखलाये
हैं । तदनुसार उत्तम एवं उच्चवर्ण के संस्कारी पात्रों की संस्कृतभाषा होती
है तथा सभी स्त्री पात्रों, विभिन्न स्तर के सेवकों, सामान्यजन तथा
निम्नवर्ग ( वर्ण ) के पात्रों की प्राकृत-भाषा । इस नियम का अपवाद यह है
कि ऐश्वर्यादि से प्रमत्त या दरिद्रता से अभिभूत धीरोदात्त आदि पात्रों की
भी प्राकृतभाषा बीच-बीच में आवश्यकतानुसार रखी जाती है । इसी प्रकार
नारीपात्रों में भी महारानी, वेश्या, शिल्पकारिणी जैसे पात्रों की वैदग्ध्यार्थ
संस्कृतभाषा भी रखी जाती है । अप्सरा आदि दिव्यपात्र होने से संस्कृत-
भाषा का प्रयोग करती हैं परन्तु यदि ये नृपपत्नी के रूप में नायिका भाव
प्राप्त करे तो इन्हें भी प्राकृतभाषा में ही अपना व्यवहार रखना पड़ेगा ।
प्राकृत-भाषा-भेद—भाषाविधान के प्रसंग में नाट्यशास्त्र में सात
प्राकृतभाषाओं का उल्लेख किया गया है । ये हैं—( १ ) मागधी,
( २ ) अवन्तिजा, ( ३ ) प्राच्या, ( ४ ) शौरसेनी, ( ५ ) अर्धमागधी,
( ६ ) बाह्लीका तथा ( ७ ) दाक्षिणात्या । ये ही वे सात भाषाएँ हैं जो
तत्कालीन विविध जनपदों की प्रचलित भाषायें रही थीं । इसके अतिरिक्त
विभाषायें होती हैं—जिनके अन्तर्गत शकार, आभीर, चाण्डाल, शबर, द्रमिल
( द्रविड ) तथा वनेचरों की भाषाएँ आती हैं तथा जिनका नाट्यशास्त्र में
विधान दिया गया है । इन भाषाओं का विधान पात्रों में देश, जाति तथा
अवस्था के अनुरूप किया जाता है, क्योंकि भाषायें भी देश तथा जातिभेद से
विभिन्नता धारण करने वाली होती ही हैं । इन भाषाओं को रूपकों में
सम्भाषण के अनुसार रखा जाता है तथा भाषा के प्रयोग का ( विधाना-
नुसारी तथा विचार पूर्वक रखा गया ) पात्रानुसारी प्रस्तुतीकरण रहता है ।
भाषाविधान—हम पूर्व में दिखला आये हैं कि नाटकों में प्रयुज्यमान
भाषाओं में संस्कृत तथा प्राकृतभाषायें आती हैं । नाट्यशास्त्र में संस्कृत
भाषा के विषय में संक्षेप में विवरण देकर फिर प्राकृतभाषा का भी विवेचन
किया गया है । यहाँ हम पूर्व कथित चारों भाषा प्रभेदों पर क्रमशः विचार
करेंगे । ये हैं—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा, ( ३ ) जातिभाषा
तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अन्तिम भाषा योन्यन्तरी उन पशु-
पक्षियों की भाषा होती है जिनका मञ्च पर प्रस्तुतीकरण अभीष्ट होता है ।
अतिभाषा—शेष या अन्य तीन भाषाओं में सर्व प्रथम ‘अतिभाषा’ आती
है जो प्राचीन आर्यभारतीय भाषा या वैदिकभाषा जैसी कोई शिष्टभाषा थी
( ७३ )
तथा जिसका तत्कालीन प्रजाजन में बोलचाल में व्यवहार होता था । यही
भाषा नाट्यशास्त्र में वर्णित 'अतिभाषा' थी जिसका देवताओं की ( या
पवित्र ) भाषा के रूप में विवरण दिया गया है । इसका स्वरूप कैसा था ?
यह प्रश्न कोई कठिन बात नहीं क्योंकि ऐसे स्थान पर हमें पाणिनि से थोड़ी
सहायता मिल जाती है । पुराकालीन वैयाकरणों ( तथा पाणिनि ) ने अपने
ग्रन्थों में छन्दों की ( वेदादि की ) भाषा के साथ-साथ अपने समय में प्रचलित
भाषा के रूप दिये हैं। इन सभी आचार्यों ने पूर्वशास्त्रकालीन संस्कृतभाषा
को छन्दों की भाषा मान्य की है। जो निश्चित रूप में प्राचीनभारतीय-आर्य
भाषा या वैदिक-संस्कृतभाषा थी तथा जिसका ब्राह्मणों के द्वारा यज्ञविधियों
आदि में प्रयोग होता था। इसी का महर्षि पाणिनि ने छन्दोभाषा के रूप में
निरूपण किया था तथा दिव्यपात्रों में इसी भाषा का अतिभाषा के रूप में
भरतमुनि ने विधान दिया है। आचार्य अभिनवगुप्त का मत है कि वैदिक-
शब्दों के बहुल प्रयोग तथा स्वरभेद आदि संस्कार से पूर्ण मण्डित भाषा की
स्थिति को 'अतिभाषा' में देखा जा सकता है।
आर्यभाषा—अतिभाषा की परवर्ती भाषा आर्यभाषा थी, जिसका
व्यवहार ( नाटकादि ) रूपक में राजा जैसे उदात्त पात्र करते थे। आर्यभाषा
का स्वरूप हम मोटे रूप में शास्त्रीय-संस्कृत या लौकिकसंस्कृत मान सकते
हैं। जिसका समाज के उच्चस्तरीय वर्ग में व्यवहार होता था। इसका
आर्यभाषा नामकरण तथा नाट्यशास्त्र में स्थित विवरण यह संकेत करने
के लिये पर्याप्त है कि यह समग्र आर्यावर्त से सम्बद्ध भाषा थी। आचार्य
अभिनवगुप्त का मत है कि पूर्ण संस्कार सम्पन्न संस्कृतभाषा को ही आर्य-
भाषा समझना चाहिए ।१
जातिभाषा—आर्यभारतीय प्रजा की आवासीय या प्रादेशिक भाषाएँ
ही 'जातिभाषा' है। ये संस्कृत तथा प्राकृतभाषा के अन्तर्वर्ती विस्तीर्ण
प्रभेद रखती थीं। अब यहाँ प्रश्न यह होगा कि क्या यह भाषा सामान्य-
भारतीय प्रजा की आवासीय या क्षेत्रीय भाषा रही थी ? इसका उत्तर बहुत
साफ है। यद्यपि हमारे पास तत्कालीन समाज के स्पष्ट नृवंशीयतत्व से
सम्बद्ध चित्र विद्यमान नहीं है परन्तु प्राप्य तथ्यों के तथा सुदृढ़ परिकल्पना के
आधार पर यह माना जा सकता है कि उस समय नाट्यप्रदर्शन देखने वाली
प्रजा विशुद्ध आर्यजातीय तथा मिश्र आर्यजातीय अवश्य रही थी तथा सामान्य
१. द्रष्टव्य-अभि० भार० Vol II पृ० ३७२ ( बडौदा सं० ) ।
( ७४ )
प्रजा में आर्यजाति के समाज से सामीप्य रखने वाली जातियाँ या उनसे
सम्बद्ध कुछ अनार्य जातियाँ भी थी। अतः जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों
की क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएँ रही जिनका प्रयोग संस्कृत या प्राकृतभाषा
की सम्बोध्यविधि के अनुसार रखा जाता था। इन भाषाओं में अपने
प्रजातीय तथा क्षेत्रीय शब्दों का मिश्रण रहता था जो बाद में अधिक विस्तार
पाने पर पृथक् विभाषा के रूप में विकास पा जाता था तथा जिनसे एक पृथक्
भाषा का रूप बन जाता था। इस क्रम ने पूर्वकालिक भाषाव्यवहार का
स्थान धीरे-धीरे ले लिया, जिसमें आर्यभाषा का प्रकृतविधि से व्यवहार
होता था तथा जिसे ये प्रजातियाँ समझती तथा स्वीकार करती थी। परन्तु
अतिशय स्पष्टता के साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रजातीय भाषाएँ
अपने तात्कालिक या वास्तविक रूप में (रूपकों में) प्रस्तुत की जाती थी।
यह तथ्य नाट्यशास्त्र के निम्न उद्धरण से स्पष्ट है—
द्विविधा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
म्लेच्छशब्दोपचारा च भारतं वर्षमाश्रिता ॥ (ना० शा० १८।२८)
इस प्रकार स्पष्ट है कि जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों की स्थानीय भाषा
थी, जो प्राचीन आर्यभारतीय सम्बोधविधि के अनुसार प्रयोज्य रहती थी
तथा जिसमें प्रजातीय शब्दों का मिश्रण रहता था।
इन भाषाओं पर विचार के पश्चात् हमारा ध्यान उन अब सात भाषाओं
पर भी जाता है जो इसी जातिभाषा के अन्तर्गत क्षेत्रों से सम्बद्ध हैं। ये सात
भाषाएँ पहिले कही जा चुकी हैं जिनमें शौरसेनी, मागधी तथा अर्धमागधी
स्पष्टतः, आर्यभाषा से उद्भूत हैं तथा यही स्थिति आवन्ती, प्राच्या,
बाह्लीकी तथा दाक्षिणात्या के उद्भव के विषय में भी है। यद्यपि आज हमें
अवन्ती या प्राच्या के अंश नाट्यकृति में अधिकता से प्राप्य नहीं है तथा
बाह्लीकी एवं दाक्षिणात्या का भी नाट्यशास्त्रगत विवरणमात्र ही मिलता है
जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनके रूप अतीत के गर्भ में (नमूने के साथ
साथ ही) विलीन हो चुके हैं। इन तथ्यों से एक बात और भी स्पष्ट रूप में
उभर कर आती है कि नाटकादि में अवस्थित प्राकृतभाषाएँ सर्वदा एक
लचीली दशा में ही स्थित रही थी जिनका प्रयोग पात्रों की स्थिति, प्रकृति
तथा देश के अनुरूप रखा जाता था। यहाँ नाट्यप्रयोग के प्रस्तोता को इसी
कारण भरतमुनि ने अपनी सुविधा के अनुरूप भाषाप्रयोग की स्वतन्त्रता दे दी है।
भरतमुनि के इस भाषाविधान का परवर्ती नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों तथा
नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त प्रभाव रहा तथा भरतानुसारी भाषाविधान को लेते
( ७५ )
हुए उनमें नवीन अंश जुड़ते रहे। शारदातनय ने अपने भावप्रकाशन में
प्राकृतभाषा के पैशाची, मागधी तथा शौरसेनी प्रभेदों को ग्राम्य, नागरक
तथा उपनागरक प्रभेदों के विवरण देकर अठारह कर दिया जो भरत के
मत में दिखलाया गया था ( भाषा ४ + सप्तभाषा + सप्तविभाषा = १८) ।
आचार्य विश्वनाथ कविराज ने साहित्यदर्पण में तेरह प्राकृतभाषाओं का नामतः
विवरण देकर उनका प्रयोगविधान दिखलाया भी है। शौरसेनी, मागधी
तथा अर्धमागधी प्राकृतों का संस्कृत नाटकों में व्यवहार (सदा) लोकप्रियता
बनाये भी रहा। प्रायः (महाराष्ट्री तथा) शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग सभी
नाटकों में मिलता है। सर्वाधिक प्राकृतभाषाओं के विधानानुगतप्रयोग के
दर्शन शूद्रक के मृच्छकटिक में हमें मिलते हैं जहाँ चाण्डाली, शाकारी तथा
ढक्की भाषाओं का भी प्रयोग हुआ है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि का
दाय तथा प्रभाव नाट्यशास्त्रीयग्रन्थों तथा नाट्यरचनाओं पर सभी संभव
स्थितियों के साथ पड़ता रहा है यह निर्विवाद है।
नाट्यशास्त्र के उन्नीसवें अध्याय में भाषाविधान के एक अन्य प्रयोगगत
पक्ष को लेकर सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जनादि की विधि निरूपित है। इनमें
सर्वप्रथम सम्बोधन का विवरण है—
सम्बोधन-प्रकार—नाटकों के पात्र अपनी उत्तम, मध्यम तथा हीन
स्थिति में अवस्थादि के अनुसार एक दूसरे को सम्बोधित कर सम्भाषण करते
हैं, जिनका नाट्यशास्त्र में विस्तार से विवरण दिया गया है। इन असंख्य
सम्बोधनों का आधार पात्रों की सामाजिक स्थिति, पारिवारिक भावना,
आदरअनुराग व्यवसाय तथा सेवादि नियोजित कार्य तो है ही उनका लोक-
प्रचलित व्यवहार भी है। ये सभी सम्बोधन पुरुष तथा नारी पात्रों को एक
विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान कर भारतीय समाज की महनीय स्थिति को संकेतित
करते हैं।
इसके अतिरिक्त भरतमुनि ने इस सम्बोधन-विधान के साथ साथ पात्रों
के विभिन्न जातीय एवं सामाजिक स्तर का ध्यान रखते हुए तदनुसारी
नामकरण के विधान भी दिये हैं, जो बड़े व्यापक है तथा जिनसे पात्रों के
कर्मादि के अनुरूप नामकरण की प्रवृत्ति का भी आभास मिलता है। इसका
प्रभाव परवर्ती नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त रूप में प्राप्त होता है।
पाठ्य—(गुण तथा उसकी उपयोगिता) :—वाचिक अभिनय का
प्रस्तुतीकरण संवाद या पाठ्य के द्वारा सम्पन्न होने के कारण भरतमुनि ने
पाठ्यतत्व को वाचिकअभिनय का प्राण कहा है। इस सन्दर्भ में मुनि ने
( ७६ )
‘पाठ्य-गुण’ पद का प्रयोग किया था जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि पाठ्य के जो उपकारक या आधार हों उन
( उपकरणों ) का विश्लेषण जिनसे अभिनय का पल्लवन किया जाए ‘पाठ्य-
गुण’ कहलाते हैं। ये उपकारक उपकरण हैं :—सप्तस्वर, तीन स्थान, चार
वर्ण, दो काकु, छः अलङ्कार तथा छः अङ्ग । यहाँ क्रमशः इनका विवरण दे
रहे हैं :—
सप्तस्वर—रसों के सन्दर्भ में गीतादि के स्वरों का विनियोजन ही
पाठ्य का सप्तस्वर गुण कहलाता है। ये सप्तस्वर हैं—षड्ज, ऋषभ,
गान्धार, मध्यम पञ्चम, धैवत तथा निषाद । इनमें हास्य तथा शृङ्गाररस के
योग में मध्यम तथा पञ्चम स्वरों का करुणरस के योग में गान्धार तथा
निषाद स्वरों का तथा भयानक एवं बीभत्स रस के योग में धैवत स्वर का
विधान विहित है।
स्थान—इसके अन्तर्गत शरीर के शिर, कण्ठ तथा उरस् प्रदेश आते हैं
जिनके विशिष्ट क्रम से स्वरों का उत्थान किया जाता है तथा काकु का
प्रयोग। पाठ्य के प्रसंग में पात्रों की दूरस्थ स्थिति में शिर तथा कण्ठ को
किञ्चिद् दूरी में रखते हुए तथा निकटस्थ पात्रों के साथ संवाद की स्थिति में
उरस् का प्रयोग किया जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रसंग में
बतलाया कि दूरस्थ पात्रों को शिर या मूर्धा निष्पन्न स्वर से तार या उच्च-
ध्वनि में बुलाया या संभाषण किया जाता है जब कि अतिदूरी के न होने पर
कण्ठ के मध्य स्वर से संभाषण किया जाता है। इसी प्रकार समीपवर्ती पात्र
से उरस् या वक्षःस्थल के समीपवर्ती मन्द्रस्वर से संभाषण होता है।
वर्ण—नाट्यशास्त्र में चार पाठ्यवर्ण बतलाये हैं—उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित तथा कम्पित जिनका हास्य आदि रसों के योग में प्रयोग ( या
उपयोग ) होता है। स्वरित तथा उदात्त का प्रयोग हास्य तथा शृङ्गार
रस में, उदात्त तथा कम्पित का वीर, रौद्र तथा अद्भुतरस में तथा करुण,
बीभत्स एवं भयानक रसों में अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित वर्णों का प्रयोग
किया जाता है।
काकु—पाठ्यगुण का प्राणभूततत्व काकु होता है, क्योंकि काकु के ही
द्वारा स्वरवैभिन्य से विचित्रता आती है तथा नवीन अर्थ का आधार
विस्तीर्णता को प्राप्त करता है। इस काकु के दो प्रभेद होते हैं—
( १ ) साकाङ्क्ष, ( २ ) निराकाङ्क्ष । प्रकरणादि की अपेक्षा करने वाला
काकुविधान साकाङ्क्ष कहलाता है। इसमें तार से मन्द्र तक स्वर, अनियत
( ७७ )
अर्थ, उदात्त आदि वर्ण तथा उच्चादि अलङ्कार अपरिसमाप्त रहते हैं।
निराकाङ्क्ष-काकु में इसके विपरीत अर्थ नियत, 'उच्च आदि वर्ण तथा
अलङ्कार परिसमाप्त स्थान शिर और मन्द्र से तार तक स्वरों की योजना
रहती है। काकु का जिह्वा के द्वारा सम्पादन होता है तथा उच्च, दीप्त
आदि वर्णों तथा सन्धिविच्छेद आदि के द्वारा पाठ्य में काकु को प्रमुखता दी
जाती है क्योंकि सर्वत्र काकु प्रधान रहता है।
पाठ्यगत अलङ्कार—पाठ्य के छः अलङ्कार माने गये हैं, जिनसे काकु
को पूर्णता प्राप्त होती है। ये हैं—(१) उच्च, (२) दीप्त, (३) मन्द्र,
(४) नीच, (५) द्रुत, तथा (६) विलम्बित। दूरस्थित पात्रों की विस्मय,
त्रास तथा बाधा की दशा में होने वाले संवादों में पाठ को उच्चस्वर में रखा
जाता है। पारस्परिक आक्षेप, क्रोध, तथा कलह आदि की स्थिति में
विलम्बितस्वर में पाठ रखा जाता है। इस प्रकार विभिन्न भावदशाओं के
अनुरूप पात्रों का पाठविधान भी रखा गया है जिससे अभिनय या नाट्यप्रयोग
को प्रभावशाली एवं सफल बनाया जा सके ।
पाठ्याङ्ग—पाठ्य के छः अङ्ग भी होते हैं—(१) विच्छेद, (२) अर्पण,
(३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन। विराम के
कारण पाठ में 'विच्छेद' होता है। यह नाट्यार्थ के अनुरोध पर या उसे
ध्यान में रख कर किया जाता है तथा यह अर्थदर्शक होता है। इसी
कारण नाट्यार्थ को पूर्णतः हृदयंगम करने एवं अर्थानुरोध के लिये विरामों
की योजना रखी जाती है। इन अर्थदर्शक विरामों से युक्त जब पाठ्य होता
है या किया जाता है तो नाट्यप्रयोग को यह समृद्ध कर देता है। गम्भीर
एवं मधुरस्वर में पात्र द्वारा किये जाने वाले पाठ के द्वारा दर्शकों
का अभिनीत भावों में समाहित हो जाना 'अर्पण' कहलाता है। इसमें
अभिनेता कवि या नाट्यकार द्वारा उन्नीत संवेदना को दर्शकों को अर्पण
करता है। वाक्य की समाप्ति होना 'विसर्ग' तथा पाठ्य की शृङ्खला को
बनाए रखना 'अनुबन्ध' कहलाता है। विभिन्न स्थानों से उत्थित स्वर का
उत्तरोत्तर दीप्त होना 'दीपन' तथा तार स्वर में उच्चारित स्वर का क्रमशः
मन्द्रस्थिति में आना 'प्रशमन' है।
भरतमुनि ने इन अङ्गों से होने वाले रसाश्रित प्रयोग भी दिखलाये हैं।
तदनुसार हास्य तथा शृङ्गाररस में अर्पण, विच्छेद, दीपन तथा प्रशमन
नामक अङ्गों का, वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, दीपन
और अनुबन्ध का तथा बीभत्स एवं भयानकरस में विसर्ग तथा विच्छेद का
विधान रखा जाता है। इन अङ्गों के विभिन्न रसाश्रित प्रयोगों को तार,
मन्द्र तथा मध्य नामक अलङ्कारों के आधार पर रखा जाता है। तारस्वर
से मन्द्र तथा मन्द्र से तार स्वर पर सहसा पाठ नहीं रखा जाता है; क्योंकि
ऐसा करना नाट्यार्थ का प्रतिरोधक होता है। किन्तु द्रुत, मध्य तथा
विलम्बित का प्रयोग नाट्यार्थ की उद्दीपित करने के कारण सदा इष्ट
होता है।
इस प्रकार भाषाविभेद सम्बोधन विधि, पात्रों के नामकरण तथा काकु,
स्वर, अलङ्कार तथा पाठ्याङ्गों के विवरण के साथ छन्दों की तथा भाषा की
प्रकृत्ति को विस्तार से देकर वाचिक-अभिनय का साङ्ग एवं तात्विक विवरण
नाट्यशास्त्र में इन चार अध्यायों में दिया गया है। इससे पाठ्य के अङ्गों
के ठीक रखने की स्थिति का निर्माण होता है जो नाट्यार्थ की भावना को
व्यवस्थित कर देता है। ऐसा होने पर कवि या नाट्यकार की उद्भावित
संवेदना का दर्शक समाहित दशा में अवबोध करने में समर्थ हो जाता है।
पाठ्यगुणों का व्यवस्थित एवं साङ्ग विवरण सर्वप्रथम नाट्यशास्त्र में ही
हुआ जो उस समय की प्रयोग-पद्धति का पूर्ण संकेत देता है कि वह कितनी
समृद्ध रही थी। यह विवरण तथा इसमें निदर्शित विधान से यदि अभिनयगत
निपुणता प्राप्त की जाए तो नाट्यप्रयोग सदा ही निश्चित रूप से सफलता
प्राप्त करेंगे। भरतमुनि की प्रयोग विज्ञानगत निपुणता तो इस विवरण से
प्रकट होती ही है साथ ही उनकी दीर्घदृष्टि का भी इससे बोध होता है।
परवर्तीकाल में नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थकारों ने ऐसे विषयों का अधिक विस्तार से
विवरण ही नहीं दिया तथा ऐसे विषयों का व्यवस्थित विश्लेषण भी नाट्य-
शास्त्र के ( सार तत्व के ) आधार पर नहीं लिखा गया। उनने पाठ्यादि के
भरतोक्त विवेचन को ऐसा करते हुए बिना किसी संशोधन के सार्वकालिक
स्वीकृति ही प्रदान की तथा भरतमुनि की प्रतिभा को ही इस सन्दर्भ में
( आदि से लेकर अन्तिम भाग तक ) अक्षुण्ण मान्यता प्रदान करते हुए ऐसा
प्रतीत होता है कि अपना एकमत से इसे समर्थन ही दे दिया था।
**प्रस्तुत खण्ड तथा उसके पाठान्तर—**इस प्रकार इस द्वितीयभाग में
नाट्यशास्त्र के अष्टमअध्याय से एकोनविंश अध्याय तक के विवरण को
उपस्थापित किया गया। विंश अध्याय से षट्त्रिंश अध्याय तक इसी प्रकार
क्रमशः अगले भागों में विवेचन किया जाता रहेगा। यह हम पूर्व में भी
बतला चुके हैं कि नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत संस्करण में प्रायः सभी अद्यतन एवं
( ७६ )
उपलब्ध सामग्री का यथाशक्य उपयोग किया गया है तथा प्रायः सभी अद्यतन
सामग्री का प्राप्य तथ्यों के आधार पर अनुशीलन भी। नाट्यशास्त्र के
पाठों के अन्तर्गत जो पाठ नाट्यशास्त्र के प्रामाणिक तथ्य लिये हुए थे उन्हें
मूलपाठ बनाकर तथा अवशिष्ट पाठान्तरों को टिप्पणी में दिखलाया गया है
जिससे नाट्यशास्त्र के सभी उपलब्ध पाठान्तरों का एकत्र संग्रह हो जाए।
कुछ पाठान्तरों के अर्थ भी यथास्थान आवश्यकतानुसार दे दिये गये हैं जिससे
अध्येता एवं अनुशीलनकर्त्ता को सभी विषयों की अभिप्राप्ति हो तथा किसी
महत्वपूर्ण पाठ या पाठान्तर को वे भी अपने विचार का विषय बना सकें।
पाठान्तर सङ्केत—इसमें ‘क’ पाठ के अन्तर्गत गायकवाड ओरि० सीरीज
बड़ौदा से प्रकाशित अभिनवभारती व्याख्या के अनुगत पाठ तथा इसी के
साथ रहने वाले पाठान्तरों को भी कोष्ठकान्तर्गत ‘म’ या ‘भ’ देकर दिखलाया
गया है। इसी प्रकार ‘ख’ पाठ के अन्तर्गत काव्यमाला संस्करण बम्बई के
प्रकाशित पाठों को तथा ‘ग’ पाठ के अन्तर्गत प्रथमभाग की तरह ही काशी
संस्कृत ग्रन्थमाला चौखम्बा वाराणसी के पाठों को लिया गया है। इसमें भी
प्रथमभाग की तरह ही मूलपाठ को काशी संस्करण की दीर्घपाठ परम्परा के
अनुसार यथासम्भव रखा गया है किन्तु आवश्यकतानुसार इनमें अनेक स्थानों
पर ( थोड़ा ) परिवर्तन भी हो गया है। नवम अध्याय तथा आगे अध्यायों
में वर्णित हस्ताभिनयादि के रेखाचित्रों को भी इस भाग में यथाशक्य लगाया
गया है, जिससे नाट्यशास्त्रीय विषयों को हृदयंगम करने में सहायता मिलेगी।
यही क्रम अगले भागों में रखा जा रहा है तथा नाट्यशास्त्र के शेष भाग भी
शीघ्र ही प्रस्तुत करने का उद्योग जारी है। आवश्यक विवरण को पूर्ववत्
ध्यान में रख कर प्रस्तुत भाग के परिशिष्ट १ में अतिरिक्त टिप्पणियाँ तथा
परिशिष्ट २ में पद्यार्धानुक्रमणिका लगायी गयी हैं तथा अन्त में शुद्धिपत्र भी
दे दिया गया है। इतना रहने पर भी सुधी पाठकों से प्रमादवश छूटी हुई
अशुद्धियों तथा विषयगत विस्तार सम्बन्धी सुझावों को भेजने की अभ्यर्थना
है जिससे उनका उपयोग होकर अगले संस्करणों को और भी परिमार्जित
किया जा सकेगा।
पाठान्तर प्रक्रिया—नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में पाठों को लेकर कुछ
विवरण अल्प मात्रा में ही संकेत रूप में रखा गया था। इसका कारण यही
था कि वहाँ विषय-विवरण ने पर्याप्त स्थान ले लिया था तथा वही बात फिर
इस भाग के समय भी विद्यमान है परन्तु अपेक्षित बात को यहाँ अवश्य रखना
है । जैसा कि हमने प्रथमभाग में कहा था कि श्रीग्रासे को अपने संस्करण
के लिये नाट्यशास्त्र के विभिन्न हस्त लेखों के कारण एक नवीन पद्धति
निर्मित करनी पड़ी थी । उसकी प्रक्रिया तथा पाठ विनिश्चायक सरणि का
अल्पविवरण पुनः यहाँ देना अप्रासङ्गिक नहीं होगा क्योंकि यह नाट्यशास्त्र
के परिशीलन में एक प्रमुख ( पक्ष की ) स्थिति रखता है । वे कहते हैं कि—
'भारतीय नाट्यशास्त्र के हमारे मूलपाठ का स्वरूप अधिकांशतः सभी
ओर से प्राप्य उत्तम या इष्ट को ग्रहण कर लेने की प्रकृति का है, क्योंकि एक
पाठ को स्थिर करने में किसी आग्रह या दबाव का अनुभव नहीं होता, जो
एक सहज प्राथमिकता के अनुरोध पर किसी हस्तलेख को लेने हेतु रहती है ।
हमने कभी कभी तो हस्तलेखों की संख्यागत वृद्धि या आधिक्य का अनुगमन
किया है तो कभी किसी समग्र तथ्य को ध्यान में रखते हुए रुचि को आधार
बना कर पाठों को लिया था । ऐसा करते हुए हम भरतमुनि के मूलपाठ को
शुद्ध या संशोधित करने की अमूलक महत्वाकांक्षा से दूर ही रहे हैं, जिसमें
अनधिकृत संशोधन भी हो जाते हैं । यहाँ तो केवल ऐसे पाठ भी मूल में ले
लिये गये हैं जो किसी उत्तरकालीन संशोधन के कारण किसी एक ही हस्तलेख
में थे । इसमें इतनी बात की सतर्कता अवश्य रखी गयी कि ये बिना किसी
आधार के नहीं लिये गये हों तथा साथ ही उनके पाठान्तर भी यथास्थान
रख दिये गये हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में वे आवश्यक थे ।'
श्री ग्राँसे के इस विवरण से थोड़ी आंशिक भिन्नता रखने पर भी उनके
इस कथन में नाट्यशास्त्र के सम्पादन के ऐसे संकेत विद्यमान हैं जिनके महत्व
से इन्कार नहीं किया जा सकता है परन्तु प्रस्तुत सम्पादक इस विषय में
थोड़ी विचार भिन्नता भी रखता है। नाट्यशास्त्र के अच्छे संशोधित पाठों
को प्रकृतसंस्करण में हमारे द्वारा लिया गया है जबकि उनके अन्य पाठ भी
हस्त लेखों के कारण विद्यमान थे परन्तु सन्तोषजनक रूप में जो स्वीकार्य नहीं
हो सकते थे । अतएव ऐसे पाठों को उपयुक्त विचार के बाद ले लिया गया
जो संशोधन की उपयुक्तता लिए हुए थे परन्तु ऐसी स्थिति में शेष पाठान्तरों
की भी ( अच्छे रूप में रहने पर या तो ) व्याख्या कर दी गयी है या फिर
उन्हें पाठान्तर के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है जिससे आगे चलकर
उनके औचित्य पर और भी विचार हो सके । प्रकृत सम्पादक अपने आग्रह
१. द्रष्टव्य—ग्रासे संस्करण की प्रस्तावना—पृ० ५, ११-१२ पेरिस
संस्करण ।
( ८१ )
पूर्ण पाठों को थोपने के पक्ष में नहीं है तथा उसने कहीं ऐसी स्वतन्त्रता का
उपयोग भी नहीं किया है। नाट्यशास्त्र के पाठान्तरों के अनुशीलनकर्त्ता
संशोधक विद्वानों से इस सन्दर्भ में यही निवेदन है कि वे अपनी मीमांसा के
समय इस विशिष्ट स्थिति को भी अवश्य ध्यान में रखेंगे जो सम्पादन के
समय प्रायः सभी पूर्व सम्पादकों ने अनुभव की थी तथा उसे अपने-अपने
संस्करणों में वर्णित भी किया था।
यह एक बड़े ही आदर्श की तथा महत्व की भी बात होती यदि हम
हस्तलेखों में तथा नाट्यशास्त्र के संस्करणों में प्राप्य एवं विद्यमान सभी पाठ-
भेदों को पादटिप्पणी में दे देते किन्तु ऐसा करना मुश्किल से व्यावहारिक बन
पाता। अतएव यहाँ पाठान्तर देते समय यह बात भी सर्वदा ध्यान में रखी
गयी है कि दिये गये पाठ या पाठान्तर किन्ही संशोधित संस्करणों में किस
प्रकार रहे हैं। इस प्रकार वर्तमान संशोधित संस्करण में उन संस्करणों के
पाठों को आवश्यक संकेत के साथ पाठान्तर टिप्पणी में दिखलाया गया है।
परन्तु यहाँ इतना अवश्य हुआ है कि ऐसे पाठान्तरों को प्रायः नहीं लिया
गया जो केवल पुनरुक्ति या शाब्दिकभेद मात्र के कारण अधिक महत्व के
नहीं थे, परन्तु ऐसे पाठों में भी जो प्राप्त करवाने योग्य थे तो उन्हें बराबर
रखा ही गया है। इसके प्रथमअध्याय से चौदह अध्याय तक के पाठों का श्री
ग्रासे के संस्करण से भी समीकरण करते हुए उसे 'क' पाठ के अन्तर्गत (या
अन्य वर्ग के अन्तर्गत) रखते हुए संकेत बनाये गये हैं तथा बम्बई काव्यमाला
संस्करण के सामान्यतः 'ख' के संकेत के अन्तर्गत पाठों को इस संस्करण में
दर्शाया गया है जिसका स्पष्टीकरण आवश्यक था।
आभार-प्रदर्शन—
“नाट्यशास्त्र” के इस द्वितीयभाग के लिये भी प्रथमभाग की तरह
ही अनेक सुधीजन, एवं साहित्य-विद्या-निष्णात मनीषियों का सहयोग,
प्रोत्साहन तथा प्रेरणा मिली है, जिनका उपकार सदैव मानते हुए उन्हें
धन्यवाद देना अपना प्रथम कर्त्तव्य मानता हूँ। इसी प्रकार नाट्यशास्त्र के
पूर्व प्रकाशित संस्करणों के सम्पादकों का भी सामान्यतः अधमर्ण हूँ जिनके
संस्करणों के कारण ही प्रस्तुत संस्करण को संवारने में सहायता मिली है।
इनमें भी सर्व प्रथम गायकवाड ओरियेन्टल सीरीज, बड़ौदा के अभिनवभारती
टीका सहित संस्करण के प्रथितयशस्क सम्पादक म० म० रामकृष्ण 'कवि'
का, काव्यमाला—निर्णयसागर प्रेस बम्बई के सम्पादक श्री पाण्डुरंग परब
६ ना० द्वि० भू०
( ८२ )
तथा द्वितीय संस्करण के सम्पादक श्री पण्डित केदारनाथ साहित्यभूषण का
तथा काशी संस्कृत ग्रन्थमाला, काशी के नाट्यशास्त्र के सम्पादक श्री
बटुकनाथ शर्मा तथा पण्डित बलदेव उपाध्याय के प्रति भी अपनी कृतज्ञता
मानता हूँ जिनके संस्करणों ने प्रस्तुत संस्करण को संवारने में आधार प्रदान
किया। इसी प्रकार एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता से प्रकाशित नाट्यशास्त्र
( श्री मनोमोहन घोष के अंग्रेजी अनुवाद सहित ) के संस्करण से भी पर्याप्त
सहायता मिलने से उसके प्रति भी अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।
इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्रीय वाङ्मय के प्राचीन ग्रन्थकारों के प्रति तथा
अभिनव संशोधकों तथा समालोचकों का भी कृतज्ञ हूँ जिनके ग्रन्थों के
अनुशीलन ने मुझे प्रस्तुत संस्करण में अनेक अभिनव तथ्यों तथा शास्त्रीयप्रमेयों
पर अनेक दृष्टिकोणों से विचार तथा विषय मीमांसा करने में प्रवृत्त
करवाया।
प्रस्तुत ग्रन्थ के लेखन-काल में जिन अनेक ख्यातिप्राप्त विद्वानों, मित्रों
तथा लेखकों का हार्दिक एवं व्यावहारिक सहयोग मिला था तथा जिसका
प्रथम भाग में उल्लेख किया जा चुका है उन महानुभावों के साथ साथ उसी
क्रम में श्री डॉ० प्रभाकर नारायणजी कवठेकर, कुलपति विक्रम विश्वविद्यालय,
उज्जैन का विशेष रूप से आभारी हूँ, जिसने इस नाट्यशास्त्र के प्रदीप व्याख्यान
को अपनी गुणग्राहिता तथा उदारता से नाट्यशास्त्र की तात्विक मीमांसा को
प्रश्रय दिया। इसी प्रकार इन्दौर के शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय
के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ० देवेन्द्रकुमारजी जैन का भी नाट्यशास्त्र
की समीक्षा करने ( 'नई दुनिया' दैनिक में ) के कारण आभारी हूँ।
नाट्यशास्त्र के प्रदीप व्याख्यान को प्रोत्साहित कर शीघ्र प्रकाशित करवाने
के आग्रह के साथ साथ उसके अनुशीलन को अनुशंसित करने वाले विद्वानों
में स्व० श्री डॉ० बलदेवप्रसादजी मिश्र ( विधायक तथा सुप्रसिद्ध मानसमर्मज्ञ
एवं समीक्षक—राजनांदगाँव ), श्री सुधाकर पाण्डेय—( प्रधानमन्त्री काशी
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ), प्रो० श्री डॉ० श्यामसुन्दरलाल दीक्षित
अमरावती का भी मैं कृतज्ञ हूँ। इसके अतिरिक्त प्राध्यापक श्री वेङ्कटाचलजी,
अध्यक्ष संस्कृत विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, सुहृद्वर डॉ० रामेश्वर
शर्मा, रीडर नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर, प्रो० गणेशदत्त त्रिपाठी, हिन्दी
विभाग, शास० कला वाणिज्य महा०, इन्दौर, डॉ० लक्ष्मण नारायण शुक्ल,
प्राध्यापक संस्कृत महाविद्यालय, इन्दौर, प्रो० हर्षदधोलकिया, संस्कृत
महाविद्यालय, इन्दौर, प्रो० डॉ० पुरु दाधीच, भातखण्डे संगीत महाविद्यालय,
( ८३ )
लखनऊ तथा श्री प्रो० कृष्णशास्त्री कानिटकर, शास० कला वाणिज्य महा०
इन्दौर आदि का भी हृदय से आभारी हूँ ।
नाट्यशास्त्र के सभी खण्डों में प्रशस्त सहकार के कारण डॉ० रुद्रदेवजी
त्रिपाठी, लालबहादुर संस्कृत विद्यापीठ, देहली का तथा हिन्दी के परम
सुकवि सुहृद्वर डॉ० शिवमङ्गल सिंह 'सुमन' ( भूतपूर्व कुलपति विक्रम
विश्वविद्यालय, उज्जैन ) का भी इस सन्दर्भ में विशेषतः आभारी हूँ ।
नाट्यशास्त्र के व्याख्यानादि लेखन के समस्त कार्य को मध्यप्रदेश शासन
की सेवा में रहकर करने के कारण मैं मध्यप्रदेश शासन के प्रति भी अपना
विनम्र आभार प्रदर्शन करता हूँ । साथ ही नाट्यशास्त्र जैसे महाग्रन्थ के
लेखन के सुदीर्घ समय में सदा एकनिष्ठ होकर सहयोग देने वाले मेरे
अपने परिवार के सभी सदस्य भी धन्यवाद के अधिकारी हैं ।
इसी प्रसंग में मैं गोलोकवासी श्रेष्ठप्रवर बाबू जयकृष्णदासजी गुप्त का
भी स्मरण आवश्यक मानता हूँ जो ऐसे आकरभूत शास्त्रीय ग्रन्थ के प्रकाशन
में सदा रुचि लेते रहे हैं ।
मैं चौखम्भा संस्कृत संस्थान के संचालक गुप्त बन्धुओं का भी आभारी हूँ
जिनने नाट्यशास्त्र के भागों को अपनी गौरवशाली परम्परा के अनुरूप
प्रस्तुत करने का अतिशय उद्यम किया । इसी परिवार के श्री पं० देवनारायण
झा जी का भी मुद्रण कार्य में सहयोग के कारण आभार व्यक्त करता हूँ ।
किं बहुना—
नाट्याम्नाय-नितान्ततान्तमनासामासेतुशीताचला—
क्षोणीमण्डलमध्यवर्तिविदुषामाभोगिनी चेतसाम् ।
जीयादुक्तिविवेकजालनिकरैः संशोधिता निस्तुलैः
गम्भीरा मधुरा प्रबोधजननी व्याख्या प्रदीपाभिधा ॥
उज्जयिनी, \ सुधीजनकृपाकाङ्क्षी
विजयादशमी, सं० २०३५ } बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री
इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित या हस्तलिखित पाठ उपलब्ध नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ है)।