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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 668 में से

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है । जैसा कि हमने प्रथमभाग में कहा था कि श्रीग्रासे को अपने संस्करण
के लिये नाट्यशास्त्र के विभिन्न हस्त लेखों के कारण एक नवीन पद्धति
निर्मित करनी पड़ी थी । उसकी प्रक्रिया तथा पाठ विनिश्चायक सरणि का
अल्पविवरण पुनः यहाँ देना अप्रासङ्गिक नहीं होगा क्योंकि यह नाट्यशास्त्र
के परिशीलन में एक प्रमुख ( पक्ष की ) स्थिति रखता है । वे कहते हैं कि—
'भारतीय नाट्यशास्त्र के हमारे मूलपाठ का स्वरूप अधिकांशतः सभी
ओर से प्राप्य उत्तम या इष्ट को ग्रहण कर लेने की प्रकृति का है, क्योंकि एक
पाठ को स्थिर करने में किसी आग्रह या दबाव का अनुभव नहीं होता, जो
एक सहज प्राथमिकता के अनुरोध पर किसी हस्तलेख को लेने हेतु रहती है ।
हमने कभी कभी तो हस्तलेखों की संख्यागत वृद्धि या आधिक्य का अनुगमन
किया है तो कभी किसी समग्र तथ्य को ध्यान में रखते हुए रुचि को आधार
बना कर पाठों को लिया था । ऐसा करते हुए हम भरतमुनि के मूलपाठ को
शुद्ध या संशोधित करने की अमूलक महत्वाकांक्षा से दूर ही रहे हैं, जिसमें
अनधिकृत संशोधन भी हो जाते हैं । यहाँ तो केवल ऐसे पाठ भी मूल में ले
लिये गये हैं जो किसी उत्तरकालीन संशोधन के कारण किसी एक ही हस्तलेख
में थे । इसमें इतनी बात की सतर्कता अवश्य रखी गयी कि ये बिना किसी
आधार के नहीं लिये गये हों तथा साथ ही उनके पाठान्तर भी यथास्थान
रख दिये गये हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में वे आवश्यक थे ।'
श्री ग्राँसे के इस विवरण से थोड़ी आंशिक भिन्नता रखने पर भी उनके
इस कथन में नाट्यशास्त्र के सम्पादन के ऐसे संकेत विद्यमान हैं जिनके महत्व
से इन्कार नहीं किया जा सकता है परन्तु प्रस्तुत सम्पादक इस विषय में
थोड़ी विचार भिन्नता भी रखता है। नाट्यशास्त्र के अच्छे संशोधित पाठों
को प्रकृतसंस्करण में हमारे द्वारा लिया गया है जबकि उनके अन्य पाठ भी
हस्त लेखों के कारण विद्यमान थे परन्तु सन्तोषजनक रूप में जो स्वीकार्य नहीं
हो सकते थे । अतएव ऐसे पाठों को उपयुक्त विचार के बाद ले लिया गया
जो संशोधन की उपयुक्तता लिए हुए थे परन्तु ऐसी स्थिति में शेष पाठान्तरों
की भी ( अच्छे रूप में रहने पर या तो ) व्याख्या कर दी गयी है या फिर
उन्हें पाठान्तर के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है जिससे आगे चलकर
उनके औचित्य पर और भी विचार हो सके । प्रकृत सम्पादक अपने आग्रह

१. द्रष्टव्य—ग्रासे संस्करण की प्रस्तावना—पृ० ५, ११-१२ पेरिस
संस्करण ।