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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

९०

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-सोई पुरुष कबीर है, जेहि हम कीन्हो खोज ।
सबे कहै मोहि वाउर, कहै भसुंड बनरोज ॥
त्रेता रामचंद्र मोहि जांचा । नागफांस परिचित भौ कांचा ॥
तहां पहुँच अहिनास उबारा । तब मैं करतातेहिनावविचारा ॥
करता निरबंद योनि नहि आवे । नागफांस तेहि बांधको पावे ॥
तब हम चीन्ह कौसिल जाये । भक्तवत्सल क्षत्रीरूप धर आये ॥

दोहा-क्षत्रीरूप राजसी, सातकी सद्गुरु रूप ।
तमगुण तामस सकल सब, त्रिगुण बित्त तेहि भूप ॥
अब हम सत्यपुरुषको चीन्हा । कबीरकेस्तुतिगरुडबहुकीन्हा ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण गरुड तुम जानहु । कबीरकेअंस सुपच पाहिचानहु ॥
जिनके भोजन घंट जो बाजा । अधर अकाशजो धजा विराजा ॥
सो कबीरके सेवक रहई । जेहि सपनाकोउतिहँपुरअहई ॥
उधसेन भक्त बंद मै छोरा । ताते मोहि संत कहैं बंदिछोरा ॥
कबीर छोरहिँ चौरासी यम फंदा । निर्गुण नाम कबीर निर्दिदा ॥
जापर दायरा करहिँ सतनामा । सो देखे सतलोक सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण सुन आसन मोरा । महा सुज्ञान गरुड बल जोरा ॥
हमही रहे त्रेता रघुवंसा । तवहीं कबीर मेटे यम संसा ॥
सतकबीरके अंस एक राऊ । सो पूंजी यम पितहिँ दियाऊ ॥
राय रभिता राम सोहँगी । ताके नार देह अर्धगी ॥
रामचंद्र अर्धगी सांता । रावण चोर संधि सिर दीता ॥

कबीरकृष्णगीता ।

९१

तेहि प्रति रामचंद्र दुख पावा । वन २ रटत वचन पितु पावा ॥
वचन सरूप धरे सब देवा । डासन त्रिण भोजन फल मेवा ॥
सिंधु सेत वांधे हरि ताका । पर्वत सबे सिंधु महीं राखा ॥
वांधन लगे सिंधु गंभीरा । तब हरि सुमरे सत्यकवीरा ॥
आय कबीर तुरत दरसावा । कबीर रूप हरि हृदय समावा ॥
रामचंद्रके हृदय कबीरा । आद ब्रह्म कबीर गंभीरा ॥
कबीरके अंस हैं लक्ष्मण वाला । लिखा मेर पर अंक रिसाला ॥
लक्ष्मण अंक सेतु लेहु वांधा । रामचंद्रका छूटा धंधा ॥
उत्तरा सैन लंकागढ दूटा । सकल देवका वंदी छूटा ॥
दीन्हो राज्य विभीषण थापी । कोइ न वांचे राक्षस पापी ॥
सिय बंदिछोर राम लियो संग। । सत्यकबीर प्रताप सुरंगा ॥
सुन खगपति सब देव मुनीसा । सृष्टि कबीर सबन कहैं दासा ॥

दोहा—कहैं कृष्ण सुनु देव मुनि, रक्षक नाम कबीर ।
हमहिं औसर सुमरहीं जन, गाठे परे शरीर ॥

जीवके सुख देवे कारण । पुरुष कबीर प्रगट कलि सारन ॥
रामनाम गुरु महिमा भाषा । सत्संगतके इच्छा राखा ॥
सत्संगत गुरु मार्ग पाई । गुरु सदुरु मिल ज्यास नसाई ॥
खरा खोटा परख दिखाये । सदुरु सो जिन सत्य चिन्हाये ॥
निर्गुण एक कबीर बखाना । सर्गुण सकल देव मिल जाना ॥
निर्गुण बोलता कबीरको अंसा । रमता राम सकल घट हंसा ॥
कहैं कृष्ण कबीर परजाई । सदुरु सत्य कबीर गोसाई ॥

९२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-सद्गुरु सत्य कबीर हैं, निहचल अजर शरीर ।
भौसागर तारन तरन, समर्थ सत्य कबीर ॥

व्यास सुखदेव समेता । अज हरि हर प्रभु कृपानिकेता ॥
नारद ऋषि इंद्रादि सनकादी । सके न कोई कबीरसंवादी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुखदेऊ । कबीरहिं मानुष कहे जनि कोऊ ॥
कबीर सर्वाधिक करताके करता । भरी ठरै फिर खाड़ी भरता ॥
भक्त रूप धर प्रगट दिखाये । गुरुकी भक्ति ठिग दास कहाये ॥
युग २ रक्षा हमरी कीन्हा । भक्त रूप होय दर्शन दीन्हा ॥
रामरूप संग लक्ष्मण सीता । सत्यकबीर बन दास पुनीता ॥

दोहा-कहैं कृष्ण सब कोइ सुनो, इत उत दास कबीर ।
सतकबीर सत युग २ सुमेर, दोउ दीन गुरु पीर ॥

व्यासवचन ।

कहैं व्यास सकल मिल वाणी । धन्य कबीर जेहि कृष्ण बखानी ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख देऊ । हमहु न लखा कबीरका भेऊ ॥
जब कबहुँ हम त्रसित निरंजन । तहां कबीर काल शिर भंजन ॥
कबीरको चरणोदक जब लीन्हा । जबते अगम गम्य हम चीन्हा ॥
हमरे कहे के पिता निराकारा । हम कहै ये कबीर प्रतहारा ॥
कबीरके पांव निरंजन लागे । और जीव कहा कस आगे ॥
निरंजन एक दिन प्राप्त धाये । कबीर नाम जप जीव बचाये ॥

गुरुभक्तिकी महिमा

कवीरकृष्णगीता ।

९३

दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।

अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥

कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥

जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥

तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥

संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥

जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥

रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥

परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥

दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥

सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥

कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥

तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥

तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥

तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥

सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥

बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥

चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥

दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।

हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥

गरुडकी चेतना - गरुड और कबीर सम्वाद

९४

कवीरकृष्णगीता ।

सकल देवता सुन थर हरेऊँ । धाय कवीरके चरणन परेऊ ॥
चरणोदक लै मुखमहँ लीन्ह। चरण परसि प्रदक्षिण कीन्ह। ॥

कबीरवचन ।

कहँ कवीर सुनो सुनि व्यासा । गुरुके भक्त कटे यम फाँसा ॥
गुरु विन राम न भावे हांथा । गुरु विन डोलहिँ जीव अनाथा ॥
गुरुकी भक्त साधुकी सेवा । हरषि गोपाल मिले यह भेवा ॥
हमहू गुरुको करता जाना । काउ जीत गुरु नाम बसाना ॥
गुरु सोई जो अंतहु थीठा । जन्म बरण गुरुलागे सीठा ॥

दोहा—योग यज्ञ तप तीर्थ, प्रतिमा भूत मसान ।

कहँ कवीर सदुरु विना, जीव जात यम थान ॥
उठके गरुड टाढ बये आगे । हरिसों विनती करने लागे ॥
आज्ञा देहु मोहि त्रिसुवननाथा । हमहु जीव निज करहु सनाथा ॥
हम कवीर कहँ सदुरु करहीं । सेवा तुम्हार ध्यान उर धरहीं ॥
कृष्ण विहँस कहवे अस लीन्ह। सुनहु विहँग सबन चित दीन्ह ॥
यहिते श्रेष्ठ अमर कछु नाहीं । धन्य सो जो गुरु शरण समाहीं ॥
हमहू गुरुके शरण समाने । सदुरु कर कवीर कहँ जाने ॥
कबीरके आस सबनको भाई । कहहि कृष्ण पुन गरुड बुझाई ॥

दोहा—खगपति गये कवीर पहुँ, शरण देहु सतनाम ॥

यमसे त्रास निवारहु, देहु भक्त सतधामा ॥

कबीरवचन ।

कहँ कवीर सुनो खगराई । बडे भाग गुरु शरण समाई ॥
गुरुकी आज्ञा शिष्य जो माने । शिष्य सोईजो गुरु सुरति समाने ॥

कबीरकृष्णगीता ।

९५

चरण टेक विनवें नभगामी । आज्ञाकरहु सो मागो स्वामी ॥
कहो तो सीस कल्प सुँइ धरऊँ । कहो निजहु तासन परऊँ ॥
हमहू गुरुकी महिमा जाना । गुरुते श्रेष्ठ और नहीं आना ॥
हम त्रिभुवन पातिके सुखपाला । हमरे पीठ जो सदा गोपाला ॥
जब हम देस गोपाल तेहि सेवा । परेउं चरण तर लीन्ह तुव भेवा ॥
दोहा—कहे तक्षक आरि जोर कर, विनय सीस पग राख ।
काटहु यम कर फाँस प्रभु, गुरुड दीनता भाष ॥

कबीर वचन ।

कहे कबीर सुनो खगराया । मिले ना समर्थ सद्गुरु दाया ॥
आपन जीव सम सब कह लेखे । एके राम सकल घट पेखे ॥
सुर असुरारी चाल निहारे । नीर क्षीर बिलगाइ सुधारे ॥
ज्ञान औ मनकी दशा विचारे । सतपद गहि गुरु सुरत निहारे ॥
जेते आमिष मीन मद मांसू । परधन परनिंदा उपहासू ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन गुरुड सुजाना । अंकुर सुगंध पवित्र फुल पाना ॥
दोहा—गुरु कहैं करता जाने, साधन गुरु कह लेख ।
कहैं कबीर सुन खगपाति, राम सकल घट देख ॥

गुरुडवचन ।

गुरुड कहे तब सीस नवाई । सत्यकबीर तुम समर्थ साई ॥
तुम्हरे सिखापन हृदय मानो । शरण देहु कहे श्रीमगवानो ॥

कबीरवचन ।

श्रीकृष्ण तुम त्रिभुवन राऊ । गुरुडहि बोधे कहहु सुभाऊ ॥

१६

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-शब्द हमारे शीतल, अमृत मोद सो भाव ।

भक्तपंथ समिता ज्ञान दृढ, अभे सुक्त पद लेव ॥
भले गुरुड जाय आनहु साजा । गह २ वैकुंठ वाजन बाजा ॥
कहे गुरुड भाषहु प्रभु साउज । सत्यपुरुष कह चढे सब सांउज ॥
कहे कबीर नारिअर भरपूरा । सेत गरी मिष्टान खजुरा ॥

दोहा-पान फूल चंदन सुाचि मेवा, गऊ घृत जोत प्रकाश।
सो अमर प्रत नाम गुरु, चरण सतिहर दास ॥

सेत सिंहासन क्षत्र चंदेवा । ध्वजा पताका सेत सजेवा ॥
गुर मिष्टान छान जल झारी । थार जोतिधर पंच मुख वारी ॥
आज्ञा मांग गुरुड उठ धाये । तैतिस कोट देव हकराये ॥

सवा लाख नीरअर ले आना । सवा सो मन मिष्टान प्रवाना ॥
कृष्णहि नेवत दीन्ह कर जोरी । तुव प्रताप गुरु मम बंदछोरी ॥
शिव सनकादि ब्रह्मादि विष्णुवादी । देवकृष्ण सुन सुखसे सादी ॥

सब मिल आय कीन्ह धुन ध्याना । भजन अखंड शब्द प्रवाना ॥

दोहा-सकल देव मुनि चक्रित, गुरुड शरण सतनाम ।

सत्यकबीर जो सुमरे, तेहि गाढे आवे काम ॥
दीन्ह पान यम त्रिण तोराई । चरणासुत तिलक दठाई ॥
पाय प्रवाना गुरुड अनंदा । जस चकोर पाये निस चंदा ॥
महायसाद सकल मिल लीन्हा । विनवहिं गुरुड असीस तब दीन्हा

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण स्वगति बढ भागी । तुम सदुरुके दास सुभागी ॥
धन्य भाग तेहि प्राणी केश । शरण कबीर गये दुख फेरा ॥

कबीरकृष्णगीता

( ९७ )

सरगुण भक्त जो आवा गौना । तन थर दुख सुख पावे पवना ॥
निर्गुण भक्त शरण सतनामा । नाम कबीर भजन सुखधामा ॥

दोहा—कहैं कबीर सुन खगपाति, नाम कबीर कंडहरा।

निरगुण भक्त सब ऊपर, आवागवन निवार ॥

सकल देव मिल स्तुति लावा । बडे भाग हम दर्शन पावा ॥

व्यासदेव सुखदेव सुनियारद । विनती करें सुरपाति गण शारद ॥

श्रीकृष्णसे पूछे व्यासा । कबीरकी माहिमा करहु प्रकाशा ॥

तुमते भेछ कबीर कस भयऊ । यह चरित्र हम जान न पायऊ ॥

श्रीकृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख जाना। कबीर आद करता निरवाना ॥

निरंजन हमरे पिता दृग काला । जार मार जिव करहि बेहाला ॥

सतकबीर काल शिर भंजन । कबीर नाम ते त्रसित निरंजन ॥

दोहा—तीन लोकते न्यारा, अमरलोक विस्तार ।

जो कबीरको सुमरे, सोइ उतरे भौपार ॥

कहैं कृष्ण मैं कहों परमारथ । निर्गुण भक्त जन्म जुग स्वारथ

जब कलकाल निरंजन कोपिहै । भिटिहै दया धर्म विश रोपिहै ॥

गंगा सती सिद्ध औ साधक । सबके सत घटि है कलबाधक ॥

गिराकार सब जीव गरासे । भक्तहीन तेहि काल तरासे ॥

निर्गुण भक्तिहीन जो प्राणी । पापी पुनी जार सब सानी ॥

सबकर सत् काल बिचलाई । कबीरसे संत अडे रहाई ॥

गाहैं ताहि कबीर ले राखी । आगे तेहि निजु कबीर हरि भाबी ॥

९८

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-अजर मुक्त सो पावे जो, सुभरे सत्यकबीर ।

नरकी दैही त्यागके, हिरंमर धरे शरीर ॥

७३ पंडव नारद सुख व्याप्ता । एक दिन सुन कस भयउ तमाप्ता ।
जीव एक सतलोक चलि जाई । दूत ताहि नहिं पायउ प्राई ॥
गये दूत धर्मरायके पास । धर्मराय आप यम वासा ॥
हम त्रिय बंधु यम सहित सिधायो । हेरत जीव कितहु नहिं पाये ॥
सब थाके हम देश देखा जाई । सुन्यके पार मानसर जाई ॥
महासुगंध देश उजियारा । कामिन शोभा अकह अपारा ॥
कोटिन चंद सूर्य छवि एका । हंस असंख हंसनि तेहि रेखा ॥

दोहा-जहैं सतपुरुष कबीर निज, सो नहिं देखेउं ठौर ।

पुरुषलोकको आभा, मानसरोवर मोर ॥

अपनी कंचन उदित अटारी । हंसनीको लगी गंध हमारी ॥
द्वारपाल एक पठडन वेगी । देश निकार धायो बहु वेगी ॥
मोहिं घर बांहनीकारीस बाहर । मैं सुभरेउं कबीर तेहि ठाहर ॥
तहैं कबीर मोहि लीन्ह बचाई । बार अनेक दया उर लाई ॥
जहांसे गयऊं निरंजन खोदा । कबीरके आद न जाने वेदा ॥
कबीर सबनके आद बखाना । कबीरके आद कोई नहिं जाना ॥
कबीर नाम कायाको वीरा । कदली तन पौनगरसीरा ॥

दोहा-काया कदल दल, गुप्त प्रगट कबीर ।

सबके भीतर बाहर, स्वास निहस्वास शरीर ॥

सचलोककी ऐसी शोभा । कहि न सिराय मोर मनलोभा ॥
एक हंस तरवन जोती । छिन्न एक महैं देखऊं ससीकोती ॥

कृष्ण गरुड सम्वाद

कबीरकृष्णगीता ।

९९

एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥
निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥
जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥
तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥
तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥

दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।

ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥
जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥
सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥
सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥
विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥

कबीरवचन ।

हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥
हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥
जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥

दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।

दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥

गरुडवचन ।

गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥
कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥
कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा
औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥

१००

कबीरकृष्णगीता ।

श्रीकृष्णवचन ।

सुन खगेशे कहे त्रिभुवनराई । सबकी गति मैं कहों बुझाई ॥
सतकबीरकी भक्ति जो करि हैं। सो सत सत्यलोकपगु धरि हैं ॥
अमरवीर हिरभर काया । सवी सुवास अभी फल पाया ॥

दोहा—सत्यकबीरके सेवक, बहुर योनि नहीं आव ।
अमरलोक सुख विलसे, निरभे कैल कराव ॥

निरगुण अजर कबीरा जिवतारा । सरगुण भक्त जो दस औतारा ॥
नकली निरगुण निरंजनराई । जिनके हम योहदार कहाई ॥
सकल मूल निरगुणकबीरा । सरगुण राम कृष्ण मम लीला ॥
हमरी भक्ति जो करे सचेता । सब तज गुरु साधुनसो हेता ॥
ब्रह्म बोलता पूजे सोई । माटी पाथर साधु न जोई ॥
कपिलगऊ भाव धर रहई । भला बुरा ये सबके सहई ॥
जीव मृतक होय मोहिं भावे । सब वैकुंठ साधु तन पावे ॥

दोहा—जवलग मैं वैकुंठ रहों, तवलग मेरे पास ।

प्रभु आज्ञा मैं औतारों, मम अश्रित गर्भवास ॥
रहित मुक्त नहीं हमरे हांथा । रहित मुक्त कबीर गुरु दाता ॥
करे मम भक्त देह मैं तारों । सत्यकबीर देह निस्तारों ॥
सद्वरु समर्थ रूप हमारा । योह समान को आन विचारा ॥
एक भैन औ कबीरसे भाई । कलुक निरंजन अस्थान जब जाई
और सब हैं हमरे आसा । शिव अज सनकादिक मम दासा ॥
देह मुक्तको हम हैं दाता । जीवके मुक्त कबीरके हांथा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१०१

देह सुक करे सो पावे । पाप पुण्यमहैं आवे जावे ॥
गाढके हीन सो दानहि पावे । तेहि औसर साकट पछतावे ॥

दोहा—देह सुक थह जानहु, देह धरे फल पाव ।

सत्यकबीर जो सुमरे तो, बहुर योनि नहिं आव।
रज तम लक्षण भूत पिशाचा । सतगुण साधु संत प्रकाशा ॥
रज तम चाल परे चौरासी । सतगुण देह सुक विश्वासी ॥
कर्म भ्रमकी छूटे आसा । आवागैन निरंजन फांसा ॥
निरंजन सेवक कबीरको अंसा । कबीर जेमुख तेहि विषंसा ॥

दोहा—खरा खोटा सब पाखे, पारसी निरंजन राय ।

पुरुष प्रवाना देखि सिर नावे, विना छाय धरखाय ॥
कहे कृष्ण पंनग अरि सुनहू । कहूं ज्ञान अपने मन गुनहू ॥
सतगुरु भक्त पपील चलानी । निरगुण भक्त विहँग बखानी ॥
पंछी विहँग उड जाय अकाशा । नहिं पपील चढ सके बेआसा ॥
जहां इच्छा तहैं जाय विहँगा । चढ़ि सरगुण मता अुअंगा ॥
कोट माहि सरगुण गति पावे । निरगुण भक्त सबे तर जावे ॥

दोहा—निरगुण महिमा अगम है, सरगुण सके न कोय ।

सरगुण उपजन विनसन, निरगुण विन गति नहिं होय ॥
सतयुत नेता द्वापर काली । चहुँगुण निरगुण अजर अमाली
निरगुण सरगुण सबके मूला । सोई सत्यकबीर हरि बोला ॥

दोहा—हमरी तुम्हरी को कहे, कबीर सबनके मूल ।

कहे कृष्ण सुने खगपती, को कबीर सम तूल ॥

शुकदेव कबीर सम्वाद

१०२

कबीरकृष्णगीता ।

बोले गरुड विहसिके वाणी । मम जीवन शुभ सट्टरु जानी ॥
चरणोदक ले निर्मल भयऊ । सट्टरु चरण हियभहँ धरऊं ॥
व्यासदेव सुखदेव सिर नाये । बडे भाग्य हम दर्शन पाये ॥
व्यासदेव सुनि नारद पूछा । हमहुको है भक्तिकी इच्छा ॥
पान प्रवाना हमको दीजे । सुत्कदान हमहूको कीजे ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो सब कोई । जीव दया विन मुक्त न होई ॥
जीवदया धर सट्टरु सेवे । सबसे गीत नाम चित देवे ॥
सबमें सोर मिता अब राधा । स्थिर सत्यनाम निज नामा ॥
विना भक्ति भगवंत न भेटे । सट्टरु विना ना संशय भेटे ॥
सट्टरु कहैं कबीर हम आहीं । सट्टरु अंश विष्णुके माहीं ॥
सट्टरु अंश जीव सत सबमें । राम कृष्ण मम अस कहो अवमें ॥
हमरे अंश निरंजन राधा । तीन लोक अधिकार तिन पाया ॥
तिन पुन आपन अंस उत्पाना । छल छुटम मान अभिमाना ॥
छल औ क्षुद्र विष्णु बहुरंगा । ब्रह्मा कुभत हंग रुद्रंगा ॥
रजगुण ब्रह्मा विष्णु सतोगुण । काल प्रले जन रुद्र तमोगुण ॥
अष्टंगी वटपारकी बुदिया । वटपार निरंजन सब जिव लटिया ॥
एक सै वै विष्णु सत भाषा । विष्णु नाम तब सट्टरु भाषा ॥
रजगुण तमगुण लोहु धातू । पुरुष अंस जीव सट्टरु सातू ॥

दोहा-निरंजन जीव झरकावे, सवा लक्ष नित खाय ।
कहैं कबीर जो मोही भजे, तेहि यम निकट न जाय ॥

कवीरकृष्णगीता ।

१०३

व्याससुखदेववचन ।

व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥
विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥
अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥
दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥
चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा
हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥
साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥
बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥
कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥
हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥
हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥
सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥
जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥
विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥
क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥
जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥
हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥
सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥

कृष्ण कबीर सम्वाद

१०४

कबीरकृष्णगीता ।

निरंजनके वंश यज्ञारा । एक विष्णु तेहि पुरमें सारा ॥
सांच विना बांचे नहिं कोई । भक्त बेपुस तेहि काल बिगोई ॥
तुम कहैं विष्णु चिंता कछुनाहौं । तुम्हरे पास हम सदा रहार्हौं ॥
नरक परे नहिं देहो तोहौं । जो तुम ध्यान शासिहो मोहौं ॥
कि होय सेवक या होय स्वामी । संत गाढ पहुंचे सुरत गामी ॥
जो जेहि नाम न ध्यावे प्राणी । तासु लोक पहुंचे निज गामी ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण कबीर बल मोश । करताके करता बंदी छोरा ॥
दोहा-मैं कबीर कहैं चीन्हा, कबीर रूप करतार ।
करता निरंजन कितम, कहैं कृष्ण निरवार ॥
कबीरवचन ।

यह सुन कबीर कृष्णकंठलावा । सीस हांथ दे निकट बैठावा ॥
कहैं कबीर तुम हमरे अंशा । हम चीन्हे विन काल विधंसा ॥
निराकार कहैं जब उपजाया । स्वास तेज कंभी तन आया ॥
आगम तास होय यह काला । जीवन कहैं यम करे बेहाला ॥
तब पुन पुरुष दीन्ह तेहि आषा । योगजीत तेरो सिर खाषा ॥
योगजीत तब उत्पन्न दीन्ह। ताके आस निरंजन छीना ॥
चौंसठ युग सेवा लव लावा । सेवा वस्य राज तिन पावा ॥
अमरलोक ते गये निकास। जब अछूंगा कीन्हे आसा ॥
योगजीत डर काल डराई । नाम कबीर सुनत छिप जाई ॥
वस्तु जीव सब साज हमरा । निरंजन कहैं सौपाल भारा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१०५

पुरुष आज्ञा तज मन मत ठाना । निरंजन तोपे काल दिवाना ॥
जीवन कहैं तिन करे अहारा । जीव विवश हो परे बिचारा ॥
तव मोहिँ दाद जीवनकी आई । दासा तन धर भाके दहाई ॥
जो जिव भाके हमारी करि हैं । ताको काल खूंट नहिँ धरि हैं ॥
चारों युग जिवलोक पठावा । युग प्रवान नाम जिव गावा ॥

दोहा--सतयुग सत सुकृत अंचित, त्रेता नाम मुनीन्द्र ।

द्वारपर करुणामय भये, कलयुग नाम कबीर ॥
कहैं कृष्ण तोहि तबहीं चीन्हा । जब पताल राख मोहि लीन्हा ॥
औ सबके गाढे उपकरहू । प्रेमवश्य तुम ओट न धरहू ॥
अहो साहेब मैं तुम्हरे दासा । अजर मुक्त है तुम्हरे पास ॥
पिताके उर छल शुद्ध कछु करहूँ । पिता निरंजन डर हम डरहूँ ॥
बहुर भरोस तुम्हारो सोई । पुण्य धर्मके बात चलाई ॥
निरंजन जाना हमरी वाता । कबीर कृष्ण दोह एके मतराता ॥
जीव दया गुरु भक्त बखानहु । सतसंगति महिमा कथि आनहु ॥
रामनाम गुरु साधुसे नेहा । कहैं कबीर राम गुरु देहा ॥
ठाकुर कहैं मानुष जनि जानहु । राम कृष्ण करता पाहिचानहु ॥
रामकृष्णके हम लघु जेठा । जैसे फेर जन्मपितु बेटा ॥

दोहा--राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके दास ।

स्वामी सेवक होयके, करहिं भक्त प्रकाश ॥

तुम हो व्यास विष्णु औतारा । चौविस महीं तुम भक्त सियारा ॥
हम हरि वंश विष्णु मम अंसा । भक्त रूप हम विष्णु प्रशंसा ॥

१०६

कबीरकृष्णगीता ।

विष्णु दया जब कीन्ह पुकारा । तब जानो हमरे संचारा ॥
जवहिं निरंजन विष्णु समाई । तब कर विष्णु कपट चतुराई ॥
सबपर श्रेष्ठ जानो सतनामा । कहैं कबीर गुरुपद विश्रामा ॥
गुरुसोई जो यमसो उबारे । जन्म मरण दुख दारुण तारे ॥
कहैं कबीरसो सद्गुरु जानो । राम कृष्णको स्वयं बखानो ॥

कृष्ण वचन ।

कहैं कृष्ण हम निहचे जाना । हम सब पर कबीर प्रवाना ॥
निरंजन आद सो अजर कबीरा । स्वासरूप रमै सकल शरीरा ॥
हममहैं तुममहैं सोहंग जीऊ । स्वास रूप तन जीवके पीऊ ॥
जीव सब अंश कबीरके भाई । देह निरंजन राय बनाई ॥
जो जिव लैहो कबीरके पाना । ताके डर निराकार डेराना ॥
कोटिन केर काल मोहि खावा । निराकार अज शिवहिं नचावा
और जीव केहि लेखा माहीं । रहटके घरिया आवहिं जाहीं ॥

दोहा-रहटके घारिया सरगुण, रीते भर उत्तराय ।

भरी उरध भर खाली, निडर कूपके जाय ॥

जब नहिं धरती अकाश पताला । जब नहिं देह जगत कित काला
नाहिं निरंजन आद भवानी । वहिं तब त्रिगुण पवन औ पानी
तब नहिं दश अवतार मम भयऊ गंगा जती सती नहिं रहऊ ॥
तबकी कहैं कबीर सहिदानी । जबकी काहु मर्म न जानी ॥
कबीर बढाई हम कह दीन्हा । आप मै दास करता मोहि कीन्हा
कहैं कृष्ण सुन आद कहानी । जाके आद वेद नहिं जानी ॥
निर्गुण आद पुरुष अविनाशी । कबीर कहाये प्रगट भये कासी ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१०७

दोहा-निर्गुण मूल सकलके, निर्गुण मता अगाध ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास मुनी, कबीर भजे सो साध ॥

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम सब देवन मैं प्रधाना ॥

श्रीमुखसे तुम मोहि वखाना । तुम त्रियलोक धनी हम जाना ॥

सेवक कहैं स्वामी पत देई । स्वामी सेवे सेवक सोई ॥

दोहा-कबीर नाम हरि गावहीं, गुरुके ध्यान अधार ।

गुरु गोविंदके लेखहीं, साधराम रूप अधार ॥

कृष्णवचन ।

कृष्ण कपिल कबीर पगु गहा । सुन स्वामी तुम कैसे कहा ॥

तुम्हरे समान न देखौं काहू । हम सब कर तुम हाथ निवाहू

और सबे सरिता चौमासा । जेठ झुराय सिंधको आसा ॥

सिंधुको जल संसार बिडाई । मेघमाला छपनकोट बरसाई ॥

सरिता सिंधुको सेवक आहीं । स्वामी सरवर कबहुँ नहीं चाहीं

निरगुण वास फूल भये सरगुण । सरगुण देह बोलता निरगुण ॥

कहैं कृष्ण मोहि देहू पाना । तब डर काल मोहि नहीं जाना

जो २ जीव शिष्य सब तोरा । तुव बल जाहि लोक बल जोरा

हमहू कहैं इच्छा यह आई । तुव प्रताप लोक हम जाई ॥

कबीर वचन ।

कहैं कबीर तुम हमरे आहू । राज करहु तुव रक्षक साहू ॥

जो तुम होहु प्रगट मम चेल। निराकारको मिटि है सेला ॥

गुप्त हृदय मैं हमकहैं राखहु । प्रगट निरंजन महिमा भाषहु ॥

१०८

कबीरकृष्णगीता ।

जासो गीत हृदय बस जीवा । अंतकाल प्राप्त सोह पीवा ॥
सबसो गीत खसस सो सेजू । सत पग हिय विषै कित तेजू ॥
मुखसो गीत सबहिं प्रभु जानी । गुप्त प्रगट पिथा व्रत चित ठानी
भली छांड नहिं करिय सदाई । भली भला सुरत संतन गाई ॥
कोई मदवारे सो मदफल पावे । विजधर भे मद माद समावे ॥
दोहा-कहैं कबीर श्रीकृष्णसों, जानि छांडहु सत व्योहार ।

सत्ताहिं ते गत पाईये, झूठहिं नरकमें डार ॥
कोटिन काल निरंजन आवै । जो माहि जपै ताहि नहिं पावे ॥
युग २ नाम हमारो गावे । यम विण तोड प्रवाना पावे ॥
हर स्वांस सतनाम समावे । गगन गगन सतनाम सुहावे ॥
अघर सघर दृग दश प्रकाशा । भीतर बाहर राम निवासा ॥
यंत्र मंत्र औषध तप योगा । तीर्थ व्रत देव चंदन भोगा ॥
सबे आस तज भज गुरु साधू । कहैं कबीर सब भेर उपाधू ॥
डरे न यमसो बल कै मोरा । सुमरे नाम कबीर बंदीछोरा ॥
पूजे बोलता सब जिव राधा । मन वच कर्म सतनाम विश्रामा ॥
राधे ध्यान तो जियत तेहि भेटै । विश्वासी जियहिं अंत दुख भेटै ॥
सुन आतुर हरि साज मंगावा । नरिअर पान मिष्टान्न सुहावा ॥
सबे साज आनेउ बहुताई । घृत पकवान सुवास बसाई ॥
सकल देवतन भोजन कीन्हा । तेहि पाछे हरि वीरा लीन्हा ॥
यम विण तोर काल मुख थूँका । दीन्हो पान भेट सब चूका ॥
सतगुण देवता कोट इकादस । सनन पान लीन्हा हरि पारस ॥
रजगुण तमगुण पेल पराने । विष्णु व्यासको निंदा ठाने ॥

कबीरका अपने पन्थकी बात कृष्णसे कहना

कवीरकृष्णगीता ।

१०९

कृष्णवचन ।

यहा आनंद कृष्ण मन भयऊ । मन हम राज निकंटक पायऊ ॥
जेहि रक्षक भये सत्यकबीरा । बार न बंके तासु शरीरा ॥
कृष्णके दुरवासा ऋषि गुरु हैं । सत्य कबीर सबके सटुर हैं ॥
सत् मिले सतकबीरके हाटा । सत् विना जिव वारा बाटा ॥
तीन लोक महीं डंका परिया । सबते श्रेष्ठ कबीर ठहरिया ॥
जीव उबारन ताके सब दासा । विष्णु व्यास सतनाम प्रकाशा ॥
कहैं कृष्ण सेवक जत वाणी । हम तुम सेवक सेवक जानी ॥
जगमहैं कौतुक पंथ चलाई । निज पंथ इस ताहि बलताई ॥
दूत हमार तासु रह दासा । जो कोई होय कबीर गुरु आसा ॥
सबीर नाम प्रति स्वास जप प्राणी । कबीर नाम भज लहे सुखधामी

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम हमरे महीं सकल समाना ॥
जब तुम चाहो दरस मम किया । नाम सरूप प्रेम चित दिया ॥
जाके नाम सरूप चितलावे । गुप्त प्रगट ते दर्शन पावे ॥
अब तुम इच्छा हमरे हांथा । हमरे दास कहैं देहौ साथा ॥
धर्मदास मम अंस औतारा । थापेउं ताहि जम्बूद्वीप कडिहारा ॥
दोहा—धर्मदासके अगुवा, जाग्रित च्छ्रामनदास ।
हम जग होय जगाइब, करव पंथ प्रकाश ॥
जा गुरु नांद पुत्र धर्मदासा । व्यालिस वंश धर्म दास प्रकाशा ॥
पुन एक सुरत गोपाललेव नाऊ । तुम्हरो प्रीत गोपाल सुन भाऊ ॥
तुम्हरी सुरत रहे मम अंगा । हम तुम व्यापक सकलो संगा ॥