कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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कृष्णवचन ।
यहा आनंद कृष्ण मन भयऊ । मन हम राज निकंटक पायऊ ॥
जेहि रक्षक भये सत्यकबीरा । बार न बंके तासु शरीरा ॥
कृष्णके दुरवासा ऋषि गुरु हैं । सत्य कबीर सबके सटुर हैं ॥
सत् मिले सतकबीरके हाटा । सत् विना जिव वारा बाटा ॥
तीन लोक महीं डंका परिया । सबते श्रेष्ठ कबीर ठहरिया ॥
जीव उबारन ताके सब दासा । विष्णु व्यास सतनाम प्रकाशा ॥
कहैं कृष्ण सेवक जत वाणी । हम तुम सेवक सेवक जानी ॥
जगमहैं कौतुक पंथ चलाई । निज पंथ इस ताहि बलताई ॥
दूत हमार तासु रह दासा । जो कोई होय कबीर गुरु आसा ॥
सबीर नाम प्रति स्वास जप प्राणी । कबीर नाम भज लहे सुखधामी
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम हमरे महीं सकल समाना ॥
जब तुम चाहो दरस मम किया । नाम सरूप प्रेम चित दिया ॥
जाके नाम सरूप चितलावे । गुप्त प्रगट ते दर्शन पावे ॥
अब तुम इच्छा हमरे हांथा । हमरे दास कहैं देहौ साथा ॥
धर्मदास मम अंस औतारा । थापेउं ताहि जम्बूद्वीप कडिहारा ॥
दोहा—धर्मदासके अगुवा, जाग्रित च्छ्रामनदास ।
हम जग होय जगाइब, करव पंथ प्रकाश ॥
जा गुरु नांद पुत्र धर्मदासा । व्यालिस वंश धर्म दास प्रकाशा ॥
पुन एक सुरत गोपाललेव नाऊ । तुम्हरो प्रीत गोपाल सुन भाऊ ॥
तुम्हरी सुरत रहे मम अंगा । हम तुम व्यापक सकलो संगा ॥