सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 114

१००

कबीरकृष्णगीता ।

श्रीकृष्णवचन ।

सुन खगेशे कहे त्रिभुवनराई । सबकी गति मैं कहों बुझाई ॥
सतकबीरकी भक्ति जो करि हैं। सो सत सत्यलोकपगु धरि हैं ॥
अमरवीर हिरभर काया । सवी सुवास अभी फल पाया ॥

दोहा—सत्यकबीरके सेवक, बहुर योनि नहीं आव ।
अमरलोक सुख विलसे, निरभे कैल कराव ॥

निरगुण अजर कबीरा जिवतारा । सरगुण भक्त जो दस औतारा ॥
नकली निरगुण निरंजनराई । जिनके हम योहदार कहाई ॥
सकल मूल निरगुणकबीरा । सरगुण राम कृष्ण मम लीला ॥
हमरी भक्ति जो करे सचेता । सब तज गुरु साधुनसो हेता ॥
ब्रह्म बोलता पूजे सोई । माटी पाथर साधु न जोई ॥
कपिलगऊ भाव धर रहई । भला बुरा ये सबके सहई ॥
जीव मृतक होय मोहिं भावे । सब वैकुंठ साधु तन पावे ॥

दोहा—जवलग मैं वैकुंठ रहों, तवलग मेरे पास ।

प्रभु आज्ञा मैं औतारों, मम अश्रित गर्भवास ॥
रहित मुक्त नहीं हमरे हांथा । रहित मुक्त कबीर गुरु दाता ॥
करे मम भक्त देह मैं तारों । सत्यकबीर देह निस्तारों ॥
सद्वरु समर्थ रूप हमारा । योह समान को आन विचारा ॥
एक भैन औ कबीरसे भाई । कलुक निरंजन अस्थान जब जाई
और सब हैं हमरे आसा । शिव अज सनकादिक मम दासा ॥
देह मुक्तको हम हैं दाता । जीवके मुक्त कबीरके हांथा ॥