कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनके वंश यज्ञारा । एक विष्णु तेहि पुरमें सारा ॥
सांच विना बांचे नहिं कोई । भक्त बेपुस तेहि काल बिगोई ॥
तुम कहैं विष्णु चिंता कछुनाहौं । तुम्हरे पास हम सदा रहार्हौं ॥
नरक परे नहिं देहो तोहौं । जो तुम ध्यान शासिहो मोहौं ॥
कि होय सेवक या होय स्वामी । संत गाढ पहुंचे सुरत गामी ॥
जो जेहि नाम न ध्यावे प्राणी । तासु लोक पहुंचे निज गामी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण कबीर बल मोश । करताके करता बंदी छोरा ॥
दोहा-मैं कबीर कहैं चीन्हा, कबीर रूप करतार ।
करता निरंजन कितम, कहैं कृष्ण निरवार ॥
कबीरवचन ।
यह सुन कबीर कृष्णकंठलावा । सीस हांथ दे निकट बैठावा ॥
कहैं कबीर तुम हमरे अंशा । हम चीन्हे विन काल विधंसा ॥
निराकार कहैं जब उपजाया । स्वास तेज कंभी तन आया ॥
आगम तास होय यह काला । जीवन कहैं यम करे बेहाला ॥
तब पुन पुरुष दीन्ह तेहि आषा । योगजीत तेरो सिर खाषा ॥
योगजीत तब उत्पन्न दीन्ह। ताके आस निरंजन छीना ॥
चौंसठ युग सेवा लव लावा । सेवा वस्य राज तिन पावा ॥
अमरलोक ते गये निकास। जब अछूंगा कीन्हे आसा ॥
योगजीत डर काल डराई । नाम कबीर सुनत छिप जाई ॥
वस्तु जीव सब साज हमरा । निरंजन कहैं सौपाल भारा ॥