कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥
निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥
जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥
तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥
तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥
दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।
ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥
जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥
सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥
सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥
विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥
कबीरवचन ।
हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥
हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥
जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥
दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।
दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥
गरुडवचन ।
गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥
कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥
कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा
औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥