कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सद्गुरु सत्य कबीर हैं, निहचल अजर शरीर ।
भौसागर तारन तरन, समर्थ सत्य कबीर ॥
व्यास सुखदेव समेता । अज हरि हर प्रभु कृपानिकेता ॥
नारद ऋषि इंद्रादि सनकादी । सके न कोई कबीरसंवादी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुखदेऊ । कबीरहिं मानुष कहे जनि कोऊ ॥
कबीर सर्वाधिक करताके करता । भरी ठरै फिर खाड़ी भरता ॥
भक्त रूप धर प्रगट दिखाये । गुरुकी भक्ति ठिग दास कहाये ॥
युग २ रक्षा हमरी कीन्हा । भक्त रूप होय दर्शन दीन्हा ॥
रामरूप संग लक्ष्मण सीता । सत्यकबीर बन दास पुनीता ॥
दोहा-कहैं कृष्ण सब कोइ सुनो, इत उत दास कबीर ।
सतकबीर सत युग २ सुमेर, दोउ दीन गुरु पीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास सकल मिल वाणी । धन्य कबीर जेहि कृष्ण बखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख देऊ । हमहु न लखा कबीरका भेऊ ॥
जब कबहुँ हम त्रसित निरंजन । तहां कबीर काल शिर भंजन ॥
कबीरको चरणोदक जब लीन्हा । जबते अगम गम्य हम चीन्हा ॥
हमरे कहे के पिता निराकारा । हम कहै ये कबीर प्रतहारा ॥
कबीरके पांव निरंजन लागे । और जीव कहा कस आगे ॥
निरंजन एक दिन प्राप्त धाये । कबीर नाम जप जीव बचाये ॥